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Dr vijay agrawal


'Dr vijay agrawal' - 86 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • देश में दलित नेतृत्व की विडम्बना और दिशा

    देश में दलित नेतृत्व की विडम्बना और दिशा

    भूकम्प और ज्वालामुखियों ने कई सुन्दर और उपयोगी भू-आकृतियों को जन्म दिया है. लेकिन ऐसा होता बहुत कम है. देखा यह गया है कि आकृतियां बन तो जाती हैं, लेकिन बनी रह नहीं पातीं.

  • इतिहास के पंजों में फंसी कलाओं की गर्दन

    इतिहास के पंजों में फंसी कलाओं की गर्दन

    'पद्मावती' फिल्म के बारे में अब केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने एक नया फैसला लिया है. बोर्ड ने इतिहासकारों की एक छः सदस्यीय समिति गठित की है, जो इस फिल्म के ऐतिहासिक तथ्यों की सत्यता का परीक्षण करेगी. समिति का गठन इसलिए किया गया है, क्योंकि फिल्मकार ने इसमें अंशतः ऐतिहासिक तथ्यों के होने की बात कही है.

  • रूस की क्रांति : एक छोटी-सी ज़िन्दगी की लंबी कहानी

    रूस की क्रांति : एक छोटी-सी ज़िन्दगी की लंबी कहानी

    आजकल तो लोग ही आराम से 82-83 साल तक जी लेते हैं, सो, ऐसे में यदि किसी दर्शन से जन्मी राजनैतिक व्यवस्था की उम्र भी लगभग इतनी ही हो, तो अफसोस की बात तो है ही... और सोचने की बात भी... 100 साल पहले 7 नवंबर को लेनिन के नेतृत्व में जो ऐतिहासिक और चामत्कारिक घटना रूस में घटी, उसने पूरी दुनिया को जोश से भर दिया था.

  • पद्मावती विवाद : कल्पना के घोड़े पर सवार शख्स की उसी घोड़े के खिलाफ जंग

    पद्मावती विवाद : कल्पना के घोड़े पर सवार शख्स की उसी घोड़े के खिलाफ जंग

    'पद्मावती' फिल्म को लेकर फिलहाल जिस तरह का शोर-शराबा और चीख-चिल्लाहट मची हुई है, उस दौर में इस तरह की बातें करना अनर्गल प्रलाप से अधिक कुछ नहीं है, फिर भी मन है कि मानता नहीं. साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि जान-बूझकर इतिहास और तर्क की अनदेखी की जा रही है.

  • हिमाचल और गुजरात में किस करवट बैठेगा चुनावी ऊंट?

    हिमाचल और गुजरात में किस करवट बैठेगा चुनावी ऊंट?

    प्रश्‍न यह उठता है कि क्या हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस बनी रहेगी और गुजरात में बीजेपी बेदखल हो जाएगी? फिलहाल इन दोनों प्रश्‍नों के जो उत्तर नजर आ रहे हैं, वह यह कि दोनों में से किसी के होने की संभावना नहीं है. 68 सीटों वाली हिमाचल की विधानसभा में कांग्रेस ने 2012 में 36 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी. बीजेपी इससे 10 कम रही थी. कांग्रेस ने अपने 83 वर्षीय जिस नेता को अपने भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया है, वे इस बीच लगातार भ्रष्टाचार के मामलों में चर्चा में रहे हैं.

  • आखिर किसके लिए है यह ग्लोबलाइजेशन?

    आखिर किसके लिए है यह ग्लोबलाइजेशन?

    फिलहाल जीडीपी, जीएसटी, तेजोमहल, पगलाया विकास, गुजरात चुनाव, गौरव यात्रा, बाबाओं के रोमांस आदि-आदि का शोर इतना अधिक है कि इस कोलाहल में भला भूखेपेट वाले मुंह से निकली आह और कराह की धीमी और करुण आवाज कहां सुनाई पड़ेगी.

  • राजनीति, नौकरशाही के बीच जारी 'धूप-छांव' के खेल से अवाम असमंजस में

    राजनीति, नौकरशाही के बीच जारी 'धूप-छांव' के खेल से अवाम असमंजस में

    गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स, यानी GST में किए गए बदलावों के बारे में जवाब देते हुए एक न्यूज़ चैनल पर राजस्व सचिव हंसमुख अधिया ने एक सामान्य-सी लगने वाली बात कही थी, जिससे आज की सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर काफी रोशनी पड़ती है.

  • क्या आप महान गायक मोहम्मद रफी की मजार को जानते हैं? अगर नहीं तो ये बातें आपको चौंकाएंगी...

    क्या आप महान गायक मोहम्मद रफी की मजार को जानते हैं? अगर नहीं तो ये बातें आपको चौंकाएंगी...

    एक अच्छी-प्यारी सी ताजी खबर और हम भारतीयों के लिए काफी-कुछ चौंकाने वाली भी. खबर यह है कि ब्रिटेन की सरकार ने अपने यहां के दस पाउंड वाले नोट पर अपनी मशहूर लेखिका जेन आस्टिन की तस्वीर छापी है.

  • ‘मकान’ में तब्दील होते ‘घर’..सावधान होने का वक्त आ गया

    ‘मकान’ में तब्दील होते ‘घर’..सावधान होने का वक्त आ गया

    एक ही घर में रहने वाले लोग जब अपने-अपने कमरों में कैद हो जाते हैं, तो घर मकान बनने लगता है. और जब वे ही लोग आंगन में इकट्ठे होकर आपस में बतिया रहे होते हैं, तो वही मकान घर में परिवर्तित होकर गुंजायमान हो उठता है.

