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सूर्यकांत पाठक


'सूर्यकांत पाठक' - 13 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • Valentine's Day: मौसम का जादू...बादलों से आलिंगन में बंधी धरती

    Valentine's Day: मौसम का जादू...बादलों से आलिंगन में बंधी धरती

    वेलेंटाइन डे पर भोर आंखें खोल ही रही थी कि रिमझिम फुहारों ने दिल्ली पर प्यार बरसाना शुरू कर दिया, वंसत ऋतु में प्यार के मौसम की दस्तक.

  • बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कहते हैं महात्मा गांधी

    बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कहते हैं महात्मा गांधी

    महात्मा गांधी का देहावसान होने पर अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जनरल सी मार्शल ने कहा था - 'महात्मा गांधी आज सारी मानवता के प्रतिनिधि बन गए हैं. यह वह व्यक्तित्व है जिसने सत्य और विनम्रता को साम्राज्यों से भी ज्यादा शक्तिशाली बनाया.'

  • स्मृति शेष : हिंदुस्तानी संगीत के आकाश पर दमकते रहेंगे गिरिजा देवी के सुर

    स्मृति शेष : हिंदुस्तानी संगीत के आकाश पर दमकते रहेंगे गिरिजा देवी के सुर

    आम तौर पर गायक एक क्षेत्र विशेष चुनता है जैसे शास्त्रीय, सुगम संगीत या लोक संगीत और उसमें भी ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, गजल, भजन वगैरह या फिर कोई खास लोक गायन शैली...लेकिन गिरिजा देवी की गायकी इन सीमाओं में कभी नहीं बंधी. वे शुद्ध शास्त्रीय संगीत में निष्णात थीं तो सुगम संगीत में भी उन्हें महारत था. इतना ही नहीं, वे लोक संगीत को तो खास पहचान देने वाली गायिका थीं. हिंदुस्तानी संगीत के विशाल आकाश पर उनके स्वर हर जगह दमकते रहे. यही कारण है कि वे आम कलाकारों से कहीं ऊपर प्रतिष्ठित थीं.

  • रोहिंग्या समुदाय की त्रासदी : कैसा लगेगा, यदि आपके पैरों तले से जमीन खींच ली जाए?

    रोहिंग्या समुदाय की त्रासदी : कैसा लगेगा, यदि आपके पैरों तले से जमीन खींच ली जाए?

    क्या अभागे रोहिंग्या मुसलमानों को कोई ऐसा टापू मिल पाएगा जहां बाढ़ न आती हो, जहां वे इंसानों की तरह जी सकें, जहां फिर कोई उनके घर न जला सके, हैलिकॉप्टरों से हमले करके उनका संहार न कर सके, जहां उनको उनके जीने के अधिकार से वंचित न किया जा सकता हो, जहां उनकी अपनी पहचान हो, अपनी जमीन हो और भविष्य भी हो?

  • अनिल दवे की रगों में बहती थी नर्मदा नदी

    अनिल दवे की रगों में बहती थी नर्मदा नदी

    अनिल माधव दवे एक राजनीतिज्ञ से ज्यादा समाजसेवी थे. उनका जन्म स्थान उज्जैन शिप्रा के तट पर स्थित है लेकिन उनकी अगाध श्रद्धा नर्मदा नदी में थी. उनमें नर्मदा और इसकी नदी सभ्यता को जानने-समझने की उत्कट आकांक्षा थी. वे प्रकृति के प्रति अनन्य अनुराग से भरे हुए थे.

  • पुस्तक समीक्षा : तमन्ना तुम अब कहां हो- हर क्षण गुजरतीं अंतहीन कहानियां

    पुस्तक समीक्षा : तमन्ना तुम अब कहां हो-  हर क्षण गुजरतीं अंतहीन कहानियां

    निधीश त्यागी का कथा संग्रह (हालांकि यह सिर्फ इतना नहीं) ‘तमन्ना तुम अब कहां हो’ 2013 में पहली बार प्रकाशित हुआ. तब से यह लगातार चर्चा में रहा. इसमें प्रेम कथाएं हैं, पर आम प्रचलित प्रेम कथाओं की तरह नहीं. यह सुखांतकों या दुखांतकों की तरह भी नहीं हैं. यह तो आम जीवन में रोज-ब-रोज कहीं से शुरू होने और कहीं छूट जाने वालीं अनुभूतियां हैं. यह कहना भी शायद कमतर होगा कि यह सिर्फ और सिर्फ प्रेम कथाएं हैं, इसमें प्यार से इतर आकांक्षाएं भी हैं, जीवन के विविध रंग हैं.

  • जमाने में हम : दिल्ली का साहित्य जगत और निर्मला जैन के संघर्ष की कथा

    जमाने में हम : दिल्ली का साहित्य जगत और निर्मला जैन के संघर्ष की कथा

    दिल्ली का हिन्दी साहित्य जगत और राजधानी के विश्वविद्यालयों का हिन्दी शिक्षण जगत बीती सदी के उत्तरार्ध्द में कैसे बदलता गया, साहित्य जगत में किस तरह की राजनीति चलती रही और इसके समानांतर किस तरह रचनाकर्म, शोध जैसे कार्य होते रहे...यह सब गहराई से समझने के लिए निर्मला जैन की कृति 'जमाने में हम' बड़ी उपयोगी है. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित यह कृति निर्मला जैन की आत्मकथा है.

