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'Prime time' - 295 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • प्राइम टाइम इंट्रो : मोदी सरकार के तीन साल का सरकारोत्‍सव

    प्राइम टाइम इंट्रो : मोदी सरकार के तीन साल का सरकारोत्‍सव

    आज सरकारोत्सव है. सरकारोत्सव उस उत्सव को कहते हैं कि जब सरकार अपने एक साल पूरे करती है. सरकारोत्सव मनाने की परंपरा शायद अमेरिका में शुरू हुई थी जब राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने अपनी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर जश्न मनाया था. रूजवेल्ट 1932 में राष्ट्रपति बने थे. भारत में भी यह परंपरा चली आई लेकिन 100 दिन के बाद सरकारें 200 दिन नहीं मनाती हैं, वो सीधा सालगिरह मनाती हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : यूपी के कुछ हिस्से क्यों उबल रहे हैं?

    प्राइम टाइम इंट्रो : यूपी के कुछ हिस्से क्यों उबल रहे हैं?

    हमारी आज की राजनीति बेवजह आक्रामक होती जा रही है. नेताओं की भाषा में जो आक्रामकता है वही एंकर की हो गई है, वही अब सड़कों पर लोगों की होती जा रही है. तरह तरह की फिज़ूल की धार्मिक और जातीय सेनाओं के भरोसे राजनीति अपनी आकांक्षा ज़ाहिर करेगी तो फिर औपचारिक दलों का क्या होगा, उन्हें यह भी सोच लेना चाहिए.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : झूठ पर लाठालाठी, मीडिया का आचरण और सेना का मनोबल

    प्राइम टाइम इंट्रो : झूठ पर लाठालाठी, मीडिया का आचरण और सेना का मनोबल

    अरुंधति रॉय का नाम सुनते ही व्हाट्स ऐप पर चलने वाली फेक यूनिवर्सिटी के छात्रों के मन में क्रोध के विविध स्वरूप फूट पड़ते हैं. इसे आम बोलचाल में व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी कहते हैं जहां झूठ की पढ़ाई होती है और जहां पढ़ने वाला छात्र कसम खाता है कि झूठ के अलावा कभी किसी को सत्य नहीं समझेगा. झूठ ही सत्य है इसके लिए पॉलिटिकल ट्रेनिंग चलती रहती है. इस यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भीड़ बनाने में राष्ट्रीय भूमिका अदा की है जिसकी सबसे बड़ी कामयाबी है जहां तहां लोगों को घेरकर मार देना. इन दिनों आप झारखंड के मुख्यमंत्री, पुलिस प्रमुख किसी के बयान सुनिए, लगता है कि वे व्हाट्स ऐप की अफवाहों से खासे परेशान हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : अहम सवाल, देश में जीएम सरसों की पैदावार होनी चाहिए?

    प्राइम टाइम इंट्रो : अहम सवाल, देश में जीएम सरसों की पैदावार होनी चाहिए?

    हजारों साल से प्राकृतिक सरसों हमारे भरोसे का साथी रहा है. प्राकृतिक सरसों इसलिए कहा क्योंकि अब एक नया सरसों आ सकता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में जेनेटिकली मोडिफाइड मस्टर्ड कहते हैं. हिन्दी में जीएम सरसों कह सकते हैं. पूरी दुनिया में जीएम फूड यानी जेनिटिकली मोडिफाइड अनाजों के खाने और असर को लेकर बहस चल रही है. भारत में इस बहस का नतीजा यह निकला कि 2010 में बीटी ब्रिंजल, बीटी बैंगन पर रोक लगा दी गई. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी जीईएसी ने पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जीएम मस्टर्ड की व्यावसायिक खेती की अनुमति दी जा सकती है. पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट में जीएम फूड को लेकर सवाल-जवाब छापे गए हैं. इसमें कहा गया है कि सारे जीएम फूड को हम एक तराजू पर नहीं तौल सकते.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : नेताओं में मानहानि की होड़ क्यों मची?

