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Premchand News in Hindi


'Premchand' - 24 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • प्रेमचंद@135 : बेहतर तो होता कि आज आप प्रासंगिक न होते

    प्रेमचंद@135 : बेहतर तो होता कि आज आप प्रासंगिक न होते

    देश का मीडिया मुंबई बम काण्ड के दोषी याकूब मेमन की फांसी पर बहस मुबाहिसों में फंसा हुआ है। उसके पास उस सामाजिक सरोकार के लिए उतना समय नहीं है, जिसे मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कथावस्तु बनाया था।

  • दयाशंकर मिश्र का ब्लॉग : प्रेमचंद की याद में हामिद का टूटा हुआ चिमटा

    दयाशंकर मिश्र का ब्लॉग : प्रेमचंद की याद में हामिद का टूटा हुआ चिमटा

    आज हिंदी कहानी के युगपुरुष की 135वीं जयंती पर दयाशंकर मिश्र उनके मासूम पात्र को नए जमाने में रखकर जो फैंटेसी गढ़ रहे हैं, उसमें गरीबी से जीता हामिद सांप्रदायिकता से पस्तहाल नजर आता है...

  • प्रेमचंद@135 : समय से कितने आगे थे, 'लिव इन' पर एक सदी पहले ही लिख चुके थे

    प्रेमचंद@135 : समय से कितने आगे थे, 'लिव इन' पर एक सदी पहले ही लिख चुके थे

    'लिव इन रिलेशन' जैसे संबंध आज के दौर में सामने आए हैं, लेकिन प्रेमचंद ने तो उस जमाने में जब 'गौना' के बगैर पति-पत्नी आपस मे मिल भी नहीं सकते थे, 'मिस पद्मा' जैसी कहानी लिखी जिसका विषय 'लिव इन रिलेशन' है।

  • 135वीं जयंती पर विशेष : रंगमंच की जान है प्रेमचंद की हिंदुस्तानी भाषा

    135वीं जयंती पर विशेष : रंगमंच की जान है प्रेमचंद की हिंदुस्तानी भाषा

    मुंबई की 'आइडियल ड्रामा एंड इंटरटेनमेंट एकेडमी' (आइडिया) मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का नाट्य रूपांतरण और प्रदर्शन इसलिए भी करती है क्योंकि इससे न सिर्फ नए कलाकारों की हिन्दी की समझ बेहतर होती है बल्कि उनके उच्चारण भी सुधर जाते हैं।

  • सौ साल बाद भी प्रासंगिक हैं प्रेमचंद, रंगमंच पर भी असर बरकरार

    सौ साल बाद भी प्रासंगिक हैं प्रेमचंद, रंगमंच पर भी असर बरकरार

    भारतीय मनोरंजन उद्योग के केंद्र मुंबई में फिल्म के विषय, निर्माण की तकनीक के बेहद विकसित हो जाने के बावजूद रंगमंच पर प्रेमचंद आज भी अपने खासे असर के साथ मौजूद हैं। मुंबई में प्रेमचंद की कहानियों की रंगमंचीय प्रस्तुतियों का सिलसिला कई दशकों से अनवरत चल रहा है।

  • 'अन्नदाता' के पेट पर लात आखिर कब तक?

    'अन्नदाता' के पेट पर लात आखिर कब तक?

    एक प्रचलित कहावत है कि 'किसी के पेट पर लात मत मारो भले ही उसकी पीठ पर लात मार दो।' मगर इस देश में आज से नहीं, सदियों से, गुलामी से लेकर आजादी तक, पाषाण युग से लेकर आज वैज्ञानिक युग तक, बस एक ही काम हो रहा है और वह काम यह है कि हम अपने अन्नदाता, अपने पालनहार, किसान के पेट पर लात मारते ही चले जा रहे हैं।

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