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पुस्तक समीक्षा News in Hindi


'पुस्तक समीक्षा' - 17 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • Book Review: 'बेरंग' जिंदगी के 'रंग' हज़ार, कुछ ऐसी ही है गोर्की-एल्विन की कविता-संग्रह

    Book Review: 'बेरंग' जिंदगी के 'रंग' हज़ार, कुछ ऐसी ही है गोर्की-एल्विन की कविता-संग्रह

    उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के रहने वाले दो युवा, जिनकी उम्र भले ही ज्यादा नहीं हो लेकिन उन्होंने जीवन के छोटे-बड़े कठिनाइयों से गुजरकर अपने अनुभवों को कविता के माध्यम से पिरोया है. गोर्की सिन्हा और एल्विन दिल्लु ने संयुक्त रूप से कविता संग्रह रची है, जिसका नाम 'रंग बेरंग' है.

  • पुस्तक समीक्षा : हवा के ताजे झोंके की तरह है 'भीगी रेत'

    पुस्तक समीक्षा : हवा के ताजे झोंके की तरह है 'भीगी रेत'

    देश के मौजूदा सियासी माहौल में ये पंक्तियां कितनी मौजू हैं. लेखक और समाजसेवी रवि शर्मा का हालिया काव्य संग्रह 'भीगी रेत' ताजा हवा के झोंके की तरह है.

  • 'हसीनाबाद' : सपने और सच के बीच का फ़ासला

    'हसीनाबाद' : सपने और सच के बीच का फ़ासला

    यह अंदाज़ा था कि गीताश्री जब उपन्यास लिखेंगी तो कोई स्त्री-गाथा उसके केंद्र में होगी. 'हसीनाबाद' को पढ़ते हुए इस स्तर पर उनसे निराशा नहीं होती. उनके उपन्यास के केंद्र में गोलमी नाम की एक युवा नृत्यांगना है जो 'सपने देखती नहीं बुनती है'.

  • छबीला रंगबाज़ का शहर : हमारे समय में कथा-लेखन की अलग लकीर

    छबीला रंगबाज़ का शहर : हमारे समय में कथा-लेखन की अलग लकीर

    अपने पहले कहानी संग्रह 'छबीला रंगबाज़ का शहर' के साथ प्रवीण कुमार ने हिंदी के समकालीन कथा-संसार में एक अलग तरह की दस्तक दी है. हिंदी में प्रचलित कथा लेखन में वे दिलचस्प ढंग से तोड़फोड़ करते दिखाई पड़ते हैं.

  • किताब-विताब : 'जग दर्शन का मेला', एक छूटती हुई विधा की ज़रूरी याद

    किताब-विताब : 'जग दर्शन का मेला', एक छूटती हुई विधा की ज़रूरी याद

    शिवरतन थानवी की यह किताब 'जग दर्शन का मेला' अलग-अलग छिटपुट समयों में लिखी गई उनकी डायरियों और टिप्पणियों से बनती हैं. इन टिप्पणियों के बीच हमें राजस्थान की शैक्षिक पहल के सूत्र भी मिलते हैं और उसके सामाजिक पर्यावरण के भी. शिवरतन थानवी बीच-बीच में साहित्यिक कृतियों पर भी टिप्पणी करते चलते हैं, व्यक्तित्वों पर भी और आयोजनों पर भी.

  • उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया के चार पत्रकारों को मौत की सजा सुनाई

    उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया के चार पत्रकारों को मौत की सजा सुनाई

    उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया के चार पत्रकारों को देश का अपमान करने वाली एक किताब की समीक्षा के लिए मौत की सजा सुनाई है. सरकारी मीडिया ने इसकी जानकारी दी.

  • पुस्तक समीक्षा : तमन्ना तुम अब कहां हो- हर क्षण गुजरतीं अंतहीन कहानियां

    पुस्तक समीक्षा : तमन्ना तुम अब कहां हो-  हर क्षण गुजरतीं अंतहीन कहानियां

    निधीश त्यागी का कथा संग्रह (हालांकि यह सिर्फ इतना नहीं) ‘तमन्ना तुम अब कहां हो’ 2013 में पहली बार प्रकाशित हुआ. तब से यह लगातार चर्चा में रहा. इसमें प्रेम कथाएं हैं, पर आम प्रचलित प्रेम कथाओं की तरह नहीं. यह सुखांतकों या दुखांतकों की तरह भी नहीं हैं. यह तो आम जीवन में रोज-ब-रोज कहीं से शुरू होने और कहीं छूट जाने वालीं अनुभूतियां हैं. यह कहना भी शायद कमतर होगा कि यह सिर्फ और सिर्फ प्रेम कथाएं हैं, इसमें प्यार से इतर आकांक्षाएं भी हैं, जीवन के विविध रंग हैं.

  • पुस्तक समीक्षा : इतवार छोटा पड़ गया - इस सादगी में इक बात है...

    पुस्तक समीक्षा : इतवार छोटा पड़ गया - इस सादगी में इक बात है...

    दुष्यंत के बाद इस दौर तक आते-आते हिन्दी ग़ज़लों ने भी अपना चोला पूरी तरह बदला है. प्रताप सोमवंशी इसी साझा परंपरा की पैदाइश हैं, जिसमें वह अपना एक अलग रंग भी मिलाते हैं. 'इतवार छोटा पड़ गया' की ग़ज़लें इसका बहुत जीवंत सबूत हैं.