    प्राइम टाइम इंट्रो : नेताओं में मानहानि की होड़ क्यों मची?

    मानहानि किसकी होती है, कैसे होती है और कितने की होती है, यह सब किस तराजू पर तौला जाता है, अब जान लेने में ही हम सब की भलाई है. वित्त मंत्री जेटली की मानहानि दस करोड़ की हुई है या बीस करोड़ की, इसका फैसला तराजू पर तौल कर होगा या हैसियत का भी कोई बैरौमीटर होता है उससे होगा.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : लड़कों की दादागीरी से लड़ती लड़कियां

    प्राइम टाइम इंट्रो : लड़कों की दादागीरी से लड़ती लड़कियां

    लोकतंत्र की एक खूबी यह है कि वह कोई ठोस पदार्थ नहीं है. लोकतंत्र तरल पदार्थ है, इसलिए आज की राजनीति में प्रॉपेगेंडा के द्वारा इसे ठोस पदार्थ में बदलने का प्रयास होता रहता है. मतदान करने की उम्र भले ही 18 साल हो, मगर लोकतंत्र में भागीदारी की कोई उम्र नहीं हो सकती है. किसने सोचा था कि हरियाणा के रेवाड़ी ज़िले की 9वीं और 10वीं की 80 से अधिक लड़कियां धरने पर बैठ जाएंगी और सरकार से अपनी मांग मनवा लेंगी.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्‍या तीन तलाक पर कोर्ट का दखल ठीक है?

    प्राइम टाइम इंट्रो : क्‍या तीन तलाक पर कोर्ट का दखल ठीक है?

    तीन तलाक़ पर तैयारी के दौरान कई लेखों में मीडिया खासकर न्यूज़ चैनलों को लेकर एक खीझ दिखाई दी. यही कि मीडिया ख़ासकर टीवी ने तीन तलाक के मसले को हां या ना में बदल कर रख दिया है. जबकि यह मामला हां या ना के अलावा उन विकल्पों का भी है जो तीन तलाक की समाप्ति के बाद हो सकता है, जिसे लेकर तमाम संगठनों के बीच अलग अलग राय है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : फ्रांस में राष्‍ट्रपति चुनाव में मैक्रों की जीत के मायने

    प्राइम टाइम इंट्रो : फ्रांस में राष्‍ट्रपति चुनाव में मैक्रों की जीत के मायने

    हमारा देश, हमारी कंपनी, हमारी नौकरियां. इस टाइप की राजनीति को जीत का फार्मूला मान लिया गया. जिस भी देश में इस तरह की बातें करने वाला कोई नेता देखा जाता है, मीडिया को उसमें भावी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नज़र आने लगता है. सबको लगता है कि राष्ट्रवाद की जो भी बात करेगा, जनता बहकावे में आती रहेगी.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : निर्भया कांड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    प्राइम टाइम इंट्रो : निर्भया कांड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    निर्भया मामले में फांसी की सज़ा बहाल हुई है. ट्रायल कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने शुरू से लेकर अंत तक फांसी की सज़ा बहाल रखी है. इस मामले ने भारत में बलात्कार के प्रति कानूनी प्रक्रियाओं और नज़रिये को हमेशा के लिए बदल दिया. अभियुक्तों के वकीलों को आपत्ति थी कि सारे अभियुक्तों को सामूहिक सज़ा सुनाई गई है. अपराध में सबकी अलग-अलग भूमिका और उनकी सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक पृष्ठमूभि के हिसाब से सज़ा तय नहीं हुई.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : वित्त वर्ष बदलने का फायदा कितना?

    प्राइम टाइम इंट्रो : वित्त वर्ष बदलने का फायदा कितना?

