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'Premchand' - 24 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • आज भी उपेक्षा का शिकार हैं मुंशी प्रेमचंद का घर और गांव

    आज भी उपेक्षा का शिकार हैं मुंशी प्रेमचंद का घर और गांव

    अब पूरे साल उन्हें सभी उनके हाल पर छोड़ देंगे. तमाम घोषणाओं के बावजूद मुंशी प्रेमचंद का घर और गांव आज भी उपेक्षा का शिकार हैं और जो कुछ बना भी है, वह बस यूं ही खड़ा है, बिना किसी काम के.

  • उत्तर प्रदेश : लमही गांव में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उनके प्रति बरसा एक दिन का प्यार

    उत्तर प्रदेश : लमही गांव में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उनके प्रति बरसा एक दिन का प्यार

    कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती उनके गांव लमही मनाया गया. सरकारी महकमों ने अपनी फ़र्ज़ अदायगी की तो प्राइवेट स्कूल, रंगकर्मी, साहित्यकार और पत्रकारों ने भी अपने कथाकार को याद किया. अब पूरे साल उन्हें सभी उनके अपने हाल पर छोड़ देंगे. तमाम घोषणाओं के बावजूद मुंशी प्रेमचंद का घर और गांव आज भी उपेक्षा का शिकार है. मुंशी जी की जयंती पर उनके पात्र होरी, माधव, घीसू की गहरी संवेदना से जुड़े कलाकार नाटक के जरिए उन्हें याद कर रहे थे. लमही में हर साल उनका जन्म दिवस मनाया जाता है. सरकारी महकमे फ़र्ज़ अदायगी का टेंट भी लगाते हैं. स्मारक स्थल पर कार्यक्रम होते हैं और गांव में मेले जैसा माहौल रहता है. लेकिन अपने कथाकार के प्रति एक दिन के इस प्यार पर गांव के लोगों के अंदर एक दर्द भी है.

  • मुंशी प्रेमचंद के पैतृक घर को मिली बिजली, आपूर्ति रोके जाने पर हो गया था विवाद

    मुंशी प्रेमचंद के पैतृक घर को मिली बिजली, आपूर्ति रोके जाने पर हो गया था विवाद

    उत्तरप्रदेश विद्युत निगम ने वाराणसी के बाहरी इलाके में लमही में स्थित महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद के पैतृक मकान में बिजली की आपूर्ति बहाल कर दी है. दरअसल, लेखक की 139 वीं जयंती के कुछ दिन पहले पिछले सप्ताह उनके मकान की बिजली आपूर्ति रोके जाने से विवाद पैदा हो गया था. हालांकि, वराणसी के जिलाधिकारी सुरेंद्र सिंह ने इससे इनकार किया कि महान कथाकार के पैतृक गांव में मकान की बिजली आपूर्ति रोक दी गई थी.

  • Book Review: समकालीन कथा परिदृश्‍य में 'लमही'

    Book Review: समकालीन कथा परिदृश्‍य में 'लमही'

    लमही इससे पहले भी अन्‍य कतिपय विशेषांकों के अलावा समकालीन उपन्‍यास-परिदृश्‍य पर औपन्‍यासिक शीर्षक से दो विशेषांक प्रकाशित कर चुकी है.

  • प्रेमचंद की कहानियां को आज भी भूले नहीं हैं लोग

    प्रेमचंद की कहानियां को आज भी भूले नहीं हैं लोग

    साहित्य जगत में मुंशी प्रेमचंद का स्थान उस ऊंचाई पर हैं जहां बिरले पहुंच पाये हैं. उनकी कहानियों में ग्रामीण भारत खासतौर पर किसानों की स्थिति का जो वर्णन है वह किसानों की आज की हालत से कोई खास भिन्न नहीं है.

  • लेखकों, कवियों की पहचान को संजोता जामिया का प्रेमचंद अभिलेखागार

    लेखकों, कवियों की पहचान को संजोता जामिया का प्रेमचंद अभिलेखागार

    पुराने लेखकों और कवियों की कृतियां, अच्छी तस्वीरें एवं उनसे जुड़ी जानकारी इंटरनेट या किसी एक स्थान पर शायद ही सटीक रूप से मिलती हैं.

  • प्रेमचंद और रूसी लेखक दोस्तोएवेस्की की कहानियों पर बनी फिल्म

    प्रेमचंद और रूसी लेखक दोस्तोएवेस्की की कहानियों पर बनी फिल्म

    राज ने फिल्म प्रेमचंद और दोस्तोएवेस्की कहानियों की दुनिया का विलय करने के बारे में बताया, "दोनों लेखक दुनिया के दो अलग हिस्सों से ताल्लुक रखते हैं, इसलिए तुरंत इसे मिलाने का प्रयास नहीं किया."

  • प्रेमचंद के लेखन ने बदली हिंदी-उर्दू साहित्य की दिशा

    प्रेमचंद के लेखन ने बदली हिंदी-उर्दू साहित्य की दिशा

    प्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचंद के पौत्र आलोक राय का कहना है कि होरी और गोबर जैसे पात्रों के रचियता ने अपने ‘आधुनिक दृष्टिकोण’ और सहज अभिव्यक्ति से हिंदी तथा उर्दू साहित्य की दिशा बदल दी.

