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Prime time intro


'Prime time intro' - 355 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकारों, पारा शिक्षकों की पिटाई...

    राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकारों, पारा शिक्षकों की पिटाई...

    आज कल हर दिन कोई न कोई दिवस यानी डे आ जाता है. एक डे जाता नहीं कि दूसरा डे आ जाता है. हर डे की अपनी प्रतिज्ञा होती है और न भूलने की कसमें होती हैं, मगर ये उसी दिन तक के लिए वैलिड होती है. अगले दिन दूसरा डे आता है, पोस्टर बैनर सब बदल जाता है. नए सिरे से प्रतिज्ञा लेनी पड़ती है कि हम इनके आदर्शों को नहीं भूलेंगे. भूल जाते हैं कि पिछले दिन ऐसी ही एक प्रतिज्ञा ले चुके हैं.

  • भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता में दखल क्यों?

    भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता में दखल क्यों?

    जब स्वदेशी जागरण मंच भारतीय रिजर्व बैंक को सलाह देने लगे कि उसे क्या करना है तो इसका मतलब यही है कि भारत में ईज ऑफ डूइंग वाकई अच्छा हो गया है. नोटबंदी के समय नोटों की गिनती में जो लंबा वक्त लगा, रिज़र्व बैंक ने सामान्य रिपोर्ट में नोटबंदी पर दो चार लाइन लिख दी, तब किसी को नहीं लगा कि उर्जित पटेल को इस्तीफा दे देना चाहिए. बल्कि तब रिजर्व बैंक को भी नहीं लगा कि सरकार हस्तक्षेप कर रही है. उसकी स्वायत्तता पर हमला हो रहा है. सबको उर्जित पटेल अर्जित पटेल लग रहे थे. अब उर्जित पटेल का इस्तीफा भी मांगा जा रहा है और उनके भी इस्तीफा देने की ख़बर आ रही है. 

  • क्या हम पटेल के विचारों की ऊंचाई भी छू पाएंगे?

    क्या हम पटेल के विचारों की ऊंचाई भी छू पाएंगे?

    आज सरदार का दिन है. जन्मदिन है. हम सबके सरदार दुनिया में सबसे ऊंचे हो गए हैं. जन्मदिन पर सरदार को एक नई सोहबत मिली है. दुनिया की ऊंची प्रतिमाओं की सोहबत मिली है. अब उनकी तुलना जिन प्रतिमाओं से होगी उनमें उनकी प्रतिमा नहीं है, जिनके साथ और जिनके पीछे सरदार सरदार बने रहे. मतलब सरदार गांधी और नेहरू से अलग इन प्रतिमाओं की सोहबत में भी खूब चमक रहे हैं. फकत 3000 करोड़ से ही सरदार पटेल की प्रतिमा दुनिया में सबसे ऊंची हो गई. 3000 करोड़ सुनकर अफसोस न करें. सोचें कि आपने स्कूल कॉलेज या अस्पताल के लिए कब संघर्ष किया. कब लाइब्रेरी की मांग की.

  • क्या एमजे अकबर इस्तीफ़ा ना देने पर अड़ गए हैं?

    क्या एमजे अकबर इस्तीफ़ा ना देने पर अड़ गए हैं?

    विदेश राज्य मंत्री मुबशिर जावेद अकबर ने पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया है. वकालतनामे में 97 वकीलों का नाम देखने के बाद भी दो महिलाएं और सामने आईं हैं. स्वाति गौतम ने क्विंट में और तुसीता पटेल ने स्क्रॉल डॉट इन में अकबर के साथ अपने अनुभव को लिखा है. उम्मीद थी कि कानूनी कार्रवाई के बाद अकबर को लेकर महिलाओं के लेख आने बंद हो जाएंगे, मगर ऐसा नहीं हुआ. लग रहा था अब जिन्हें लिखना था उन्होंने लिख लिया है. बाकी नहीं लिखेंगी. एक दिन में दो महिलाओं के लेख आने के बाद कहा नहीं जा सकता है कि कल कोई लेख नहीं आएगा. कल कोई प्रसंग नहीं आएगा.