  • ओम पुरी का जाना : सिनेमा से एक आम इनसान का चेहरा खो जाना

    ओम पुरी का जाना : सिनेमा से एक आम इनसान का चेहरा खो जाना

    ओम पुरी अब दुनिया में नहीं हैं. फिल्म उद्योग में सैकड़ों कलाकार आते-जाते रहते हैं, कुछ लोकप्रियता पाते हैं...बहुत सारे समय के साथ भुला दिए जाते हैं. सवाल यह है कि ओम पुरी में उन सैकड़ों कलाकारों से अलग क्या था और उन्हें क्यों याद किया जाता रहेगा... ओम पुरी एक बेहतरीन अभिनेता तो थे ही साथ में एक आम इनसान का चेहरा भी थे, वह चेहरा जो आपको अपने आसपास हमेशा नजर आ जाता है.

  • रिश्तेदार नहीं, रिश्तों पर भरोसे का ‘रंग’...

    रिश्तेदार नहीं, रिश्तों पर भरोसे का ‘रंग’...

    भारत से विदेशों में जाकर बसने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. इसके परिणाम स्वरूप पारिवारिक विघटन भी बढ़ रहा है. विदेशों में स्थाई रूप से जा बसे लोगों के मां-बाप एकाकी जीवन जीने और बुढ़ापे की परेशानियों को झेलने के लिए मजबूर होते हैं. उन्हें अंतिम समय में कोई अपना पानी देने वाला भी नहीं होता. इस त्रासदी पर केंद्रित नाटक ‘टुकड़े-टुकड़े धूप’ का मंचन भरतमुनि रंग उत्सव के तहत बुधवार को दिल्ली के श्रीराम सेंटर में किया गया.

  • युद्ध के विरुद्ध एक गजब की अदा ऐसी भी...

    युद्ध के विरुद्ध एक गजब की अदा ऐसी भी...

    जब युद्ध के खिलाफ जनभावनाएं अलग-अलग माध्यमों में व्यक्त हो रही हैं तब यह विचार रंगमंच पर भी अवतरित हुआ. दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल ने युद्ध की विभीषिका पर केंद्रित नाटक 'गजब तेरी अदा' का प्रदर्शन किया. 'गजब तेरी अदा' में 'अदा' क्या है? 'अदा' वास्तव में उस स्त्री समाज की है जो हमेशा से युद्ध के कुप्रभावों को सबसे अधिक सहने के लिए अभिशप्त रही है.

  • मोहम्मद रफी : मन में बसे गीत भाषा और काल की सीमा से परे

    मोहम्मद रफी : मन में बसे गीत भाषा और काल की सीमा से परे

    कभी आपने अंदाजा लगाया है कि आम लोग सबसे अधिक गाने किस गायक के गुनगुनाते हैं. जरा ध्यान देकर देखें...हिन्दी फिल्मी संगीत के प्रेमियों में अधिक दीवाने मोहम्मद रफी के ही मिलेंगे. मन में बसकर जुबान पर चढ़ने वाली धुनें वही होती हैं जिनका कम्पोजीशन उम्दा होता है और गायक जिन्हें ऐसा गाता है कि सुनने वाले के दिल में उतर जाए. वास्तव में मोहम्मद रफी दिल से गाते थे.

  • आरडी बर्मन...संगीत, जो तरंगित है रसिकों के मन में

    आरडी बर्मन...संगीत, जो तरंगित है रसिकों के मन में

    आज यदि यदि राहुलदेव बर्मन जिंदा होते तो 77 साल के हो गए होते। उन्हें दुनिया से विदा हुए 22 साल से अधिक वक्त बीत गया लेकिन उनका संगीत फिल्म संगीत के रसिकों की रगों में आज भी तरंगित हो रहा है। उनकी धुनें विस्मृत नहीं की जा सकतीं। सवाल यह है कि किसी संगीत सर्जक को बरसों बरस याद क्यों किया जाता रहता है?

  • अंग्रेजी बोलने-सुनने पर अतिरिक्त अंक, हिन्दी का क्या?

    अंग्रेजी बोलने-सुनने पर अतिरिक्त अंक, हिन्दी का क्या?

    सीबीएसई ने एक ताजा फैसले में अंग्रेजी की महत्ता और बढ़ा दी है। संस्थाएं बच्चों को अंग्रेजी में शिक्षित करके उन्हें 'ग्लोबल' बनाएं, लेकिन अपनी भाषाई जड़ों से उखाड़कर ऐसा करना क्या ठीक है? हिन्दी को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। यह हिन्दी को प्रसारित करने के लिए नहीं बल्कि इसे जिंदा रखने के लिए जरूरी है।