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Prime time intro


'Prime time intro' - 349 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • क्या है राफेल सौदे का सच?

    क्या है राफेल सौदे का सच?

    फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे राफेल मामले में तूफान मच सकता है. फ्रांस की मीडिया में ओलांद का यह बयान काफी सनसनी फैला चुका है. वहां के पत्रकार फ्रांस्वा ओलंद के इस बयान को खूब ट्वीट कर रहे हैं. यह एक ऐसा बयान है जो राफेल मामले में सरकार को नए सिरे से कटघरे में खड़ा करती है. आपको याद होगा कि जब अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस की यात्रा पर गए थे तब फ्रांस्वा ओलांद ही राष्ट्रपति थे. उन्हीं के साथ राफेल विमान का करार हुआ था.

  • सरकारी नौकरियों में ज्वाइनिंग में देरी क्यों?

    सरकारी नौकरियों में ज्वाइनिंग में देरी क्यों?

    मुझे पता है कि आज भी नेताओं ने बड़े-बड़े बयान दिए हैं. बहस के गरमा गरम मुद्दे दिए हैं. लेकिन मैं आज आपको सुमित के बारे में बताना चाहता हूं. इसलिए बता रहा हूं ताकि आप यह समझ सकें कि इस मुद्दे को क्यों देश की प्राथमिकता सूची में पहले नंबर पर लाना ज़रूरी है. सुमित उस भारत के नौजवानों का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी संख्या करोड़ों में है. जिन्हें सियासत और सिस्टम सिर्फ उल्लू बनाती है. जिनके लिए पॉलिटिक्स में आए दिन भावुक मुद्दों को गढ़ा जाता है, ताकि ऐसे नौजवानों को बहकाया जा सके. क्योंकि सबको पता है कि जिस दिन सुमित जैसे नौजवानों को इन भावुक मुद्दों का खेल समझ आ गया उस दिन सियासी नेताओं का खेल खत्म हो जाएगा. मगर चिंता मत कीजिए. इस लड़ाई में हमेशा सियासी नेता ही जीतेंगे. उन्हें आप बदल सकते हैं, हरा नहीं सकते हैं. इसलिए सुमित जैसे नौजवानों को हार जाना पड़ता है.

  • मैनहोल में होने वाली मौतों का ज़िम्मेदार कौन?

    मैनहोल में होने वाली मौतों का ज़िम्मेदार कौन?

    सरफ़राज़, पंकज, राजा, उमेश और विशाल को आप नहीं जानते होंग. 9 सितंबर 2018 को पश्चिम दिल्ली के कैपिटल ग्रीन डीएलएफ अपार्टमेंट में इन पांचों की सीवर की सफाई करते हुए मौत हो गई. क्या आपको दिल्ली के घिटोरनी इलाके के स्वर्ण सिंह, दीपू, अनिल और बलविंदर याद हैं.

  • बैंकों का एनपीए बढ़ने के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

    बैंकों का एनपीए बढ़ने के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

    बैंकों ने जितना लोन दिया, उस लोन का जितना हिस्सा बहुत देर तक नहीं लौटता है तो वह नॉन परफार्मिंग असेट हो जाता है. जिसे एनपीए कहते हैं. एनपीए को लेकर यूपीए बनाम एनडीए हो रहा है. लेकिन जिसने इन दोनों सरकारों में लोन लिया या नहीं चुकाया, उसका तो नाम ही कहीं नहीं आ रहा है. 2015 में जब आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने भारतीय रिज़र्व बैंक से पूछा था कि लोन नहीं देने वालों के नाम बता दीजिए तो रिजर्व बैंक ने इंकार कर दिया था. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने नाम बताने के लिए कहा था. क्या यह अजीब नहीं है कि जिन लोगों ने लोन नहीं चुकाया उनका नाम राजनीतिक दल के नेता नहीं लेते हैं. न प्रधानमंत्री लेते हैं न राहुल गांधी लेते हैं न अमित शाह नाम लेते हैं. क्या यह मैच फिक्सिंग नहीं है. असली खिलाड़ी बहस से गायब है और दोनों तरफ के कोच भिड़े हुए हैं.

