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Dr vijay agrawal


'Dr vijay agrawal' - 105 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • फिल्मों में झलकते राजनीतिक आशय

    फिल्मों में झलकते राजनीतिक आशय

    'स्त्री', 'सुई-धागा' और 'मंटो', इन तीनों फिल्मों में एक बात जो एक-सी है, वह है - नारी की शक्ति और उसके अधिकारों की स्वीकृति. 'स्त्री' भले ही एक कॉमेडी थ्रिलर है, लेकिन उसमें स्त्री के सम्मान और शक्ति को लेकर समाज की जितनी महीन एवं गहरी परतें मिलती हैं, वह अद्भुत है. यही कारण है कि भूत-प्रेत जैसी अत्यंत अविश्वसनीय कथा होने के बावजूद उसने जबर्दस्त कलेक्शन किए.

  • अब जागना होगा ऊंघते अमेरिका को...

    अब जागना होगा ऊंघते अमेरिका को...

    निर्णय लेना आसान नहीं होता, और जो निर्णय लिए गए, वे तो और भी ज़्यादा कठिन थे. इसके लिए बहुत अधिक साहस की ज़रूरत थी, किन्तु भारत ने यह साहस कर दिखाया, वह भी एक ही दिन में, तथा एक ही देश की इच्छा के विरुद्ध नहीं, उसकी आदेशनुमा धमकियों को भी दरकिनार करते हुए...

  • लोकतंत्र पर मंडराती नौकरशाही तंत्र की छाया

    लोकतंत्र पर मंडराती नौकरशाही तंत्र की छाया

    हमें यह सोचना होगा कि लोकतंत्र की आत्मा मूलतः लोक में बसती है या ब्यूरोक्रेसी में...? इतने उच्च स्तर पर प्रवेश करने से पहले ब्यूरोक्रेसी के ये सदस्य आए भले ही लोक-जीवन से क्यों न हों, लेकिन मसूरी की प्रशासनिक अकादमी में प्रवेश करते ही उनकी चेतना का जो रूपान्तरण होता है, वह उन्हें लोकतंत्र पर शासन करने वाले एक विशिष्ट तंत्र में तब्दील कर देता है,

  • एक अबूझ शख्स की कई अनसुलझी दास्तानें

    एक अबूझ शख्स की कई अनसुलझी दास्तानें

    वे अमेरिकी अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लगभग पौने तीन साल की कार्यशैली से खुश हो सकते हैं, जो 'अमेरिकन फर्स्ट' के नारे पर विश्वास करते हुए अपने देश के लिए एक 'स्वर्णयुग' की कल्पना कर रहे हैं, लेकिन सच यह है कि अधिकांश अमेरिकी उनकी कार्यशैली से बेहद नाखुश हैं.

  • IAS के 'लौह-द्वार' पर प्रथम प्रहार

    IAS के 'लौह-द्वार' पर प्रथम प्रहार

    केंद्र सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों के संयुक्त सचिव के 10 पदों के लिए निजी क्षेत्र के लोगों से जो आवेदन मंगवाए थे, उसके जवाब में कुल 6,077 आवेदन प्राप्त हुए हैं. यानी प्रति पद के लिए औसतन 600 व्यक्ति. यह एक अद्भुत संयोग है कि जिस सिविल सेवा परीक्षा के तहत IAS अधिकारियों की भर्ती होती है, उसमें बैठने वाले और सेलेक्ट होने वाले परीक्षार्थियों का अनुपात भी लगभग यही होता है

  • कहीं भारत न पहुंच जाए तुर्क हवा...

    कहीं भारत न पहुंच जाए तुर्क हवा...

    पिछले महिने एशिया और यूरोप महाद्वीपों के बिल्कुल बीच में बसे हुए आठ करोड़ की आबादी वाले तुर्की नामक इस्लामिक देश में एक छोटी-सी ऐसी राजनीतिक घटना घटी है, जिसकी ओर फिलहाल दुनिया का ध्यान उतना नहीं गया, जितना जाना चाहिए था, जबकि यह घटना भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है.

  • डोनाल्ड ट्रंप की बदौलत बेनकाब होता अमेरिकी चेहरा

    डोनाल्ड ट्रंप की बदौलत बेनकाब होता अमेरिकी चेहरा

    डोनाल्ड ट्रंप के बचे हुए ढाई साल दुनिया के सामने अमेरिका के चेहरे को बेनकाब कर देंगे. इससे विश्व का नेतृत्व करने का उसका अब तक का दावा ध्वस्त होगा, और एक नई विश्व-व्यवस्था का आकार उभरेगा, जिसे डोनाल्ड ट्रंप की विश्व को देन के रूप में लिया जाना चाहिए.

  • खुलनी ही चाहिए समाज की खिड़कियां...

    खुलनी ही चाहिए समाज की खिड़कियां...

    लोकसभा चुनाव से करीब 10 महीने पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह धमाकेदार घोषणा कर देश की सियासत को गर्मा दिया है कि वह हर जिले में दारुल कजा (शरिया अदालत) खोलेगी.

  • आखिर दिल्ली सरकार की समस्या है क्या...?

    आखिर दिल्ली सरकार की समस्या है क्या...?

