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Priyadarshan


'Priyadarshan' - 222 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • किताब समीक्षा : स्मृतियों की जुगाली से बनी प्राथमिक कविता

    किताब समीक्षा : स्मृतियों की जुगाली से बनी प्राथमिक कविता

    झारखंड में तीन साल की बच्ची से हुए रेप की चीख आप इस संग्रह में सुन सकते हैं. मॉब लिंचिंग पर कई कविताएं हैं. सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर दुख भरी कविता है- आत्महत्या के पहले की सिहरन को महसूस करने की कोशिश करती हुई. होली-दशहरा भी इन कविताओं में आते हैं. लेकिन फिर दुहराना होगा कि ये बिल्कुल प्राथमिक अभिव्यक्तियां हैं जो किसी भी कवि हदय इंसान में संभव हैं. बहुत गहरी तकलीफ़ों को तत्काल बयान नहीं करना चाहिए. उन्हें उलट कर, पलट कर, कुछ

  • पुलवामा, फ़वाद चौधरी का बयान और हिंदुस्तान

    पुलवामा, फ़वाद चौधरी का बयान और हिंदुस्तान

    पाकिस्तान के कैबिनेट मंत्री फ़वाद चौधरी ने अपनी संसद में कह दिया है कि पुलवामा हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ था. भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने और उसमें सक्रिय हिस्सेदारी निभाने का आरोप पाकिस्तान पर पुराना है और गाहे-ब-गाहे उसके सबूत भी मिलते रहते हैं. मगर पहली बार संसद में किसी मंत्री का यह बयान एक अलग अहमियत रखता है.

  • प्रधानमंत्री की मगही और भाषाओं का दर्द

    प्रधानमंत्री की मगही और भाषाओं का दर्द

    बिहार में पटना की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मगही बोलने की कोशिश करते नज़र आए. बिहार की तीन प्रमुख भाषाओं में मगही कुछ लटपटाई हुई सी भाषा है. उसमें न भोजपुरी वाली अक्खड़ता है और न मैथिली वाला माधुर्य, बल्कि इसकी जगह एक घरेलूपन है जिसमें प्रेम और क्रोध दोनों एक सीमा के भीतर ही प्रगट होते हैं.

  • यह कैसी भाषा है नीतीश कुमार जी? इसका असली मतलब क्या है?

    यह कैसी भाषा है नीतीश कुमार जी? इसका असली मतलब क्या है?

    नीतीश कुमार को हम क़सूरवार क्यों मानें? दरअसल हमारी राजनीति ही नहीं, हमारे समूचे सार्वजनिक विमर्श की भाषा बहुत सपाट और निरर्थक हो चुकी है. इस विमर्श में शब्द अपने अर्थ जैसे खो चुके हैं. वे तभी चुभते या तंग करते हैं जब वे बहुत अश्लील या फूहड़ ढंग से इस्तेमाल किए जाते हैं.या तब भी वे चुभते नहीं हैं, बस हमारे राजनीतिक इस्तेमाल के लायक हो जाते हैं. हम अपना पक्ष देखकर उनका विरोध या बचाव करते हैं.

  • अपनी अलग कथा-प्रविधि गढ़ता एक लेखक

    अपनी अलग कथा-प्रविधि गढ़ता एक लेखक

    वह कहानी जिसकी चर्चा के बिना यह टिप्पणी अधूरी रहेगी. दरअसल यह कहानी जितनी लेखक के लिए चुनौती भरी है उतनी ही आलोचक के लिए भी. ‘एक राजा था जो सीताफल से डरता था’ नाम की यह कहानी हालांकि संग्रह के प्रकाशन से पहले भी चर्चित हो चुकी है. यह पूरी तरह फंतासी से पैदा हुई कथा है- इसमें कुछ लोककथा का रंग शामिल है, लेकिन यह लोककथा नहीं है.

  • क्या बिहार की हवा तेजस्वी के पक्ष में बहने लगी है?

