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  • अर्थव्यवस्था ढलान पर है, लेकिन क्या ऐसी ख़बरें हिन्दी अख़बारों में छप रही हैं...?

    अर्थव्यवस्था ढलान पर है, लेकिन क्या ऐसी ख़बरें हिन्दी अख़बारों में छप रही हैं...?

    2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही विदेशी निवेशकों ने भरोसा दिखाना शुरू कर दिया था, जिसके कारण भारत में 45 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया. अब वह भरोसा डगमगाता नज़र आ रहा है. जून महीने के बाद से निवेशकों ने 4.5 अरब डॉलर भारतीय बाज़ार से निकाल लिए हैं. 

  • झारखंड में पेड न्यूज का नया चेहरा

    झारखंड में पेड न्यूज का नया चेहरा

    पेड न्यूज़ का नया रूप आया है. आया है, तो क्या कमाल आया है. क्या आपने या किसी नॉन रेज़िडेंट इंडियन ने यह सुना है कि सरकार अपनी योजनाओं की तारीफ छपवाने के लिए टेंडर निकाले और पत्रकारों से कहे कि वे अर्जी दें कि कैसे तारीफ करेंगे? विदेशों में ऐसा होता है या नहीं, ये तो नान रेज़िडेंट इंडियन ही बता सकते हैं कि क्या वाशिंगटन पोस्ट, गार्डियन, न्यूयार्क टाइम्स अपने पत्रकारों से कहे कि वे सरकार का टेंडर लें, उसकी योजना की जमकर तारीफ करते हुए लेख लिखें और फिर उसे दफ्तर ले आएं ताकि फ्रंट पेज पर छाप सकें? इसलिए कहा कि ऐसा कमाल बहुत कम होता है. युगों-युगों में एक बार होता है जब चाटुकारिता आफिशियल हो जाती है. वैसे भी होती है लेकिन जब विज्ञापन निकले, तारीफ के पैसे मिलें, यह बताया जाए तो चाटुकारिता पारदर्शी हो जाती है.

  • ट्विटर पर ट्रेंड हुई तो क्या समस्या हल होगी?

    ट्विटर पर ट्रेंड हुई तो क्या समस्या हल होगी?

    ट्विटर पर ट्रेंड के बारे में आपने सुना होगा. किसी मसले को लेकर जब कुछ समय के भीतर ट्वीट की संख्या बढ़ने लगती है तो वह ट्रेंड करने लगता है. कई बार मार्केंटिंग कंपनियां पैसे लेकर भी ट्रेंड कराती हैं, राजनीतिक दलों का आईटी सेल भी संगठित रूप से ट्रेंड कराता है. कई बार लोग अपनी तरफ से किसी मसले को लेकर ट्वीट करने लगते है और वह ट्रेंड में बदल जाता है.

  • अमित शाह का बयान और भाषाओं की सांप्रदायिकता

    अमित शाह का बयान और भाषाओं की सांप्रदायिकता

    बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने हिंदी को लेकर अचानक जो विवाद पैदा किया, क्या उसकी कोई ज़रूरत थी? क्या बीजेपी के पास वाकई कोई भाषा नीति है जिसके तहत वह हिंदी को बढ़ावा देना चाहती है? या वह हिंदू-हिंदी हिंदुस्तान के पुराने जनसंघी नारे को अपनी वैचारिक विरासत की तरह फिर से आगे बढ़ा रही है?

  • रवीश कुमार का ब्लॉग: 'अगर नाम बदलने से हालात बदलते हैं तो अम्बानी रख लेता हूँ'

    रवीश कुमार का ब्लॉग: 'अगर नाम बदलने से हालात बदलते हैं तो अम्बानी रख लेता हूँ'

    मंत्री तो कभी आकर जवाब देंगे नहीं, आपमें से कोई उन तक पहुँचा दे. ऐसे पत्र बहुत आते हैं जिनमें 40 से 80 प्रतिशत विकलांगता की समस्या की बात होती है. सभी जगह पत्र भेजने और आजकल ट्वीट करने के बाद भी इनकी सुनवाई नहीं होती. इन पत्रों को पढ़िए. समाज में पीड़ा और अपमान की कितना परतें हैं.

