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छत्तीसगढ़ में हो गई है कीटभक्षी पौधों की भरमार...

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छत्तीसगढ़ में हो गई है कीटभक्षी पौधों की भरमार...
रायपुर:

छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में विभिन्न तालाबों के आसपास इन दिनों कीटभक्षी पौधे ड्रॉसेरा बर्मेनाई (Drosera Burmannii) नज़र आ रहा है... आमतौर पर लाल रंग में दिखने वाला यह पौधा दूर से फूल जैसा नज़र आता है, लेकिन वास्तव में यह पूरा पौधा होता है, जिसके बीच में मुख्य तना रहता है, और इस एक-वर्षीय पौधे पर तने के अंतिम छोर पर पुष्पक्रम होता है, जिसमें भरपूर संख्या में बीज होते हैं...

इन दिनों राज्य के जगदलपुर, एकवर्धा, राजनांदगांव और कांकेर जिलों में ड्रॉसेरा बर्मेनाई शहर से लगे गांवों व इनके पास के तालाबों के नज़दीक बहुतायत से पाए जा रहे हैं... ये कीटभक्षी पौधे (Carnivorous Plants) उस स्थान पर पाए जाते हैं, जहां मिट्टी नम हो और सूर्य की भरपूर रोशनी हो... जगदलपुर के पल्ली गांव में तालाब के आसपास बड़ी संख्या में इस पौधे को देखा जा सकता है... इन्हें 'सनड्यू' या 'ट्रॉपिकल सनड्यू' (Sundew or Tropical Sundew) भी कहा जाता है...

वनस्पतिशास्त्र के प्राध्यापक डॉ जेके वर्मा के अनुसार, ड्रॉसेरा बर्मेनाई लाल रंग का पौधा है, जो लाल रंग का चिपचिपा पदार्थ सनड्यू उत्सर्जित करता रहता है, और यह चिपचिपा पदार्थ ओस होने का भ्रम पैदा करता है... कीट इसकी ओर आकर्षित होते हैं, और इसमें चिपककर रह जाते हैं, जिन्हें ड्रॉसेरा बर्मेनाई भोजन के रूप में ग्रहण करता है...

दरअसल, ड्रॉसेरा बर्मेनाई जमीन में पोषक तत्वों की कमी रहने पर कीटों का भक्षण करता है और कीट के शरीर से प्रोटीन और नाइट्रोजन लेता है... ड्रॉसेरा बर्मेनाई में नाइट्रेट रिडक्टेज़ एंज़ाइम (Nitrate Reductase Enzymes) होते हैं, जो कीट के नाइट्रेट को तोड़ते हैं...

इस पौधे के पनपने में सूर्य का पर्याप्त प्रकाश सहायक होता है, और पर्याप्त धूप न मिलने पर ड्रॉसेरा का विकास रुक जाता है... ड्रॉसेरा बर्मेनाई से निकलने वाले तरल पदार्थ को इसीलिए 'सनड्यू' अर्थात 'धूप की ओस' नाम दिया गया है... पौधे के शीर्ष पर उगे पुष्पक्रम में गुलाब की पंखुड़ियों की तरह पत्तियां होती हैं, जो पहले लाल, फिर बैंगनी हो जाती हैं... ड्रॉसेरा बर्मेनाई की एक खासियत यह भी है कि भरपूर भोजन प्राप्त करने के बाद इसकी पंखुड़ियां हरी हो जाती हैं...

डॉ वर्मा ने कहा कि ड्रॉसेरा बमेर्नाई अद्भुत पौधा है, जो पहले जमीन में पोषक तत्वों को टटोलता है, फिर कमी को पूरा करने के लिए कीट-पतंगों को बहुत तरकीब से फंसाता है, उसके बाद कीटों के शरीर का प्रोटीन और नाइट्रोजन अवशोषित कर लेता है...

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