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हिटलर के क्रूर तानाशाह बनने के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी? पढ़ें यह रिपोर्ट...

हिटलर के उदय को समझने के लिये आपको पहले विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के और जर्मनी के हाल को समझना होगा

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हिटलर के क्रूर तानाशाह बनने के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी? पढ़ें यह रिपोर्ट...

खास बातें

  1. हिटलर के क्रूर तानाशाह बनने के पीछे की पृष्ठभूमि
  2. नाज़ी दौर में कोलोन में ही नहीं जर्मनी में जगह-जगह जो यातना केंद्र बने थे
  3. इस यातना में लाखों लोगों की हत्या की गई
नाज़ी दौर में कोलोन में ही नहीं जर्मनी में जगह-जगह जो यातना केंद्र बने उनमें लाखों लोगों की हत्या की गई. हमारे सहयोगी हृदयेश जोशी ने इतिहासकार और आलोचक दिलीप सिमियन से बात की. उसी बातचीत के अंश

सवाल – हिटलर को सभी एक क्रूर तानाशाह के रूप में जानते हैं. आखिर हिटलर के बनने के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी. हमें विस्तार से समझायें.
जवाबहिटलर के उदय को समझने के लिये आपको पहले विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के और जर्मनी के हाल को समझना होगा. इसकी पृष्ठभूमि पहला महायुद्ध है. तब भारी संख्या में लोग मारे गये करीब 2 करोड़ लोग मारे गये. सारा समाज अस्त- व्यस्त हो गया. जर्मनी में इससे पहले लोकतंत्र नहीं था. सिर्फ लोकतंत्र की मांग करने वाली पार्टिंयां थी. महायुद्ध से 4 बड़े साम्राज्य खत्म हो गये. हिटलर के बारे में एक व्यंग्य कहा जाता है कि अगर एक लोकतात्रिक क्रांति न हुई होती तो हिटलर सत्ता में आता भी नहीं. वह तो एक कॉमन सोल्जर था. पहले महायुद्ध में वह एक आम सैनिक था और उसे कुछ पदक भी मिले वीरता के लिये. वह अपने जनरलों से कहा करता था कि आप लोग एक कुलीन जाति के लोग हो और मैं तो एक सामान्य सैनिक हूं.

सवाल – ये नस्लवादी सोच कैसे पनपी ... तभी या पहले से थी?
जवाब –जर्मन आर्मी हार गई थी. र्ऑटोमन साम्राज्य, जर्मन साम्राज्य, ज़ार का रूसी साम्राज्य, ऑस्टेरो हंगरी साम्राज्य खत्म हो गये. जर्मनी में एक पुरानी लालसा थी कि वह ऑस्ट्रिया के साथ मिल जायेंगे, क्योंकि खुद को एक ही नस्ल समझते थे. इस प्रकार की नस्लवादी बातें पहले से चलती आ रही थी जिसमें यहूदियों को निशाना बनाना और ये कहना कि आर्य नस्ल सबसे श्रेष्ठ हैं शामिल हैं. ये बातें हिटलर ने शुरू नहीं की ये पहले से चल रही थी. याद कीजिये कि ईसाइयत में यहूदियों के प्रति घृणा का वातावरण पहले से चलते आ रहा है. उन्हें ईसा मसीह का हत्यारा माना जाता था. ये ईसाइयत में एक गहरा पहलू है. ईसा मसीह खुद एक यहूदी थे. बाइबिल में ये लिखा हुआ है यहूदियों ने ईसा मसीह को प्राणदंड की मांग की थी. जब प्राचीन रोमन के गवर्नर ने कहा कि मैं इस आदमी को निर्दोष पा रहा हूं. तुम लोग कर लो जो कुछ करना है. यहूदियों ने कहा कि इसका खून हमारे सर पर और आने वाली पीढ़ियों के सिर पर होना चाहिये. बाइबिल में लिखा हुआ है कि यहूदियों ने कबूल किया है कि हम ईसा मसीह की मौत चाहते हैं और उसका दोष हमारे सिर पर रहेगा.