  • सऊदी अरब के तेल ठिकाने पर हमला, भारत की अर्थव्यवस्था को कितना बड़ा झटका?

    सऊदी अरब के तेल ठिकाने पर हमला, भारत की अर्थव्यवस्था को कितना बड़ा झटका?

    सऊदी अरब के तेल के खदानों पर ड्रोन से हमला हुआ है. शनिवार की सुबह दो धमाके हुए जिसके कारण सऊदी अरब में तेल का उत्पादन घट गया है. दुनिया में हर दिन तेल का जितना उत्पादन होता है उसका पांच प्रतिशत उत्पादन घट गया है. अबक़ैक में दुनिया का सबसे बड़ा तेल संशोधन कारखाना है. ख़ुरैस तेल के खदान पर भी हमला हुआ है.

  • रैमॉन मैगसेसे अवार्ड मिलने के बाद रवीश कुमार ने यूं किया दर्शकों का शुक्रिया अदा

    रैमॉन मैगसेसे अवार्ड मिलने के बाद रवीश कुमार ने यूं किया दर्शकों का शुक्रिया अदा

    मुझे 25 साल के इस पेशे में यह बात आपके बीच रहकर समझ आई है कि दर्शक या पाठक होना पत्रकार के होने से भी बड़ी ज़िम्मेदारी का काम है. जीवन भर लोगों को सुबह उठकर आदतन आधे अधूरे मन से अख़बार पलटते देखा करता था. कइयों को अख़बार लपेट कर शौच के लिए जाते देखा करता था. कुछ लोगों के लिए अखबार यहां से वहां उठाकर रख देने के बीच कुछ पलट कर देख लेने का माध्यम हो सकता है, रिमोट से एक न्यूज़ चैनल से दूसरे न्यूज़ चैनल बदल कर अपनी बोरियत दूर करने का ज़रिया हो सकता है मगर निश्चित रूप से यह दर्शक या पाठक होना नहीं है.

  • 69000 शिक्षक परीक्षा के परीक्षार्थियों को बधाई, कामयाबी मिलेगी

    69000 शिक्षक परीक्षा के परीक्षार्थियों को बधाई, कामयाबी मिलेगी

    इस आंदोलन की अच्छी बात है कि सभी उत्तर प्रदेश के अलग-अलग ज़िलों से आए हैं और हाथ में तख़्ती बैनर लेकर आए हैं. इस वक्त में जब मीडिया की प्राथमिकता बदल गई है ये छात्र- छात्राएं अलग-अलग ज़िलों से आकर प्रदर्शन कर रहे हैं. सुखद बात यह भी है कि इस आंदोलन में लड़कियां भी अच्छी संख्या में आई हैं. शायद सभी पहली बार मिल रहे होंगे. लड़कियां भी आपस में धरना स्थल पर मिल रही होंगी. इनका कहना है कि सरकार ने जो पात्रता तय की है उसी के अनुरूप परीक्षा पास कर चुके हैं. जब सरकार ने फार्म निकाला तो परीक्षा की तारीख में मात्र में एक महीने का वक्त दिया. अब रिज़ल्ट आने में आठ महीने की देरी क्यों हो रही है.

  • रवीश कुमार का ब्लॉग : क्या अब भी इंजीनियर होना श्रेष्ठ है?

    रवीश कुमार का ब्लॉग : क्या अब भी इंजीनियर होना श्रेष्ठ है?

    पूर्णियां की सड़कों पर गुज़रते हुए विश्वेश्वरैया की छोटी सी प्रतिमा देखी थी. वहा के अभियंता समाज ने दिखाया था. आज उनकी जयंती पर इंजीनियरों के बारे में अच्छी अच्छी बातें कही जा रही हैं. उन शुभकामना संदेशों में ऐसी कोई तस्वीर नहीं है जो बताती है कि इंजीनियरों ने उनकी विरासत को कैसे आगे बढ़ाया है.

