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Prime time intro


'Prime time intro' - 365 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • रफाल का एक और सच हुआ बाहर

    रफाल का एक और सच हुआ बाहर

    इस नोटिंग में रक्षा सचिव इस बात पर एतराज़ ज़ाहिर करते हैं कि अगर प्रधानमंत्री कार्यालय को भरोसा नहीं है तो वह डील के लिए अपनी कोई नई व्यवस्था बना ले. जाहिर है जो कमेटी कई साल से काम कर रही है, अचानक उसे बताए बगैर या भंग किए बगैर प्रधानमंत्री कार्यालय सक्रिय हो जाए तो किसी को भी बुरा लगेगा.

  • सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के फैसले पर सवाल

    सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के फैसले पर सवाल

    जजों को नियुक्त करने वाली सुप्रीम कोर्ट की संस्था कॉलेजियम के फैसले को लेकर विवाद हो गया है. कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के पांच जज होते हैं. इस कॉलेजियम ने 12 दिसंबर की बैठक में तय किया कि दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेंद मेनन और राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग का प्रमोशन सुप्रीम कोर्ट में होगा. मगर उस बैठक के बाद सरकार को बैठक का फैसला ही नहीं भेजा गया.

  • शिक्षा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में क्यों नहीं?

    शिक्षा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में क्यों नहीं?

    सरकारी स्कूलों और कालेजों में शिक्षा की हालत ऐसी है कि जरा सा सुधार होने पर भी हम उसे बदलाव के रूप में देखने लगते हैं. सरकारी स्कूलों में लाखों की संख्या में शिक्षक नहीं हैं. जो हैं उनमें से भी बहुत पढ़ाने के योग्य नहीं हैं या प्रशिक्षित नहीं हैं.

  • लड़कियों को लेकर समाज में इतनी हिंसा क्यों?

    लड़कियों को लेकर समाज में इतनी हिंसा क्यों?

    बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ. यह नारा आपको अब हर टैम्पो ट्रक के पीछे दिख जाता है. अक्सर इस नारे में हमारा ज़ोर बेटियों के पढ़ाने पर होता है लेकिन ज़ोर होना चाहिए पहली लाइन पर. बेटी बचाओ पर. किससे बचाओ और क्यों बचाओ. क्या यह नारा इसलिए नहीं है कि हमारा समाज बेटियों को गर्भ में मारने वाला रहा है और गर्भ से बेटियां बाहर भी आ गईं तो सड़कों पर जला कर मार देता है या बलात्कार से मार देता है

  • रोजगार के मुद्दे पर हमारी सरकारें कितनी गंभीर?

    रोजगार के मुद्दे पर हमारी सरकारें कितनी गंभीर?

    नौजवानों का सबसे बड़ा इम्तिहान यह है कि वे नौकरी को लेकर किए जा रहे किसी भी वादे और बहस को लेकर भावुक न हों. न तो कांग्रेस की तरफ से भावुक हों न बीजेपी की तरफ से. आपने नौकरी सीरीज़ के दौरान देखा है कि किस तरह देश के कई राज्यों में चयन आयोगों ने नौजवानों को अपमानित और प्रताड़ित किया है.

  • इंसाफ का लंबा इंतजार क्या सजा नहीं? पुणे का मोहसिन शेख हत्याकांड याद कीजिए

    इंसाफ का लंबा इंतजार क्या सजा नहीं? पुणे का मोहसिन शेख हत्याकांड याद कीजिए

    क्या वाकई हम इंसाफ़ की बात करते हैं या इंसाफ के नाम पर कांग्रेस बनाम बीजेपी करते हैं. दंगों और नरसंहारों के इंसाफ की बात जब भी आती है वह वहां भी पहुंचती है जहां इसकी बात नहीं होती है. उसकी आवाज़ पुणे में भी गूंज रही है और अलवर में भी और बुलंदशहर में भी.