सवाल – यानी घृणा का माहौल पहले से ही था?
जवाब – माहौल था और घृणा के पनपने के लिये परिस्थितियां मौजूद थी. हिटलर पावर में आया तो उसे  कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट्स दोनों समुदायों को बुलाकर कहा कि मैं यहूदियों के साथ ऐसा कुछ नहीं करने जा रहा हूं जिसकी मांग आपने पहले से नहीं की है. तो ये एक वातावरण था. इस वातावरण में राजतंत्र ढह गया, गणतंत्र बना  जिसके संविधान की रचना में समाज विज्ञानी मैक्स वेबर का भी हाथ था. अगर गणतंत्र न बना होता और राजतंत्र न ढहा होता तो हिटलर जैसे आदमी की इतना ऊपर चढ़ने गुंजाइश नहीं थी. गणतंत्र काफी अस्थाई था. उसका ढांचा तो था लेकिन उसके वफादार लोग नहीं थे. डेमोक्रेसी विथआउट डेमोक्रेट्स जैसी बात थी. कम्युनिस्ट पार्टी बनी थी और उसका उत्थान रूसी क्रांति के प्रभाव में भी हुआ. बोल्सेविक ने सत्ता छीन ली थी और वो लोग कह रहे थे कि पूरे यूरोप में हमारी क्रांति आनी चाहिये और आयेगी. ये लोग भी कह रहे थे कि ये खोखला गणतंत्र है और इसके पलट सर्वाहारा अधिनायक होना चाहिये. वो लोग रूसी क्रांति का नमूना चाहते थे.

सवाल – आर्मी का क्या रोल था
जवाब – जैसा मैंने कहा कि आर्मी युद्ध हार चुकी थी और हारना वाले हमेशा अनिच्छुक हैं अपनी जिम्मेदारी मानने के लिये. उन्होंने कहा कि हमारी पीठ में छुरा भौंका गया है इसलिये हम हारे हैं. यहूदियों के ऊपर रिपब्लिकन के ऊपर,  कम्युनिस्ट के ऊपर. राष्ट्रवाद के नारे को अतिवाद में बदल दिया गया और उसका हिस्सा था यहूदी विरोध । साम्यवाद विरोध, समाजवाद विरोध गणतंत्र. एक मिश्रित प्रकार की विचारधारा गढ़ी गई। इस मिश्रण में एक तरफ को अतिराष्ट्रवाद और दूसरी ओर समाजवाद था. समाजवाद के बल पर ये कहा जा सकता था कि ये जर्मन वर्कर्स की पार्टी है. यह पार्टी बनी है 1920 में और इसके संस्थापक हिटलर नहीं थे. एक एंटोन ड्रैक्सलर थे जिन्होंने इस पार्टी की स्थापना की और बाद में वहां हिटलर जाकर मिल गया. उन दिनों में जबकि संविधान पूरी तरह से पारित नहीं हुआ था उस वक्त सेना के भीतर इस तरह के तत्व थे जो चाहते थे कि लोकतन्त्र को किसी तरह से रोक दिया जाये. वह संविधान नहीं देखना चाहते थे क्योंकि वह रूढ़िवादी लोग थे. राजतन्त्र पसंद करने वाले लोग थे. वह कहते थे कि हमारी पीठ में छुरा भौंक दिया गया. हमें हरवाया (पहले विश्व युद्ध में ) गया हम हारे नहीं. ये देशद्रोही तत्वों ने हमें हराया. इन्हीं लोगों ने हिटलर को सेना के विघटन के बाद सेना के अंदर एक नौकरी दी.

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सवाल – मेरी जानकारी में सेना उस वक्त लोकतन्त्र विरोधी प्रचार कर रही थी… क्या यह सच है?
जवाब – बिल्कुल ... लोकतन्त्र के खिलाफ प्रचार करने के लिये सेना तो उस वक्त सेमिनार और स्टडी सर्किल चला रही थी. लोगों को बताने के लिये कि ये सब एक ढकोसला है. ये सब नहीं होना चाहिये. ये सब 1920 में हो रहा था. इस दौर में हिटलर के भाषण देने की कुशलता निखर कर सामने आने लगी. म्यूनिक के बीयर हॉल में इसने अपने भाषण देने का सिलसिला शुरू किया. यहां वह जमकर अतिराष्ट्रवादी, समाजवाद विरोधी, यहूदी विरोधी, लोकतन्त्र विरोधी भाषण दिया करता था. इससे धीरे धीरे उसका नाम बनने लगा और फिर वह इसी पार्टी में शामिल हो गया.