  • .....और ढहा दिया गया मुंशी प्रेमचंद का 'घर'

    .....और ढहा दिया गया मुंशी प्रेमचंद का 'घर'

    कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने जिस किराए के घर में कथा संसार रचा, सहेजने की बजाय प्रशासन ने लोगों के लिए 'खतरा' बताकर उसे चंद समय में ढाह दिया और समाज का पहरुआ बनने का ढोंग करने वाले सिर्फ तमाशबीन बने रहे.

  • हताशा के कोहरे में ढांढस बंधाएंगी प्रेमचंद की ये 10 बातें...

    हताशा के कोहरे में ढांढस बंधाएंगी प्रेमचंद की ये 10 बातें...

    माना की प्रेमचंद का साहित्‍य लेखन आज से सालों पहले हुआ, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि उनकी रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी की लेखन काल में रही होंगी.

  • प्रेमचंद की इस नायिका ने मारा था दहेज लोभी पति के चेहरे पर तमाचा...!

    प्रेमचंद की इस नायिका ने मारा था दहेज लोभी पति के चेहरे पर तमाचा...!

    उपन्‍यासकार प्रेमचन्द ने कई महान कृतिया दी हैं. जिनमें से एक है 'निर्मला'. निर्मला का का निर्माण काल 1923 ई. और प्रकाशन का समय 1927 ई. है. प्रेमचन्द्र के उन उपन्यासों में निर्मला बहुत आगे माना जाता है जिन्‍होंने साहित्य के मानक स्थापित किए. इस उपन्‍यास में प्रेमचंद ने समाज में औरत के स्त्री और उसकी दशा का चित्रण पेश किया है.

  • प्रेमचंद की कहानी: पूस की रात

    <b>प्रेमचंद की कहानी: पूस की रात</b>

    प्रेमचंद की कहानी: पूस की रात कथा सम्राट प्रेमचंद ने हिन्‍दी के खजाने में कई अनमोल रत्‍न जोड़े हैं. प्रेमचंद का लेखन और उनकी रचानाएं जितनी प्रासंगिक उस समय में थीं, जब वह रची गईं, उतनी ही आज भी हैं. प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों में किसानों, मजदूरों और वर्ग में बंटे हुए समाज का मार्मिक चित्रण हैं.

  • आत्मकथा : महात्मा गांधी के दर्शन के दो दिन बाद ही प्रेमचंद ने छोड़ दी थी 20 साल पुरानी नौकरी

    आत्मकथा : महात्मा गांधी के दर्शन के दो दिन बाद ही प्रेमचंद ने छोड़ दी थी 20 साल पुरानी नौकरी

    ऐसा समारोह मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था. महात्माजी के दर्शनों का यह प्रताप था, कि मुझ जैसा मरा आदमी भी चेत उठा. उसके दो ही चार दिन बाद मैंने अपनी बीस साल की नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

  • प्रेमचंद को गूगल का अनोखा सलाम, 'गोदान' डूडल से किया याद

    प्रेमचंद को गूगल का अनोखा सलाम, 'गोदान' डूडल से किया याद

    कथाकार मुंशी प्रेमचंद की 136वीं सालगिरह पर गूगल इंडिया ने उन्हें अनोखे तरीके से याद किया है. सबसे बड़े सर्च इंजन ने अपने होम पेज पर प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास 'गोदान' का डूडल लगाया है.

  • प्रेमचंद एक सदी बीत जाने के बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं : गुलजार

    प्रेमचंद एक सदी बीत जाने के बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं : गुलजार

    साहित्य के साथ गुलजार के रिश्ते में मुंशी प्रेमचंद का सबसे अधिक प्रभाव रहा है और प्रख्यात कवि-गीतकार का मानना है कि एक सदी बीत जाने के बाद भी प्रेमचंद की कृतियों ने अपनी प्रासंगिकता नहीं गंवाई है.

  • ‘दुखी दलित’ का सुख किसमें है...सदगति या अस्तित्व में?

    ‘दुखी दलित’ का सुख किसमें है...सदगति या अस्तित्व में?

    प्रेमचंद की कहानी ‘सदगति’ में दुखी दलित नायक अपने घर में एक पूजा के लिए गांव के ब्राह्मण को बुलाने जाता है। ब्राह्मण इस शर्त पर चलने को राज़ी होता है कि बदले में दुखी दलित उसके (ब्राह्मण के) घर का वो सारा काम करेगा जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है, मसलन झाड़ू, घर लीपना, गाय को घास डालना, वगैरह वगैरह।

  • पटना पुस्तक मेला: मधुशाला हो या गोदान, कायम है पुरानी कृतियों का आकर्षण

    पटना पुस्तक मेला: मधुशाला हो या गोदान, कायम है पुरानी कृतियों का आकर्षण

    'कृतियां कभी नहीं मरतीं, उसके शब्द अमर होते हैं'। रचनाकार भले ही गुजर गए हों, लेकिन उसकी रचनाएं अमर रहती हैं। ऐसा ही कुछ पटना पुस्तक मेले में देखने को मिल रहा है।

  • मुंशी प्रेमचंद की 135वीं जयंती पर विशेष

    मुंशी प्रेमचंद की 135वीं जयंती पर विशेष

    एक सदी पहले जब मुंशी प्रेमचंद का नन्हा किरदार हामिद ‘ईदगाह’ जा रहा था, तो उसके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना गरीबी और यतीम होना थी, लेकिन उसके बालसुलभ हौसले के दीये को मुंशी जी ने गुरबत की आंधी में बुझने नहीं दिया।