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रवीश कुमार


'रवीश कुमार' - 573 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • प्राइम टाइम इंट्रो : बातचीत की असफल मेज से मंदिर-मस्जिद विवाद सुलझने की उम्मीद क्यों?

    प्राइम टाइम इंट्रो : बातचीत की असफल मेज से मंदिर-मस्जिद विवाद सुलझने की उम्मीद क्यों?

    राम मंदिर-बाबरी मस्जिद का मुद्दा एक बार फिर से पब्लिक में आ गया है. उन्हीं लोगों के बीच आ गया है जो 67 साल में बातचीत कर, आपस में लड़भिड़कर भी नतीजा नहीं निकाल सके. धीरे-धीरे यह मुद्दा राजनीति से निकलकर अदालत की देहरी में समा गया और आम तौर पर व्यापक शांति कायम हो गई. मीडिया ने यूपी के हर चुनाव में बीजेपी से पूछकर इसे पब्लिक में लाने के तमाम प्रयास किए कि मंदिर कब बनेगा मगर बीजेपी भी अदालत के फैसले की बात कर अपनी दूसरी रणनीतियों को अंजाम देने में जुट गई. बार-बार तमाम पक्षों ने दोहराया कि अदालत का फैसला अंतिम रूप से माना जाएगा.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलना योगी के सामने बड़ी चुनौती

    प्राइम टाइम इंट्रो : अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलना योगी के सामने बड़ी चुनौती

    यूपी में बीजेपी की जीत पर जितनी समीक्षाएं छपी हैं, उससे कम योगी के एलान के बाद नहीं छपी हैं. हर घंटे योगी की समीक्षा करता हुआ एक लेख अवतरित हो रहा है. इन लेखों में योगी के पुराने बयानों का हवाला दिया जा रहा है. स्त्री विरोधी बयान, अल्पसंख्यक विरोधी बयान. उतनी ही तेज़ी के साथ योगी को मुस्लिम हितैषी बताने वाले किस्से भी सामने आ रहे हैं. कैसे मंदिर परिसर में मुसलमानों की दुकाने हैं, कैसे मुसलमान उनके करीबी हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : खेती से हारे, अब भाषा से हारते किसान

    प्राइम टाइम इंट्रो : खेती से हारे, अब भाषा से हारते किसान

    संसाधन से लेकर संपादकीय पसंद जैसे तमाम कारणों से दिल्ली से चलने वाले स्थानीय किंतु राष्ट्रीय कहलाने वाले चैनलों की दुनिया में दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत का आगमन तभी होता जब वहां ऐसा कुछ होता है जिसका तालुल्क भाषा से कम हो, हल्ला हंगामा या तमाशा से ज़्यादा हो. आज के मीडिया जगत में तमाशा की कोई भाषा नहीं होती है. तमाशा हो तो हिन्दी चैनलों पर फ्रांस की घटना भी भारत की ज़रूरी ख़बरों से ज़्यादा जगह घेर लेगी.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : किसानों की कर्ज़ माफ़ी आर्थिक तौर पर कितनी भारी?

    प्राइम टाइम इंट्रो : किसानों की कर्ज़ माफ़ी आर्थिक तौर पर कितनी भारी?

    क्या आप जानते हैं कि भारत के किसानों पर कितने लाख करोड़ का कर्ज़ा है. इन किसानों में से कितने छोटे और मझोले किसान हैं और कितने खेती पर आधारित बिजनेस. कई बार हम खेती पर आधारित बिजनेस के लोन को भी किसानों के लोन में शामिल कर लेते हैं. सितंबर 2016 में राज्यसभा में कृषि राज्य मंत्री ने बताया था कि भारत के किसानों पर 30 सितंबर 2016 तक 12 लाख 60 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ा है. इनमें से 9 लाख 57 हज़ार करोड़ का कर्ज़ा व्यावसायिक बैंकों ने किसानों को दिया है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : ईवीएम पर किसे कितना भरोसा?

    प्राइम टाइम इंट्रो : ईवीएम पर किसे कितना भरोसा?