सवाल – हिटलर की पार्टी का क्या योगदान है. उसकी राजनीति कैसे आगे बढ़ी.
जवाब – शुरुआत में जर्मन वर्कर्स पार्टी इसका नाम था औऱ बाद में इसका नाम बदल दिया गया और इसका नाम जर्मन नेशनल सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी का नाम दिया गया, जिससे नाज़ी शब्द निकलता है. यानी हिटलर जो है वह एक वातावरण की उपज है. इस वातावरण में जहां यहूदी विरोधी विचारधारा पहले से फैली हुई थी. अति राष्ट्रवाद पहले से फैला हुआ था. गणतन्त्र का विरोध करना पहले से फैला हुआ था. सारी विचारधारायें काम कर रही थी. इस वातावरण में ये आदमी कुछ शासक वर्गों के लिये उपयोगी दिखने लगा. उन्होंने सोचा किये बहुत अच्छा भाषण देता है और लोगों की लामबन्दी करने में बहुत उपयोगी हो सकता है. इस वातावरण में बहुत सारे ऐसे लोग थे जो सैनिक थे और उनकी नौकरी खतम हो गई थी. ये लोग सड़कों पर घूम फिर रहे थे. तो टोलियों में इनकी लामबन्दी की गई. ये प्राइवेट आर्मी की तरह थे. एक प्राइवेट आर्मी का नाम था फ्री कोर. तो फ्री कोर पैरा मिलिट्री फोर्स थी जो भूतपूर्व सैनिकों की फोर्स थी. इसमें भूतपूर्व सैनिकों को किसी प्रकार की नौकरी दी गई लेकिन इनका असल काम था राजनीतिक विरोधियों को ठोकना. यह गुंडा फोर्स था और इस परिस्थिति में जहां पर गणतन्त्र बन रहा था लेकिन वह डांवाडोल था सुदृढ़ नहीं था.

सवाल – यानी सड़कों पर स्वयंभू संगठन गुंडागर्दी कर रहे थे?
जवाब – गुंडागर्दी कर रहे थे और उन्हें सरकार की सरपरस्ती हासिल थी. गणतन्त्र की जड़ें नहीं थीं समाज में क्योंकि समाज खुद अस्तव्यस्त था. इतने सारे लोग युद्ध में मारे गये थे. हज़ारों महिलायें थी जिनके पति नहीं थे. इतने सारे परिवार थे जिनमें पिता ही नहीं था. इतने सारे परिवार थे जहां मातायें बच्चों को पाल रहीं थीं. बेकारी थी. आर्थिक संकट था. राजनीतिक संकट था. अस्थाईपन था. इस वातावरण में धीरे धीरे एक नये प्रकार की राजनीति बनने लगी और इस राजनीति में मौजूदा परिस्थितियों के प्रति क्रोध. वर्सेल की संधि के प्रति क्रोध जो 1919 में हुई जिसमें न सिर्फ जर्मनी को दोषी ठहराया गया बल्कि युद्धशुल्क के रूप में उन पर एक दण्ड लागू किया गया और क्षतिपूर्ति के लिये उन्हें बहुत भारी रकम देनी पड़ी. जर्मनी के कुछ प्रान्त हड़प लिये गये. ऐसे वातावरण में एक अतिराष्ट्रवादी भावना पैदा हुई जर्मनी में कि देखो हम पर इतना अन्याय हो रहा है. हिटलर ने अपने भाषणों को इस अन्याय पर केंद्रित करता. अगर आप उस वक्त के हिटलर के भाषणों को सुनें आपको लगेगा कि हां ये तो सच बोल रहा है क्योंकि वह बार बार ये कह रहा था अभी हम पर (हिटलर औऱ उसकी पार्टी पर ) जो आरोप लग रहे हैं वह तो जर्मनी के साथ होता आया है. वह कहता कि उसके विरोधियों ने भी तो ज्यादतियां की हैं और पूरी दुनिया में उपनिवेश हड़प लिये हैं. वह कहता कि आज जो जर्मनी पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने न जाने कितनी ज़मीन छीनी है. ये पृष्ठभूमि है हिटलर के बनने के पीछे.

