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हिटलर को पत्र लिखकर युद्ध रोकने और अहिंसा अपनाने की अपील की थी बापू ने

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हिटलर को पत्र लिखकर युद्ध रोकने और अहिंसा अपनाने की अपील की थी बापू ने

फाइल फोटो

नई दिल्ली: दुनिया को सत्य अहिंसा के अद्भुत प्रयोग से अभिभूत करने वाले महात्मा गांधी ने जर्मन तानाशाह एडाल्फ हिटलर को दो बार पत्र लिखकर मानवता के वास्ते द्वितीय विश्व युद्ध रोकने की अपील की थी लेकिन शांति के मसीहा अपने प्रयास में सफल नहीं हुए थे। बापू ने हिटलर को सचेत किया था कि हिंसक रास्ते पर किसी का एकाधिकार नहीं होता और कोई दूसरी शक्ति अधिक व्यवस्थित होकर उन्हें परास्त कर सकती है।

बापू ने हिटलर को दो पत्र लिखे थे। इसमें से पहला पत्र 23 जुलाई 1939 और दूसरा पत्र 24 दिसंबर 1940 को लिखा गया था।

पीटीआई भाषा को मिले पहले पत्र के अनुसार, बापू ने पहले पत्र में हिटलर को लिखा था, 'आज यह स्पष्ट है कि आप एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो उस युद्ध को रोक सकते हैं जो मानवता को भीषण स्थिति तक पहुंचा सकता है। चाहे वह विषय आपके लिए कितना भी कीमती क्यों न हो, इसकी आपको कीमत चुकानी पड़ेगी। क्या आप एक ऐसे व्यक्ति की अपील पर ध्यान देंगे जिसने युद्ध के रास्ते को अस्वीकार किया हो।'

महात्मा गांधी ने दूसरे पत्र में जर्मन तानाशाह को लिखा, 'हम ब्रिटिश उपनिवेशवाद का नाजीवाद से कम विरोध नहीं करते। अगर कोई अंतर है, तो वह इसके तौर तरीके में है। ब्रिटिश शासन का विरोध करने से हमारा तात्पर्य किसी भी स्थिति में ब्रिटेन के लोगों को नुकसान पहुंचाना नहीं है। हम उन्हें बदलना चाहते हैं, युद्ध में पराजित करना नहीं। हम ब्रिटेन के खिलाफ बिना हथियार के विद्रोह कर रहे हैं।'

बापू ने कहा था, 'हम उन्हें बदल सकें या नहीं. हम उनके शासन को अहिंसक और असहयोग के माध्यम से असंभव बना देंगे।' उन्होंने लिखा, 'हम दुनिया में सबसे संगठित हिंसा के खिलाफ सही रास्ते से एकजुट हो रहे हैं, जबकि आपने (हिटलर) उन्हें चुनौती दी है। यह देखने का विषय है कि कौन अधिक संगठित है, ब्रिटिश या जर्मन। हम जर्मनी की मदद से ब्रिटिश शासन को समाप्त नहीं करना चाहते हैं बल्कि इसके लिए अहिंसा का रास्ता अपना रहे हैं।'

बापू ने हिटलर को लिखे पत्र में कहा, 'अहिंसा के रास्ते में पराजय जैसी कोई भी बात नहीं होती। यह करो या मरो की स्थिति होती है जिसमें किसी को आहत नहीं किया जाता।'

'आप (हिटलर) यह नहीं देख पा रहे हैं कि आप जिस रास्ते को अपना रहे हैं उस पर किसी का एकाधिकार नहीं है। ब्रिटिश नहीं तो कोई भी अन्य शक्ति इस रास्ते पर और अधिक व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़कर आपको परास्त कर सकती है। आप अपने लोगों के लिए ऐसी कोई विरासत नहीं छोड़ रहे हैं जिस पर वे गर्व कर सकें।'

बापू ने जर्मन तानाशाह को लिखा, 'इसलिए मैं आपसे मानवता के आधार पर अपील करता हूं कि युद्ध रोकें। अगर आप और ग्रेट ब्रिटेन संयुक्त पसंद के पंचाट के समक्ष अपने मतभेद को दूर कर लें तो आप कुछ भी नहीं खोयेंगे।'

उन्होंने हिटलर को लिखा था, 'हमें आपकी बहादुरी या मातृभूमि के प्रति आपकी निष्ठा पर कोई संदेह नहीं है। अगर आप युद्ध में जीत भी जाते हैं तो भी यह साबित नहीं होगा कि आप सही थे। इससे यही साबित होगा कि विध्वंस की आपकी क्षमता अधिक थी। मैंने काफी पहले ब्रिटेन के सभी लोगों से अहिंसा के रास्ते को अपनाने की अपील की थी। आपसे भी यही अपील कर रहा हूं।'

दोनों पत्रों में बापू ने हिटलर को 'प्रिय मित्र' कह कर संबोधित किया था।


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