  • BLOG : कांग्रेस की बैठक से ही स्पष्ट है, कितने बड़े संकट में है सबसे पुरानी पार्टी

    BLOG : कांग्रेस की बैठक से ही स्पष्ट है, कितने बड़े संकट में है सबसे पुरानी पार्टी

    कांग्रेस के मौजूदा हालात में यह टोटका सरीखा लगता है कि पार्टी ने आज की बैठक ऐसे एजेंडे के साथ की, जिससे न सिर्फ उसके प्रतिद्वंद्वी चकरा जाएंगे, बल्कि उसके अपने नेता भी. इससे पहले, कभी भी पार्टी अपनी या देश की ज़रूरतों को लेकर इतनी कटी-कटी कभी महसूस नहीं हुई थी.

  • हिन्दी में गुनना-बुनना मुमकिन नहीं रह गया, सो हश्र तो यही होना था...

    हिन्दी में गुनना-बुनना मुमकिन नहीं रह गया, सो हश्र तो यही होना था...

    पुरानी-नई किताबों की जिल्द की अलग-सी गंध आज भी पढ़ने का शौक ज़िन्दा रखे हुए है... सो, आप लोगों से अब सिर्फ यही कहना चाहता हूं, खुद भी कुछ न कुछ पढ़ने की आदत डालें, और अपने बच्चों को देखने दें कि आप क्या कर रहे हैं, ताकि वे भी वैसे ही बन सकें... और यकीन मानिए, अगर ऐसा हो पाया, तो हिन्दी की दशा सुधारने के लिए हर साल मनाए जाने वाले हिन्दी दिवस की ज़रूरत नहीं रहेगी...

  • क्या आज भी मौजूद हैं नमक के दरोगा?

    क्या आज भी मौजूद हैं नमक के दरोगा?

    मित्रों मुंशी प्रेमचंद की कहानी नमक का दरोगा का ये अंश है. इस कहानी को दोबारा सालों बाद इसलिए पढ़ी कि शनिवार को मैं किसी पैरामिलिट्री के अफसर के पास बैठा था उन्होंने मुझे बताया कि ISS यानी इंडियन साल्ट सर्विसेज यानी भारतीय नमक सेवा अब भी देश में मौजूद है. देशभर में करीब दर्जनभर अधिकारी हैं जो नमक की गुणवत्ता और उसकी सप्लाई पर नजर रखते हैं.

  • अगले साल बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जीत आखिर क्यों तय?

    अगले साल बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जीत आखिर क्यों तय?

    बिहार विधानसभा का चुनाव अगले साल होना है और जब उसके पहले कई अन्य राज्यों में चुनाव होना है तो उस परिप्रेक्ष्य में बिहार के विधानसभा चुनाव को लेकर भविष्यवाणी जल्दीबाजी होगी लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं उससे तो केवल एक बात साफ लग रही है, और वह है नीतीश कुमार का एक बार फिर मुख्यमंत्री चुना जाना. खासकर इस कथन को बल बिहार की राजधानी पटना में पिछले दिनों तीन अलग-अलग घटनाओं से मिला. इनका एक-दूसरे से कोई सम्बंध नहीं था लेकिन सबका राजनीतिक अर्थ एक था.