    सरकार बदलने से किसी दल के समर्थकों में हार की हताशा तो होती ही होगी, उनके भीतर एक भय भी होता है. कई बार हारने वाली पार्टी के कार्यकर्ता डर के कारणों को समझ नहीं पाते हैं. इसका कारण सिम्पल है. जब किसी समर्थक की पार्टी सत्ता में आती है तो थानों में भी आती है. झूठे मुकदमों और ज़मीन के कब्ज़ों के लिए भी आती है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : राजनीति में नैतिकता को तौलने वाला कोई तराजू नहीं

    प्राइम टाइम इंट्रो : राजनीति में नैतिकता को तौलने वाला कोई तराजू नहीं

    भारतीय राजनीति में सब कुछ है बस एक तराजू नहीं है, जिस पर आप नैतिकता तौल सकें. चुनाव बाद की कोई नैतिकता नहीं होती है. राज्यपाल के बारे में संविधान की जितनी धाराएं और उनकी व्याख्याएं रट लें, व्यवहार में राज्यपाल सबसे पहले अपनी पार्टी के हित की रक्षा करते हैं. यही हम कई सालों से देख रहे हैं, यही हम कई सालों तक देखेंगे. राज्यपालों ने संविधान की भावना और आत्मा से खिलवाड़ न किया होता तो कर्नाटक, बिहार, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड के मामले में अदालत को राज्यपाल के फैसले पलटने नहीं पड़ते. उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को जब चुनौती दी गई तब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा था लोग गलत फैसले ले सकते हैं चाहे वे राष्ट्रपति हों या जज. ये कोई राजा का फैसला नहीं है जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : उत्तर प्रदेश में मोदी-शाह का कमाल

    प्राइम टाइम इंट्रो : उत्तर प्रदेश में मोदी-शाह का कमाल

    'यूपी को गुजरात पसंद है', पता नहीं किसी ने ये नारा क्यों नहीं लिखा, लेकिन यूपी ने अपनी तरफ से यही नारा दे दिया है. यूपी को समझ कर भारतीय राजनीति को समझने वाले कंफ्यूज़ हो गए हैं. फिलहाल यही लगता है कि यूपी को अमित शाह से बेहतर कोई नहीं जानता और यूपी प्रधानमंत्री मोदी से बेहतर किसी को नहीं पहचानता है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : नेता से सुनिए चुनाव प्रचार के कटु अनुभव...

    प्राइम टाइम इंट्रो : नेता से सुनिए चुनाव प्रचार के कटु अनुभव...

    पतझड़ में जैसे पत्ते बिखरे होते हैं वही हाल इस बार एग्ज़िट पोल के नंबरों का है. लोग उलट पलट कर देख तो ले रहे हैं मगर यह सोच कर नहीं उठा रहे हैं कि गिरे हुए पत्ते किस काम के. एग्ज़िट पोल की ऐसी दुर्गति कभी नहीं देखी गई. टीवी चैनलों के चुनावी कवरेज़ में एग्ज़िट पोल की अपनी विश्वसनीयता होती थी. ग़लत होते हुए भी लोगों को बहुत दिनों तक यकीन रहा कि इन आंकड़ों की अपनी वैज्ञानिकता है. जल्दी ही विश्वसनीयता और वैज्ञानिकता ग़ायब होने लगी. धीरे-धीरे शक करने लगे, एग्ज़िट पोल ग़लत होने लगे.

  • एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार को कुलदीप नैयर सम्मान

    एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार को कुलदीप नैयर सम्मान

    पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार को एक बार फिर सम्मानित किया जाएगा. भाषाई पत्रकारिता के लिए स्थापित पहला कुलदीप नैयर सम्मान संजीदा पत्रकार रवीश कुमार को दिया जाएगा.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : लड़कियों के लिए हॉस्टल टाइमिंग से लेकर पहनावे तक के नियम अलग क्यों?

    प्राइम टाइम इंट्रो : लड़कियों के लिए हॉस्टल टाइमिंग से लेकर पहनावे तक के नियम अलग क्यों?

