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ब्लॉग


'ब्लॉग' - 999 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • क्या समिति और NGO से चलने लगा है विदेश मंत्रालय

    क्या समिति और NGO से चलने लगा है विदेश मंत्रालय

    एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार की ज़ुबान फिसल गई और उन्होंने नागरिक अभिनंदन समिति का नाम ले लिया.

  • क्या है फेक न्यूज का नया सरगना डीप फेक वीडियो?

    क्या है फेक न्यूज का नया सरगना डीप फेक वीडियो?

    झूठ के पैर नहीं होते लेकिन टेक्नालॉजी ने झूठ को ताकतवर बना दिया है. अभी ही हम जैसे लोग परेशान हैं कि जो बात कहीं नहीं होती वो भी तस्वीर के साथ लिखकर वायरल हो रहा होता है. आल्ट न्यूज़ जैसी साइट वायरल तस्वीर और वायरल वीडियो के पीछे का झूठ तो पकड़ लेते हैं लेकिन वो उन सभी के पास नहीं पहुंच पाता है जिनके व्हाट्स ऐप के इनबाक्स में झूठ पहुंचा होता है.

  • क्या ऐसे ट्रंप की नजरों से छुप जाएगी गरीबी?

    क्या ऐसे ट्रंप की नजरों से छुप जाएगी गरीबी?

    अभी तो माहौल जम रहा था कि अमेरिका से राष्ट्रपति ट्रंप का जहाज़ उड़ेगा और न्यूज़ चैनलों पर ईवेंट कवरेज का मजमा जमेगा..सूत्रों के हवाले से खूब हलवे बनाए जाएंगे, कुछ बातों का पता होगा, कुछ का पता ही नहीं होगा लेकिन तभी आज ट्रंप साहब ने होली जैसे बन रहे मूड को बिगाड़ दिया. उन्हें सोचना चाहिए था कि हम कुछ न पता चले उसके लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं. जबकि हमें पता है कि ट्रंप साहब के पास ड्रोन कैमरा है. इसके बाद भी हमने दीवार बनाई ताकि गरीबों का घर न दिखे. अब ट्रंप साहब कार से उतरकर ड्रोन तो उड़ाएंगे नहीं. इस दीवार से अलग एक और दीवार है. मोटेरा स्टेडियम की तरफ. उस बस्ती की दीवार को रंगा जा रहा है, ईस्टमैन कलर वाले लुक में.

  • ऐसे देशभक्तों से सावधान!

    ऐसे देशभक्तों से सावधान!

    प्रधानमंत्री की आलोचना इस देश की आलोचना है, सरकार के ख़िलाफ़ कुछ कहना या करना देश के ख़िलाफ़ कुछ करना और कहना है. बाक़ी ज़रूरी सवालों पर जो सरलीकृत राय है- मसलन, तीन तलाक का ख़ात्मा बिल्कुल उचित है, पाकिस्तान में सताए जा रहे हिंदू भारत न आएं तो कहां जाएं, कश्मीर में धारा 370 तो ख़त्म होनी ही चाहिए थी, मुसलमानों को ज़्यादा बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए, पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर देना चाहिए- वही इनकी भी राय है.

  • क्या शाहीन बाग से मुगल राज आ जाएगा?

    क्या शाहीन बाग से मुगल राज आ जाएगा?

    शाहीन बाग का धरना शांतिपूर्ण ही रहा, कोई हिंसा नहीं हुई फिर भी इस धरने को लेकर सरकार के मंत्री से लेकर बीजेपी के सांसदों ने क्या-क्या नहीं कहा. इस धरने को लेकर खतरे की ऐसी-ऐसी कल्पना पेश की गई जैसे लगा कि भारत में कोई शासन व्यवस्था ही नहीं है. किसी मोहल्ले की भीड़ आकर दिल्ली पर मुगल राज कायम कर देगी. मुगलों का राज मोहल्ले से नहीं निकला था. इतिहास का इस तरह से देखा जाना आबादी के उस हिस्से को बीमार करने लगेगा जिन्हें यह समझाया जा रहा है कि एक मोहल्ले में धरने पर बैठे लोग हिन्दुस्तान जैसे विशाल मुल्क पर मुगल राज कायम कर देंगे. इस शाहीन बाग को बदनाम करने के लिए क्या-क्या नहीं हुआ.

  • क्या कभी स्कूली शिक्षा पर भी लड़ा जाएगा चुनाव?