    क्या बिहार की हवा तेजस्वी के पक्ष में बहने लगी है?

    एक बड़ी अंतर्दृष्टि से भरी किताब है- 'टॉकिंग टु माई डॉटर: अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ कैपिटलिज़्म.' इसके लेखक हैं यानिस वारौफ़किस, जो यूनान के संकट में वित्त मंत्री भी बने. अर्थशास्त्री और दार्शनिक के रूप में उनकी ख्याति रही है. वे अर्थशास्त्र के इस ज़िक्र में साहित्य और सिनेमा भी लाते हैं. किताब उन्होंने अपनी पंद्रह साल की बिटिया को संबोधित करते हुए लिखी है- तो बहुत सरल भाषा में है.

  • महागठबंधन में भाकपा माले- कितने अवसर, कितनी चुनौती?

    महागठबंधन में भाकपा माले- कितने अवसर, कितनी चुनौती?

    2015 के विधानसभा चुनावों में भाकपा माले ने लगभग अकेले दम पर तीन सीटें जीती थीं- बलरामपुर, दरौली और तरारी. बेशक, तरारी वाली सीट वह बहुत कम अंतर से जीत पाई थी- शायद मुश्किल से सवा दो सौ या ढाई सौ वोटों से. लेकिन भोजपुर क्षेत्र में उसकी वापसी का मज़बूती भरा इशारा भी थी. सुदामा प्रसाद को पूरे दो दशक बाद यह कामयाबी मिली थी. बेशक, तब वाम मोर्चे के नाम पर जुटे बहुत सारे दलों का गठबंधन उसके साथ था, लेकिन उन चुनावों में भाकपा-माकपा- किसी का खाता नहीं खुल पाया था. जाहिर है, माले की जीत उसकी अपनी थी.

  • किताब की बात: क्या बिहार में मरते रहेंगे बच्चे, बिकती रहेंगी बेटियां?

    किताब की बात: क्या बिहार में मरते रहेंगे बच्चे, बिकती रहेंगी बेटियां?

    बीते साल बिहार में नीतीश कुमार ने खादी के एक मॉल का उद्घाटन किया. इसमें शक नहीं कि खादी बिकनी चाहिए. लेकिन क्या गांधी ने खादी की कल्पना एक ऐसे कपड़े के रूप में की थी जो मॉल में बिके? गांधी की खादी बिक्री के लिए नहीं, बुनकरी के लिए थी, गरीबों के लिए थी. बताने की ज़रूरत नहीं कि गांधी की खादी का यह बाज़ारीकरण दरअसल उस नई सत्ता संस्कृति का द्योतक है जिसके तहत सारा विकास एक ख़ास वर्ग को संबोधित होता है और उसे बाज़ार की कसौटी पर खरा उतरना होता है.

  • तनिष्क विवाद और हमारे नागरिक विवेक का सवाल

    तनिष्क विवाद और हमारे नागरिक विवेक का सवाल

    पता नहीं, इस पूरे विवाद के बीच तनिष्क को कितना नुक़सान हुआ होगा, लेकिन एक समाज के रूप में हमारा नुक़सान ज़्यादा हुआ है. अपने-आप से हमारा यह पूछना बनता है कि हम कैसा समाज बना रहे हैं जिसमें कोई शख़्स या समूह एक सकारात्मक संदेश का इस्तेमाल करते हुए भी डरे? वह हर जगह हिसाब लगाता फिरे कि इससे कितने हिंदू नाराज़ होंगे या कितने मुसलमान? 

  • इन विधानसभा चुनावों में बिहार को क्या दे सकती है BJP?

    इन विधानसभा चुनावों में बिहार को क्या दे सकती है BJP?

