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'Prime time' - 678 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • लोकतंत्र के पैमाने पर भारत का रैंक क्यों गिरा

    लोकतंत्र के पैमाने पर भारत का रैंक क्यों गिरा

    असम में एनआरसी लागू होने के कारण लोगों को काफी तकलीफों से गुज़रना पड़ा है. इन प्रदर्शनों के बैनरों पोस्टरों पर फासीवाद लिखा है. न्यूजीलैंड के लोग फासीवाद के खिलाफ है. भारत सबका है. जामिया, जेएनयू और एएमयू के छात्रों के साथ सहानुभूति दिखाई गई है. यूनिवर्सिटी पर हमले को रोकने की बात है. दो घंटे तक चले इस मार्च में जो बैनर पोस्टर हैं वो भारत की अच्छी तस्वीर तो पेश नहीं कर रहे हैं. लेकिन एक बार सोचना तो चाहिए कि इस कानून ने लोगों को कितना भयभीत किया है जगह जगह लोग सड़कों पर उतर रहे हैं.

  • प्रधानमंत्री जी सरकारी नौकरी परीक्षा पर चर्चा कब होगी ?

    प्रधानमंत्री जी सरकारी नौकरी परीक्षा पर चर्चा कब होगी ?

    प्रधानमंत्री मोदी ने स्कूली बच्चों के साथ परीक्षा पर चर्चा क्या की, सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में फंसे छात्र चाहते हैं कि उनकी परीक्षा पर भी प्रधानमंत्री चर्चा करें. ताकि 12वीं के जो छात्र अगले एक दो साल में जब पहली बार मतदाता बनेंगे तो उन्हें भी पता चले कि आगे सरकारी परीक्षाओं का एक भयानक स्वरूप उनका इंतज़ार कर रहा है.

  • कश्मीरी पंडितों का दर्द हमने कितना समझा?

    कश्मीरी पंडितों का दर्द हमने कितना समझा?

    अगर किसी की तमाम तक़लीफों में सबसे बड़ी यही तकलीफ हो कि किसी ने उनकी बात नहीं की तो उस चुप्पी पर बात होनी चाहिए. इंसाफ़ का इंतज़ार लंबा हो ही गया है और शायद आगे भी हो लेकिन चुप्पी उनके भीतर चुप रही है. वो हर दिन पहले से ज्यादा चुभने लगती है.

  • शाहीन बाग़ जैसे प्रदर्शनों से कौन बोर हो गया है?

    शाहीन बाग़ जैसे प्रदर्शनों से कौन बोर हो गया है?

    ऐसा क्या फैसला है ये कि इसे समझाने के लिए बीजेपी को देश भर में 250 प्रेस कांफ्रेंस और 1000 सभाएं करनी पड़ रही हैं. इसमें स्थानीय और राष्ट्रीय नेता भी हैं और दरवाज़े दरवाज़े जाकर कानून को समझाने का कार्यक्रम भी है. जब इस कानून को 130 करोड़ भारतीयों का समर्थन हासिल है तो फिर बीजेपी को इतनी रैलियां क्यों करनी पड़ रही हैं. अब यह देखा जाना चाहिए कि 1000 सभाओं में से कितनी सभाएं असम और पूर्वोत्तर के राज्यों में होती हैं. जहां इस कानून के विरोध का स्वरूप ही कुछ अलग है.

  • अमित शाह ने नागरिकता कानून के बचाव में गांधी का गलत इस्तेमाल क्यों किया?

    अमित शाह ने नागरिकता कानून के बचाव में गांधी का गलत इस्तेमाल क्यों किया?

    जब से नागरिकता संशोधन कानून का विरोध तेज़ हुआ है, इसके समर्थन में गांधी जी का उदाहरण दिया जाने लगा है. गांधी जी उदाहरण इस तरह से दिया जा रहा है जैसे सारा काम गांधी जी के बताए रास्ते पर ही चलकर करते हों. अब गांधी जी ने तो नहीं कहा था कि गोडसे को देशभक्त बताने वाले को टिकट देनी है और सांसद बनाना है. तो फिर नागरिकता कानून का बचाव गांधी जी के नाम पर क्यों किया जा रहा है?

  • दविंदर सिंह के साथ साठगांठ में और क़ौन-कौन?

    दविंदर सिंह के साथ साठगांठ में और क़ौन-कौन?

    जम्मू कश्मीर पुलिस ने अपने डीएसपी दविंदर सिंह को बर्खास्त करने की सिफारिश की है. कड़ी कार्रवाई के नाम पर यही ब्रेक्रिंग न्यूज़ है. इसके पहले कड़ी कार्रवाई यह हुई थी कि गिरफ्तार डीएसपी को निलंबित किया गया था. क्या आप इसी सूचना का इंतज़ार कर रहे थे या आतंकियों के साथ गिरफ्तार डीएसपी के बारे में आप कुछ और जानना चाहते हैं? जो अफसर आतंक के आरोप में जेल में है, वो निलंबित रहे या बर्खास्त हो क्या फर्क पड़ता है?

