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एक समय मुल्ला उमर का भी गुरु था अफगान तालिबान का नया चीफ आतंकी हैबतुल्ला...

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एक समय मुल्ला उमर का भी गुरु था अफगान तालिबान का नया चीफ आतंकी हैबतुल्ला...

हैबतुल्ला अखुंदजादा (फाइल फोटो)

अफगान तालिबान का नया नेता हैबतुल्ला अखुंदजादा इस आतंकी संगठन के पूर्व प्रमुख मुल्ला मंसूर के दो सबसे भरोसेमेंद सहायकों में से एक है। अखुंदजादा का मतलब होता है- शिक्षक। खास बात यह कि यह कुख्यात आतंकी और पूर्व तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर का भी गुरु रहा है। वास्तव में मुल्ला अख्तर मंसूर की मौत के बाद तालिबान के मुखिया के रूप में दो नाम चल रहे थे पहला सिराजुद्दीन हक्कानी और दूसरा हैबतुल्ला अखुंदजादा। आखिर में अखुंदजादा के नाम पर मुहर लगी। आइए जानते हैं इस नए आतंकी सरगना के बारे में-
 
मुल्ला उमर ने बताया था अपना टीचर
अखुंदजादा का नाम सुनने में नया लग रहा है, लेकिन वास्तव में वह तालिबान के लिए नया नहीं है और इस आतंकी संगठन का जाना-पहचाना चेहरा है, जिसकी गहरी पैठ है। अखुंजदा, मुल्ला मंसूर के बाद दूसरे नंबर का लीडर था और उसके प्रमुख सहायकों में से एक रहा है। उम्र में वह मुल्ला उमर से भी बुजुर्ग है। इतना ही नहीं, मुल्ला उमर उसे अपना टीचर बताता रहा है।

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शरिया का प्रमुख भी रहा है हैबतुल्ला
तालिबान के शासनकाल में अखुंदजादा, शरिया का प्रमुख भी रहा है और वह न्यायिक प्रशासन भी देखता था। गौरतलब है कि 2001 में तालिबान का शासन खत्म हो गया था। अखुंदजादा की पहचान एक धर्मगुरु के रूप में भी रही है जो तालिबान के वजूद और संघर्ष को लेकर सार्वजनिक रूप से लोगों के बीच विचार व्यक्त करता रहा है और लोगो में इस संगठन में शामिल होने के लिए प्रेरित करता रहा है। उसे आक्रामक अंदाज के लिए जाना जाता रहा है, इसलिए अफगानिस्तान में तालिबान का संघर्ष तेज होने की संभावना भी जताई जा रही है।


कंधार का है रहने वाला
अखुंजदा मूलतः कंधार का रहने वाला है, जो नूरजई कबीले से है। वास्तव में इस कबीले की तालिबान लीडरशिप में गहरी पकड़ रही है। संभवतः यही कारण है कि हक्कानी के ऊपर अखुंदजादा को तरजीह दी गई।
 
अफगान का सबसे ताकतवर आतंकी संगठन है तालिबान
तालिबान अफगानिस्तान का सबसे ताकतवर आतंकी संगठन है। तालिबान के हाल ही मारे गए मुखिया मुल्ला अख्तर मंसूर का चयन दो साल (लगभग अप्रैल 2013 में)पहले मुल्ला उमर की मौत के बाद किया गया था। हालांकि मुल्ला मोहम्मद उमर के भाई मुल्ला अब्दुल मन्नान ने मुल्ला अख्तर मोहम्मद मंसूर के चयन का विरोध किया था। यही नहीं मुल्ला उमर के बेटे याकूब ने भी मंसूर को तालिबान के बड़े हिस्से का समर्थन नहीं होने की बात कही थी। बाद में यह मामला सुलझा लिया गया था।



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