  • हिदायतुल्लाह नेशनल यूनिवर्सिटी के छात्र आंदोलन पर, शिक्षकों पर गंभीर आरोप

    हिदायतुल्लाह नेशनल यूनिवर्सिटी के छात्र आंदोलन पर, शिक्षकों पर गंभीर आरोप

    हिदायतुल्ला नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 1000 के छात्र इन दिनों आंदोलन कर रहे हैं. 27 अगस्त से वे एक निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं. उन सीनियरों के बदले भी जो सहते रहे और चुपचाप यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर चले गए. उनके बदले भी ये छात्र लड़ रहे हैं, ताकि उन्हें और आने वाली पीढ़ियों को अब और न झेलना पड़े.

  • भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार गिरफ़्तार

    भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार गिरफ़्तार

    जब सरकारें आपको कम्युनिस्ट बताकर गिरफ्तार करने आने लगे तो समझ लेने का वो आखिरी वक्त होता है कि अब आपकी कोई हैसियत नहीं है. जब टीवी चैनल अर्बन नक्सल और कम्युनिस्ट बताकर देश का दुश्मन टाइम बहस करने लगें तो समझ लेने का आखिरी वक्त होता है कि अब नौकरी से लेकर पढ़ाई पर बात नहीं होगी. अब आपकी बात ही नहीं होगी और जो भी होगी उस प्रोपेगैंडा के हिसाब से होगी, जिसे मैं अक्सर थीम एंड थ्योरी कहता हूं. जिसे लेकर एक तरफ विरोधी या सवाल करने वालों को कुचला जा सके और दूसरी तरफ सवाल न उठे इसका इंतज़ाम किया जा सके. थीम एंड थ्योरी के तहत तीन मूर्ति में किस किस की मूर्ति लगेगी बहुत कमज़ोर टॉपिक था. इसलिए आज एक नया टॉपिक न्यूज़ मीडिया के मार्केट में लांच हो गया है, जिसके सहारे धीरे-धीरे मीम बनकर आपके व्हाट्सऐप में आने लगेगा. आप लाठियां खाते रहें कि सरकारी नौकरी में बहाली कब होगी मगर आपके सारे रास्ते बंद हो चुके हैं.

  • सरकारी नौकरियों की भर्ती में सालों क्यों लगते हैं?

    सरकारी नौकरियों की भर्ती में सालों क्यों लगते हैं?

    हर दिन सोचता हूं कि अब नौकरी सीरीज़ बंद कर दें. क्योंकि देश भर में चयन आयोग किसी गिरोह की तरह काम कर रहे हैं. उन्होंने नौजवानों को इस कदर लूटा है कि आफ चाह कर भी सबकी कहानी नहीं दिखा सकते हैं. नौजवानों से फॉर्म भरने कई करोड़ लिए जाते हैं, मगर परीक्षा का पता ही नहीं चलता है. देश में कोई भी खबर होती है, ये नौजवान दिन रात अपनी नौकरी को लेकर ही मैसेज करते रहते हैं. मेरी नौकरी, मेरी परीक्षा का कब दिखाएंगे. परीक्षा देकर नौजवान एक साल से लेकर तीन साल तक इंतज़ार कर रहे हैं तो कई बार फॉर्म भरने के बाद चार तक परीक्षा का पता ही नहीं चलता है. यह सीरीज़ इसलिए बंद करना ज़रूरी है क्योंकि समस्या विकराल हो चुकी है. जब भी बंद करने की सोचता हूं किसी नौजवान की कहानी सुनकर कांप जाता हूं. तब लगता है कि आज एक और बार के लिए दिखा देते हैं और फिर सीरीज़ बंद नहीं कर पाता. 

  • गिरते रुपया का आम आदमी पर क्या होगा असर?

    गिरते रुपया का आम आदमी पर क्या होगा असर?

    डॉलर के मुक़ाबले रुपये की राजनीति घूम फिर कर 2013-14 आ जाती है जब यूपीए के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नकारा साबित करने के लिए रुपये की कीमत का ज़िक्र होता था. आप मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी के उस समय के ट्वीट को देखें या भाषण सुने तो रुपये के गिरते दाम को भारत के गिरते स्वाभिमान से जोड़ा करते थे. विपक्ष के नेताओं से लेकर रविशंकर और रामदेव भी कहा करते थे कि मोदी जी प्रधानमंत्री बनेंगे तो डॉलर के मुकाबले रुपया मज़बूत हो जाएगा. जब भी रुपया कमज़ोर होता है ट्‌विटर पर रविशंकर का ट्वीट चलने लगता है कि मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते ही एक डॉलर की कीमत 40 रुपये हो जाएगी यानी रुपया मज़बूत हो जाएगा. वे किस आधार पर कह रहे थे, वही बता सकते हैं अगर वे इस पर कुछ कहें. आज भारत का रुपया डॉलर के मुकाबले इतना कमज़ोर हो गया जितना कभी नहीं हुआ था. पहली बार एक डॉलर की कीमत 70 रुपये हो गई है.