    आम समाज की यही सोच है कि लड़कियों के लिए सुरक्षा ज़रूरी है और देर रात तक बाहर रहने की इजाज़त मां-बाप भी नहीं देंगे. इस तरह से यह लड़ाई सिर्फ हॉस्टल के ख़िलाफ़ नहीं है. अपने उन घरों से भी है जहां इस तरह की पाबंदी है और जो इस तरह की पाबंदियों का समर्थन करते हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : बच्चों को टॉपर बनाने की कोशिश में हम भटक तो नहीं रहे

    प्राइम टाइम इंट्रो : बच्चों को टॉपर बनाने की कोशिश में हम भटक तो नहीं रहे

    भारत में भाषण तो दिया जाता है कि इम्तहानों से घबराना नहीं है मगर सारा सिस्टम इसी तरह से बनाया जाता है कि न घबराने वाला बच्चा भी घबराया सा रहे. इम्तहान हमारी जीडीपी से भी ज़्यादा तनाव पैदा करते हैं. जिन इम्तहानों का जीवन में कोई मतलब नहीं होता है, वो न जाने कितने जीवन पर जानलेवा साबित हो रहे होंगे, हिसाब लगाना मुश्किल है. सीबीएसई ने फिर से दसवीं का इम्तहान शुरू कर दिये हैं. घरों में युद्ध सा माहौल रहता है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क

    प्राइम टाइम इंट्रो : हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क

    हार्वर्ड से ज़्यादा दम होता है हार्डवर्क में. नारा तो सरिया, सीमेंट के विज्ञापन जैसा ही ज़ोरदार है. प्रधानमंत्री की इस गुगली से हार्वर्ड वालों की धुकधुकी बढ़ गई होगी. वैसे हार्डवर्क नाम की कोई यूनिवर्सिटी नहीं है फिर भी परेशान तो होंगे कि क्या वे बिना हार्डवर्क के ही हार्वर्ड वाले हो गए. यूपी के महाराजगंज से हार्वर्ड वालों को पहली बार सीरीयस चुनौती मिली है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : बहुत सताते हैं हमारे दम तोड़ते बदहाल शहर

    प्राइम टाइम इंट्रो : बहुत सताते हैं हमारे दम तोड़ते बदहाल शहर

    भारत के शहरों को करीब से देखने की जरूरत है. सड़कों पर कारें भरी हैं और आदमी उन कारों में घंटों फंसा हुआ है. हवा की हालत खराब है. थोड़ी सी बरसात होती है कि शहर डूबने लगते हैं. भारत का ऐसा कोई प्रमुख शहर नहीं बचा है जो ट्रैफिक जाम और प्रदूषित हवा से कराह नहीं रहा है. हमें लगता है कि यह कोई वक्ती समस्या है, मगर अब यह मान लेना चाहिए कि हमारे शहर दम तोड़ने के कगार पर हैं. इन्हें बेहतर बनाए जाने की बातें अखबारों में ही होती हैं, जमीन पर कम ही दिखता है. अवसर भी इन्हीं शहरों में हैं तो जाहिर है आबादी का दबाव भी बढ़ेगा.

  • कौन डरता है लड़कियों के बोलने से?

    कौन डरता है लड़कियों के बोलने से?

    जब भी कोई अकेला बोलता है, उसका बोलना किसी भी भीड़ से बहुत बड़ा होता है. अकेला बोलने वाला कमज़ोर से कमज़ोर वक्त में, ताकतवर से ताकतवर सरकार के सामने एक उम्मीद होता है. सरकारें अगर हमेशा जनता के साथ होतीं तो इसी भारत देश में इसी वक्त में अलग-अलग सरकारों के ख़िलाफ़ सैकड़ों की संख्या में विरोध प्रदर्शन नहीं चल रहे होते. सरकार चुनते तो आप हैं मगर वो हमेशा आपकी नहीं होती है. ये बात जानने के लिए मैट्रिक पास होना ज़रूरी नहीं है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : बच्चे के जन्म के लिए ऑपरेशन सही है या नॉर्मल डिलिवरी?

    प्राइम टाइम इंट्रो : बच्चे के जन्म के लिए ऑपरेशन सही है या नॉर्मल डिलिवरी?