    क्या कभी स्कूली शिक्षा पर भी लड़ा जाएगा चुनाव?

    90 के दशक के आखिरी हिस्से से अचानक भारत की राजनीति को बिजली सड़क पानी के मुद्दे से पहचाना जाने लगा. इससे बिजली और सड़क का कुछ भला तो हुआ लेकिन पानी पीछे छूट गया. शिक्षा और स्वास्थ्य का तो नंबर ही नहीं आया. दिल्ली विधानसभा का चुनाव शायद पहला चुनाव है जिसमें शिक्षा का सवाल केंद्र में आते आते रह गया. बेशक दिल्ली का चुनाव स्कूल से शुरू होता है लेकिन शाहीन बाग को पाकिस्तान, गद्दार और आतंकवाद से जोड़ने की सियासी आंधी के कारण पिछड़ता जा रहा है. हिन्दी प्रदेशों के लिए जिनमें से दिल्ली शिक्षा का आखिरी पड़ाव है, यह मुद्दा नई राजनीति को जन्म दे सकता है या दे सकता था. बिहार यूपी और अन्य हिन्दी प्रदेशों से शिक्षा के कारण भी लाखों लोगों का पलायन हुआ है. लोगों ने खराब स्कूलों और कॉलेज की कीमत इतनी चुकाई है कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए शहर बदलने लगे और ट्यूशन और कोचिंग का खर्चा उनकी ज़िंदगी की जमा पूंजी निगल गया. स्कूल अगर राजनीति के केंद्र में आता है तो यह मसला दिल्ली सहित हिन्दी प्रदेशों की राजनीति बदल देगा.

  • सांप्रदायिक तूफ़ान के भंवर में दिल्ली का चुनाव

    सांप्रदायिक तूफ़ान के भंवर में दिल्ली का चुनाव

    सुप्रीम कोर्ट का डेटा है कि 2019 में जनवरी से जून के बीच बच्चों खासकर लड़कियों के खिलाफ 24000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे. 2018 में भारत में 33,977 बलात्कार के केस दर्ज हुए हैं. क्या किसी केस में प्रधानमंत्री और अमित शाह बचाते हुए देखे गए हैं? राष्ट्रीय अपराध शाखा ब्यूरो के रिकार्ड के अनुसार 2018 में दिल्ली में बलात्कार के 1217 मामले दर्ज हुए थे.

  • शाहीन बाग को बचाना भारत को बचाना है

    शाहीन बाग को बचाना भारत को बचाना है

    शाहीन बाग में करीब 40 दिन से आंदोलन चल रहा है- बल्कि वह लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन को एक नई गरिमा, नई कलात्मकता, नई ऊंचाई और नई जनतांत्रिकता दे रहा है. कविता, संगीत, चित्रकला, नाटक, संस्थापन कला- सब इस आंदोलन की जान हैं. दूर-दूर से लोग यहां बस यह देखने आ रहे हैं कि विरोध प्रदर्शन कितना खूबसूरत हो सकता है. दूर-दराज के इलाक़ों में शाहीन बाग बनाने की कोशिश हो रही है.

  • रवीश कुमार का ब्लॉग: मोदी जी को 400 नहीं 545 सीट दीजिए लेकिन उनकी भाषा मत लीजिए

    रवीश कुमार का ब्लॉग: मोदी जी को 400 नहीं 545 सीट दीजिए लेकिन उनकी भाषा मत लीजिए

    छह साल बाद अर्थव्यवस्था फेल है. इस दौरान जिनकी ज़िंदगी बर्बाद हुई उसे सुधरने में बहुत वक्त लग जाएगा. आप प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री की भाषा देखिए.