    कई फैसले ऐसे होते हैं जो सुनने में बहुत अच्छे होते हैं, लगता है कि हां ये तो ठीक ही है बल्कि बढ़िया है. लेकिन क्या उन फैसलों से फायदा भी उतना ही होता है जितना सुनने में लगते हैं. भारत में 150 साल से बजट एक अप्रैल से शुरू होता रहा है. इसे ब्रिटिश परंपरा के तौर पर पेश किया जा रहा है. अब सरकार एक जनवरी से नया वित्त वर्ष बनाना चाहती है और केंद्र के इस फैसले के साथ मध्य प्रदेश भी जुड़ गया है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : भारतीय प्रेस जोखिम उठा रहा है या सत्ता के सामने सिर झुका रहा है?

    प्राइम टाइम इंट्रो : भारतीय प्रेस जोखिम उठा रहा है या सत्ता के सामने सिर झुका रहा है?

    कहीं से भी मीडिया को लेकर अच्छी ख़बर नहीं है. ऐसा क्यों हो रहा है, क्या जनता को स्वतंत्र मीडिया नहीं चाहिए, क्या स्वतंत्र मीडिया की चाह सिर्फ कुछ लोगों तक ही सीमित है. मीडिया का कारोबार काफी तेज़ी से बढ़ रहा है. दुनिया में भी और भारत में भी. लेकिन क्या आपके जीने की परिस्थितियां पहले से बेहतर हुई हैं, क्या आपको लगता है कि राजनीति में जवाबदेही आ गई है, या सबकुछ धारणा ही है, जैसा चल रहा था वैसा ही चल रहा है. लोगों का भरोसा इसी मीडिया पर क्यों है जिसकी स्वतंत्रता, निष्पक्षता को लेकर दुनिया भर में सवाल उठ रहे हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : जवानों की शहादत पर बदली भाषा- क्या सरकार को दबाव में आना चाहिए?

    प्राइम टाइम इंट्रो : जवानों की शहादत पर बदली भाषा- क्या सरकार को दबाव में आना चाहिए?

    पत्रकारिता से निराश होते दर्शकों के बीच सेना, सीमा और पाकिस्तान एक अच्छा मौका देता है, अपनी साख का लाइसेंस नया करने का. इसलिए हम एंकर ज़ोर-ज़ोर से राष्ट्र के प्रहरी बन जाते हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या रेरा क़ानून से ख़रीददारों को लाभ होगा?

    प्राइम टाइम इंट्रो : क्या रेरा क़ानून से ख़रीददारों को लाभ होगा?

    आज जब टीवी देख रहा था तो कुछ इस तरह की पंक्तियां उछल रही थीं कि अब बेईमान बिल्डरों की खैर नहीं. अब नहीं बचेंगे बेईमान बिल्डर. शब्दों से किस तरह टीवी एक नकली हकीकत तैयार करता है ये पंक्तियां उसी की मिसाल हैं. आप बिल्डरों के खिलाफ रात दिन प्रदर्शन कर रहे आम लोगों से पूछिये कि क्या वाकई एक मई से रेरा कानून लागू होने के बाद बिल्डरों की खैर नहीं होगी. उनकी बेईमानी खत्म हो जाएगी.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्यों हुई देरी लोकपाल की नियुक्ति में?

    प्राइम टाइम इंट्रो : क्यों हुई देरी लोकपाल की नियुक्ति में?

    लोकपाल भले न आया हो लेकिन इसके आने को लेकर जो आंदोलन हुआ उससे निकल कर कई लोग सत्ता में आ गए. 2011 से 13 के साल में ऐसा लगता था कि लोकपाल नहीं आएगा तो कयामत आ जाएगी. 2013 में लोकपाल कानून बन गया. 1968 में पहली बार लोकसभा में पेश हुआ था. कानून बनने में 45 साल लग गए तो कानून बनने के बाद लोकपाल नियुक्त होने में कम से कम दस बीस साल तो लगने ही चाहिए थे.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या दिल्ली के दिमाग में कश्मीर है?