    दिल्ली सरकार के साथ पिछले दिनों जो कुछ हुआ, या इसे यूं भी कह लें कि उसने जो कुछ किया, उससे कई महत्वपूर्ण सवाल मन में उठते हैं. पहला सवाल तो यही कि देश की राजधानी की सरकार लगभग 10 दिन तक हड़ताल पर रही. सरकार के खिलाफ हड़तालों की बात तो आम थी, लेकिन यह एकदम से खास हो गई. और वह हड़ताल भी किसके विरूद्ध - अपने ही उपराज्यपाल के विरुद्ध, और वह भी उन्हीं के दफ्तर में घुसकर.

  • इतिहास को बनाते और बनते हुए देखने का सुख

    इतिहास को बनाते और बनते हुए देखने का सुख

    और इसी कारण 12 जून, 2018 का दिन दुनिया के इतिहास में तब तक के लिए दर्ज हो गया, जब तक दुनिया मौजूद रहेगी. इसी के साथ समय की पीठ पर इन दो नेताओं के नाम के अक्षर भी हमेशा-हमेशा के लिए अंकित हो गए.

  • ‘102 नॉट आउट’ : आनंदवाद से सुखवाद की ओर छलांग…

    ‘102 नॉट आउट’ : आनंदवाद से सुखवाद की ओर छलांग…

    अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर स्टारर फिल्म '102 नॉट आउट' का इतनी तेज़ी से हो रहा प्रभाव मार्क्सवादियों की कलाविषयक इस धारणा को बखूबी पुष्ट कर रहा है कि कलाएं समाज का आईना ही नहीं, समाज को बदलने और गढ़ने वाली छेनी-हथौड़ी भी होती हैं.

  • राजनीति की नई चिढ़ाती-बरगलाती भाषा...

    राजनीति की नई चिढ़ाती-बरगलाती भाषा...

    कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि चुनाव बाद कांग्रेस PPP पार्टी बन जाएगी, तो मुझे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की तर्ज पर लगा कि वह विपक्षियों के बीच गठबंधन की बात कर रहे हैं. लेकिन बाद में उन्होंने खुद इसका अर्थ बताया कि कांग्रेस 'पंजाब, पुदुच्चेरी और परिवार' की पार्टी रह जाएगी. दो दिन के बाद राहुल गांधी ने जेडीएस का नया अर्थ दिया - जनता दल संघ परिवार. निःसंदेह, जनता को इससे मजा आ रहा है.

  • वर्तमान समय की खौफनाक अनजानी गुलामी

    वर्तमान समय की खौफनाक अनजानी गुलामी

    तकनीकी अनुसंधानों के द्वारा आदमी पर नियंत्रण रखकर उसे इतना निरीह और गुलामों से भी बदतर गुलाम बना दिया जायेगा, इसकी शायद कल्पना भी नहीं की गई थी.

  • आंदोलनों का चिंतित करने वाला स्वरूप

    आंदोलनों का चिंतित करने वाला स्वरूप

    एक सभ्य समाज में संदिग्धता के लिए कोई जगह नहीं होती. फिर भी यदि कोई व्यक्ति विशेष संदिग्ध हो जाये, तो चलेगा. यदि कोई संस्था संदिग्ध हो जाये, तो एक बार वह भी ढक जायेगा. लेकिन यदि कोई जनान्दोलन, और वह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में, संदिग्ध हो जाये, तो इसे चलाते रहना व्यवस्था के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक हो जाता है.

  • ‘शीतयुद्ध‘ के नये संस्करण का आगाज

    ‘शीतयुद्ध‘ के नये संस्करण का आगाज

    अमेरिका ने सन् 2016 में 'अमेरीका फर्स्ट' का नारा देने वाले ट्रम्प को अपना राष्ट्रपति चुनकर दुनिया को साफ-साफ बता दिया था कि ''विश्व का नेतृत्व करने में अब उसकी कोई रुचि नहीं रह गई है.''

  • शिक्षा का डिमोनेटाइजेशन होगा यह

    शिक्षा का डिमोनेटाइजेशन होगा यह

    इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण उस समय मिला था, जब अजीत जोगी नवनिर्मित प्रदेश छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने थे. उन्होंने इंजीनियरिंग और मेडिकल में जाने के लिए प्रवेश परीक्षाओं की व्यवस्था को हटा दिया था. ऐसा करते ही करोड़ों कमाने वाले कोचिंग संस्थानों के हाथ के तोते उड़ गए थे.

  • भय की ठंड से कुड़कुडाती भाषा

    भय की ठंड से कुड़कुडाती भाषा

    मैं धर्मसंकट में हूं, जबर्दस्त धर्मसंकट में. मेरे शब्द मुझसे रुठ गए हैं. सदियों-सदियों से इनका प्रयोग कर-करके मेरे पूर्वजों ने इनके अर्थों में विस्तार किया है. उन्होंने इन्हें जीवन दिया है. मैं अब उनका हत्यारा बन रहा हूं.

  • खेलों के ज़रिये जुड़ते दो 'दुश्मन' देश

    खेलों के ज़रिये जुड़ते दो 'दुश्मन' देश

    इतिहास का एक गंभीर विद्यार्थी होने के नाते अब मेरा इस तथ्य पर पूरा यकीन हो गया है कि समय की गति का स्वरूप सचमुच वृत्ताकार होता है, भले ही उसकी रेखाएं कुछ-कुछ तिरछी क्यों न हों. इसे ही सामान्य भाषा में कहा जाता है कि 'इतिहास स्वयं को दोहराता है...' हम अधिक लंबे दौर में न जाकर इतिहास के इस विलक्षण स्वरूप को पिछले तीन दशकों में ही चिह्नित कर सकते हैं.

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