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'Prime time' - 705 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • हम सुशांत सिंह राजपूत केस को महीनों के लिए प्राइम टाइम मुद्दा नहीं बना सकते: NDTV से बोले चेतन भगत

    हम सुशांत सिंह राजपूत केस को महीनों के लिए प्राइम टाइम मुद्दा नहीं बना सकते: NDTV से बोले चेतन भगत

    चेतन भगत (Chetan Bhagat) ने कहा: "हम सभी सुशांत का आदर करते थे, मैं उनसे प्यार करता था. जब 'काई पो चे' नहीं बनी थी. और  '3 इडियट्स' के बाद मेरी फिल्म शुरू नहीं हो रही थी."

  • लॉकडाउन के बगैर भी लड़ी जा सकती है कोविड से जंग, दक्षिण कोरिया का '3T' मॉडल हुआ कामयाब

    लॉकडाउन के बगैर भी लड़ी जा सकती है कोविड से जंग, दक्षिण कोरिया का '3T' मॉडल हुआ कामयाब

    एक ओर जहां अमेरिका, चीन, इटली और भारत जैसे देश कोरोना वायरस से जूझते नजर आ रहे हैं. वहीं ताइवान के बाद दक्षिण कोरिया एक ऐसा देश बन गया है जिसने बिना वैक्सीन, एंटी बॉडी और बड़े पैमाने पर लॉकडाउन के बिना ही इस बीमारी से उबरने लगा है. दक्षिण कोरिया में कई तरह की गाइडलाइन के साथ ही दफ्तर, म्यूजियम खुलने लगे हैं. सड़कों पर वैसी भीड़ तो नजर नहीं आ रही है लेकिन अब पहले जैसा सन्नाटा भी नहीं दिख रहा है. मई में ही स्कूल भी खोलने की तैयारी चल रही है. दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस के लगभग 10 हजार केस हुए हैं जिसमें 9 हजार से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं. मई के शुरुआती दिनों में सिर्फ 30 केस आए हैं. दरअसल कोरोना से लड़ने के लिए दक्षिण कोरिया ने 3 टी (3T) मॉडल का इस्तेमाल किया है. इसका मतलब है, ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट. इस मॉडल की चर्चा NDTV के रवीश कुमार ने अपने शो Prime Time में की है.

  • कैसे लड़ रहा है कोरोना से दक्षिण कोरिया, बगैर शहरों और जनजीवन को ठप्प किए

    कैसे लड़ रहा है कोरोना से दक्षिण कोरिया, बगैर शहरों और जनजीवन को ठप्प किए

    चीन में कोरोना वायरस की ख़बर आते ही दक्षिण कोरिया की चार निजी कंपनियों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैमाने के हिसाब से टेस्ट किट का निर्माण शुरू कर दिया. इस कारण समय रहते दक्षिण कोरिया के पास इतने टेस्ट किट हो गए कि एक दिन में 10,000 सैंपल की जांच की जा सकती थी.

  • रवीश कुमार का ब्‍लॉग : फ़ेस आइडेंटिफिकेशन सॉफ़्टवेयर और सवाल

    रवीश कुमार का ब्‍लॉग : फ़ेस आइडेंटिफिकेशन सॉफ़्टवेयर और सवाल

    फ़ेस आइडेंटिफिकेशन सॉफ्टवेयर, लोकसभा में दिल्ली दंगों पर चर्चा का जवाब देते हुए जब गृहमंत्री अमित शाह ने इसका नाम लिया तो कुछ सदस्य सन्न रह गए. उनसे ज्यादा सन्न हो गए इस टेक्नॉलजी की जानकारी रखने वाले लोग. चीन को छोड़ कर दुनिया भर में इस टेक्नॉलजी को लेकर एक राय नहीं है.

  • कोरोना दुनिया भर की सरकारों के सामने चुनौती

    कोरोना दुनिया भर की सरकारों के सामने चुनौती

    क्या दुनिया कुछ दिनो के लिए ठप्प होने के कगार पर पहुंच गई है? क्या दुनिया के कई देशों को क्वारेंटाइन करने की नौबत आ सकती है? विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को पैनेडेमिक घोषित कर दिया है. दिल्ली में इसे महामारी घोषित किया गया है और 31 मार्च तक के लिए सारे सिनेमा घर बंद कर दिए गए हैं. जहां इम्तहान खत्म हो चुके हैं उन स्कूलों के बंद कर दिए जाने के आदेश दे दिए गए हैं.

  • दिल्ली की हिंसा पर लोकसभा में कितनी संवेदनशील चर्चा?

    दिल्ली की हिंसा पर लोकसभा में कितनी संवेदनशील चर्चा?