  • आतंकवादियों से क्या नाता रहा डीएसपी देविंदर सिंह का?

    आतंकवादियों से क्या नाता रहा डीएसपी देविंदर सिंह का?

    मुझे हैरानी हो रही है कि डीएसपी दविंदर सिंह की आतंकवादियों के साथ गिरफ्तारी से लोग हैरान हैं. दरअसल हैरानी इसलिए कि बार-बार मना करने के बाद भी बहुत लोग आतंकवाद को मज़हब की निगाह से ही देखते हैं. आतंक को दूसरे सवालों और संबंधों के साथ नहीं देखते हैं?

  • किस तरफ़ जा रही है JNU हिंसा की जांच?

    किस तरफ़ जा रही है JNU हिंसा की जांच?

    दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच की प्रेस कांफ्रेस में कहानी 5 जनवरी की हिंसा से ज्यादा 4 जनवरी की थ्योरी पर पहुंचती है, जिसके सहारे जेएनयू प्रशासन बार बार दावा करता है कि लेफ्ट के छात्रों ने सर्वर रूप को क्षतिग्रस्त किया और मारपीट की. जो प्रशासन की शुरू से लाइन रही है. 4 जनवरी की हिंसा का न तो स्केल वैसा था और अगर वैसा था तो उसकी एफआईआर कराने का ख्याल जेएनयू प्रशासन को 5 जनवरी की हिंसा के बाद ही क्यों आया, इसका जवाब नहीं मिला.

  • सेंट स्टीफ़ंस के छात्र भी उतरे जेएनयू के छात्रों के साथ

    सेंट स्टीफ़ंस के छात्र भी उतरे जेएनयू के छात्रों के साथ

    सेंट स्टीफेंस के छात्रों का इस तरह से सड़क पर आना, जेएनयू, जामिया मिलिया और एएमयू के खिलाफ उस चुप्पी को तोड़ना है जिसकी तरफ इशारा कर बताया जा रहा था कि समाज में पुलिस हिंसा के प्रति समर्थन है. क्योंकि वो समाज सिर्फ अपने बहुसंख्यक धर्म के चश्मे से देख रहा है.

  • जेएनयू और जामिया के बीच भेदभाव क्यों किया गया?

    जेएनयू और जामिया के बीच भेदभाव क्यों किया गया?

    इसके बाद भी 5 जनवरी की शाम को जिस दिन हिंसा हुई थी, उस दिन जेएनयू प्रशासन उस हिंसा के खिलाफ एफआईआर नहीं कराता है. दिल्ली पुलिस अपनी तरफ से स्वत: संज्ञान लेते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराती है. इस एफआईआर का कुछ हिस्सा पढ़ना चाहता हूं.

  • JNU हिंसा: 'हमले के वक्त जय श्री राम के नारे लगा रहे थे हमलावर', चश्मदीदों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया

    JNU हिंसा: 'हमले के वक्त जय श्री राम के नारे लगा रहे थे हमलावर', चश्मदीदों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया

    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में कुछ हफ्ते पहले फीस वृद्धि किए जाने के बाद से विरोध प्रदर्शन जारी थे, लेकिन पिछले दो-तीन दिन से वामदल-समर्थक विद्यार्थियों और दक्षिणपंथी कहे जाने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के समर्थक विद्यार्थियों के बीच तनाव कुछ बढ़ा हुआ दिखने लगा था

  • यूनिवर्सिटी को नज़रों के सामने बर्बाद किया गया

    यूनिवर्सिटी को नज़रों के सामने बर्बाद किया गया

    एक्सप्रेस ने पीटीआई के हवाले से खबर लिखी है कि इन सुरक्षा गार्ड ने एडमिन ब्लॉक में प्रदर्शन में छात्रों पर हमला किया था. उन्हें घसीट कर हटाया और सामान फेंक दिए. उसमें कुछ लड़कियों को चोट भी लगी थी. वो सिक्योरिटी गार्ड 5 जनवरी की शाम कहां थे, जिन्हें जेएनयू की सुरक्षा को बेहतर करने के लिए लाया गया था और तीन साल से काम कर रहे 400 गार्ड को हटाया गया था.

