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राह चलते फटते जा रहे हैं इस लड़की के कपड़े : यूट्यूब फिल्म के ज़रिये 'घूरने वालों' को संदेश

'स्ट्रिप्ड' (Stripped) शीर्षक से तैयार की गई यह शॉर्ट फिल्म आना नामक लड़की की कहानी है, जो आधुनिक कामकाजी लड़की है... पढ़ी-लिखी है, और आज़ादख्याल भी है... लेकिन जब भी उसे पुरुषों की वासनामयी नज़रों का शिकार होना पड़ता है, वह अपमानित और पीड़ित महसूस करती है...

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राह चलते फटते जा रहे हैं इस लड़की के कपड़े : यूट्यूब फिल्म के ज़रिये 'घूरने वालों' को संदेश

शॉर्ट फिल्म 'स्ट्रिप्ड' आना नामक लड़की की कहानी है, जो कामकाजी है, और पुरुषों की वासनामयी नज़रों का शिकार होकर अपमानित और पीड़ित महसूस करती है...

नई दिल्ली: हिन्दुस्तान में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार भरपूर कोशिशों के बाद भी खत्म तो हो ही नहीं रहा है, कम भी नहीं हो पा रहा है... आएदिन अख़बारों, टीवी चैनलों पर रेप, गैंगरेप और घरेलू हिंसा की घटनाएं नज़र आती हैं, और हम कुछ पल के लिए आंदोलित-आक्रोशित होने के अलावा कुछ नहीं कर पाते... देशभर के चैनलों और अख़बारों में जाने-पहचाने लोग महिलाओं की तरफदारी में, और कहीं-कहीं सहानुभूति में भी बात करते, लिखते दिखाई पड़ते हैं...

यह तो हुई बड़े अपराधों की बात, जो रिपोर्ट कर दी जाती हैं, लेकिन उन अपराधों का क्या, जो आमतौर पर देश की हर लड़की झेलती है, और शायद ही कभी रिपोर्ट हो पाते हों... जी हां, कुत्सित विचारों को मन में लिए लड़कियों को घूरकर देखना भी उन्हें तकलीफ देता है, जिसे वे कभी लोकलाज के डर से, और कभी उस घूरने वाले के 'रेपिस्ट' या 'एसिड अटैकर' बन जाने के डर से रिपोर्ट नहीं करती हैं...

आज हमारी नज़र में आई है उन वाहियात मानसिकता वाले लोगों को पीड़िता का पक्ष समझाने की बिल्कुल अनूठे तरीके की कोशिश, जिसे यूट्यूब पर लगभग दो साल पहले भोपाल के 'Join Films' ने शॉर्ट फिल्म के रूप में अपलोड किया था... 'स्ट्रिप्ड' (Stripped) शीर्षक से तैयार की गई यह शॉर्ट फिल्म आना नामक लड़की की कहानी है, जो आधुनिक कामकाजी लड़की है... पढ़ी-लिखी है, और आज़ादख्याल भी है... लेकिन जब भी उसे पुरुषों की वासनामयी नज़रों का शिकार होना पड़ता है, वह अपमानित और पीड़ित महसूस करती है...

पुरुषों के उसे घूरने से वह बेहद तकलीफ महसूस करती है, जिसकी एक वजह यह भी है कि इसे समाज में अपराध की तरह देखा ही नहीं जाता, और उसे एहसास है कि इससे बचने के लिए वह कुछ नहीं कर सकती... रात-दिन यही झेलने वाली आना की ज़िन्दगी का एक साधारण दिन इस शॉर्ट फिल्म में दिखाया गया है, जो देश की हर लड़की को बिल्कुल अपने जैसा लग सकता है...

दफ्तर के लिए घर से निकलते ही आना की परेशानी शुरू हो जाती है, और फिल्म में उसका पहला 'शिकारी' है उसी की कॉलोनी का चौकीदार... उसके बाद बस स्टैंड पर इंतज़ार करता एक पुरुष, फिर दफ्तर में काम करने वाले सहकर्मी उसे गलत नज़रों से घूरते हैं... पुरुषों के घूरने पर आना क्या महसूस करती है, इसे दिखाने का तरीका ही इस फिल्म की खासियत है...



हम जानते हैं, इस फिल्म को देखकर आप भी आंदोलित महसूस कर रहे होंगे, सो, रुकिए मत, नीचे कमेंट सेक्शन में हमें बताइए, आपके मन में इस वक्त क्या विचार घुमड़ रहे हैं...

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