    जिस दिल्ली दंगे में 50 से अधिक लोग मारे गए और 500 से अधिक घायल हो गए, क्या आप नहीं जानना चाहेंगे कि जब इस पर लोकसभा में चर्चा हुई तो सदन में क्या बात हुई, विपक्ष के नेताओं ने क्या तैयारी की थी और सरकार की तरफ से गृहमंत्री और बीजेपी के सांसदों ने क्या कहा. आप भी लोकसभा की वेबसाइट पर सभी के भाषणों को पूरा पढ़ सकते हैं क्योंकि वहां शब्दश: होता है.

  • अदालतों पर भरोसे की बहाली का फ़ैसला...

    अदालतों पर भरोसे की बहाली का फ़ैसला...

    इलाहाबाद हाइकोर्ट में दो जजों की बेंच ने जो फैसला सुनाया है वो कम महत्वपूर्ण नहीं है. ऐसा फैसला बता रहा है कि कुछ बचा है कि अदालतों के भरोसे ही वरना अब सरकार अपने उन फैसलों के लिए भी शर्मिंदा नहीं होती जो संवैधानिक मूल्यों और मर्यादाओं के खिलाफ़ पाई जाती हैं. पहले मामला समझिए. लखनऊ की सड़कों पर 50 लोगों की तस्वीरें उनकी निजी जानकारी के साथ बैनर पर लगा दी गईं.

  • अब यस बैंक के खाताधारकों पर संकट का साया

    अब यस बैंक के खाताधारकों पर संकट का साया

    सिर्फ इतना कह देने से कि खाताधारकों को परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, यस बैंक के खाताधारकों को यकीन नहीं हुआ. सुबह हुई तो कई शहरों में यस बैंक के ब्रांच के बाहर खाताधारकों की भीड़ लग गई. प्राइवेट सेक्टर का यह चौथा बड़ा बैंक है. इस बैंक ने दो लाख करोड़ लोन दिए हैं जिसका बड़ा हिस्सा डूब रहा है, जो शायद वापस न आए.

  • पहले दंगों से जूझे अब चुनौतियों से जूझ रहे हैं

    पहले दंगों से जूझे अब चुनौतियों से जूझ रहे हैं

    दिल्ली दंगों की बहसें बड़ी होने लगी हैं. इन बहसों के लिए खलनायक चुन लिए गए हैं ताकि आराम कुर्सी पर बैठे प्रवक्ताओं के भाषण में जोश आ सके. धीरे-धीरे अब चैनलों से मरने वालों की संख्या भी हटती जा रही है, लेकिन उनके पीछे परिवार वाले अलग-अलग चुनौतियों से जूझ रहे हैं.

  • कोरोना वायरस को लेकर एहतियात बढ़ी

    कोरोना वायरस को लेकर एहतियात बढ़ी

    फरवरी के पहले हफ्ते तक केरल में कोरोना वायरस के तीन मामले सामने आए थे. उसके बाद से केरल में कोई नया मामला सामने नहीं आया है लेकिन सोमवार से जैसे ही तीन मामलों की पुष्टि हुई है, दिल्ली के आस पास इस वायरस को लेकर हलचल तेज़ हो गई है. लेकिन आप जो भी देख रहे हैं वो एहतियात के तौर पर तैयारियों की तस्वीरें हैं. सतर्क रहना है उसमें बुराई नहीं है लेकिन आप सभी से अनुरोध है कि अनावश्यक अफवाहबाज़ी और चिन्ताओं से दूर भी रहें.

  • दिल्ली दंगा- बेकरी से लेकर रेडिमेड गारमेन्ट्स को निशाना बनाने की कोशिश

    दिल्ली दंगा- बेकरी से लेकर रेडिमेड  गारमेन्ट्स को निशाना बनाने की कोशिश

    उत्तर पूर्वी दिल्ली की आबादी करीब 26 लाख होनी चाहिए. 23 लाख मतदाता हैं. यहां आबादी की बसावट का पैटर्न इस तरह से नहीं है कि बहुसंख्यक एक जगह बसते हों और अल्पसंख्यकों की बसावट उससे दूर कहीं किसी एक जगह पर हो. उत्तर पूर्वी दिल्ली में एक ही गली में हिन्दू और मुसलमान दोनों हैं. ऐसा भी है कि एक गली में मुसलमान है, तो बगल की गली में हिन्दू हैं. ऐसा है कि दोनों के मोहल्ले कहीं कहीं साफ-साफ अलग-अलग हैं. कुल मिलाकर देखेंगे तो यहां की बसावट मिली जुली बसावट है.

  • दिल्ली की हिंसा पर काबू पाने में इतना समय क्यों लगा?  

    दिल्ली की हिंसा पर काबू पाने में इतना समय क्यों लगा?  

    बड़े नेता बोलने लगे हैं हेडलाइन अब बड़ी होने लगेगी और आम लोगों की तकलीफें छोटी होने लग जाएंगी. उनके बयानों से जगह भर जाएगी और जिनकी दुकानें जली हैं, घर वाले मारे गए हैं और जो अस्पताल के बिस्तर पर ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे हैं उनके लिए जगह कम बचेगी.

