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क्रांति संभव


'क्रांति संभव' - 54 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • एक सोशल मीडिया योद्धा की ट्रैवल डायरी

    एक सोशल मीडिया योद्धा की ट्रैवल डायरी

    छुट्टियों पर जाकर तस्वीरें खींचना जीवन की अद्भुत व्यथा है, जिसे भरपूर एन्जॉय किया जाता है. जब नौकरी और प्रोडक्टिविटी के मकड़जाल में यह समय के सदुपयोग के हिसाब से परम धर्म लगता रहता था. अब इस व्याधि की गहराई और ज़्यादा अंडरग्राउंड चली गई है.

  • राहुल गांधी पर बीजेपी का उपकाऱ और ब्लॉग को लेकर मेरी दुविधा...

    राहुल गांधी पर बीजेपी का उपकाऱ और ब्लॉग को लेकर मेरी दुविधा...

    विचार बदलना मुश्किल काम होता है. दिमाग़ की चक्की में नई बातों को डालना पड़ता है, पुर्ज़ों में तेल डालते रहना पड़ता है कि चक्की चलती रहे. बातों को बारीक़ पीसकर विचार में तब्दील करती रहे. इससे ज़्यादा मुश्किल काम होता है धारणा बदलना. धारणा विचारों की बोरियों को एक पर एक रखने पर बनती हैं. इसी लिए धारणा बदलने के लिए ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

  • कुशीनगर में ग़लती किसकी थी? और सज़ा का गणित क्या होता है?

    कुशीनगर में ग़लती किसकी थी? और सज़ा का गणित क्या होता है?

    बारह इंतज़ार अब कभी ख़त्म नहीं होंगे, जिनके सफ़र घर और स्कूल के बीच ख़त्म हो गए. ये इंतज़ार ना तो उनके परिवारों के लिए ख़त्म होगा ना ही उनके स्कूल के दोस्तों के लिए. उनके मां-बाप कुछ दिनों तक, सुबह उनके टिफ़िन में क्या दिया जाएगा, सोने से पहले हर रात आदतन सोचेंगे. आदतन सुबह उठेंगे भी लेकिन नाश्ता नहीं बनाएंगे.

  • पूजा और लाठीचार्ज के बीच एक देवी, एक मनुष्य और एक शरीर

    पूजा और लाठीचार्ज के बीच एक देवी, एक मनुष्य और एक शरीर

    बीएचयू में धरना चल रहा था. छात्राओं की स्टोरी चल रही थी. न्यूज़ एजेंसी की माइक पर लड़कियां बता रहीं थीं छेड़ख़ानी की शिकायत के बारे में. एक लड़का भी साउंड बाइट देने आया.

  • दिल्ली की ट्रैफिक में साइकिल चलाने से मुझे क्या सबक मिला...

    दिल्ली की ट्रैफिक में साइकिल चलाने से मुझे क्या सबक मिला...

    सेहत की फिक्र करने वाले और थोड़ा बहुत पर्यावरण की चिंता करने वाले अपर मिडिल क्लास लोगों ने जब से हजारों और लाखों रुपये की साइकिलें खरीदनी शुरू की है, लोगों का नजरिया बदला है.

  • “बयान”: एक सस्ती एंथ्रोपोलॉजिकल स्टडी

    “बयान”: एक सस्ती एंथ्रोपोलॉजिकल स्टडी

    बयान शाश्वत है. ना तो वो दिया जाता है, ना वो सुना जाता है. ब्रह्मांड का अकाट्य तत्व है बयान जो सिर्फ़ मुंह बदलता है. बयान अपनी पार्टी और अपना फ़ॉर्म बदलता है, नेता और वोट बैंक भी बदलता है क्योंकि बयान एक कॉस्मिक एनर्जी हैं. वो एनर्जी जिससे छिटक कर मनुष्य बना है.

  • नितिन गडकरी के बयान से क्यों भौंचक्की रह गईं कार कंपनियां?

    नितिन गडकरी के बयान से क्यों भौंचक्की रह गईं कार कंपनियां?

    ये मामला शुरू हुआ था ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चर्रस की कांफ्रेंस में. वे कंपनियां जो गाड़ी कंपनियों के लिए पार्ट पुर्ज़े बनाती हैं उनका असोसिएशन है ACMA और उसी के कांफ्रेंस में देश-विदेश की कंपनियों के नुमाइंदे आए हुए थे.