  • शिकारा का प्रीमियर: सब कुछ पहली बार जैसा था, जैसे पहली बार उसी दिन गोली चली हो

    शिकारा का प्रीमियर: सब कुछ पहली बार जैसा था, जैसे पहली बार उसी दिन गोली चली हो

    जम्मू से आए कश्मीरी पंडित परिवारों को देख रहा था तभी राहुल पंडिता की एक बात कान से टकराई. सबके भीतर इतना भरा हुआ है कि लोग फट पड़ते हैं. हर बार शुरू से कहानी बताने लगते हैं. उसके बाद धीरे-धीरे कश्मीरी पंडित परिवारों से टकराता गया. कनॉट प्लेस के पीवीआर प्लाज़ा सिनेमा हॉल के भीतर जा ही रहा था कि किसी ने पीछे से आवाज़ दी और मुझे खींच लिया, विधु विनोद चोपड़ा. मुड़ते ही उन्होंने कहा कि मैं टीवी नहीं देखता. मैं तो खुद कहता हूं लोग टीवी न देखें. पर वो कुछ और कहना चाहते थे. उन्होंने कहा कि राहुल ने आपके वीडियो का लिंक भेजा था. शाहीन बाग वाले एपिसोड का. मैं देखने लगा तो हैरान हुआ कि टीवी पर इतनी शांति से कैसे बातचीत हो सकती है. फिर मैंने ही कहा था कि इनको बुलाओ. लेकिन मुझे अफ़सोस है कि उसके पहले आपके बारे में कुछ पता नहीं था.

  • निर्भया के इंसाफ़ की गरिमा बनाए रखें- उसे जल्दबाज़ी भरे प्रतिशोध में न बदलें

    निर्भया के इंसाफ़ की गरिमा बनाए रखें- उसे जल्दबाज़ी भरे प्रतिशोध में न बदलें

    निर्भया की मां आशा देवी का दुख निस्संदेह बहुत बड़ा है. इस दुख को समझना मुश्किल नहीं है. उनकी बेटी के साथ बहुत बर्बर और घृणित व्यवहार हुआ और उसके मुजरिमों को अब तक सज़ा नहीं मिली है. लेकिन सांत्वना की बात इतनी भर है कि ये मुजरिम सजा के बिल्कुल आख़िरी सिरे पर हैं, ख़ुद को मिले अंतिम क़ानूनी विकल्पों का इस्तेमाल कर रहे हैं और इनकी सज़ा के लिए गिनती के दिन रह गए हैं. यही नहीं, न्याय से जुड़ी संस्थाएं जितनी तेज़ी से न्याय की इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही हैं, वह रफ़्तार किसी और केस में दिखाई नहीं पड़ती.

  • लखनऊ में घर तलाश रही हैं प्रियंका गांधी वाड्रा, बढ़ती जा रही हैं कांग्रेस की उम्मीदें...

    लखनऊ में घर तलाश रही हैं प्रियंका गांधी वाड्रा, बढ़ती जा रही हैं कांग्रेस की उम्मीदें...

    कांग्रेस का तर्क है कि प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा उत्तर प्रदेश में किए काम का असर दिखने लगा है - सबूत के तौर पर वह बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मुखिया तथा पूर्व मुख्यमंत्री मायावती द्वारा हाल ही में प्रियंका पर किए हमले को पेश करते हैं. इसके अलावा प्रियंका की योगी आदित्यनाथ से भी झड़प हो चुकी हैं. क्षेत्रीय महत्व रखने वाले एक ही राजनेता ने अब तक प्रियंका का विरोध नहीं किया है, और वह हैं समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख तथा पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव.

  • रवीश कुमार का ब्लॉग : CAA पर असम के मंत्री हिमंता बिश्व शर्मा का बयान पढ़ें और जोर से हंसे

    रवीश कुमार का ब्लॉग : CAA पर असम के मंत्री हिमंता बिश्व शर्मा का बयान पढ़ें और जोर से हंसे

    नागरिकता संशोधन क़ानून इसलिए लाया गया है ताकि इसके आधार पर जनता को उल्लू बनाया जा सके. अब देखिए. हिन्दी प्रदेशों में अख़बारों और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में जो ठेला गया है उसका आधार सिर्फ़ यह है कि किसी के कपड़े देखकर बहुसंख्यक सोचना बंद कर देंगे और बीजेपी की तरफ़ एकजुट हो जाएंगे. हंसी आती है. हर दूसरी चर्चा में सुनता रहता हू. क्या यह मान लिया गया है कि लोगों ने सोचना बंद कर दिया है?

  • दशक में कुछ नहीं बदला, शाहीन बाग और अन्ना आंदोलन एक ही जैसे

    दशक में कुछ नहीं बदला, शाहीन बाग और अन्ना आंदोलन एक ही जैसे

    शाहीन बाग़ का महज़ नाम ले लेने से लगभग युद्ध छिड़ उठता है. प्रशासन की आंखों की किरकिरी बनी हुई हैं शाहीन बाग़ में धरने पर बैठी महिलाएं. और अब शाहीन बाग़ महज़ एक जगह का नाम नहीं रह गया, शाहीन बाग नागरिकता कानून के विरोध का एक प्रतीक बन चुका है. ऐसे ही आंदोलन अब देश भर के कई शहरों में शुरू हो गए हैं. यह किसी भी सरकार को तनाव में लाने के लिए काफी है. और इसको लेकर मोदी सरकार का नाखुश होना लाज़मी है.