  • वक्त कमलनाथ का और धीरज सिंधिया के हिस्से में

    वक्त कमलनाथ का और धीरज सिंधिया के हिस्से में

    आज जो भी हुआ उसे बैठक नहीं, उठक-बैठक कहा जाना चाहिए. कांग्रेस को तीन मुख्यमंत्री चुनने में तीन दिन लग गए. लीजिए अब देखिए. अचानक आठ बजे के बाद राहुल ट्वीट करते हैं और लियो टॉल्सटॉय को बीच में ले आते हैं. मगर ट्वीट में खुद बीच में दिख रहे हैं और एक तरफ सिंधिया और एक तरफ कमलनाथ दिख रहे हैं. लिखा है कि धीरज और वक्त दो शक्तिशाली लड़ाके हैं.

  • शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाने की क्या रही वजह?

    शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाने की क्या रही वजह?

    शक्तिकांत दास 2015-17 के दौरान आर्थिक मामलों के सचिव थे और उन्हीं के कार्यकाल में नोटबंदी लागू हुई थी. नवंबर से दिसंबर 2016 के बीच करीब-करीब हर दिन शक्तिकांत दास की प्रेस कॉन्फ्रेंस होती थी और वे नोटबंदी के लागू किए जाने को लेकर नए-नए नियम बनाते थे. सूचना देते थे. जब जनता नोट बदलने को लेकर समस्याओं से घिरी थी तब वे नए-नए आइडिया लेकर आते थे.

  • बुलंदशहर में क्या जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की साजिश की गई?

    बुलंदशहर में क्या जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की साजिश की गई?

    पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या से संबंधित एफआईआर में 27 लोगों के नाम हैं, 50-60 लोग अज्ञात बताए गए हैं मगर गिरफ्तारी चार की हुई है. यानी 87 नाम, अनाम लोगों में से मात्र 4 गिरफ्तार हुए हैं. मुख्य आरोपी भी गिरफ्तार नहीं हुआ है.

  • नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति अभी तक क्यों नहीं बनी?

    नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति अभी तक क्यों नहीं बनी?

    चुनावी भाषणों और चर्चाओं में शिक्षा को जगह क्यों नहीं मिलती है? जिस मुद्दे से ज़्यादातर नौजवानों की ज़िंदगी प्रभावित होती है, वह किसी सरकार के मूल्यांकन का आधार क्यों नहीं बनता है. आज इंजीनियरिंग की पढ़ाई चरमरा गई है. 2017 में एक ख़बर पढ़ी थी कि भारत में 800 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो गए हैं. 8 अप्रैल को टाइम्स ऑफ इंडिया में मानस प्रतिम ने लिखा था कि AICTE से 200 इंजीनियरिंग कॉलेजों ने बंद होने की अनुमति मांगी है. यही नहीं हर साल 50 फीसदी से अधिक सीटें खाली रह जा रही हैं.

  • राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकारों, पारा शिक्षकों की पिटाई...

    राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकारों, पारा शिक्षकों की पिटाई...

    आज कल हर दिन कोई न कोई दिवस यानी डे आ जाता है. एक डे जाता नहीं कि दूसरा डे आ जाता है. हर डे की अपनी प्रतिज्ञा होती है और न भूलने की कसमें होती हैं, मगर ये उसी दिन तक के लिए वैलिड होती है. अगले दिन दूसरा डे आता है, पोस्टर बैनर सब बदल जाता है. नए सिरे से प्रतिज्ञा लेनी पड़ती है कि हम इनके आदर्शों को नहीं भूलेंगे. भूल जाते हैं कि पिछले दिन ऐसी ही एक प्रतिज्ञा ले चुके हैं.

  • भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता में दखल क्यों?

    भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता में दखल क्यों?

