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Arun jaitley blog


'Arun jaitley blog' - 93 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • संस्थाओं की बर्बादी के बीच जनता की मदहोशी, यही तो हैं अच्छे दिन

    संस्थाओं की बर्बादी के बीच जनता की मदहोशी, यही तो हैं अच्छे दिन

    इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के बाद सीबीआई जो सफाई देती है वो और भी गंभीर है. एजेंसी का कहना है कि सर्च से संबंधित सूचनाएं लीक गईं इसलिए उनका तबादला किया गया. कमाल है. अगर ऐसा हुआ तो उस सूचना से फायदा किसे हुआ है, किसे लीक की गईं थीं सूचनाएं. अब उस एस पी को ही आरोपी बना दिया गया है. अगर सीबीआई का एस पी गुप्त सूचनाएं लीक करे तो क्या सिर्फ तबादले की कार्रवाई होनी चाहिए? किसकी आंखों में धूल झोंकने का खेल खेला जा रहा है? किसकी आंखों में चमक पैदा करने के लिए तबादले का खेल खेला जा रहा है? सीबीआई कहती है कि उसके खिलाफ जांच हो रही है मगर यह जवाब नहीं दे सकी कि एस पी मिश्रा ने किसकी अनुमति से एफ आई आर की?

  • प्रधानमंत्री लूट बंद करने का भाषण दे रहे हैं, वित्त मंत्री कथित लुटेरों के लिए ब्लाग लिख रहे हैं

    प्रधानमंत्री लूट बंद करने का भाषण दे रहे हैं, वित्त मंत्री कथित लुटेरों के लिए ब्लाग लिख रहे हैं

    हम सब जानते हैं कि सीबीआई की साख दो कौड़ी की नहीं है. इसका काम है नागरिकों को फंसाना और मुकदमों को उलझना. हाल के दिनों में सीबीआई ने खुद से साबित किया है जब उसके दो निदेशकों की लड़ाई सड़क पर आ गई. दोनों एक दूसरे पर रिश्वत से लेकर केस को प्रभावित करने के आरोप लगाने लगे हैं. लेकिन जब देश के वित्त मंत्री सीबीआई की जांच पर सवाल उठा रहे हैं तो उसी के साथ प्रभावित भी कर रहे हैं.

  • क्या अपने अंतिम बजट में मोदी सरकार खोलेगी खजाना?

    क्या अपने अंतिम बजट में मोदी सरकार खोलेगी खजाना?

    एक फरवरी को मोदी सरकार अपना अंतिम बजट पेश करेगी. चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले आने वाला यह बजट अंतरिम होगा. यानी परंपरा के मुताबिक सरकार इसके जरिए चुनाव होकर नई सरकार बनने तक तीन महीनों के लिए होने वाले खर्च का इंतजाम करेगी. परंपरा यह भी है कि जाती हुई सरकार कोई बड़ा नीतिगत ऐलान इस अंतरिम बजट में नहीं करती है. लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी सरकार परंपरा को ताक पर रखकर इस अंतरिम बजट या वोट ऑन अकाउंट में आने वाले चुनावों के मद्देनजर बड़े ऐलान कर सकती है, ताकि वोटरों को लुभाया जा सके? कुछ ऐसे ऐलान हैं जिनका लंबे समय से इंतजार किया जा रहा है. सरकार के भीतर इन्हें लेकर चर्चा भी है.

  • अमेरिका से अरुण जेटली का विपक्ष पर 'ब्लॉग वार': कुछ लोगों को लगता है, उनका जन्म ही 'राज' करने के लिए हुआ है

    अमेरिका से अरुण जेटली का विपक्ष पर 'ब्लॉग वार': कुछ लोगों को लगता है, उनका जन्म ही 'राज' करने के लिए हुआ है

    केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली भले ही अभी अपने इलाज के लिए अमेरिका में हों, मगर उनकी सक्रियता अभी कम नहीं हुई है. ब्लॉग के जरिए अक्सर विपक्ष पर हमला बोलने वाले अरुण जेटली ने एक बार फिर से इलाज के दौरान ही ब्लॉग लिखा है और कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी है.

  • अरुण जेटली को कैसे समझ आ गया एक GST रेट, क्या आप समझ पाए...?

    अरुण जेटली को कैसे समझ आ गया एक GST रेट, क्या आप समझ पाए...?

    4 अगस्त, 2016 को हमने एक लेख लिखा था. उस हफ्ते राज्यसभा में GST को लेकर बहस हुई थी. कांग्रेस और BJP के नेताओं की बहस को सुनते हुए मैंने लिखा था, "राज्यसभा में वित्तमंत्री अरुण जेटली और पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम की भाषा और देहभाषा ऐसी थी, जैसे दोनों एक चैप्टर पढ़कर आए हों और उसे अपना पर्चा बताने का प्रयास कर रहे हों...