  • आसान नहीं है कलेक्टरी करना

    आसान नहीं है कलेक्टरी करना

    देश के प्रधानमंत्री का सीधे कलेक्टरों से बात करना, और वह भी 9 अगस्त को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 75वीं वर्षगाँठ जैसे अत्यन्त महत्वपूर्ण अवसर पर, इन दोनों के गहरे प्रतीकात्मक अर्थ हैं.

  • 'आम आदमी' एवं 'दलित' की नई राजनीतिक परिभाषा

    'आम आदमी' एवं 'दलित' की नई राजनीतिक परिभाषा

    और भ्रम फैलाने का सबसे अच्छा माध्यम यह है कि शब्दों के परंपरागत-संस्कारगत अर्थों को भ्रष्ट करके उनकी परिभाषायें बदल दी जायें. इस राजनीतिक औजार की सबसे अधिक जरूरत लोकतांत्रिक प्रणाली वाली व्यवस्था में पड़ती है, और भारत में फिलहाल यही प्रणाली काम कर रही है.

  • राजनीति के समक्ष खड़ी 'बेचारी' व्यवस्था

    राजनीति के समक्ष खड़ी 'बेचारी' व्यवस्था

    34-वर्षीय महिला आईपीएस पूरे साहस के साथ बीजेपी के स्थानीय नेता का मुकाबला कर रही थी, जो बिना हेल्मेट पहने बाइक चलाते हुए पुलिस द्वारा पकड़ा गया था. यह न केवल बदलते हुए भारत की तस्वीर थी, बल्कि उससे कहीं ज्यादा बदलते हुए उस उत्तर प्रदेश की कानून और व्यवस्था की तस्वीर थी, जिसे पहले की सरकारों ने तथाकथित 'जंगलराज' में तब्दील कर दिया था.

  • राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और प्रतीक की राजनीति...

    राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और प्रतीक की राजनीति...

    यहां मूल चिंता यह है कि वह दिन कब आएगा, जब इस देश के वंचित वर्ग का व्यक्ति अपनी जाति से नहीं बल्कि अपनी योग्यता से जाना जाएगा, क्योंकि जाति का लेबल उसकी योग्यता को निरस्त करके उसे अनावश्यक ही कुंठित कर देता है.

  • शिक्षा के चक्रव्यूह में फंसकर खो गई है मौलिकता...

    शिक्षा के चक्रव्यूह में फंसकर खो गई है मौलिकता...

    यूनान के दार्शनिक सुकरात ने कहा था, "मेरे इस शहर के सभी लोग मूर्ख हैं, क्योंकि वे यह जानते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं... एक केवल मैं ही ज्ञानी हूं, क्योंकि मैं यह जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता..."

  • कठघरे में खड़ा एक तथाकथित क्रांतिकारी नेता

    कठघरे में खड़ा एक तथाकथित क्रांतिकारी नेता

    मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी यह सोचने को मजबूर है कि बात-बात पर, यहां तक कि बिना बात का भी बतंगड़ बनाकर लगभग रोजाना ही दहाड़ने वाला वह शेर आज मौन क्यों है? आरोप कोई बाहरी व्यक्ति नहीं लगा रहा है. लगाने वाला उन्ही के मंत्रीपरिषद का उनका एक विश्वसनीय साथी है. तो क्या उन आरोपों का उत्तर चुप्पी होगी ? देश के वित्तमंत्री ने उन पर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया है. यह विकल्प केजरीवाल के पास भी है. क्या वे भी कपिल मिश्रा के साथ ऐसा ही कुछ करके जनता के सामने अपने निर्दोष होने का प्रमाण पेश करेंगे?

  • नदी नहीं, मैया है नर्मदा...

    नदी नहीं, मैया है नर्मदा...

    ज़ाहिर है, जहां राजसत्ता के पास लोकचेतना की इतनी मजबूत, बड़ी और गहरी शक्ति हो, उसे क्यों अपने आपको किसी विधान का मोहताज बनना चाहिए. फिर भी यदि ऐसा किया जाता है, तो वह कहीं न कहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमज़ोरी को व्यक्त करता है, चाहे इस कमज़ोरी का कारण कुछ भी हो...

  • नौकरशाही के नए अवतार का इंतजार

    नौकरशाही के नए अवतार का इंतजार

    योगी अदित्यनाथ ने अपने अभी तक के बढ़ाए गए कदमों से यह तो सिद्ध करने में सफलता हासिल कर ली है कि 'मेरा अपना कोई स्वार्थ नहीं है'. यह जनविश्वास के लिए बहुत जरूरी था. उन्होंने नौकरशाहों को यह संदेश स्पष्ट रूप से दे दिया है कि काम किए बिना गुजारा नहीं है, और सही तरीके से काम करना पड़ेगा. इसी के साथ जुड़ी हुई बात है- टारगेट फिक्स करना. यानी कि अब 'देखा जाएगा और देखते हैं' के स्थान पर 'होगा' की कार्यसंस्कृति को अपनाने के बहुत स्पष्ट निर्देश दे दिए गए हैं.

  • मानसिक स्वास्थ्य विधेयक से उभरती चिंता की लकीरें

    मानसिक स्वास्थ्य विधेयक से उभरती चिंता की लकीरें

    जो संसद अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयकों को निर्धारित समय से भी कम समय में पारित कर देती है, उसी संसद की लोकसभा ने मानसिक स्वास्थ्य बिल के लिए निर्धारित दो घंटे के बदले सात घंटे लिए. ज़ाहिर है, देश मानसिक स्वास्थ्य के प्रति काफी चिंतित जान पड़ रहा है.

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