    जब स्वदेशी जागरण मंच भारतीय रिजर्व बैंक को सलाह देने लगे कि उसे क्या करना है तो इसका मतलब यही है कि भारत में ईज ऑफ डूइंग वाकई अच्छा हो गया है. नोटबंदी के समय नोटों की गिनती में जो लंबा वक्त लगा, रिज़र्व बैंक ने सामान्य रिपोर्ट में नोटबंदी पर दो चार लाइन लिख दी, तब किसी को नहीं लगा कि उर्जित पटेल को इस्तीफा दे देना चाहिए. बल्कि तब रिजर्व बैंक को भी नहीं लगा कि सरकार हस्तक्षेप कर रही है. उसकी स्वायत्तता पर हमला हो रहा है. सबको उर्जित पटेल अर्जित पटेल लग रहे थे. अब उर्जित पटेल का इस्तीफा भी मांगा जा रहा है और उनके भी इस्तीफा देने की ख़बर आ रही है. 

  • क्या हम पटेल के विचारों की ऊंचाई भी छू पाएंगे?

    क्या हम पटेल के विचारों की ऊंचाई भी छू पाएंगे?

    आज सरदार का दिन है. जन्मदिन है. हम सबके सरदार दुनिया में सबसे ऊंचे हो गए हैं. जन्मदिन पर सरदार को एक नई सोहबत मिली है. दुनिया की ऊंची प्रतिमाओं की सोहबत मिली है. अब उनकी तुलना जिन प्रतिमाओं से होगी उनमें उनकी प्रतिमा नहीं है, जिनके साथ और जिनके पीछे सरदार सरदार बने रहे. मतलब सरदार गांधी और नेहरू से अलग इन प्रतिमाओं की सोहबत में भी खूब चमक रहे हैं. फकत 3000 करोड़ से ही सरदार पटेल की प्रतिमा दुनिया में सबसे ऊंची हो गई. 3000 करोड़ सुनकर अफसोस न करें. सोचें कि आपने स्कूल कॉलेज या अस्पताल के लिए कब संघर्ष किया. कब लाइब्रेरी की मांग की.

  • क्या एमजे अकबर इस्तीफ़ा ना देने पर अड़ गए हैं?

    क्या एमजे अकबर इस्तीफ़ा ना देने पर अड़ गए हैं?

    विदेश राज्य मंत्री मुबशिर जावेद अकबर ने पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया है. वकालतनामे में 97 वकीलों का नाम देखने के बाद भी दो महिलाएं और सामने आईं हैं. स्वाति गौतम ने क्विंट में और तुसीता पटेल ने स्क्रॉल डॉट इन में अकबर के साथ अपने अनुभव को लिखा है. उम्मीद थी कि कानूनी कार्रवाई के बाद अकबर को लेकर महिलाओं के लेख आने बंद हो जाएंगे, मगर ऐसा नहीं हुआ. लग रहा था अब जिन्हें लिखना था उन्होंने लिख लिया है. बाकी नहीं लिखेंगी. एक दिन में दो महिलाओं के लेख आने के बाद कहा नहीं जा सकता है कि कल कोई लेख नहीं आएगा. कल कोई प्रसंग नहीं आएगा.

  • एमजे अकबर पर सरकार की चुप्पी पर सवाल

    एमजे अकबर पर सरकार की चुप्पी पर सवाल

    विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर कथित रूप से लगे आरोपों को लेकर मीडिया में खासकर हिन्दी के अखबारों में कैसी रिपोर्टिंग हो रही है, यह देखना दिलचस्प होगा. कहीं पर भी आरोप लगाने वाली महिलाओं की बातें विस्तार से नहीं हैं. जहां प्रमुखता से छपी हैं वहां भी और कई जगह तो खबर ऐसे छपी है जैसे यूं ही किसी ने राह चलते आरोप लगा दी हो. आप हैरान हो जाएंगे कि कुछ हिन्दी अखबारों में दस बीस लाइन की खबर भी ठीक से नहीं छपी है. विदेश राज्य मंत्री पर 9 महिला पत्रकारों ने आरोप लगाए हों, पूरी सरकार चुप हो गई हो और हिन्दी अखबारों से इस खबर को करीब करीब गायब कर दिया जाए यह कितना दुखद है. एक अखबार के कई संस्करण होते हैं. हार्ड कापी होती है, ई संस्करण होते हैं, वेबसाइट होती है. भोपाल से अनुराग द्वारी ने बताया कि 10 अक्तूबर को हिन्दी के दो बड़े अखबारों की हार्ड कापी में अकबर की खबर नहीं है. इनके लाखों पाठकों को पता ही नहीं चला होगा, जबकि यह ख़बर पत्रिका और भास्कर में है. 

