NDTV Khabar

प्राइम टाइम इंट्रो


'प्राइम टाइम इंट्रो' - 481 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • प्राइम टाइम इंट्रो : आखिर रैगिंग को क्यों छिपा रहे हैं कुलपति?

    प्राइम टाइम इंट्रो : आखिर रैगिंग को क्यों छिपा रहे हैं कुलपति?

    इस देश में आप जिसे चाहें लाइन में खड़ा कर सकते हैं, उसे हांक सकते हैं. इसी की नुमाइश है यह वीडियो और कतार में चले आ रहे मेडिकल के छात्र. यूपी के सैफई आयुर्विज्ञान महाविद्यालय में मेडिकल कालेज के छात्र हैं, जिनकी रैगिंग हुई है और सिर मुड़वा दिया गया है.

  • ऐसे माहौल में कैसे काम करेगा अफसर?

    ऐसे माहौल में कैसे काम करेगा अफसर?

    इंदौर नगर निगम के कर्मचारियों पर बल्ला चलाने के आरोप में जेल बंद आकाश विजयवर्गीय जब बाहर आए तो कहा कि उन्हें पछतावा नहीं है लेकिन अब वे गांधी के रास्ते पर चलेंगे. वैसे गांधी के रास्ते में प्रायश्चित करना भी था. यही क्या कम है कि आज भी लोग गांधी के रास्ते पर चलना चाहते हैं. बस उस रास्ते पर अब गांधी नहीं मिलते हैं. प्रधानमंत्री मोदी पर कांग्रेस ने चौकीदार चौर है का आरोप लगाया तो उन्होंने मैं भी चौकीदार हूं का नारा दिया. इसी से प्रेरित होकर एक गायक ने विधायक आकाश विजयवर्गीय के समर्थन में म्यूज़िक वीडियो लांच किया है. मेरी गुजारिश है कि आकाश को सुपर हीरो बनाने वाले इस वीडियो को आप जब देखें तो गाना समाप्त होने तक चुप रहें और गाना जब समाप्त हो जाए तो उसके बाद भी चुप रहें.

  • क्या गन्ने का जूस बेचेंगे उत्तर प्रदेश के युवा?

    क्या गन्ने का जूस बेचेंगे उत्तर प्रदेश के युवा?

    पकौड़ा तलना भी रोज़गार है. प्रधानमंत्री के इस कथन को राजनीतिक और सामाजिक तौर से बहुतों ने मज़ाक उड़ाया था. मगर 2019 के रिजल्ट ने मज़ाक उड़ाने वालों को नकार दिया. जो लोग अब भी इसका राजनीतिक और सामाजिक मज़ाक उड़ाते हैं उन्हें अपनी राय में संशोधन कर लेना चाहिए. शायद इसी जनसमर्थन से उत्साहित होकर उत्तर प्रदेश सरकार ने 23 जून को एक ट्वीट किया. इस ट्वीट में कहा गया है कि युवाओं को बड़ी संख्या में रोज़गार उपलब्ध कराने की दिशा में अग्रसर यूपी सरकार ने प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के ज़रिए ऋण मुहैया करवाकर नौजवानों को गन्ने के जूस के कारोबार से जोड़ने का फैसला लिया है.

  • बिहार के सरकारी अस्पतालों की व्यथा-कथा

    बिहार के सरकारी अस्पतालों की व्यथा-कथा

    आज बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने एक ट्वीट किया है कि राबड़ी देवी बताएं, उनके शासन में मेडिकल कॉलेजों की क्या स्थिति थी. यह सुनकर किसी को भी लग सकता है कि राबड़ी देवी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद काफी कुछ सुधार हुआ होगा.

  • बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था कब तक बीमार रहेगी?

    बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था कब तक बीमार रहेगी?

    बिहार के मुज़फ्फरपुर ज़िले में 109 बच्चों की मौत हो चुकी है. यह आधिकारिक आंकड़ा है. मीडिया में आंकड़ा तो 130 पार कर गया है. जब तक हम पूरे बिहार के हेल्थ सिस्टम और बजट को नहीं समझेंगे, बड़े सवाल नहीं करेंगे. श्री कृष्ण मेडिकल कालेज अस्पताल के कुछ वीडियो लेकर तड़क भड़क करने से कुछ नहीं होगा. आप अभी भी स्वास्थ्य से जुड़े असली मसलों से भाग रहे हैं. यह एक दिन का मामला नहीं है.