  • सोशल मीडिया कॉम्पैटिबल मुद्दों को उठाने की जरूरत नहीं, उठे-उठाए आते हैं...

    सोशल मीडिया कॉम्पैटिबल मुद्दों को उठाने की जरूरत नहीं, उठे-उठाए आते हैं...

    बहुत समय से एक विड्रॉल सिम्प्टम महसूस हो रहा है. लग रहा है कि मन में कुछ बेचैनी है, अंगूठे कसमसा रहे हैं, ट्विटर टाइमलाइन तड़पड़ा रहा है, फेसबुक फड़फड़ा रहा है, बाकी सोशल मीडिया के तमाम प्लैटफ़ॉर्म पर भी इत्यादि टाइप की समस्याएं देखने को मिल रही थीं. लग रहा है एक खालीपन ने पूरे यूनिवर्स को घेर लिया है. इस मनोस्थिति को पकड़ने के लिए हेलो जिंदगी वाले शाहरुख खान काफी हैं, फ़्रॉयड की जरूरत नहीं पड़ेगी. समस्या सीधी और सिंपल है, हुआ दरअसल ये है कि मार्केट में मुद्दों की भारी कमी हो गई है, अब कोई ऐसा मुद्दा बच ही नहीं पा रहा है जिसे मैं उठा पाऊं.

  • कब हार मानी होगी गोरखपुर के अस्पताल में बैठे उस पिता ने...

    कब हार मानी होगी गोरखपुर के अस्पताल में बैठे उस पिता ने...

    बच्चा दिमाग़ कई विडंबनाओं को देखकर उलझ जाता है. ऐसे ही किसी एक याद ना आने वाली बारीक़ी को जब समझने में दिक्कत हो रही थी तो मुझसे ठीक बड़ी बहन ने मुझसे कहा कि मां बनोगे तो समझोगे.

  • मराठा जन शक्ति के पीछे कौन? कैसे संभव हुआ बिना किसी नेता का मोर्चा?

    मराठा जन शक्ति के पीछे कौन? कैसे संभव हुआ बिना किसी नेता का मोर्चा?

    मुंबई में बुधवार को निकले मराठा क्रांति मोर्चे ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. मोर्चे में कुल कितने लोग शामिल हुए इसका कोई अधिकृत आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आया है.

  • कौन कहता है कि टाइम मशीनें नहीं बनी हैं ?

    कौन कहता है कि टाइम मशीनें नहीं बनी हैं ?

    टाइम मशीन का काम क्या होता है. एक वक़्त से दूसरे वक़्त में जाना ? यही होता है ना उसका काम. इसी पैमाने पर मैं ये स्थापना दे रहा हूं कि टाइम मशीन बन चुके हैं और हमारे इर्द-गिर्द बड़ी संख्या में मौजूद है.

  • नई मारुति डिजायर की टेस्ट ड्राइव की रिपोर्ट का किसी को इंतज़ार था क्या?

    नई मारुति डिजायर की टेस्ट ड्राइव की रिपोर्ट का किसी को इंतज़ार था क्या?

    हिंदुस्तानी ग्राहक एक जूते का फीता भी ख़रीदते हैं तो सोसाइटी के वाचमैन से लेकर अपने फ़ैमिली डॉक्टर तक से सलाह ले लेते हैं कि कौन से ब्रांड का ख़रीदा जाए. कौन से मार्केट में पौने सात रुपए की छूट मिल सकती है. तो ऐसे में गाड़ियां तो बड़ी चीज़ हैं. लाखों का वारा न्यारा होता है. पहले के ज़माने में पीएफ़ का पूरा पैसा लग जाता था, आजकल बैंक का इंटरेस्ट रेट रहता है.

  • फेसबुक की दुनिया में सड़कों पर दोस्त बनाता एक बाइकर

    फेसबुक की दुनिया में सड़कों पर दोस्त बनाता एक बाइकर

    इस फेसबुक की दुनिया में सड़कों पर दोस्त बनाता एक बाइकर. हाल फ़िलहाल में बहुत कम ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें देखते ही पहली नज़र में महसूस होता है कि वो इन्सपिरेशनल हैं, जिनकी कहानी प्रेरणा दे.