  • BLOG : अब बाहर निकलना चाह रहे हैं कांग्रेस के ‘लॉस्ट ब्वॉयज़’

    BLOG : अब बाहर निकलना चाह रहे हैं कांग्रेस के ‘लॉस्ट ब्वॉयज़’

    एक वक्त था, जब कांग्रेस के लिए सब कुछ ठीक चल रहा था. वे बड़े परिवारों (उनमें से एक तो पूर्व राजपरिवार का सदस्य है) के उत्तराधिकारियों के रूप में चांदी का चम्मच लिए पैदा हुए थे, उनकी जमकर खातिर की गई, उनकी सुनी गई, और प्रशासन का तजुर्बा दिलवाने के लिए उन्हें राज्यमंत्री भी बनाया गया. अब माहौल बहुत बदल गया है. उम्र के पांचवें दशक में कदम रख चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद तथा दीपेंद्र हुड्डा 'पीटर पैन सिन्ड्रोम' से पीड़ित हैं, और सुधार के लिए संघर्षरत दिख रहे हैं.

  • 2016 से ही ट्रैफिक जुर्माना थोपने का बोगस विचार चल रहा है...

    2016 से ही ट्रैफिक जुर्माना थोपने का बोगस विचार चल रहा है...

    2016 से ही ट्रैफिक जुर्माना थोपने का बोगस विचार चल रहा है. एक ग़रीब मुल्क में दस दस हज़ार लोगों से वसूलने की यह तरकीब आज लोगों को बेचैन कर रही है लेकिन जब इस पर सवाल उठ रहा था तब लोग चैनलों के चिरकुटिया राष्ट्रवाद के सुख में डूबे थे. अब मज़ाक़ उड़ाने से क्या फ़ायदा.

  • हिन्दी प्रदेश के नौजवान अपने पिता से पूछे, हाल में कौन सी किताब पढ़ी है!

    हिन्दी प्रदेश के नौजवान अपने पिता से पूछे, हाल में कौन सी किताब पढ़ी है!

    ज़ाहिर है मीडिया के स्पेस में तरह-तरह के गांधी गढ़े जाएंगे. उनमें गांधी नहीं होंगे. उनके नाम पर बनने वाले कार्यक्रमों के विज्ञापनदाताओं के उत्पाद होंगे. गांधी की आदतों को खोज खोज कर साबुन तेल का विज्ञापन ठेला जाएगा. हम और आप इसे रोक तो सकते नहीं.

  • बड़े-बड़े फैसलों से साफ ज़ाहिर है अमित शाह की ताकत...

    बड़े-बड़े फैसलों से साफ ज़ाहिर है अमित शाह की ताकत...

    एयर इंडिया की बिक्री के फैसले से लेकर अनुच्छेद 370 (जम्मू एवं कश्मीर का विशेष दर्जा) खत्म करने और आरिफ मोहम्मद खान को केरल का राज्यपाल बनाने तक गृहमंत्री अमित शाह ही हैं, जो मोदी 2.0 को लक्ष्यों को अमली जामा पहना रहे हैं.

  • ब्लॉग : क्या नीतीश कुमार अब अपनी ही पार्टी जेडीयू के लिए 'कामचलाऊ' नेता बन गए हैं

    ब्लॉग :  क्या नीतीश कुमार अब अपनी ही पार्टी जेडीयू के लिए 'कामचलाऊ' नेता बन गए हैं

    क्या बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड अपने सुप्रीमो नीतीश कुमार को अब 'कामचलाऊ' और 'अस्थायी'  मानती है. ये सवाल सोमवार को पार्टी दफ़्तर के बाहर लगाए गये नए होर्डिंग के बाद लोग पूछ रहे हैं.  रविवार शाम , पटना में पार्टी दफ़्तर के बाहर नए होर्डिंग लगाए गए जिसमें नारा  था , ‘क्यूं करे विचार ठीके तो है नीतीश कुमार’.  निश्चित रूप से जिसने भी स्लोगन लिखा होगा उसमें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ख़ासकर नीतीश कुमार के क़रीबी आरसीपी सिंह के सहमति से  ही ये होर्डिंग लगायी होगी. लेकिन पार्टी के ही नेताओं को लगता है ये नारा लोगों को पच नहीं रहा. ठीके का मतलब बिहार की राजनीति और गांव घर में यही होता हैं कि वो बहुत अच्छे तो नहीं लेकिन ठीक ठाक कामचलाऊ हैं.