  • क्या उर्जित पटेल सरकार का दबाव झेल नहीं पाए?

    क्या उर्जित पटेल सरकार का दबाव झेल नहीं पाए?

    इस बीच आप सीबीआई का हाल देख चुके हैं. जिस सवाल के साथ 2018 का साल शुरू हुआ था लगता है उस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला है. साल के ख़त्म होने पर नहीं मिला है. कौन है जिसके इशारे पर या जिसके शौक के लिए भारत की इन तमाम संस्थाओं की साख को दांव पर लगाया जा रहा है. उर्जित पटेल जो हमेशा सरकार के दबाव में काम करने वाले गवर्नर के तौर पर ही देखे गए, अचानक क्या हुआ कि वे दबाव से निकलने के लिए तड़प उठे.

  • क्या रफ़ाल सौदे में कहीं कुछ छुपाया जा रहा है?

    क्या रफ़ाल सौदे में कहीं कुछ छुपाया जा रहा है?

    रफाल विमान सौदा सिर्फ सरकार के लिए ही टेस्ट नहीं है, बल्कि मीडिया के लिए भी परीक्षा है. आप दर्शक मीडिया की भूमिका को लेकर कई सवाल करते भी रहते हैं. यह बहुत अच्छा है कि आप मीडिया और गोदी मीडिया के फर्क को समझ रहे हैं. हम सबको परख रहे हैं.

  • सरकार का पिंड नहीं छूटा नोटबंदी कांड से

    सरकार का पिंड नहीं छूटा नोटबंदी कांड से

    कल यानी गुरुवार को नोटबंदी की दूसरी बरसी थी. विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के हादसे को याद दिलाया. उन्होंने बताया कि देश की अर्थव्यवस्था को चैपट करने में नोटबंदी की क्या और कितनी भूमिका रही.

  • क्या भारत में पत्रकारों के सवालों पर अंकुश नहीं?

    क्या भारत में पत्रकारों के सवालों पर अंकुश नहीं?

    अमरीका में मध्यावधि चुनाव के नतीजे आए हैं. उन नतीज़ों पर अलग से चर्चा हो सकती है, होनी भी चाहिए लेकिन एक बात की चर्चा हिन्दुस्तान के पत्रकारों के बीच ज़्यादा है. उनके बीच भी है जो भारत की मीडिया को गोदी मीडिया में बदलते हुए देख रहे हैं.

  • पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों से निपटने की सरकार की कोशिश

    पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों से निपटने की सरकार की कोशिश

    आख़िर कब तक सरकार भी देखती और कब तक लोग भी देखते. पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस के दाम बढ़ते-बढ़ते कहां तक जाएंगे किसी को नहीं पता. कई महीनों से जनता पेट्रोल डीज़ल और रसोई गैस के दाम दिए जा रही थी और यह मान लिया गया था कि जनता इस बार उफ्फ तक नहीं कर रही है क्योंकि वह सरकार के ख़िलाफ़ नारे नहीं लगा रही है.

  • क्या माल्या को भागने से रोका जा सकता था?

    क्या माल्या को भागने से रोका जा सकता था?

    बहुत से लोग माल्या के भारत परित्याग प्रकरण को लेकर परेशान हैं. भारत की तमाम सुरक्षा प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए विजय माल्या ने जिस तरह से भारत का परित्याग किया है वह इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि उनके पहले और उनके बाद भी कई लोगों ने भारत का परित्याग किया है.

  • जेटली न तो इस्तीफ़ा दें और न ही अपना बचाव इन चंपू पत्रकारों से करवाएं

    जेटली न तो इस्तीफ़ा दें और न ही अपना बचाव इन चंपू पत्रकारों से करवाएं

    मैं नहीं चाहता कि जेटली इस्तीफ़ा दें. मैं इसलिए ये चाहता हूं कि मुझे चांस ही नहीं मिला उनका बचाव करने के लिए. बहुत से पत्रकारों को जब जेटली का बचाव करते देखा तो उस दिन पहली बार लगा कि लाइफ में पीछे रह गया. मगर फिर लगा कि जब जेटली को भी इन पत्रकारों के बचाव की ज़रूरत पड़ जाए तब लगा कि मुझसे ज़्यादा तो जेटली जी पीछे रह गए.

  • प्राइम टाइम : नाकाम रही नोटबंदी?

    प्राइम टाइम : नाकाम रही नोटबंदी?