    इन चुनावों में नित्यानंद राय या इसके पहले के चुनाव में गिरिराज सिंह के बयान इसकी ओर इशारा करते हैं. कभी मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की ललकार और कभी आरजेडी की जीत पर कश्मीरी आतंकियों के पनाह लेने की चेतावनी बताती है कि बीजेपी जिस सामाजिक ध्रुवीकरण को अपना मुख्य राजनैतिक मूल्य बना चुकी है, उसे वह बिहार पर भी लागू करेगी.

  • नीतीश कुमार को क्या अपने 15 सालों पर भरोसा नहीं है?

    नीतीश कुमार को क्या अपने 15 सालों पर भरोसा नहीं है?

    नीतीश कुमार अकेले मुख्यमंत्री नहीं हैं जिन्होंने 15 साल लगातार शासन किया. दिल्ली आने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन बार चुने जा चुके थे और लगभग 13 साल पूरे कर चुके थे. दिल्ली में शीला दीक्षित ने 15 साल पूरे किए, उसके बाद चुनाव हारीं. ओडिशा में नवीन पटनायक भी उनसे लंबे समय से सरकार चला रहे हैं.

  • तो आप उनका आर्थिक बहिष्कार करना चाहते हैं?

    तो आप उनका आर्थिक बहिष्कार करना चाहते हैं?

    इन दिनों सोशल मीडिया पर बहुत ज़ोर-शोर से मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार की मुहिम चलाई जा रही है. वैसे यह कोई नई सूझ नहीं है. हिंदुत्व ब्रिगेड के उत्साही विचारक-प्रचारक पहले भी यह बात कहते रहे हैं, बल्कि चोरी-छुपे इस पर अमल करने की कोशिश भी करते रहे हैं. किराये पर मकान देने में, नौकरी देने में और यहां तक कि कभी-कभी कुछ ख़रीदने बेचने में वह इस बात का ध्यान रखते हैं कि सामने वाला मुसलमान, अछूत या पिछड़ी जाति का तो नहीं है?

  • दिल्ली तो बस एक नई प्रयोगशाला है

    दिल्ली तो बस एक नई प्रयोगशाला है

    दिल्ली और देश में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए न भारतीय जनता पार्टी को कोसें और न ही संघ परिवार को. ये सब अपने लक्ष्यों को लेकर बहुत ईमानदार संगठन हैं- लक्ष्य तक पहुंचने के लिए चाहे जितनी बेईमानी कर लें. एक समुदाय के प्रति अपने भाव इन्होंने कभी नहीं छुपाए और यह इरादा भी कभी नहीं छुपाया कि सत्ता में आने के बाद वे इस देश के बहुसंख्यकवाद को नई ताक़त देंगे. धारा 370 हटाने की बात हो, राम मंदिर निर्माण की बात हो, तीन तलाक़ की बात हो, एनआरसी की बात हो- सब बीजेपी के घोषणापत्र में पहले से दर्ज है. बल्कि कई बार इस आधार पर उनकी खिल्ली उड़ाई गई कि वे सत्ता में आने के बाद अपना एजेंडा भूल जा रहे हैं. अब वे अपना घोषित एजेंडा पूरा कर रहे हैं तो इस पर आप दुखी हो सकते हैं, हैरान नहीं.

  • लेकिन यह जीत अभी अधूरी है

    लेकिन यह जीत अभी अधूरी है

    यह सच है कि दिल्ली के नागरिकों ने ध्रुवीकरण की राजनीति को नकार दिया है. लेकिन यह इतना सपाट मामला नहीं है. नागरिकों के फ़ैसले के पीछे और भी वजहें हो सकती हैं. आम आदमी पार्टी का दावा है कि उसके काम की वजह से उसे वोट मिले. बहुत दूर तक यह बात सही लगती है. मुफ्त बिजली-पानी, महिलाओं के लिए मुफ़्त यात्रा और स्कूलों और मोहल्ला क्लीनिकों की सुविधा इस महानगर के ग़रीब और निम्नमध्यवर्गीय लोगों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं रही. हालांकि सांप्रदायिकता ऐसी अंधी होती है कि उसे कई बार कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है.