  • कब मिलेगी ख़ौफ़ से आज़ादी?

    कब मिलेगी ख़ौफ़ से आज़ादी?

    15 अगस्त के आस-पास दिल्ली अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क हो ही जाती है, इसके बाद भी संसद के बिल्कुल करीब कंस्टीट्यूशन क्लब के बाहर उमर ख़ालिद पर गोली चलाने की कोशिश होती है. सुरक्षा के लिहाज़ से इस हाई अलर्ट ज़ोन में कोई पिस्टल लेकर आने की हिम्मत कैसे कर गया और फरार भी हो गया. उमर ख़ालिद कंस्टीट्यूशन क्लब के बाहर चाय की दुकान से पेप्सी पीकर लौट रहे थे कि पीछे से हमला होता है. उन्हें मुक्का मार कर गिरा दिया, लेकिन उमर ने उसका हाथ पकड़ लिया जिसके हाथ में पिस्तौल थी. ढाई बजे से वहां 'ख़ौफ़ से आज़ादी' नाम का कार्यक्रम होने वाला था, उसी के लिए उमर ख़ालिद समय से पहले पहुंच कर चाय पी रहे थे. तभी वहां कोई शख्स आया जो सफेद शर्ट में था और उमर ख़ालिद को धक्का देने लगा.

  • क्या नियमों को तोड़कर राफेल डील में बदलाव?

    क्या नियमों को तोड़कर राफेल डील में बदलाव?

    क्या राफेल लड़ाकू विमान की खरीद में घोटाला हुआ है, इस बारे में आज यशवंत सिन्हा, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी ने प्रेस कांफ्रेंस की. इनकी मांग है कि सरकार सभी सवालों के जवाब दे, विपक्ष इन सवालों को ठीक से उठाए और मीडिया उन तथ्यों को उजागर करने का प्रयास करे, जिन्हें सरकार छिपाना चाहती है. प्रशांत भूषण ने प्रेस रिलीज में लिखा है कि सरकार दोस्ताना मीडिया के ज़रिए भ्रम फैला रही है. आइये पहले जल्दी से इसकी कहानी कैसे शुरू होती है उस पर नज़र डालते हैं. राफेल लड़ाकू विमान फ्रांस की कंपनी डास्सों एविएशन बनाती है. 2007 से भारत इसे ख़रीदने का सपना देख रहा है. उस साल भारतीय वायुसेना ने सरकार को अपनी ज़रूरत बताई थी और यूपीए सरकार ने रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोज़ल तैयार किया था कि वह 167 मीडियम मल्टी रोल कंबैट एयरक्राफ्ट खरीदेगा. इसमें साफ साफ कहा गया था कि जो भी टेंडर जारी होगा उसमें यह बात शामिल होगी कि शुरुआती ख़रीद की लागत क्या होगी, विमान कंपनी भारत को टेक्नॉलजी देगी और भारत में उत्पादन के लाइसेंस देगी.

  • तमिलनाडु की राजनीति के एक युग का अंत

    तमिलनाडु की राजनीति के एक युग का अंत

    तमिलनाडु की राजनीति का आज दूसरा युग समाप्त हो गया. डीएमके नेता एम करुणानिधि का देहांत हो गया. 94 साल के करुणानिधि 28 जुलाई से अस्पताल में भर्ती थे. तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि का लंबा दौर चला है. 5 दिसंबर 2016 को जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति अनिश्चतता से गुज़र रही थी. 5 बार मुख्यमंत्री रहे एम करुणानिधि के निधन ने राज्य की राजनीति का मैदान खुला छोड़ दिया है. जयललिता और करुणानिधि की राजनीति सिर्फ प्रतिस्पर्धा की राजनीति नहीं थी, दोनों ने विचारधारा के स्तर पर कई रेखाएं खीचीं हैं. आज स्क्रीन पर आप भले ही करुणानिधि के उदास और टूटे हुए समर्थकों को देख रहे हैं मगर इस शख्स ने तमिलनाडु का ग़ज़ब का इतिहास लिखा है. आप जानते है कि डीएमके की स्थापना अन्ना दुरई ने की थी. इस पार्टी में नौजवान नेता के रूप में एम करुणानिधि आए थे. इससे पहले वे पत्रकारिता में थे.

  • मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में नीतीश सरकार सोती क्यों रही?

    मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में नीतीश सरकार सोती क्यों रही?

    दिल्ली को अब पता चला है, वैसे पूरा नहीं पता चला है, सुप्रीम कोर्ट को भी पता चल गया है और अदालत ने मामले का संज्ञान ले लिया है. बिहार के एक बालिका गृह के भीतर 44 में से 34 बच्चियों के साथ बलात्कार की पुष्टि की ख़बर को सिस्टम कैसे पचा सकता है और समाज कैसे डकार लेकर चुप रह सकता है इसे समझने के लिए नेता, नौकरशाही, न्यायपालिका और जाति के आधार पर गोलबंद ताकतवर लोगों के झुंड के भीतर झांक कर देखना होगा. बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग के कहने पर ही मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस ने राज्य के कई सुधार गृहों का जायज़ा लिया और 27 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट सौंप दी. 110 पेज की रिपोर्ट एक दो घंटे में पढ़ी जा सकती है मगर समाज कल्याण विभाग एक महीने तक हरकत में नहीं आया.

  • टूटी सड़कों पर हादसों का ज़िम्मेदार कौन? 

    टूटी सड़कों पर हादसों का ज़िम्मेदार कौन? 

    पिछले दो दिनों से यूपी के बरेली के हाफिज़गंज कस्बे से लोग दनादन मैसेज कर रहे हैं कि हमारे इलाके की सड़क बेहद ख़राब है. हमारा कारोबार, जीवन सब कुछ तबाह हो गया है. नेशनल मीडिया यह सवाल क्यों नहीं उठाता है. बरेली के कुछ नौजवानों ने लिखा है कि यह गांव मेन हाईवे पीलीभीत बाईपास पर स्थित है. हमारे कस्बे की मेन रोड जिसकी तस्वीर हम अटैच कर रहे हैं, आप देख लीजिए. जून 2018 में विधायक जी ने रोड पास करवा कर शिलान्यास भी करवा दिया मगर फोटो देख लीजिए. कांवड़ियों के आने जाने का मार्ग भी यही है. पीलीभीत, नवाबगंज, खटीमा और टनकपुर के कांवड़िये इसी मार्ग से गुज़रते हैं. सर, शिव भक्त गंदे पानी और कीचड़ में से गुज़रते हैं. देखकर बुरा लगता है, पर हम जनता क्या कर सकते हैं. स्कूल के बच्चे रोज़ साफ सुथरे कपड़े पहनकर आते हैं लेकिन बेचारे रोज़ गंदे पानी से गुज़रते हैं, गिर जाते हैं और चोट लग जाती है.

  • विधायक की बुद्धिजीवियों को धमकी...

    विधायक की बुद्धिजीवियों को धमकी...

    अगर आप पढ़ते लिखते हैं, सोचते विचारते हैं या आपके परिवार में कोई नौजवान पढ़ता लिखता है, दुनिया को देखने समझने के लिए अलग-अलग किताबें पढ़ता है, जिसे आस पास के लोग इंटेलेक्चुअल कहते हैं, तो थोड़ी सावधानी बरतने में कोई हर्ज नहीं है. कभी भी खुद को इंटेलेक्चुअल न कहें वर्ना अब ऐसा नेता हो गए हैं जिन्हें इंटेलेक्चुअल को गोली से मरवा देने का शौक चढ़ गया है. चुने हुए प्रतिनिधि बेलगाम होते जा रहे हैं. किसी को भी गोली मार देने की बात ऐसे कह रहे हैं जैसे कोई बादशाही हुक्म जारी किया जा रहा हो. कभी सेना को तो कभी आस्था को ढाल बनाकर ऐसी बातें कही जा रही हैं. हम ये कैसा भारत बना रहे हैं जहां विधायक बल्कि बीजेपी के विधायक कहते है कि मैं अगर गृहमंत्री होता तो सेना के ख़िलाफ बोलने वाले इंटेलेक्चुअल को गोली से उड़वा देता. क्या उन्हें नहीं पता कि सेना से रिटायर होने के बाद जनरल से लेकर ब्रिगेडियर और कर्नल तक सेना पर सवाल उठाते रहे हैं. ये कब से हो गया कि ऐसा करने पर गोली से उड़वा दिया जाएगा.

  • महिलाओं के खिलाफ अपराध घट क्यों नहीं रहे?

    महिलाओं के खिलाफ अपराध घट क्यों नहीं रहे?