  • गंभीर मुद्दे इन चुनावों से गायब क्यों रहे? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

    गंभीर मुद्दे इन चुनावों से गायब क्यों रहे? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

    नमस्कार मैं रवीश कुमार, इंटरव्यू होता नहीं था कि लोग हंसना शुरू कर देते थे. ह्मूमर नहीं होता तो 2019 का चुनाव सीरियस नहीं होता. पत्रकारों की जगह अभिनेताओं ने ले ली और सवाल लतीफे बन गए. कई बार तो लगा कि नेता खुद ही कार्टून बन रहे हैं और कार्टूनिस्ट सिर्फ स्केच कर रहे हैं.

  • क्या हिंदी को लेकर हमारा समाज उदासीन हुआ?

    क्या हिंदी को लेकर हमारा समाज उदासीन हुआ?

    अगले तीन चरण के चुनाव मुख्य रूप से हिन्दी भाषी प्रदेशों में ही हो रहे हैं. लेकिन इन प्रदेशों में हिन्दी की ही हालत ख़राब है. हिन्दी बोलने वाले नेताओं के स्तर पर क्या ही चर्चा की जाए, उनके भाषणों में करुणा तो जैसे लापता हो गई है. आक्रामकता के नाम पर गुंडई के तेवर नज़र आते हैं. सांप्रदायिकता से लैस हिन्दी ऐसे लगती है जैसे चुनावी रैलियों में बर्छियां चल रही हों. चुनाव के दौरान बोली जाने वाली भाषा का मूल्यांकन हम बेहद सीमित आधार पर करते हैं. यह देखने के लिए कि आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है या नहीं. मगर भाषा की भी तो आचार संहिता होती है. उसका अपना संसार होता है,संस्कार होता है. ज्ञान का भंडार होता है. उन सबका क्या.

  • हम कितना असंवेदनशील बनाना चाहते हैं समाज को

    हम कितना असंवेदनशील बनाना चाहते हैं समाज को

    भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने भले ही अपने बयान से किनारा कर लिया लेकिन हेमंत करकरे के बारे में उनके बयान का असर गया नहीं है. प्रज्ञा ठाकुर भले ही इस बयान को छोड़ अपने राजनीतिक प्रचार में आगे निकल गईं हैं मगर उनके बयान हेमंत करकरे के साथ काम करने वाले पुलिस अफसरों की अंतरात्मा को चुनौती दे रहे हैं.

  • पत्रकारों को अवमानना की सजा सुनाने पर सवाल

    पत्रकारों को अवमानना की सजा सुनाने पर सवाल

    इस चुनाव में मीडिया भी एक मुद्दा है. इस मीडिया के लिए आप कैसे लड़ेंगे यह एक मुश्किल सवाल है, मीडिया खुद के लिए लड़ पाएगा या नहीं यह उसका सवाल है. मगर मीडिया एक मुद्दा है. मीडिया पर इस तरह हमला है और इतना हमला है कि आप भी किन-किन सवालों की परवाह करेंगे, और इसी तरह धीरे-धीरे आप उन सवालों को नज़रअंदाज़ कर सामान्य होने लगेंगे.

  • युद्ध का विरोध करना युद्ध से घबराने की बात नहीं

    युद्ध का विरोध करना युद्ध से घबराने की बात नहीं

    जिसकी आशंका की जा रही है उसकी एक झलक आज दिखी है. अगर यह उसी दिशा में जाती दिख रही है तो अब सबको गंभीर होकर सोचना चाहिए. क्या बुधवार की सुबह जो हुआ वह भारत पाकिस्तान को युद्ध की लेकर जा सकता है.

  • सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के फैसले पर सवाल

    सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के फैसले पर सवाल

    जजों को नियुक्त करने वाली सुप्रीम कोर्ट की संस्था कॉलेजियम के फैसले को लेकर विवाद हो गया है. कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के पांच जज होते हैं. इस कॉलेजियम ने 12 दिसंबर की बैठक में तय किया कि दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेंद मेनन और राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग का प्रमोशन सुप्रीम कोर्ट में होगा. मगर उस बैठक के बाद सरकार को बैठक का फैसला ही नहीं भेजा गया.

  • शिक्षा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में क्यों नहीं?

    शिक्षा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में क्यों नहीं?