सवाल – किन तत्वों का हिटलर के बनने में योगदान रहा ?
जवाब - उस वक्त जर्मनी में कुछ ऐसे तत्व थे जिनमें औद्योगिक, राजनीतिक और सैनिक शक्तियां शामिल हैं जिन्हें लगा कि एक उपयोगी यंत्र के रूप में इस आदमी का इस्तेमाल हो सकता है. विरोधियों को मारने के लिये, कम्युनिस्टों को रोकने के लिये या गणतन्त्र को स्थाई होने से रोकने के लिये. उन्होंने उसका इस्तेमाल करना शुरू किया. उन्हें मालूम नहीं था कि कौन किसका इस्तेमाल करेगा बाद में.

सवाल – इस बीच हिटलर ने एक तख्ता पलट की कोशिश भी की जिसमें उसने म्यूनिक में कुछ नाजी कार्यकर्ताओं को इकट्ठा कर मार्च किया और वह नाकाम रहा?
जवाब - जी हां वह एक महत्वपूर्ण घटना है. उसने एक तख्तापलट करने की कोशिश की 1923 में जहां उसे 1 साल 10 महीने की जेल हुई. अब देखिये कि क्या होना शुरू हुआ. विचारधारा का प्रभाव समाज के ऊपर ही नहीं सामाजिक ढांचे और लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर होने लगा. ये सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है समझने के लिये. एक मिसाल मैं आपको दे सकता हूं कि जब कभी किसी नाज़ी को गुंडागर्दी के केस में पकड़ कर लाया जाता तो वह कई बार आसानी से छूट जाते. अगर कम्युनिस्टों को सोशलिस्टों को किसी गुंडागर्दी के केस में फंसाया जाता तो उन पर दंड लग जाता. यानी धीरे धीरे न्यायिक प्रणाली के ऊपर विचारधारात्मक प्रभाव पड़ने लगा. उस वक्त के एक महान लेखक हुये हैं फ्रांस नोयमन उन्होंने एक महत्वपूर्ण किताब लिखी है जिसका नाम बेहीमथ है जिसमें उन्होंने कहा है कि प्रतिक्रांति के केंद्र में न्यायिक प्रणाली थी क्योंकि जानबूझ कर न्यायिक प्रणाली का एक झुकाव था और इस झुकाव में क्या हुआ कि नाज़ी बचते रहे और उनके आलोचक फंसते रहे. धीरे धीरे इन शक्तियों को वजन मिला और समाज में प्रोत्साहन मिलने लगा.

सवाल – यहूदियों के नरसंहार के लिये क्या जनमत तैयार किया हिटलर ने...
जवाब – जर्मनी में यहूदियों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं थी. विचारधारा का प्रभाव ऐसा कि नाज़ी ये कह सकते थे कि यहूदी पूंजीपति भी हैं और साम्यवादी भी हैं. एक तरफ ये कहा गया कि वह कम्युनिस्ट हैं और षड्यंन्त्र करके सारे देश को भंग करके सत्ता हड़पना चाहते हैं और दूसरी ओर यह भी कहा जाता था कि बड़े बड़े सूदखोर पूंजीपति भी यहूदी ही हैं. माहौल ऐसा था कि साम्यवाद का और पूंजीवाद का दोनों का ही दोषी यहूदी को ठहराया जाता. हर एक चीज़ का दोषी यहूदी को ठहराया जाता जबकि उनकी संख्या न के बराबर थी... एक प्रतिशत से कम थी. दूसरी बात यह कि जर्मनी में यहूदियों ने पीढ़ियों से खुद को भाषा और संस्कृति के लिहास से जर्मनी के साथ मिलाने की कोशिश की और वह इसमें सफल भी रहे. यह बात आपको जाननी चाहिये कि जो इस दौर में यहूदियों के साथ हो रहा था वह पहले जर्मन कैथोलिक समुदाय के साथ हो रहा था.