  • ऐसे देशभक्तों से सावधान!

    ऐसे देशभक्तों से सावधान!

    प्रधानमंत्री की आलोचना इस देश की आलोचना है, सरकार के ख़िलाफ़ कुछ कहना या करना देश के ख़िलाफ़ कुछ करना और कहना है. बाक़ी ज़रूरी सवालों पर जो सरलीकृत राय है- मसलन, तीन तलाक का ख़ात्मा बिल्कुल उचित है, पाकिस्तान में सताए जा रहे हिंदू भारत न आएं तो कहां जाएं, कश्मीर में धारा 370 तो ख़त्म होनी ही चाहिए थी, मुसलमानों को ज़्यादा बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए, पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर देना चाहिए- वही इनकी भी राय है.

  • श्रद्धांजलि : वैद उर्फ जाएं तो जाएं कहां?

    श्रद्धांजलि : वैद उर्फ जाएं तो जाएं कहां?

    'विमल उर्फ़ जाएं तो जाएं कहां' कृष्ण बलदेव वैद के उन उपन्यासों में है जिनके शीर्षक को सबसे ज़्यादा चर्चा मिली. लेकिन 'जाएं तो जाएं कहां' उनके लिए बस एक किताब का नाम नहीं था शायद अपने होने की वह कशमकश थी, वह कैफ़ियत ढूंढने की कोशिश थी जिससे वे ताउम्र उबर नहीं पाए. शायद 'जाएं तो जाएं कहां' का यह सवाल उनके लिए कोई आध्यात्मिक सवाल नहीं था. उनके लिए वह व्यक्तिगत चुनाव का सवाल भी नहीं था. वह उनके लिए एक लेखकीय सवाल था जिसका वास्ता जितना अस्तित्ववादी व्यााख्याओं से था, उससे ज़्यादा निजी और सामाजिक के बीच, व्यक्तिगत और सार्वजनिक के बीच के उस द्वंद्व से, जिसमें आप किसी न किसी पहचान से ख़ुद को जोड़ने को मजबूर या अभिशप्त पाते हैं. लेखक ऐसे हर मौकों पर ख़ुद को अकेला पाता है- पूछता हुआ- जाएं तो जाएं कहां.

  • शाहीन बाग़ और भारतीय लोकतंत्र की चुनौती

    शाहीन बाग़ और भारतीय लोकतंत्र की चुनौती

    शाहीन बाग़ से बहुत सारी आवाजें आ रही हैं, बहुत सारे दृश्य आ रहे हैं. वहां तिरंगा लहराया जा रहा है, वहां जन-गण-मन और वंदे मातरम तक गाया जा रहा है, वहां भारत का सुंदर नक्शा बनाया जा रहा है. वहां भारत की साझा संस्कृति के गीत गाए जा रहे हैं, वहां गांधी, अंबेडकर, भगत सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल वाली आज़ादी के नारे लगाए जा रहे हैं, लेकिन बीजेपी को यह सब सुनाई और दिखाई नहीं पड़ रहा. उसे बस दो हाशिए की आवाज़ें सुनाई पड़ीं जिन्हें शाहीन बाग के मंच का समर्थन नहीं मिला.

  • शाहीन बाग को बचाना भारत को बचाना है

    शाहीन बाग को बचाना भारत को बचाना है

    शाहीन बाग में करीब 40 दिन से आंदोलन चल रहा है- बल्कि वह लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन को एक नई गरिमा, नई कलात्मकता, नई ऊंचाई और नई जनतांत्रिकता दे रहा है. कविता, संगीत, चित्रकला, नाटक, संस्थापन कला- सब इस आंदोलन की जान हैं. दूर-दूर से लोग यहां बस यह देखने आ रहे हैं कि विरोध प्रदर्शन कितना खूबसूरत हो सकता है. दूर-दराज के इलाक़ों में शाहीन बाग बनाने की कोशिश हो रही है.

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