    सरकारी स्कूलों और कालेजों में शिक्षा की हालत ऐसी है कि जरा सा सुधार होने पर भी हम उसे बदलाव के रूप में देखने लगते हैं. सरकारी स्कूलों में लाखों की संख्या में शिक्षक नहीं हैं. जो हैं उनमें से भी बहुत पढ़ाने के योग्य नहीं हैं या प्रशिक्षित नहीं हैं.

  • लड़कियों को लेकर समाज में इतनी हिंसा क्यों?

    लड़कियों को लेकर समाज में इतनी हिंसा क्यों?

    बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ. यह नारा आपको अब हर टैम्पो ट्रक के पीछे दिख जाता है. अक्सर इस नारे में हमारा ज़ोर बेटियों के पढ़ाने पर होता है लेकिन ज़ोर होना चाहिए पहली लाइन पर. बेटी बचाओ पर. किससे बचाओ और क्यों बचाओ. क्या यह नारा इसलिए नहीं है कि हमारा समाज बेटियों को गर्भ में मारने वाला रहा है और गर्भ से बेटियां बाहर भी आ गईं तो सड़कों पर जला कर मार देता है या बलात्कार से मार देता है

  • रोजगार के मुद्दे पर हमारी सरकारें कितनी गंभीर?

    रोजगार के मुद्दे पर हमारी सरकारें कितनी गंभीर?

    नौजवानों का सबसे बड़ा इम्तिहान यह है कि वे नौकरी को लेकर किए जा रहे किसी भी वादे और बहस को लेकर भावुक न हों. न तो कांग्रेस की तरफ से भावुक हों न बीजेपी की तरफ से. आपने नौकरी सीरीज़ के दौरान देखा है कि किस तरह देश के कई राज्यों में चयन आयोगों ने नौजवानों को अपमानित और प्रताड़ित किया है.

  • इंसाफ का लंबा इंतजार क्या सजा नहीं? पुणे का मोहसिन शेख हत्याकांड याद कीजिए

    इंसाफ का लंबा इंतजार क्या सजा नहीं? पुणे का मोहसिन शेख हत्याकांड याद कीजिए

    क्या वाकई हम इंसाफ़ की बात करते हैं या इंसाफ के नाम पर कांग्रेस बनाम बीजेपी करते हैं. दंगों और नरसंहारों के इंसाफ की बात जब भी आती है वह वहां भी पहुंचती है जहां इसकी बात नहीं होती है. उसकी आवाज़ पुणे में भी गूंज रही है और अलवर में भी और बुलंदशहर में भी.

  • वक्त कमलनाथ का और धीरज सिंधिया के हिस्से में

    वक्त कमलनाथ का और धीरज सिंधिया के हिस्से में

    आज जो भी हुआ उसे बैठक नहीं, उठक-बैठक कहा जाना चाहिए. कांग्रेस को तीन मुख्यमंत्री चुनने में तीन दिन लग गए. लीजिए अब देखिए. अचानक आठ बजे के बाद राहुल ट्वीट करते हैं और लियो टॉल्सटॉय को बीच में ले आते हैं. मगर ट्वीट में खुद बीच में दिख रहे हैं और एक तरफ सिंधिया और एक तरफ कमलनाथ दिख रहे हैं. लिखा है कि धीरज और वक्त दो शक्तिशाली लड़ाके हैं.

  • शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाने की क्या रही वजह?

    शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाने की क्या रही वजह?

    शक्तिकांत दास 2015-17 के दौरान आर्थिक मामलों के सचिव थे और उन्हीं के कार्यकाल में नोटबंदी लागू हुई थी. नवंबर से दिसंबर 2016 के बीच करीब-करीब हर दिन शक्तिकांत दास की प्रेस कॉन्फ्रेंस होती थी और वे नोटबंदी के लागू किए जाने को लेकर नए-नए नियम बनाते थे. सूचना देते थे. जब जनता नोट बदलने को लेकर समस्याओं से घिरी थी तब वे नए-नए आइडिया लेकर आते थे.

  • बुलंदशहर में क्या जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की साजिश की गई?

    बुलंदशहर में क्या जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की साजिश की गई?

    पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या से संबंधित एफआईआर में 27 लोगों के नाम हैं, 50-60 लोग अज्ञात बताए गए हैं मगर गिरफ्तारी चार की हुई है. यानी 87 नाम, अनाम लोगों में से मात्र 4 गिरफ्तार हुए हैं. मुख्य आरोपी भी गिरफ्तार नहीं हुआ है.