    दिल्ली के साकेत कोर्ट में एक महिला वकील के साथ बलात्कार का मामला सामने आया है. आरोपी वकील ही है और घटना कोर्ट परिसर में हुई है. वकील गिरफ्तार है और उसका चेंबर सील है. मैं इसका ज़िक्र इसलिए नहीं कर रहा क्योंकि किसी रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित जगह बताया गया है. मैं इसलिए भी नहीं कर रहा कि कुछ लोग अपनी भड़ास निकालने आ जाएं कि इन सबको चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए. दरअसल मैं इसीलिए कह रहा हूं, क्योंकि फांसी-फांसी करके हमने हासिल कुछ नहीं किया. कई राज्यों ने फांसी की सज़ा जोड़ दी मगर हमारे समाज में औरतों के प्रति क्रूरता का अंत नहीं हुआ. अंत छोड़िए, लगता नहीं कि ऐसी घटनाएं कम हो रही हैं. आए दिन ऐसी घटना ज़रूर हो जाती हैं जो पिछली घटना से ज़्यादा क्रूर होती है.

  • शिक्षामित्रों की समस्या का समाधान कैसे निकले?

    शिक्षामित्रों की समस्या का समाधान कैसे निकले?

    यह कहानी सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, हर प्रदेश में ऐसी कहानी होगी जहां कर्मचारी कई साल तक सरकार के अलग-अलग विभागों में काम करने के बाद बाहर फेंक दिए जाते हैं. 10 साल, 20 साल सरकार के यहां नौकरी करने के बाद बाहर फेंक दिए गए ये लोग सचिवालयों और ज़िलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरना देते हुए नज़र आते हैं. ऐसा नहीं है कि ये अदालतों से नहीं जीतते, जीतने के बाद भी इनकी नियुक्ति नहीं होती है और अगर हार गए तो कोर्ट के फैसले का बहाना बनाकर हमेशा के लिए इनकी सुनवाई बंद कर दी जाती है.

  • शिक्षा व्यवस्था को लेकर कितने गंभीर हैं हम?  

    शिक्षा व्यवस्था को लेकर कितने गंभीर हैं हम?  

    कई बार हमें लगता है कि किसी विश्वविद्यालय की समस्या इसलिए है क्योंकि वहां स्वायत्तता नहीं है इसलिए उसे स्वायत्तता दे दी जाए. जब भी उच्च शिक्षा की समस्याओं पर बात होती है, ऑटोनमी यानी स्वायत्तता को एंटी बायेटिक टैबलेट के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन आप किसी भी विश्वविद्यालय को देखिए, चाहे वो प्राइवेट हो या पब्लिक यानी सरकारी क्या वहां सरकार या राजनीतिक प्रभाव से स्वायत्त होने की स्वतंत्रता है. सरकार ही क्यों हस्तक्षेप करती है, वो हस्तक्षेप करना बंद कर दे. कभी आपने सुना है कि वाइस चांसलर की नियुक्ति की प्रक्रिया बेहतर की जाएगी, उनका चयन राजनीतिक तौर पर नहीं होगा.

  • रेलवे में दस लाख नौकरियों का दावा कब पूरा होगा ?

    रेलवे में दस लाख नौकरियों का दावा कब पूरा होगा ?

    भारत का नौजवान जिन सवालों पर नेताओं को बोलते सुनना चाहता है, नेता पूरी कोशिश में लगे हैं कि उन सवालों पर न बोला जाए. टीवी के ज़रिए सवालों से देश को बहकाकर वहां ले जाया जा रहा है जहां उस बहस का कोई मतलब नहीं मगर उस बहस में चंद मिनटों का रोमांच ज़रूर है. लम्हों को धोखा देकर पीढ़ियों को बर्बाद किया जा रहा है. अच्छी बात यही है कि भारत के नौजवानों ने भी कसम खा ली है कि राजनीति के इस खेल को नहीं समझना है वरना इंदौर की डॉक्टर स्मृति लहरपुरे ने फीस के जिस दबाव में आत्महत्या की है, उस सवाल पर नेताओं को फर्क भले न पड़े, नौजवानों का सर शर्म से झुक जाना चाहिए था. अच्छी बात है कि कुछ मेडिकल संस्थानों के छात्रों ने स्मृति लहरपुरे के समर्थन में प्रदर्शन किया है. देश के ढाई करोड़ नौजवान 31 मार्च से इंतज़ार कर रहे हैं कि रेलवे के ग्रुप-डी और ग्रुप-सी की जो परीक्षा का फॉर्म भरा था वो परीक्षा कब होगी.

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