क्लर्क के बेटे ने गांव से निकल विदेश में कमाया नाम, ऐसे जीता Nobel Prize, लोग बोले- 'आपको सलाम...'

Nobel Prize Organization ने हर गोबिंद खोराना (Har Gobind Khorana) को याद करते हुए एक पोस्ट साझा की है, जिनकी मृत्यु 2011 में इसी दिन हुई थी. हर गोबिंद खोराना भारत में गरीबी के बचपन से निकलकर नोबेल विजेता बायोकेमिस्ट (Nobel-winning Biochemist) बन गए.

क्लर्क के बेटे ने गांव से निकल विदेश में कमाया नाम, ऐसे जीता Nobel Prize, लोग बोले- 'आपको सलाम...'

क्लर्क के बेटे ने गांव से निकल विदेश में कमाया नाम, ऐसे जीता Nobel Prize

नोबेल पुरस्कार संगठन (Nobel Prize Organization) ने हर गोबिंद खोराना (Har Gobind Khorana) को याद करते हुए एक पोस्ट साझा की है, जिनकी मृत्यु 2011 में इसी दिन हुई थी. हर गोबिंद खोराना (Har Gobind Khorana) भारत में गरीबी के बचपन से निकलकर नोबेल विजेता बायोकेमिस्ट (Nobel-winning Biochemist) बन गए और प्रतिष्ठित मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Massachusetts Institute of Technology) में पढ़ाने चले गए. नोबेल पुरस्कार संगठन के अनुसार, 9 नवंबर, 2011 को उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद ही कहा गया, 'इस तरह की विनम्र पृष्ठभूमि वाला कोई व्यक्ति आणविक जीव विज्ञान का प्रतीक बन सकता है, यह उनके असाधारण अभियान, अनुशासन के लिए एक वसीयतनामा है. और उत्कृष्टता के लिए प्रयास कर रहा है.' 

हर गोबिंद खोराना का जन्म 1922 में पंजाब के रायपुर (अब पाकिस्तान में) नामक एक छोटे से गांव में हुआ था. उनके पिता ब्रिटिश सरकार में एक गांव के कृषि कराधान क्लर्क थे. गरीब होने के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों को शिक्षित किया. संगठन ने यह भी बताया कि लगभग 100 लोगों के गांव में व्यावहारिक रूप से उन्ही का परिवार एकमात्र साक्षर था.

संसाधनों की कमी और खराब शैक्षणिक सुविधाओं के बावजूद, खोराना ने हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की और लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में स्नातक और मास्टर डिग्री प्राप्त की. 1945 में, वह भारत सरकार के फैलोशिप के तहत ब्रिटेन के लिवरपूल विश्वविद्यालय चले गए, जहां उन्होंने 1948 में पीएचडी प्राप्त की.

1952 में ब्रिटिश कोलंबिया के डॉ. गॉर्डन एम श्रम की नौकरी की पेशकश उन्हें वैंकूवर ले गई, जहाँ उन्होंने अपना नोबेल पुरस्कार जीतने का काम शुरू किया. इसके कुछ साल बाद, वह विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट फॉर एनजाइम रिसर्च में चले गए और 1966 में संयुक्त राज्य अमेरिका के एक नागरिक बन गए.

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हर गोबिंद खोराना को कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के रॉबर्ट डब्ल्यू होली और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के रॉबर्ट डब्ल्यू होलेबर्ग के साथ फिजियोलॉजी या मेडिसिन में 1968 का नोबेल पुरस्कार मिला. "आनुवंशिक कोड की व्याख्या और प्रोटीन संश्लेषण'' के लिए उनको पुरस्कार दिया गया. वह 1970 में एमआईटी फैकल्टी में शामिल हुए और 2007 में रिटायर हो गए.

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उनकी पुण्यतिथि पर, नोबेल पुरस्कार संगठन का पोस्ट काफी वायरल हो रहा है. लोगों को उनकी स्टोरी काफी प्रेरणादायक लग रही है. जबकि एक इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता ने उन्हें "प्रेरणा" के रूप में सम्मानित किया, दूसरे ने लिखा, "उनकी यात्रा असाधारण थी."