  • नागरिकता कानून- सोहैल अपने बेटे को और चंपक अपनी मां एकता को ढूंढ रही है

    नागरिकता कानून- सोहैल अपने बेटे को और चंपक अपनी मां एकता को ढूंढ रही है

    क्या दुनिया की कोई पुलिस है जो भारत की पुलिस को बता सके कि इंटरनेट चालू होते हुए कानून व्यवस्था कैसे संभाली जा सकती है? जिस तरह से बात-बात में भारत में इंटरनेट बंद होने लगा है उससे लगता है कि हमारी पुलिस को सारा काम तो आता है, लेकिन जब इंटरनेट चलता है तो वह कानून व्यवस्था नहीं संभाल पाती है.

  • आखिर हिंसा की वजह क्‍या होती है?

    आखिर हिंसा की वजह क्‍या होती है?

    देश के सैकड़ों जगहों पर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन हुए, लोग जमा हुए और आए और चले गए. गंभीरता से किसी ने उन प्रदर्शनों को भी नहीं लिया. वर्ना उनसे बात करने का कोई तरीका निकाला जा सकता था. अब भी हिंसक प्रदर्शनों से ज़्यादा शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की संख्या ही ज्यादा होगी. हरियाणा के मेवात में प्रदर्शनकारियों की संख्या बहुत ज्यादा थी मगर वहां कोई हिंसा नहीं हुई.

  • प्रदर्शन हिंसक हो तो असली उद्देश्य खो जाता है

    प्रदर्शन हिंसक हो तो असली उद्देश्य खो जाता है

    अगर हिंसा से प्रदर्शनों को नहीं बचाया जा सकता है तो बेहतर है प्रदर्शनों से दूर रहा जाए. कुछ समय के लिए पीछे हटने में कोई नुकसान नहीं है. बाहरी ने किया और अज्ञात लोगों ने किया इन कारणों और बहानों से कोई फायदा नहीं है. या फिर प्रदर्शन पर जाने से पहले इस बात को सुनिश्चित करें कि हिंसा की कोई संभावना न हो. नारों में उग्रता न हो और पता हो कि रैली बुलाने वाला कौन है.

  • जामिया नगर में रविवार की हिंसा कैसे भड़क गई?

    जामिया नगर में रविवार की हिंसा कैसे भड़क गई?

    लोगों को तय करना है कि आईटी सेल के तर्कों के हिसाब से सोचना है या अपने हिसाब से सोचना है. अभी कहा जा रहा है कि जामिया के छात्रों को बहकाया गया है, छात्रों का काम पढ़ना है, प्रदर्शन करना नहीं है. क्या आप वाकई यह मानते हैं कि छात्र सिर्फ बहकावे और उकसावे पर प्रदर्शन कर रहे हैं? पढ़ाई को लेकर जब दिल्ली यूनिवर्सिटी के एडहॉक शिक्षक प्रदर्शन करते हैं तब तो कोई नहीं बोलता. देश भर के करोड़ों नौजवान सरकारी नौकरी की परीक्षा और यूनिवर्सिटी की परीक्षा को लेकर भी आंदोलन करते हैं, लाठियां खाते हैं. कोई ध्यान नहीं देता है.

  • नागरिकता संशोधन बिल में मुस्लिम शरणार्थी क्यों नहीं?

    नागरिकता संशोधन बिल में मुस्लिम शरणार्थी क्यों नहीं?

    वसुधैव कुटुंबकम वाले भारत में आपका स्वागत है. पूरी दुनिया को कुटुंब यानी परिवार मानने वाले भारत की संसद में एक विधेयक पेश हुआ है. जिस भारत के सभी धर्मों को मानने वाले लोगों ने दुनिया के कई देशों में स्वेच्छा से नागिरकता ली है, उन्हें मिली भी है, उनके भारत में एक विधेयक पेश हुआ है. जिन्हें हम नॉन रेजिडेंट इंडियन कहते हैं उन्हें भी यह जानना चाहिए कि नागिरकता संशोधन विधेयक के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश यानी सिर्फ तीन पड़ोसी देशों से प्रताड़ना यातना के शिकार हिन्दू, ईसाई, पारसी, जैन, सिख और बौद्ध को नागरिकता दी जाएगी. इसमें एक मज़हब का नाम नहीं है. मुसलमान का.

  • क्या ऐसे ही भारत में इंसाफ़ होगा?

    क्या ऐसे ही भारत में इंसाफ़ होगा?

    फास्ट ट्रैक कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपने कोर्ट रूम में ताला लगाकर शिमला चले जाना चाहिए और वहां बादाम छुहाड़ा खाना चाहिए. क्योंकि उनका काम खत्म हो गया है. क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर संविधान की शपथ लेकर सासंद बने और टीवी पर आने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तेलंगाना पुलिस की एक असामाजिक करतूत को सही ठहरा दिया है. पुरुषों के अलावा बहुत सी महिलाएं भी उस पब्लिक ओपिनियन को बनाने में लगी हैं और अपने बनाए ओपिनियन की आड़ में इस एनकाउंटर को सही ठहरा रही हैं.

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