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Ravish Kumar


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  • PM मोदी को हर 2 साल पर सपने बेचने को नई जनता चाहिए, किसानों की बारी आई है

    PM मोदी को हर 2 साल पर सपने बेचने को नई जनता चाहिए, किसानों की बारी आई है

    एक और सपना अभी तक बेचा जा रहा है. 2022-23 में किसानों की आमदनी दुगनी होगी. लेकिन यही नहीं बताया जाता है कि अभी कितनी आमदनी है और 2022 में कितनी हो जाएगी. कई जानकारों ने लिखा है कि किसानों की सालाना औसत आमदनी का डेटा आना बंद हो गया है. हैं न कमाल. पर डेटा बीच-बीच में फाइलों से फिसल कर आ ही जाता है.

  • भारत बंद करने जा रहे किसान भाइयों और बहनों को रवीश कुमार का एक पत्र

    भारत बंद करने जा रहे किसान भाइयों और बहनों को रवीश कुमार का एक पत्र

    आप भारत बंद कर रहे हैं. आपके भारत बंद से पहले ही आपको न्यूज़ चैनलों ने भारत में बंद कर दिया है. चैनलों के बनाए भारत में बेरोज़गार बंद हैं. जिनकी नौकरी गई वो बंद हैं. इसी तरह से आप किसान भी बंद हैं. आपकी थोड़ी सी जगह अख़बारों के ज़िला संस्करणों में बची है जहां आपसे जुड़ी अनाप-शनाप ख़बरें भरी होंगी मगर उन ख़बरों का कोई मतलब नहीं होगा.

  • यूपी में 5 साल तक संविदा नौकरी के प्रस्ताव से घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है सरकार

    यूपी में 5 साल तक संविदा नौकरी के प्रस्ताव से घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है सरकार

    अगर यह ख़बर सही है तो इस पर व्यापक बहस होनी चाहिए. अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार उत्तर प्रदेश का कार्मिक विभाग यह प्रस्ताव ला रहा है कि समूह ख व ग की भर्ती अब 5 साल के लिए संविदा पर होगी. कांट्रेक्ट पर. पांच साल के दौरान जो छंटनी से बच जाएंगे उन्हें स्थायी किया जाएगा. इस दौरान संविदा के कर्मचारियों को स्थायी सेवा वालों का लाभ नहीं मिलेगा.

  • सिर्फ़ रेलवे परीक्षाओं की तारीख़ का एलान कर नौजवानों में फूट न डाले सरकार

    सिर्फ़ रेलवे परीक्षाओं की तारीख़ का एलान कर नौजवानों में फूट न डाले सरकार

    पिछले रविवार से ही छात्र ट्वीटर की टाइम लाइन पर ट्रेंड आंदोलन चला रहे हैं. 35 से 70 लाख ट्वीट करने के बाद भी पीयूष गोयल चुप रहे तब छात्रों ने 5 सितंबर को शाम 5 बजे थाली बजाने का आंदोलन शुरू किया.

  • क्या कड़े निर्णय के चक्कर में देश को गर्त में पहुंचा दिया PM मोदी ने?

    क्या कड़े निर्णय के चक्कर में देश को गर्त में पहुंचा दिया PM मोदी ने?

    नोटबंदी और तालाबंदी ये दो ऐसे निर्णय हैं जिन्हें कड़े निर्णय की श्रेणी में रखा गया. दोनों निर्णयों ने अर्थव्यवस्था को लंबे समय के लिए बर्बाद कर दिया. आर्थिक तबाही से त्रस्त लोग क्या यह सवाल पूछ पाएँगे कि जब आप तालाबंदी जैसे कड़े निर्णय लेने जा रहे थे तब आपकी मेज़ पर किस तरह के विकल्प और जानकारियाँ रखी गईं थीं.

  • पहली तिमाही की GDP -23.9%, मोदी जी आपका कोई विकल्प नहीं

    पहली तिमाही की GDP -23.9%, मोदी जी आपका कोई विकल्प नहीं

    सावधान हो जाएं. आर्थिक निर्णय सोच समझ कर लें. बल्कि अब यही ठीक रहेगा कि सुशांत सिंह राजपूत का ही कवरेज देखते रहिए. यह बर्बादी की ऐसी सतह है जहां से आप अब बेरोज़गारी के प्रश्नों पर विचार कर कुछ नहीं हासिल कर सकते.