    याद कीजिए नोटबंदी की वो लाइनें. खासकर महिलाएं जिनके पास अपना जमा किया हुआ पैसा था, वो सब पतियों और पिताओं के हाथ चला गया. एक झटके में किसी बुरे वक्त के लिए बचा कर रखे गए पैसे निकाल कर देने पड़े क्योंकि वे अब वे अवैध हो चुके थे. बाद में वे पैसे लौट कर पत्नियों और बेटियों के हाथ आए या नहीं, वहीं बता सकती हैं मगर महिलाओं से लेकर आम किसानों तक लाइन में लग गए. अपना पैसा जमा कराने.

  • जेटली और गोयल को कौन सा मंत्री लिखा जाए!

    जेटली और गोयल को कौन सा मंत्री लिखा जाए!

    भारत का वित्त मंत्री कौन है? इसका कोई एक जवाब नहीं हो सकता. इसका एक जवाब होता तो बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपे विज्ञापन से साफ़ हो जाता लेकिन विज्ञापन देने वाले जूता चप्पल उद्योग संग (CFLA) को पता ही नहीं चला कि किसे वित्त मंत्री लिखें.

  • इंदिरा की हिटलर से तुलना के पीछे क्या है सियासत ?

    इंदिरा की हिटलर से तुलना के पीछे क्या है सियासत ?

    तैंतालीस साल पहले रात का स्याह अंधेरा लोकतंत्र के मुंह पर कालिख पोत गया था. अपने भविष्य को लेकर आशंकित इंदिरा गांधी ने 1947 की आजादी के बाद पहली बार नागरिकों की आजादी छीनने का काम किया. सभी देशवासियों के मौलिक अधिकार सस्पेंड कर दिए गए. विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. प्रेस पर अकुंश लगा दिया गया. दिल्ली की फ्लीट स्ट्रीट कहे जाने वाले बहादुरशाह जफर मार्ग पर अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई, ताकि अगले दिन अखबार न निकल सके. अगले दिन हर अखबार के दफ्तर में एक सेंसर अफसर बैठा दिया गया जिसका काम हर खबर की पड़ताल करना था कि उसमें इंदिरा गांधी या सरकार के खिलाफ कुछ न लिखा हो. इंदिरा गांधी ने यह कदम खुद को मजबूत करने के लिए उठाया.

  • इमरजेंसी : इंदिरा गांधी, हिटलर और जेटली - असली वारिस कौन?

    इमरजेंसी : इंदिरा गांधी, हिटलर और जेटली - असली वारिस कौन?

    यह सच है कि इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है. इस दौर में नागरिक अधिकार छीन लिए गए. नेताओं, लेखकों, पत्रकारों को जेल में डाला गया. उन्हें यंत्रणाएं दी गईं. लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई. 20 सूत्री कार्यक्रम थोपा गया. अनुशासन पर्व के नाम पर तानाशाही का चाबुक चलाया गया. यह भी सच है कि इंदिरा गांधी को इतिहास उनके इस कृत्य के लिए कभी माफ़ नहीं करेगा. भारतीय जनता ने तो उन्होंने 1977 में ही दंडित कर दिया था.

  • अरुण जेटली ने ब्लॉग में राहुल पर किया तीखा हमला, पूछा- कौन है मानवाधिकारों का दुश्मन?

    अरुण जेटली ने ब्लॉग में राहुल पर किया तीखा हमला, पूछा- कौन है मानवाधिकारों का दुश्मन?

    जेटली ने लिखा है कि ये आतंकवाद और देश के खिलाफ हरकतों में शामिल हैं. जिहादियों और अलगाववादियों में से कई को हमारे पड़ोसियों से ट्रेनिंग मिली है और पैसा मिलता है. ये देश के कुछ हिस्सों में हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर में ज़्यादा सक्रिय हैं.

  • कुमार विश्वास का पत्र आम आदमी पार्टी की राजनीतिक साख के ताबूत की आखरी कील?

    कुमार विश्वास का पत्र आम आदमी पार्टी की राजनीतिक साख के ताबूत की आखरी कील?

    हमारे नेताओं को जनता की याददाश्त पर अटूट विश्वास होता है. वे मान कर चलते हैं कि जनता की याददाश्त बेहद कमज़ोर होती है इसलिए वह न तो चुनाव के दौरान किए गए वादों को याद रख पाती है और न ही विरोधियों पर लगाए गए आरोपों को. इसीलिए चुनाव के वक़्त चाहे तो आप जेब से पर्ची निकाल कर किसी काल्पनिक स्विस बैंक खाते का ज़िक्र कर अपने विरोधी की प्रतिष्ठा को धूल में मिला कर राजनीतिक लाभ ले सकते हैं या फिर मंच पर नाटकीय अंदाज में अलमारी से कथित सबूतों की फाइल निकाल कर जनता के बीच लहरा सकते हैं.