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अब विमानों से छोड़े जा सकने वाले रॉकेट बनाएगा चीन, जो उपग्रहों को प्रक्षेपित करेंगे

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अब विमानों से छोड़े जा सकने वाले रॉकेट बनाएगा चीन, जो उपग्रहों को प्रक्षेपित करेंगे

ज़मीन से लॉन्च किए जाने वाले रॉकेटों का विकल्प होंगे विमानों से लॉन्च किए जा सकने वाले रॉकेट (प्रतीकात्मक चित्र)

बीजिंग: भारत का पड़ोसी देश चीन अब ऐसे रॉकेट विकसित करने जा रहा है, जिन्हें विमानों के ज़रिये अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जा सकेगा, और ये रॉकेट अंतरिक्ष में उपग्रहों को प्रक्षेपित कर सकेंगे.

हवा में से प्रक्षेपित किए जाने वाले रॉकेट निष्क्रिय हो चुके उपग्रहों को तेजी से बदल सकते हैं, और आपदा राहत के मामले में मदद के लिए पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रहों को भी तेजी से भेज सकते हैं. यह जानकारी चाइना एकेडमी ऑफ लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी में वाहक रॉकेट विकास के प्रमुख ली तोंग्यू ने दी.

चीन के वाहक रॉकेटों की मुख्य विकासकर्ता एकेडमी में कार्यरत इंजीनियरों ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो लगभग 100 किलोग्राम के पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेज सकता है. उनकी योजना एक बड़ा रॉकेट बनाने की है, जो 200 किलोग्राम का पेलोड कक्षा में ले जा सके.

सरकारी अखबार 'चाइना डेली' ने ली के हवाले से कहा, "वाई-20 रणनीतिक यातायात विमान इन रॉकेटों को लेकर जाएगा... जेट इस रॉकेट को एक तय ऊंचाई पर जाकर छोड़ देगा... विमान से अलग होने पर रॉकेट प्रज्वलित होगा..."

विशेषज्ञों ने कहा कि बड़े उपग्रहों को कक्षा में पहुंचाने के लिए पारंपरिक रॉकेटों का ही इस्तेमाल किया जाएगा. अखबार ने उड्डयन विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि चीनी वायुसेना को वाई-20 की आपूर्ति जुलाई में शुरू हुई. यह घरेलू तौर पर विकसित चीन का पहला ऐसा यातायात विमान है, जो इतना भारी वजन लेकर जा सकता है. यह अपने साथ अधिकतम 66 टन के पेलोड को लेकर जाने में सक्षम है.

विशेषज्ञों के अनुसार, ज़मीन से प्रक्षेपित किए जाने वाले द्रवित ईंधन वाले रॉकेटों की तुलना में ठोस ईंधन वाले रॉकेटों को विमान से तेजी से प्रक्षेपित किया जा सकता है. ज़मीन से प्रक्षेपित किए जाने वाले द्रवित ईंधन वाले रॉकेटों की तैयारी में कई दिन, सप्ताह या इससे भी ज्यादा समय लग सकता है, क्योंकि यह ईंधन को पंप करने में बहुत समय लेता है.

चाइनीज़ एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग के शिक्षाविद लोंग लेहाओ ने कहा कि वाई-20 द्वारा प्रक्षेपित किए जाने वाले ठोस ईंधन के रॉकेट वाले प्रत्येक मिशन में तैयारी के लिए महज 12 घंटे का समय लगेगा. इसके बाद 200 किलोग्राम का उपग्रह पृथ्वी से ऊपर 700 किलोमीटर की सौर-स्थैतिक कक्षा में स्थापित किया जा सकता है.

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स्पेस इंटरनेशनल मैगज़ीन के कार्यकारी प्रमुख संपादक पांग झिहाओ ने कहा कि ऐसे रॉकेटों के कुछ अन्य लाभ ये हैं कि इन्हें आसानी से तैनात किया जा सकता है और इनके लिए ज़मीनी स्तर पर अवसंरचना की ज़रूरत नहीं होती. उन्होंने कहा कि यह खराब मौसम के लिहाज़ से ज़्यादा संवेदनशील नहीं होते और ज़मीन से प्रक्षेपित किए जाने वाले रॉकेटों की तुलना में इनकी प्रक्षेपण लागत कम आती है.

विश्व का पहला वायु प्रक्षेपित अंतरिक्ष मिशन वर्ष 1990 में अमेरिका ने अंजाम दिया था.


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