1870 के दौर में यही बातें जर्मन कैथोलिक समुदाय के बारे में कही जा रही थी. उन्हें जर्मनी की बजाय पोप का वफादार कहा जाता और यह बताया जाता कि कैथोलिक समुदाय के लोग तो विदेशी विचारधारा से प्रभावित हैं. यह कहा जाता कि कैथोलिक चर्च  पूरी तरह से जर्मन नहीं है और ये राष्ट्रहित में नहीं है कि कैथोलिक यहां रहें. यह सब यहूदियों के साथ बाद में हुआ लेकिन जर्मन कैथोलिक लोगों की संख्या काफी भारी थी और 1933 में जर्मन कैथोलिक चर्च ने नाज़ी पार्टी के साथ समझौता कर लिया था और जब नाज़ी सत्ता में आये तो उन्होंने ऐसे कानून पास करने शुरू कर दिये नस्ल की सफाई करने के नाम पर थे. जैसे law to protect the racial hygiene. ये कानून उनके मुताबिक नस्ल को बचाने के लिये थे जिसमें ये कहा गया कि आर्य और यहूदियों की शादी भी नहीं हो सकती. इस पर पाबन्दी लगा दी गई. जो पहले से शादीशुदा थे उन्हें भी बहुत दिक्कतें झेलनी पड़ी बाद में. अगर पति पत्नी में से एक जर्मन औऱ दूसरा यहूदी होता तो वह बच कर रह सकते थे लेकिन बड़ी मुश्किल से. तो यहूदियों के विरोध में ये कार्यक्रम तो सन 1923 से ही चल रहा था.  हिटलर ने जो अपनी आत्मकथा लिखी उसमें वह यहूदियों के खिलाफ लिख चुका था और उसने कहा कि यहूदी साम्यवाद और समाजवाद के दोषी और ज़िम्मेदार हैं। उसने ये भी कहा कि जर्मन आबादी को रहने के लिये जगह चाहिये और ये रूसियों और स्लाविक नस्लों की कीमत पर हो सकता है क्योंकि उनके पास काफी ज़मीन है. तो ये साफ तौर पर जर्मन साम्राज्यवाद औऱ नस्लवाद की घोषणा थी.

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सवाल –हिटलर की सीक्रेट पुलिस का नरसंहार करने के साथ साथ राजनीतिक बन्दियों और यहूदियों को खत्म करने में अहम रोल था. ये सीक्रेट पुलिस कैसे काम करती थी?
जवाब - हिटलर की जो सीक्रेट पुलिस थी उसका नाम था गेस्टापो. इसका पूरा नाम गेहाइमे स्टाट्स पुलिट्साए था. असल में ये राजनीतिक पुलिस फोर्स थी. सीक्रेट पुलिस गेस्टापो की स्थापना 1933 में हुई. गेस्टापो का फोकस था जितने भी राजनीतिक विरोधी हैं या राजनीतिक रूप से जो खतरनाक लोग थे उनको ठिकाने लगाना. इस सीक्रेट पुलिस ने न केवल कम्युनिस्टों, समाजवादियों और यहूदियों के साथ तमाम लोगों को पकड़ा पर वह राज्य का केंद्र भी बन गई. यह समझना ज़रूरी है कि उस वक्त राज्य का ढांचा ढह गया. हिटलर का मकसद भी यही था. उसने पहले से जो अस्तव्यस्तता थी उसे और बढ़ाया. राज्य और दल के बीच के अन्तर को समाप्त कर दिया. उदाहरण के लिये जो लीडर था उस पद को औपचारिकता दे दी गई. सन 1934 में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री (जिसे वहां चांसलर कहा जाता था)  के पद को एक कर दिया गया. यह सीधे तौर पर गैरकानूनी था. जब भूतपूर्व राष्ट्रपति की मृत्यु होने के बाद दोनों पदों को मिला दिया. 1933 में वह चांसलर बन चुका था लेकिन 1934 में उसने दोनों पद को एक कर दिया. हर राज्य में कुछ पद स्ताई होते हैं जैसे भारत में सुप्रीम कोर्ट, नौकरशाही, चुनाव आयोग, यूपीएससी, सेना, सीवीसी ये संस्थायें स्थाई हैं. ये संस्थायें सरकारों के आने जाने से नहीं बदलती. जो संविधान से बनी हैं ये राज्य को एक स्थायित्व देती हैं. इन सब चीज़ों का सम्मिलित आधार है राज्य. लेकिन राज्य औऱ दल में अंतर हैं. लेकिन हिटलरशाही में राज्य और दल को एक कर दिया गया. जितनी भी स्वाधीन संस्थायें थी समाज में चाहे वो वकीलों के संगठन हों सिविल सोसायटी हो जिसे हम लोकवृत्त कहते हैं समाज में जो स्वाधीन समूह हैं. इन सभी का अस्तित्व खत्म कर दिया गया. नाज़ी पार्टी ही एकमात्र पार्टी बन गई और जो हालात बने उनके लिये अंग्रेज़ी में एक शब्द है टोटेलिटेरिएनिज्म यानी सर्वसत्तावाद. एक सर्वसत्तावादी ढांचा कायम हो गया जर्मनी में. न सिर्फ आपके दैनिक जीवन में बल्कि आपकी आत्मा तक घुसने की कोशिश की गई. अब चर्च के ऊपर भी वो हावी होने लगे. एक राष्ट्रीय चर्च स्थापित किया गया जिसमें बाइबिल के सामने मीनकांफ (हिटलर की आत्मकथा) रखा गया. जिसमें क्रॉस के आगे एक बहुत बड़ा तलवार रखा जाता. तो इस तरह से वह लोगों के दैनिक जीवन और आत्मिक जीवन में घुसने की कोशिश करने लगे. हिटलर कभी कभी ऐसे पेश होता जैसे कि वो कोई मसीहा है. वह जब भाषण देता कि तो उस वक्त वह ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता जैसे लगता कि कोई मसीहा आ गया है और बाइबिल से कुछ चीज़ें निकाल कर पेश करता और लोगों को याद दिलाता कि मैं वही मसीहा हूं जिसका आप इंतज़ार कर रहे थे.