  • अंबानी और अडानी, आओ मिलकर पढ़ते हैं साल भर यही कहानी, हम हिन्दुस्तानी

    अंबानी और अडानी, आओ मिलकर पढ़ते हैं साल भर यही कहानी, हम हिन्दुस्तानी

    भारत संचार निगम लिमिटेड वाले जानते होंगे कि एक समय कई हज़ार करोड़ का मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनी कैसे ख़त्म की गई. उससे कहा गया कि आप 2G से 4G का मुक़ाबला करो. इस फ़ैसले से किसे लाभ हुआ BSNL के लोग जानते थे मगर हिन्दू मुसलमान की राजनीति ने कइयों के विवेक पर गोबर लीप दिया था.

  • आसमान छूने शहर आते हैं, लेकिन शहर के लोग आसमान नहीं देखते...

    आसमान छूने शहर आते हैं, लेकिन शहर के लोग आसमान नहीं देखते...

    दिल्ली की छतों का एक ही मतलब रहा है. जहां काले रंग की पानी की टंकी होती थी. जिसमें पानी मोटर से चढ़ता था.फिर उतरता था. लोग छत पर टंकी देखने जाते हैं. जब टंकी लीक करती है. क्या कभी पहले भी इस रात का आसमान इस तरह देखना होता था? हाउसिंग सोसायटी के लोग अपनी बालकनी से आती-जाती कारें देखा करते हैं. छत की सीलिंग देखते हैं. जहां छत है वहाँ डिश एंटेना लगा है. लोग घरों में बंद है. 

  • प्रातःकालीन डायरी : कहीं होता हूं, जागता कहीं और हूं...

    प्रातःकालीन डायरी : कहीं होता हूं, जागता कहीं और हूं...

    एकदम से सुबह की रौशनी बिखर जाने से ठीक पहले का सफ़ेद अंधेरा. जाती हुई रात अपने आख़िरी वक्त में सफ़ेद लगती है. रात गहराने से पहले भौंक कर सोने वाले कुत्ते भी सुबह होने से पहले भौंकने लगते हैं, कौआ पहले बोलता है या गौरैया पहले बोलती है. ची ची ची ची। ची च। ची ची ची ची. पेड़ पर कुछ कोलाहल तो है. हवा ठंडी है. ऐसे वक्त की खुली दुकानों की अपनी ख़ुश्बू होती है. भीतर बल्ब जल रहा है. बाहर सड़क पर थोड़ी सफ़ाई हो चुकी है. दुकान की बेंच बाहर रखी जा रही है. भजन बज रहा है.

  • यूपी CM योगी आदित्यनाथ के नाम रवीश कुमार का खुला खत

    यूपी CM योगी आदित्यनाथ के नाम रवीश कुमार का खुला खत

    अभ्यर्थियों के इस पत्र को सत्यापित करने का कोई ज़रिया नहीं है. आप पत्र में लिखी बातों की जांच करा सकते हैं. यह निश्चित रूप से दुखद है कि आपके राज में 2018 में शुरू हुई OCT 49568 की प्रक्रिया अगस्त 2020 तक पूरी नहीं हुई है. पत्र से यह भी नहीं लगता कि कोई क़ानूनी अड़चन है.अत: ये भर्ती तो समय से पूरी हो सकती थी.

  • इस दौर का नारा है: कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, नौकरी जाती है जाने दो

    इस दौर का नारा है: कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, नौकरी जाती है जाने दो

    क्या उन ख़बरों को ऐसे लिखे- छोटे, लघु व मध्यम श्रेणी के उद्योगों की अपनी रिपोर्ट है कि अगस्त तक चार करोड़ लोगों की नौकरियाँ जा सकती हैं. कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. CMIE का कहना है कि पचास लाख वेतनभोगी लोगों की नौकरी चली गई होगी. कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ट्रैवल एंड टूरिज़्म सेक्टर से चार करोड़ों लोगों की नौकरियाँ जा सकती हैं.कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. एयर इंडिया के पचास पायलट निकाले गए. कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. बिक जाएगा एयर इंडिया, सरकार करेगी फ़ैसला.  कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

  • नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी बड़ा ऐलान नहीं है, पुरानी भर्तियों को पूरा करने का ऐलान बड़ा होता

    नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी बड़ा ऐलान नहीं है, पुरानी भर्तियों को पूरा करने का ऐलान बड़ा होता

    बुधवार को ऐलान हुआ है कि नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी बनेगी, जो केंद्र सरकार की भर्तियों की आरंभिक परीक्षा लेगी. इस आरंभिक परीक्षा से छंटकर जो छात्र चुने जाएंगे. उन्हें फिर अलग-अलग विभागों की ज़रूरत के हिसाब से परीक्षा देनी होगी. इसके लिए ज़िलों में परीक्षा केंद्र बनाए जाएंगे.