  • ...तो एफ-1 ट्रैक पर बलीनो RS चलाते वक्त क्यों नहीं बढ़ी मेरी हार्ट-बीट...?

    ...तो एफ-1 ट्रैक पर बलीनो RS चलाते वक्त क्यों नहीं बढ़ी मेरी हार्ट-बीट...?

    यह भी लगा कि शायद इतनी सारी तेज़-तर्रार कारें चलाने के बाद अब मिजाज़ शांत हो गया है, योगी टाइप का हो गया हूं. न हर्ष, न विषाद. तो दिल-दिमाग संतुलित हो गया है. लेकिन मुंह-हाथ धोकर वापस आ रहा था, तो लगा कि शायद घड़ी की रीडिंग ही गड़बड़ा गई होगी... :)

  • राहुल गांधी को राजनीति से संन्यास लेने के लिए क्यों नहीं धकेल रहा सोशल मीडिया ?

    राहुल गांधी को राजनीति से संन्यास लेने के लिए क्यों नहीं धकेल रहा सोशल मीडिया ?

    चिंता और आश्चर्य की बात तो है ही. अपना समाज जो प्रदर्शन और मर्यादा के इतने कड़क पैरामीटर पर जीता है, उठता-बैठता-सोता है, वही हमारा प्रबुद्ध वर्ग आख़िर राहुल गांधी से राजनीति क्यों नहीं छुड़वा रहा?

  • सोचिए अगर एंबैसेडर कार वापस आ गई तो!

    सोचिए अगर एंबैसेडर कार वापस आ गई तो!

    हो सकता है 21वीं शताब्दी में बड़े होने वाले जेनरेशन में एंबैसेडर को लेकर उतनी उत्सुकता न हो, पर अस्सी-नब्बे की दशक में बड़े होने वालों के लिए तो सवालों का पिटारा खुल गया है. क्या वाकई कार वापस आएगी? आएगी तो कितनी बदल कर आएगी? नया इंजन लगेगा? बॉडी का शेप कैसा होगा? छत का डिज़ाइन तो नहीं बदल जाएगा?

  • क्यों सारे बॉलिवुडिया गाने रोमांटिक और क्यों संस्कृति के जोड़ों में दर्द?

    क्यों सारे बॉलिवुडिया गाने रोमांटिक और क्यों संस्कृति के जोड़ों में दर्द?

    अगर आप दिल्ली में कार चलाते हैं और आपके जीवन का एक ही लक्ष्य हो कि ट्रैफिक में पागल नहीं होना है तो फिर उसके लिए दो ही तरीके हैं - एक तो संगीत और दूसरा दूसरों की कारों में झांकना, जिसे स्थानीय भाषा में ताड़ना कहते हैं. लेकिन अगर आपकी मध्यम वर्ग की कुटी हुई सभ्य अपब्रिंगिंग है तो फिर आप एक ही तरीका अपनाएंगे वो है संगीत का. और मेरी समस्या इसी मुद्दे से शुरू हुई और फिर बढ़ती-बढ़ती ब्लॉग का शक्ल ले चुकी है.

  • सर्वश्रेष्ठ, महा और मेगा जैसे विशेषणों की ऑबीचुअरी

    सर्वश्रेष्ठ, महा और मेगा जैसे विशेषणों की ऑबीचुअरी

    बहुत दिनों के बाद ब्लॉग लिखना पड़ रहा है, क्योंकि ख़बर ही ऐसी आई है. आभास तो तब ही से लग रहा था कि जब मैंने एक टैलेंट शो देखा था. जिसमें बहुत से बच्चे गा रहे थे. जज सुन रहे थे और हर गाने के बाद तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे. विशेषणों की बरसात की जा रही थी. ‘माइंडब्लोइंग’ 'सुपर्ब’ ‘बेस्ट’ ‘ऑसम’ 'अनबिलीवबल' वगैरह वगैरह. हर बच्चे को सदी का गायक बताया जा रहा था, मानवता पर आशीर्वाद. पर बावजूद इन विशेषणों के, बच्चे छांटे जा रहे थे.

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