    प्राइम टाइम इंट्रो : क्या दिल्ली के दिमाग में कश्मीर है?

    व्हाट्स अप ने कश्मीर पर जितने प्रोफेसर कश्मीर के भीतर पैदा कर दिये हैं, उससे ज्यादा कश्मीर के बाहर. व्हाट्स अप के ज़रिये कश्मीर के ज़रिये जिस तरह के तथ्यों को गढ़ा जा रहा है उससे हालात बिगड़ ही रहे हैं. वही हाल शेष भारत में भी है. व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के कारण हर दूसरा आदमी कश्मीर पर राय रखता है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : चक्रव्यूह में फंसे किसानों का रचनात्मक प्रदर्शन

    प्राइम टाइम इंट्रो : चक्रव्यूह में फंसे किसानों का रचनात्मक प्रदर्शन

    किसान चक्रव्यूह में फंसे हैं. ऐसा नहीं है कि सरकारें कुछ नहीं करती हैं लेकिन उनका करना काफी नहीं है. किसानों ने जो रचनात्मकता दिखाई है उससे उनकी बेचैनी समझ में आती है. कुछ लोग निंदा भी कर रहे होंगे कि इतना अतिवाद क्यों. कई बार करुणा दिखानी चाहिए. समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों कोई मुंह में चूहा दबा रहा है, ज़मीन पर दाल-भात बिछाकर खा रहा है. वो क्या कहना चाहता है, क्या पाना चाहता है. ऐसी ही ज़िद और रचनात्मकता चाहिए किसानों को अपनी समस्या से निकलने के लिए. प्रदर्शन के लिए भी और खेती के तौर तरीके बदल देने के लिए भी....ऐसा ही ज़ोर लगाना होगा महंगी खेती के चक्र से निकलने के लिए...

  • प्राइम टाइम इंट्रो : सीबीएसई के पास सभी स्कूलों की निगरानी के लिए क्या कोई तंत्र है?

    प्राइम टाइम इंट्रो : सीबीएसई के पास सभी स्कूलों की निगरानी के लिए क्या कोई तंत्र है?

    सीबीएसई ने फिर से दोहराया है कि स्कूल किताब, नोटबुक, स्टेशनरी, यूनिफार्म नहीं बेचेंगे और बोर्ड के नियमों का पालन करेंगे. स्कूल बिजनेस नहीं है बल्कि समाज सेवा है. सभी स्कूलों से कहा गया है कि वे एनसीईआरटी या सीबीएसई की किताबों का ही इस्तेमाल करें. अभिभावकों पर अलग किताबें खरीदने का दबाव न बनाएं. इस तरह के निर्देश तो राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने भी जारी किए हैं. अब सवाल है कि जिन्हें बाध्य किया गया है अधिक दाम पर चीज़ें खरीदने के लिए, क्या उनके पैसे वापस होंगे? जिन्हें 800 की जगह 2000 के जूते खरीदने के लिए कहा गया है क्या उन्हें वापस होंगे? क्या सीबीएसई के पास सभी स्कूलों की निगरानी करने का कोई तंत्र है भी या हम सिर्फ उम्मीद करते रहते हैं?

  • प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूलों पर जनसुनवाई - हर साल क्यों बढ़ती है इतनी फीस?

    प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूलों पर जनसुनवाई - हर साल क्यों बढ़ती है इतनी फीस?

    schoolfee@ndtv.com पर हज़ारों ईमेल आए हैं. मैंने सारे तो नहीं मगर कई सौ मेल तो पढ़े ही हैं. यह तय है कि देश भर के प्राइवेट स्कूलों में इस साल 15 से 80 फ़ीसदी तक वृद्धि हुई है. हैदराबाद के एक स्कूल ने 50 फीसदी फ़ीस बढ़ा दी है. ये सब मैं ईमेल के आधार पर बता रहा हूं. क्या किसी माता-पिता की एक साल में सैलरी इतनी बढ़ती है.