  • पुस्तक समीक्षा : 'इश्क की दुकान बंद है' - समाज को तमाचा जड़ती महिलाओं की कहानियां

    पुस्तक समीक्षा : 'इश्क की दुकान बंद है' - समाज को तमाचा जड़ती महिलाओं की कहानियां

    'इश्क की दुकान बंद है' नरेंद्र सैनी का पहला कहानी संग्रह है. लेकिन अपने पहले ही संग्रह की कहानियों में वे जिस तरह रिश्तों और मानवीय संबंधों की बारीक पड़ताल करते हैं, वह हैरानी भरा है. इन कहानियों में मुख्यतः आधुनिक जीवन में बदलते रिश्तों और संवेदनाओं को पकड़ने की कोशिश गई है.

  • पुस्तक समीक्षा : 'डिजिटल इंडिया और भारत' - तथ्यों की रोशनी में गंभीर विषयों का 'सरल' विश्लेषण

    पुस्तक समीक्षा : 'डिजिटल इंडिया और भारत' -  तथ्यों की रोशनी में गंभीर विषयों का 'सरल' विश्लेषण

    डिजिटल दुनिया के बढ़ते स्‍पेस में ब्‍लॉग अनौपचारिक होते हुए भी औपचारिक रूप से एक विधा के रूप में विकसित हो रही है. बनती जा रही है. नतीजतन ब्‍लॉगरों की एक नई जमात उभरी है.

  • पुस्तक समीक्षा : इतनी सारी देवियां, इतनी सारी स्त्रियां, इतनी सारी कथाएं...

    पुस्तक समीक्षा : इतनी सारी देवियां, इतनी सारी स्त्रियां, इतनी सारी कथाएं...

    किताब निश्चय ही पठनीय है और विचारणीय भी. प्रभात रंजन के किए अनुवाद में प्रवाह है और भाव अटकते नहीं. बेशक एकाध जगह पर शायद बेध्यानी में कुछ चीज़ें छूटी हैं...

  • जमाने में हम : दिल्ली का साहित्य जगत और निर्मला जैन के संघर्ष की कथा

    जमाने में हम : दिल्ली का साहित्य जगत और निर्मला जैन के संघर्ष की कथा

    दिल्ली का हिन्दी साहित्य जगत और राजधानी के विश्वविद्यालयों का हिन्दी शिक्षण जगत बीती सदी के उत्तरार्ध्द में कैसे बदलता गया, साहित्य जगत में किस तरह की राजनीति चलती रही और इसके समानांतर किस तरह रचनाकर्म, शोध जैसे कार्य होते रहे...यह सब गहराई से समझने के लिए निर्मला जैन की कृति 'जमाने में हम' बड़ी उपयोगी है. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित यह कृति निर्मला जैन की आत्मकथा है.

  • हार्पर कॉलिन्स इंडिया का प्रसारण मंच शुरू

    हार्पर कॉलिन्स इंडिया का प्रसारण मंच शुरू

    प्रकाशन क्षेत्र की कंपनी हार्पर कॉलिन्स इंडिया ने अपना प्रसारण मंच शुरू किया है जिस पर वह पुस्तक समीक्षा, विषय वस्तु के परिचय अंश (ट्रेलर) लेखकों के बारे में जानकारी और उनके साक्षात्कारों का प्रसारण करेगी। 

  • किताब मिली - 'ध्वनियों के आलोक में स्त्री', गायिकाओं का अव्यक्त संघर्ष

    किताब मिली - 'ध्वनियों के आलोक में स्त्री', गायिकाओं का अव्यक्त संघर्ष

    मृणाल पाण्डे ने 'ध्वनियों के आलोक में स्त्री' के जरिये संगीत साधक महिलाओं के बहाने समाज के दोमुंहेपन को उजागर किया है। यह तार सप्तक पर जमे गायकों के समानांतर मंद्र सप्तक पर धकेल दी गईं गायिकाओं के संघर्ष का ऐसा दस्तावेज है जो कलाकारों, कला रसिकों के साथ-साथ आम पाठक के लिए भी बहुत उपयोगी है।

  • आपको बेहतर प्रेमी बना सकती है 'बेदाद-ए-इश्क़ : रूदाद-ए-शादी'

    आपको बेहतर प्रेमी बना सकती है 'बेदाद-ए-इश्क़ : रूदाद-ए-शादी'

    इस किताब को पढ़ना प्रेम विवाहों के तमाम उतार चढ़ावों से गुज़रने जैसा है। जहां पहली बार मिलना और प्रपोज़ करने की रूमानियत की जगह ज़िंदगी का वह चेहरा नज़र आने लगता है, जो एक बार डरा भी देता है कि कलेजा नहीं है तो इश्क़ मत कीजिए।

  • पल्लव बागला की पुस्तक की समीक्षा : हम भी अगर इसरो होते...

    पल्लव बागला की पुस्तक की समीक्षा : हम भी अगर इसरो होते...

    मेरी मैग्डेलन चर्च। केरल के तट पर बसे थुंबा का यह चर्च के बिना अंतरिक्ष में हिन्दुस्तान का सफ़र न तो शुरू होता है न पूरा। विक्रम साराभाई ने जब थुंबा को भारत के पहले राकेट प्रक्षेपण के लिए चुना तो इस चर्च के बिशप ने वहां के ईसाई मछुआरों को साराभाई की मदद के लिए तैयार किया।

  • पुस्तक-परिचय : 'तुम चुप क्यों रहे केदार' - एक त्रासदी की याद...

    पुस्तक-परिचय : 'तुम चुप क्यों रहे केदार' - एक त्रासदी की याद...

    केदारनाथ के आध्यात्मिक अनुभव को लेखक ने अपने पांव की बेड़ी नहीं बनने दिया है। उन्होंने बहुत बारीकी से इस बात का मुआयना किया है कि त्रासदी की तात्कालिक और दूरगामी वजहें क्या-क्या रहीं और कैसे एक प्राकृतिक परिघटना एक मानवीय त्रासदी में परिवर्तित हो गई।

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