ऑस्ट्रेलियाई संसद में 'सिख दंगों' पर प्रस्ताव पेश

खास बातें

  • ऑस्ट्रेलियाई संसद के एक सदस्य ने सदन में एक प्रस्ताव पेश कर, तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद नवम्बर 1984 में भड़की भीषण हिंसा को सिख समुदाय के खिलाफ नरसंहार की मान्यता देने की मांग की है।
कैनबरा:

ऑस्ट्रेलियाई संसद के एक सदस्य ने सदन में एक प्रस्ताव पेश कर, तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद नवम्बर 1984 में भड़की भीषण हिंसा को सिख समुदाय के खिलाफ नरसंहार की मान्यता देने की मांग की है।

ज्ञात हो कि 31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी के सिख अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी थी। उसके बाद राजधानी नई दिल्ली में तीन दिनों तक हुई हिंसा में कम से कम 3,000 सिख मारे गए थे।

ऑस्ट्रेलियाई सर्वोच्च परिषद ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि लिबरल पार्टी के मुख्य विपक्षी सचेतक वारेन एंस्टक ने गुरुवार को हाउस ऑफ रिप्रजेनटेटिव्स में 1984 के सिख 'नरसंहार' से सम्बंधित प्रस्ताव पेश किया। जब एन्स्टक प्रस्ताव पढ़ रहे थे, उस वक्त संसद दीर्घा में सिख समुदाय के कई सारे लोग मौजूद थे।

एन्स्टक ने कहा, इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि आज 1 नवम्बर के दिन इन हमलों को 28 साल हो गए हैं।

उन्होंने कहा, जब तक इन्हें 'सिख विरोधी दंगे' कहा जाता रहेगा, तब तक सिख समुदाय के खिलाफ इस तरह की हिंसा समाप्त नहीं हो सकती। व्यापक हिंसा और नरसंहार पर चर्चा हमेशा विवादास्पद बनी रहेगी, बल्कि इस तरह के ऐतिहासिक अन्यायों को नकारते रहने से आज मानवता के खिलाफ हो रहे अपराधों को प्रोत्साहन ही मिलेगा।

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प्रस्ताव में ऑस्ट्रेलियाई संसद से नवम्बर 1984 में सिख समुदाय के खिलाफ हुई हिंसा को भीषण हिंसा का एक संगठित अभियान करार देने तथा इन हत्याओं को प्रीवेंशन एंड पनिशमेंट ऑफ द क्राइम ऑफ जीनोसाइड पर संयुक्त राष्ट्र संकल्प के मुताबिक 'नरसंहार' करार दिए जाने की मांग की गई है।

इसमें कहा गया, नवंबर 1984 में सिखों, उनकी सम्पत्ति व उनके प्रार्थना स्थलों पर जानबूझकर किया गया हमला इस अपराध को 'नरसंहार' बनाता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन, सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) ने इसका समर्थन किया है।