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जब 16 साल के फिरोज ने किया 13 साल की इंदिरा गांधी को प्रपोज, पढ़ें उनसे जुड़े कुछ किस्से

इंदिरा गांधी से जुड़े ऐसे किस्से जो बहुत कम लोग जानते होंगे. जिससे पता चलेगा कि उन्होंने अपनी दृढ़ता का परिचय सिर्फ अपने राजनीतिक फैसले लेकर ही नहीं दिया बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी वो उतनी ही मजबूत ‌इरादों में से थीं.

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जब 16 साल के फिरोज ने किया 13 साल की इंदिरा गांधी को प्रपोज, पढ़ें उनसे जुड़े कुछ किस्से

1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था तब इंदिरा गांधी ने फिरोज से शादी की थी.

खास बातें

  1. 'Feroze the forgotten gandhi' नामक किताब में इंदिरा की शादी का जिक्र.
  2. 1942 में हुई थी इंदिरा गांधी और फिरोज की शादी.
  3. इंदिरा गांधी ने अपना आखिरी भाषण भुवनेश्वर में दिया था.
नई दिल्ली: भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि 31 अक्टूबर यानी आज है. इंदिरा गांधी को भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बेहद मजबूत इरादों वाली राजनेता के रूप में जाना जाता है. इस मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं इंदिरा गांधी से जुड़े ऐसे किस्से जो बहुत कम लोग जानते होंगे. जिससे पता चलेगा कि उन्होंने अपनी दृढ़ता का परिचय सिर्फ अपने राजनीतिक फैसले लेकर ही नहीं दिया बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी उतनी ही मजबूत ‌इरादों में से थीं. आइए सबसे पहले जानते हैं इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी की शादी का किस्सा...

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16 साल के फिरोज ने किया 13 साल की इंदिरा को प्रपोज
बर्टिल फलक की प्रकाशित किताब 'Feroze the forgotten gandhi' में इंदिरा गांधी और फिरोज के संबंधों को लेकर कई खुलासे किए. इस किताब का रिव्यू करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नटवर सिंह ने ‌लिखा- इंदिरा गांधी फिरोज से जब मिली तब वह 13-14 साल की थीं. उस वक्त फिरोज की उम्र 16 साल थी. फिरोज ने उस वक्त कई बार इंदिरा को प्रपोज किया. लेकिन तब छोटी उम्र होने के चलते ऐसा मुंमकिन नहीं हो पाया.

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जब दोनों की मुलाकात पेरिस में हुई तो दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. दोनों ने लंदन में एक ही कॉलेज में पढ़ाई भी की. लेकिन दोनों के रिश्ते से इंदिरा के पिता जवाहरलाल नेहरू को एतराज था. इंदिरा गांधी ने नेहरू जी के विरोध में जाकर शादी कर ली. 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था तब उन्होंने फिरोज से शादी कर ली. महात्मा गांधी ने फिरोज को पहले अपना सरनेम गांधी दिया था. जो आज भी गांधी परिवार का सरनेम है.

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बचपन बीता आजादी की लड़ाई में
बचपन से ही इंदिरा गांधी का राजनीति और भारत छोड़ों आंदोलन में लग चुकी थीं. उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में भी कहा था कि उनकी कोई सहेली नहीं रही, बस कजिन्स थे. जिनसे वो ज्यादा बातें होती थीं. स्कूल में उनके कई दोस्त बने, लेकिन उन्हें लड़कियों के साथ गॉसिप करना पसंद नहीं था तो वहां भी वो दोस्तों से दूर ही रहती थीं. उन्हें माता-पिता के साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता था. उनके साथ समय इंदिरा को बहुत कम मिल पाता था. क्योंकि नेहरू आजादी की लड़ाई में व्यस्त रहते थे और उन्होंने काफी वक्त जेल में भी बिताया था. 

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इंदिरा के पीएम बनाने जाने पर अमेरिका हुआ हैरान
इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी तो अमेरिका हैरान हो गया. इंदिरा की बुआ कृष्णा ने अपनी किताब डियर टू बीहोल्ड में लिखा- भारत ने एक महिला को देश का मुखिया के रूप में चुना. इस पर अमेरिका ही नहीं दुनिया दंग थी. लेकिन जब इंदिरा पहली बार अमेरिका गईं तो पूरा अमेरिका दंग था. अमेरिकन प्रेस ने उस वक्त उनको पूरी तवज्जो दी और वो दौरा उनका बहुत अच्छा रहा.

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1971 युद्ध और बांग्लादेश का उदय
1971 के उस वक्त की जब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान सरकार और सेना अपने नागरिकों पर जुल्म कर रही थी. जिससे वहां के नागरिक अपने सेना के खिलाफ ही विद्रोह कर रहे थे. यही नहीं वो भारतीय सीमा में दाखिल हो रहे थे. आकड़ों के मुताबिक करीब 10 लाख शरणार्थियों की वजह से भारत में अशांति का माहौल पैदा हो गया था. पाकिस्तान भी भारत को लगातार धमकियां दे रहा था.

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25 अप्रैल 1971 को इंदिरा ने थलसेनाध्यक्ष से यहां तक कह दिया था कि अगर पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जंग करनी पड़े तो करें, उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है. इंदिरा गांधी ने ऐसे में पाकिस्तान को दोतरफा घेरने का प्लान बनाया जिसमें तय था कि पाकिस्तान को कूटनीतिक तरीके से असहाय बनाना और दूसरी तरफ उस पर सैन्य कार्रवाई के जरिए सबक सिखाना. इसके लिए इंदिरा ने सेना को तैयार रहने का आदेश दे दिया था.

1971 के नवंबर में पाकिस्तानी हेलिकॉप्टर भारत में दाखिल हो रहे थे जिसके बाद पाकिस्तान को इस पर रोक लगाने की चेतावनी भी दी गई, लेकिन उल्टा तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति याहया खान ने भारत को ही 10 दिन के अंदर जंग की धमकी दे डाली. 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने वो गलती कर डाली जिसका शायद भारत को इंतजार था.

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पाकिस्तानी सेना के हेलिकॉप्टरों ने भारतीय शहरों पर बमबारी करनी शुरू कर दी. जिसके बाद हिंदुस्तान की सेना ने मुक्तिवाहिनी के साथ मिलकर पाकिस्तान की 90,000 सैनिकों वाली सेना को परास्त कर दिया. 16 दिसंबर को भरातीय सेना ढाका पहुंच गई. पाकिस्तान की फौज को आत्मसमर्पण करना पड़ा.
 
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ये था इंदिरा गांधी का आखिरी भाषण
भुवनेश्वर में 30 अक्टूबर 1984 की दोपहर इंदिरा गांधी ने जो चुनावी भाषण दिया था. भाषण के बीच में ही उन्होंने लिखा हुआ भाषण पढ़ने के बजाए दूसरी ही बातें बोलना शुरू कर दी थीं.  उन्होंने कहा था "मैं आज यहां हूं. कल शायद यहां न रहूं. मुझे चिंता नहीं मैं रहूं या न रहूं. मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है. मैं अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करती रहूंगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मजबूत करने में लगेगा. "

उनके इस भाषण से लोग हैरान रह गए थे. खुद उनकी ही पार्टी के लोग नहीं समझ पाए थे कि आखिर इंदिराजी ने ऐसे शब्द क्यों कहे थे. इंदिरा गांधी जब वहां से वापस दिल्ली लौट गईं. सुबह 9 बजे वो अकबर रोड पर चल रही थीं. जहां कॉन्स्टेबल सतवंत सिंह ने उन्हें मार दिया. 


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