VIDEO: हिटलर की क्रूरता का गवाह जर्मनी का एनएस डॉक्‍युमेंटेशन सेंटर


सवाल – मैं जानना चाहता था कि सीक्रेट पुलिस ने कई अत्याचार किये? राजनीतिक विरोधियों की सामूहिक हत्यायें की गईं...
जवाब – सामूहित हत्यायें तो बहुत हुईं। सिर्फ यहूदियों की ही नहीं दूसरे समुदाय के लोगों की भी. 1935 में ही उन्होंने 500 रोमानियों को पकड़ा. और ये कोलोन में ही हुआ. रोमानियों की तो हम बात ही नहीं करते. हम सिर्फ यहूदियों की बात करते हैं. ये रोमानी कौन थे. इन लोगों को जिप्सी भी कहा जाता है. करीब 1000 साल हो गये और ये कहा जाता है कि ये हिन्दुस्तान से आये और राजस्थान से आये थे. अभी भी देखने में वो बिल्कुल अलग लगते हैं और वह घूमते रहते हैं और रोमानिया का तो नाम रोमानी से आया है. उनको भी हिटलर के दौर में विशेष रूप से एक नस्लवादी नफरत का टारगेट बना दिया गया और उनका भी नरसंहार हुआ औऱ उन्हें भी कैम्पों में भेजा गया. इसका एक उदाहरण 1935 में मिलता है जब 500 रोमानियो को पकड़ के कैंपों में डाला गया. उस वक्त यही कहा गया कि जर्मन नस्ल के संरक्षण के लिये रोमानियो और यहूदियों से शादी नहीं होगी. इस तरह के कानून पारित किये गये. 1940 में तो 250 रोमानी बच्चों को चेकोस्लोवाकिया से उठाकर एक ज़हरीली गैस ज़ाइक्लोन - बी  के प्रयोग में मार डाला गया. यह उस गैस के प्रयोग और उसके असर का पता करने के लिये था जिस गैस से बाद में लाखों यहूदियों को मारा गया. उस गैस का टेस्ट रोमानी बच्चों पर किया गया. यह क्रूरता की बात नहीं है ये तो क्रूरता की हद से बाहर की बात है. यह हमारी कल्पना से भी बाहर है. इसलिये मैं कहता हूं कि वह दौर एक ऐसा अध्याय है जिससे हम सबको सीख लेनी चाहिये.


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