    दो महीना पहले चेंज डॉट ओआरजी पर मुंबई की सुवर्णा घोष ने एक याचिका डाली और लोगों से समर्थन मांगा. याचिका के ज़रिये सुर्वणा जी ने मांग की कि सभी अस्पतालों के लिए अनिवार्य किया जाए कि वे अपने अस्पताल में होने वाले सीज़ेरियन डिलिवरी की संख्या की घोषणा करें. दो महीने के भीतर इस अभियान को एक लाख चालीस हज़ार लोगों ने अपना समर्थन दिया है जिनमें से साठ फीसदी महिलाएं हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : स्टेंट की क़ीमतों पर सरकार ने लगाई लगाम

    प्राइम टाइम इंट्रो : स्टेंट की क़ीमतों पर सरकार ने लगाई लगाम

    इस रिपोर्ट के दौरान इंटरनेट पर रिसर्च करते हुए जानकारी मिली कि 2016 के साल में भारत के अस्पतालों में 6 लाख स्टेंट का इस्तेमाल हुआ. अब सोचिये 30,000 का स्टेंट आपने डेढ़ पौने दो लाख में लगवाया. अस्पतालों ने स्टेंट के ज़रिये काफी कमाया है. कई जगह यह भी पढ़ने को मिला कि भारत से लेकर अमरीका तक में 25-30 प्रतिशत लोगों को स्टेंट लगाया गया जबकि वो सिर्फ दवा से ठीक हो सकते थे. अब जो आदेश हुआ है, उसके अनुसार अस्पताल अपने बिल में अलग से बतायेंगे कि स्टेंट की कितनी कीमत वसूली गई है.

  • क्या करोड़पति भारतीयों के लिए राष्ट्र सिर्फ एक सर्विस प्रोवाइडर होता है?

    क्या करोड़पति भारतीयों के लिए राष्ट्र सिर्फ एक सर्विस प्रोवाइडर होता है?

    क्या करोड़पतियों का कोई राष्ट्र नहीं होता है? तो क्या राष्ट्र सिर्फ उस भीड़ के लिए है जो गरीब है, नासमझ है और जो अपने तर्कों के प्रति कम, भावनाओं के प्रति ज़्यादा समर्पित होती है?

  • यूपी चुनाव : सौगंध राम की खाते हैं से गंगा की सौगंध तक...

    यूपी चुनाव : सौगंध राम की खाते हैं से गंगा की सौगंध तक...

    वाकई ट्रंप ने अगर यूपी चुनाव में भाषा का स्तर देख लिया तो उनके और नीचे आने की उम्मीद की जा सकती है. ट्रंप का असर दुनिया में हो रहा है, कहीं उन पर यूपी का असर न हो जाए.

  • रवीश कुमार का ब्‍लॉग: क्या लगता है आपको, यूपी में कौन जीतेगा!

    रवीश कुमार का ब्‍लॉग: क्या लगता है आपको, यूपी में कौन जीतेगा!

    यूपी में कौन जीत रहा है, इस सवाल के दागते ही फन्ने ख़ां बनकर घूम रहे पत्रकारों के पाँव थम जाते हैं. लंबी गहरी साँस लेने लगते हैं. उनके चेहरे पर पहला भाव तो यही आता है कि दो मिनट दीजिये, नतीजा बताता हूँ लेकिन दो मिनट बीत जाने के बाद चेहरे का भाव बदल जाता है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : बीएमसी चुनावों में जनता की क्या है मांग?

    प्राइम टाइम इंट्रो : बीएमसी चुनावों में जनता की क्या है मांग?

    30,000 करोड़ से अधिक के बजट वाली बृह्न मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी के चुनाव हो रहे हैं. पौने तीन करोड़ की आबादी 227 पार्षदों को चुनने के लिए 21 फरवरी को मतदान करने जा रही है. मुंबई में वार्डों का नामकरण संख्या के हिसाब से नहीं होता है. अंग्रेज़ी अल्फाबेट से होता है. ए से लेकर टी नाम वाले वार्ड होते हैं यहां. क्‍यू, आई, जे, ओ नाम के वार्ड क्यों नहीं हैं, ये मैं नहीं जानता हूं. जबकि ए से टी के बीच ये चारों आते हैं.