  • दिल्‍ली में इस हिंसा को क्‍यों बढ़ने दिया गया?

    दिल्‍ली में इस हिंसा को क्‍यों बढ़ने दिया गया?

    मंगलवार को दिल्ली शांत नहीं हो सकी है. जैसे ही लगता है कि हालात सामान्य हो रहे हैं, कहीं और से हिंसा और घायलों की खबरें आने लगती हैं. इस हिंसा को नहीं रोक पाने के लिए कौन ज़िम्मेदार है. यह सवाल गृहमंत्री अमित शाह से शुरू होता है, फिर पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक पर जाता है फिर उप राज्यपाल और फिर मौके पर तैनात पुलिस पर पहुंचते ही दोनों पक्षों में बंट जाता है, जो अपना संतुलन खो चुके हैं और पथराव से लेकर गोलीबारी पर उतर आए हैं.

  • ट्रंप का भारत दौरा और दिल्ली में ये हिंसा!

    ट्रंप का भारत दौरा और दिल्ली में ये हिंसा!

    ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक हाईप्रोफाल राष्ट्रीय मेहमान भारत आया हो और भारत की राजधानी दिल्ली में दंगे हो रहे हों. ये और बात है कि इस हिंसा की प्रशासनिक ज़िम्मेदारी अब के मीडिया समाज में किसी की नहीं होती है, फिर भी ये बात दुखद तो है ही कि हम किस तरह की राजधानी दुनिया के सामने पेश करना चाहते हैं.

  • राजद्रोह जैसा आरोप लगाना कुछ ज्यादा नहीं है?

    राजद्रोह जैसा आरोप लगाना कुछ ज्यादा नहीं है?

    एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूं. यह कहानी आपको याद दिलाएगी कि हम कहां से कहां आ गए हैं. यह हालत हो गई है कि उस मुल्क का नाम सुनते ही इस मुल्क के होश उड़ने लगे हैं. जो अधिकारी अपना काम शायद ही कभी ठीक से कर पाते हों वो तुरंत केस दर्ज कर हीरो बन जाते हैं. राजद्रोह ही लगता है इस वक्त का सबसे प्रचलित अपराध है. पब्लिक लड़की के घर भी चली जाती है और पत्थर मारने लगती है. हम बंगलूरू की अमूल्या को लेकर ही बात करना चाहते हैं.

  • क्या कोरोना वायरस से लड़ने के लिए दुनिया और भारत सक्षम हैं?

    क्या कोरोना वायरस से लड़ने के लिए दुनिया और भारत सक्षम हैं?

    न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि उनका विश्लेषण बताता है कि कोरोना वायरस के कारण चीन में करीब 15 करोड़ की आबादी सरकारी पाबंदी में है कि वे अपने घरों से कितने दिनों में और कितनी देर के लिए घर से बाहर निकल सकते हैं. घर से बाहर निकलने पर उनके शरीर का तापमान चेक होता है, डॉक्टर चेक कर एक प्रमाण देता है, फिर परिचय पत्र दिखाना होता है तब कोई सोसायटी से बाहर अपने पड़ोस में जा पाता है. एक समय में घर से एक ही आदमी बाहर जा सकता है. वो भी रोज़ नहीं.

  • हमारे देश में क़ानून का डर कितना बचा है?

    हमारे देश में क़ानून का डर कितना बचा है?

    जस्टिस अरुण मिश्रा ने टेलिकॉम मामले की सुनवाई के समय कह दिया कि इस देश में कोई कानून नहीं बचा है. बेहतर है इस देश में रहा ही नहीं जाए, बल्कि यह देश ही छोड़ दिया जाए. मैं विक्षुब्ध हूं. लग रहा है कि इस कोर्ट के लिए काम ही न करूं. कोर्ट की नाराज़गी इस बात को लेकर थी कि टेलिकॉम मंत्रालय के डेस्क अफसर ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी. ज़ाहिर सी बात है. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर कोई अफसर रोक लगा सकता है.

  • सरकार जब पीछे पड़ जाए तो क्या होता है?

    सरकार जब पीछे पड़ जाए तो क्या होता है?

    एक सरकार किसी के पीछे पड़ जाए तो वह क्या-क्या कर सकती है यह जानना हो तो इस वक्त एक कहानी काफी है. डॉ. कफ़ील ख़ान की कहानी. सोमवार को अलीगढ़ के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ज़मानत देते हैं लेकिन उन्हें 72 घंटे तक रिहा नहीं किया जाता है. 72 घंटे बाद यूपी की पुलिस को ख्याल आता है और वह डॉ. कफील ख़ान पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा देती है जिसके तहत 1 साल तक जेल में रखा जा सकता है.

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