  • हे बिहार सरकार, इन नौजवानों की व्यथा सुन लीजिए

    हे बिहार सरकार, इन नौजवानों की व्यथा सुन लीजिए

    बिहार की जवानी प्रतिभा से भरी है और बेड़ियों से जकड़ी है. अत: युवाओं के बड़े तबके से कोई उम्मीद रखना पानी पर आग तापने जैसा होगा. इनकी सीमित आंकाक्षाओं से किसी भी राजनीतिक दल को ख़ुश होना चाहिए. बस लगन के टाईम में इन्हें कोई परेशान न करे. दहेज के सामानों का निर्बाध आवागमन रहे. आज जनमानस में सांप्रदायिकता सहज वृत्ति है. इसे बदलने का कोई भी प्रयास न करे. जातिवाद तो नैसर्गिक है. ऐसे हालात में अगर बिहार सरकार युवाओं की बात न भी मानें तो उसे कोई ख़तरा नहीं है. मेरा तर्क है कि इसी आधार पर इनकी बात सुनी जाए। बिना शर्त निष्ठा का इतना लाभ तो मिले. 

  • मीडिया के समाप्त कर दिए जाने के बाद उसी से उम्मीद के पत्र

    मीडिया के समाप्त कर दिए जाने के बाद उसी से उम्मीद के पत्र

    ये पत्र सूखे पत्रों की तरह इस इनबॉक्स से उस इनबॉक्स तक उड़ रहे हैं. हवा पत्तों को इस किनारे लगा देती है तो उस किनारे. इन नौजवानों को समझना होगा कि उनके भीतर आर्थिक मुद्दों की चेतना समाप्त कर दी गई है. तभी तो वे नेताओं के काम आ रहे हैं.

  • परीक्षा कैंसल नहीं होगी, परीक्षा की तैयारी कीजिए, सरकार कराएगी

    परीक्षा कैंसल नहीं होगी, परीक्षा की तैयारी कीजिए, सरकार कराएगी

    यूजीसी ने कहा है कि विश्वविद्यालयों में परीक्षाओं के आयोजन का काम यूजीसी का है न कि किसी राज्य सरकार का. यूजीसी ने फिर से कहा है कि वह सितंबर तक परीक्षाओं के आयोजन के हक़ में है जो कि छात्रों के भविष्य के हितों के मद्देनज़र सही है.यूजीसी ने यह भी कहा कि बिना परीक्षा के मिली डिग्री को मान्यता नहीं दी जा सकती. या

  • रोज़ आ रहे हैं 60,000 से ज़्यादा COVID-19 केस, क्या वाकई भारत की कामयाबी बड़ी है...?

    रोज़ आ रहे हैं 60,000 से ज़्यादा COVID-19 केस, क्या वाकई भारत की कामयाबी बड़ी है...?

    8 अगस्त को प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक ट्विट किया है. प्रधानमंत्री का बयान है कि "आप ज़रा कल्पना कीजिए, अगर कोरोना जैसी महामारी 2014 से पहले आती तो क्या स्थिति होती? "

  • रबीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद और आज का समय

    रबीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद और आज का समय

    पूर्वी लद्दाख में जब चीन के भारतीय सीमा में घुसपैठ की खबर आई तब एक जन आक्रोश पैदा किया गया. टिक टॉक जैसे ऐप बैन कर. चीन की कंपनी को बंद कर चीन को सबक सीखाने का जश्न मना. फिर कहा गया कि चीन ने भारतीय सीमा में प्रवेश ही नहीं किया है.

  • कोरोना की तरह ही आंकड़ों की बाजीगरी में खोईं आर्थिक चिंताएं

    कोरोना की तरह ही आंकड़ों की बाजीगरी में खोईं आर्थिक चिंताएं

    अर्थ तंत्र ने मुक्त मन संसार को कुछ ज़्यादा ही अधिग्रहीत कर लिया था. शिक्षा, फ़ीस और परीक्षा जैसे सवाल उचित ही जर्जर होकर ख़त्म हो गए. इनका कुछ होता तो नहीं है, अनावश्यक एक की चिंता दूसरे तक फैल जाती है. रोज़गार कारोबार तो वैसे ही बनते-बिगड़ते रहे हैं. अब इन सबका कवरेज बंद होना चाहिए. पत्रकारिता को इन प्रश्नों से दूरी बनाने की ज़रूरी है.

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