यह ख़बर 14 अक्टूबर, 2014 को प्रकाशित हुई थी

एक शिकायतकर्ता और घरेलू महिला शेयरधारकों से शुरू हुई सेबी-डीएलएफ की कहानी

एक शिकायतकर्ता और घरेलू महिला शेयरधारकों से शुरू हुई सेबी-डीएलएफ की कहानी

नई दिल्ली:

एक शिकायतकर्ता की कथित तौर पर 34 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के आरोप में कार्रवाई की मांग और तीन घरेलू महिलाओं द्वारा किया गया फर्जी सौदा देश की सबसे बड़ी रीयल एस्टेट कंपनी डीएलएफ और इसके शीर्ष कार्यकारियों के गले की फांस बन गया।

गौरतलब है कि सेबी ने कंपनी के 2007 के प्रथम सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) की विवरण पुस्तिका में इन सौदों और इनसे जुड़े जोखिमों को सार्वजनिक नहीं किया था। इसी के चलते शेयर बाजार विनियामक (सेबी) ने कल प्रकाशित अपने एक आदेश में डीएलएफ और इसके चेयरमैन एवं मुख्य प्रवर्तक डीएलएफ समेत छह कार्यकारियों पर तीन साल के लिए शेयर बाजार में खरीद-बिक्री का कोई सौदा करने से रोक लगा दी।

डीएलएफ ने आईपीओ में 9,187.5 करोड़ रुपए जुटाए थे। डीएलएफ का आईपीओ उस समय देश में सबसे बड़ा आईपीओ था। कंपनी का कहना है कि उसने किसी भी नियम कानून का उल्लंघन नहीं किया है। उसका कहना है कि आदेश के उचित नहीं है और वह उनके खिलाफ अपना बचाव करेगी।

सेबी ने 43 पन्ने के आदेश में पूरे घटनाक्रम का ब्योरा दिया हे। इसके अनुसार डीएलएफ के आईपीओ को लेकर व्यवसायी किंशुक कृष्ण सिन्हा ने सेबी में 4 जून 2007 और 19 जुलाई 2008 को दो शिकायतें की थीं। पहली शिकायत में उन्होंने कहा कि सुदीप्ति एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी और कुछ अन्य लोगों ने भूमि खरीद के मामले में उनके साथ 34 करेाड़ रुपये की धोखाधड़ी की है। उन्होंने इस संबंध में सुदीप्ति और प्रवीण कुमार व कुछ अन्य के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की थी।

सिन्हा ने यह भी कहा था कि सुदीप्ति में सिर्फ दो ही शेयरधारक थे- डीएलएफ होम डेवलपर्स लिमिटेड (डीएचडीएल) और डीएलएफ एस्टेट डेवलर्प लिमिटेड (डीईडीएल)। दोनों कंपनियों डीएलएफ की अनुषंगी हैं। सिन्हा ने कहा कि ये दोनों कंपनियां डीएलएफ समूह की अंग हैं। अपनी दूसरी शिकायत में सिन्हा ने कहा कि डीएलफ इस बात से इनकार कर रही है उसका या उसकी अनुषंगियों का सुदीप्ति से कोई संबंध है। उन्होंने दावा किया कि डीएलएफ का सुदीप्ति के साथ संबंध न होने की बात गलत थी।

सेबी द्वारा इस संबंध में पूछने पर डीएलफ ने संबंध से इनकार कर दिया। डीएलएफ के जवाब से संतुष्ट न होने पर सिन्हा ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जिसने अप्रैल 2010 में सेबी से कहा कि वह इस मामले की जांच करे।

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सुदीप्ति और डीएलएफ की याचिका पर विचार करने के बाद उच्च न्यायलय ने जुलाई 2011 में एक अन्य आदेश जारी किया और सेबी को इस मामले की जांच करने का निर्देश दिया। इसके बाद सेबी ने सिन्हा द्वारा 2007 में की गई दोनों शिकायतों की जांच करने का आदेश दिया।

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जांच के बाद सेबी ने डीएलफ को जून 2013 में डीएलएफ, चेयरमैन एवं मुख्य प्रवर्तक सिंह, उनके पुत्र राजीव सिंह, पुत्री पिया सिंह, और तीन अन्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया था, जिनमें प्रबंध निदेशक टीसी गोयल, तत्कालीन मुख्य वित्त अधिकारी रमेश संका, तत्कालीन कार्यकारी निदेशक (विधि) कामेश्वर स्वरूप और तत्कालीन गैर कार्यकारी निदेशक जीएस तलवार शामिल थे। तलवार को छोड़कर सेबी ने छह लोगों और कंपनी के खिलाफ आदेश जारी किया। तलवार को संदेह का लाभ दिया गया।