  • मुसलमान को ‘तुम लोग’ कहने वाली पुलिस हिंदू को ‘चोर’ बना देती है

    मुसलमान को ‘तुम लोग’ कहने वाली पुलिस हिंदू को ‘चोर’ बना देती है

    मनोज साह 1984 से खिलौना बेच रहे हैं. बुलाया तो पहले कहा दाम नहीं चाहिए, ऐसे ही ले लीजिए. इतना बोलते ही रोने लगे. दोनों आंखों से लोर टपकने लगा. तभी लोग गेंद खरीदने आ गए तो उनसे अपनी आंखें छिपाने लगे. उनके जाने के बाद उनका रोना फिर शुरू हो गया. मनोज ने बताया कि उनके दादा की दो बीघा जमीन थी, किसी ने अपने नाम से जमाबंदी करा ली. मतलब अपने नाम से करा ली. जब मनोज ने विरोध किया तो पुलिस से मिलकर चोरी के आरोप में जेल में बंद करा दिया. किसी तरह जमानत पर बाहर आए. मगर पुलिस वाला उनके परिवार को तंग करता है. बच्चों को मारता है.

  • योगी जी युवाओं पर बिल्कुल ध्यान न दें, परीक्षा बंद कर दें, नौकरी भी

    योगी जी युवाओं पर बिल्कुल ध्यान न दें, परीक्षा बंद कर दें, नौकरी भी

    आखिर किस लहज़े में लिखा जाए कि सरकार युवाओं की सुनें. यूपी का युवा रात को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में जेएनयू और दीपिका की फ़र्ज़ी बातें पढ़कर सोता है. जागता है तो रवीश कुमार याद आता है. फिर सैकड़ों मैसेज आने लगते हैं लेकिन दोपहर बाद बंद हो जाता है. आईटी सेल को हिन्दू-मुस्लिम का डोज़ बढ़ा देना चाहिए. अगर मुसलमानों की आबादी वाले पोस्ट बढ़ा दिए जाएं तो युवा दस साल और बेरोजगार रहने के लिए तैयार हो सकते हैं. बल्कि आबादी नियंत्रण के नाम पर जो बोगस क़ानून का प्रोपेगैंडा रचा जा रहा है उससे यूपी या किसी भी हिन्दी प्रदेश के युवाओं को फंसाकर बेरोज़गार रखा जा सकता है. सारे मंत्री इसी पर लेक्चर दें, देखिए लोग कैसे नशे में झूमते हैं. इसमें आरक्षण का भूत भी अचूक काम करेगा.

  • दीपिका पादुकोण के JNU जाने के समर्थन में रघुराम राजन, कहा- एक्ट्रेस ने हमें प्रेरित किया

    दीपिका पादुकोण के JNU जाने के समर्थन में रघुराम राजन, कहा- एक्ट्रेस ने हमें प्रेरित किया

    रघुराम राजन ने अपने ब्लॉग में दीपिका पादुकोण का नाम लिखे बगैर लिखा, 'जब एक एक्ट्रेस अपनी फिल्म को जोखिम में डालकर जेएनयू पीड़ितों से मुलाकात कर विरोध दर्ज कराती हैं तो वो हमें इस वजह से प्रेरित करती हैं कि दांव पर क्या लगा है. उन्होंने दिखाया कि सच और न्याय सिर्फ बड़े-बड़े शब्द नहीं हैं बल्कि ऐसे आदर्श हैं जिनके लिए कुर्बानी दी जा सकती है.'

  • क्यों नरेंद्र मोदी के लिए पहले से कहीं ज़्यादा खतरनाक हो गए हैं अरविंद केजरीवाल

    क्यों नरेंद्र मोदी के लिए पहले से कहीं ज़्यादा खतरनाक हो गए हैं अरविंद केजरीवाल

    ऐसा लगा, जैसे मुस्लिमों ने AAP का साथ छोड़ दिया है, और अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर AAP की अस्पष्ट नीतियों के चलते वे कांग्रेस की ओर लौट रहे हैं. लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस फिर गुटबाज़ी और अंदरूनी कलह की ओर चली गई.

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