  • #MeToo की चिंगारी भड़की, कई जगह असर

    #MeToo की चिंगारी भड़की, कई जगह असर

    प्रधानमंत्री मोदी ने न तो एमजे अकबर को बर्ख़ास्त किया है और न ही एमजे अकबर ने विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा दिया है. न ही अकबर के बचाव में कोई मंत्री आया है. न ही अकबर के लिए बीजेपी का कोई प्रवक्ता सामने आया है. दरअसल किस्सा ही ऐसा सामने आया है कि उसके सामने कोई सामने नहीं आ रहा है. मुबशिर जावेद अकबर मध्यप्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं तो वहां से भी कोई सामने नहीं आया है. एमजे अकबर भी अपने बचाव में अभी तक सामने नहीं आए हैं. उनका सामने आना ज़रूरी है, क्योंकि कई महिला पत्रकारों ने ऐसे प्रसंग सुनाए जिन्हें पढ़कर उन्हें भी अच्छा नहीं लगेगा. अकबर के सामने न आने से सरकार पर भी आंच आ रही है. उम्मीद है वे जल्दी सामने आएंगे और कुछ कहेंगे. किस पत्रकार के बारे में क्या धारणा है, मेरी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन जब कुछ महिला पत्रकारों ने संदर्भ और प्रसंग के साथ ब्योरा लिखा तो लगा कि अब अकबर की बात होनी चाहिए. मैंने कोई जल्दबाज़ी नहीं की. सोमवार के दिन भी रूका कि एक दिन ठहर कर देखते हैं फिर इस पर बात करेंगे. तो अपनी तरफ से जितना चेक सिस्टम हो सकता है हमने पालन किया.

  • क्या है राफेल सौदे का सच?

    क्या है राफेल सौदे का सच?

    फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे राफेल मामले में तूफान मच सकता है. फ्रांस की मीडिया में ओलांद का यह बयान काफी सनसनी फैला चुका है. वहां के पत्रकार फ्रांस्वा ओलंद के इस बयान को खूब ट्वीट कर रहे हैं. यह एक ऐसा बयान है जो राफेल मामले में सरकार को नए सिरे से कटघरे में खड़ा करती है. आपको याद होगा कि जब अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस की यात्रा पर गए थे तब फ्रांस्वा ओलांद ही राष्ट्रपति थे. उन्हीं के साथ राफेल विमान का करार हुआ था.

  • सरकारी नौकरियों में ज्वाइनिंग में देरी क्यों?

    सरकारी नौकरियों में ज्वाइनिंग में देरी क्यों?

    मुझे पता है कि आज भी नेताओं ने बड़े-बड़े बयान दिए हैं. बहस के गरमा गरम मुद्दे दिए हैं. लेकिन मैं आज आपको सुमित के बारे में बताना चाहता हूं. इसलिए बता रहा हूं ताकि आप यह समझ सकें कि इस मुद्दे को क्यों देश की प्राथमिकता सूची में पहले नंबर पर लाना ज़रूरी है. सुमित उस भारत के नौजवानों का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी संख्या करोड़ों में है. जिन्हें सियासत और सिस्टम सिर्फ उल्लू बनाती है. जिनके लिए पॉलिटिक्स में आए दिन भावुक मुद्दों को गढ़ा जाता है, ताकि ऐसे नौजवानों को बहकाया जा सके. क्योंकि सबको पता है कि जिस दिन सुमित जैसे नौजवानों को इन भावुक मुद्दों का खेल समझ आ गया उस दिन सियासी नेताओं का खेल खत्म हो जाएगा. मगर चिंता मत कीजिए. इस लड़ाई में हमेशा सियासी नेता ही जीतेंगे. उन्हें आप बदल सकते हैं, हरा नहीं सकते हैं. इसलिए सुमित जैसे नौजवानों को हार जाना पड़ता है.

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