  • एमजे अकबर पर सरकार की चुप्पी पर सवाल

    एमजे अकबर पर सरकार की चुप्पी पर सवाल

    विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर कथित रूप से लगे आरोपों को लेकर मीडिया में खासकर हिन्दी के अखबारों में कैसी रिपोर्टिंग हो रही है, यह देखना दिलचस्प होगा. कहीं पर भी आरोप लगाने वाली महिलाओं की बातें विस्तार से नहीं हैं. जहां प्रमुखता से छपी हैं वहां भी और कई जगह तो खबर ऐसे छपी है जैसे यूं ही किसी ने राह चलते आरोप लगा दी हो. आप हैरान हो जाएंगे कि कुछ हिन्दी अखबारों में दस बीस लाइन की खबर भी ठीक से नहीं छपी है. विदेश राज्य मंत्री पर 9 महिला पत्रकारों ने आरोप लगाए हों, पूरी सरकार चुप हो गई हो और हिन्दी अखबारों से इस खबर को करीब करीब गायब कर दिया जाए यह कितना दुखद है. एक अखबार के कई संस्करण होते हैं. हार्ड कापी होती है, ई संस्करण होते हैं, वेबसाइट होती है. भोपाल से अनुराग द्वारी ने बताया कि 10 अक्तूबर को हिन्दी के दो बड़े अखबारों की हार्ड कापी में अकबर की खबर नहीं है. इनके लाखों पाठकों को पता ही नहीं चला होगा, जबकि यह ख़बर पत्रिका और भास्कर में है. 

  • #MeToo की चिंगारी भड़की, कई जगह असर

    #MeToo की चिंगारी भड़की, कई जगह असर

    प्रधानमंत्री मोदी ने न तो एमजे अकबर को बर्ख़ास्त किया है और न ही एमजे अकबर ने विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा दिया है. न ही अकबर के बचाव में कोई मंत्री आया है. न ही अकबर के लिए बीजेपी का कोई प्रवक्ता सामने आया है. दरअसल किस्सा ही ऐसा सामने आया है कि उसके सामने कोई सामने नहीं आ रहा है. मुबशिर जावेद अकबर मध्यप्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं तो वहां से भी कोई सामने नहीं आया है. एमजे अकबर भी अपने बचाव में अभी तक सामने नहीं आए हैं. उनका सामने आना ज़रूरी है, क्योंकि कई महिला पत्रकारों ने ऐसे प्रसंग सुनाए जिन्हें पढ़कर उन्हें भी अच्छा नहीं लगेगा. अकबर के सामने न आने से सरकार पर भी आंच आ रही है. उम्मीद है वे जल्दी सामने आएंगे और कुछ कहेंगे. किस पत्रकार के बारे में क्या धारणा है, मेरी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन जब कुछ महिला पत्रकारों ने संदर्भ और प्रसंग के साथ ब्योरा लिखा तो लगा कि अब अकबर की बात होनी चाहिए. मैंने कोई जल्दबाज़ी नहीं की. सोमवार के दिन भी रूका कि एक दिन ठहर कर देखते हैं फिर इस पर बात करेंगे. तो अपनी तरफ से जितना चेक सिस्टम हो सकता है हमने पालन किया.

  • क्या है राफेल सौदे का सच?

    क्या है राफेल सौदे का सच?

    फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे राफेल मामले में तूफान मच सकता है. फ्रांस की मीडिया में ओलांद का यह बयान काफी सनसनी फैला चुका है. वहां के पत्रकार फ्रांस्वा ओलंद के इस बयान को खूब ट्वीट कर रहे हैं. यह एक ऐसा बयान है जो राफेल मामले में सरकार को नए सिरे से कटघरे में खड़ा करती है. आपको याद होगा कि जब अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस की यात्रा पर गए थे तब फ्रांस्वा ओलांद ही राष्ट्रपति थे. उन्हीं के साथ राफेल विमान का करार हुआ था.

  • सरकारी नौकरियों में ज्वाइनिंग में देरी क्यों?

    सरकारी नौकरियों में ज्वाइनिंग में देरी क्यों?

    मुझे पता है कि आज भी नेताओं ने बड़े-बड़े बयान दिए हैं. बहस के गरमा गरम मुद्दे दिए हैं. लेकिन मैं आज आपको सुमित के बारे में बताना चाहता हूं. इसलिए बता रहा हूं ताकि आप यह समझ सकें कि इस मुद्दे को क्यों देश की प्राथमिकता सूची में पहले नंबर पर लाना ज़रूरी है. सुमित उस भारत के नौजवानों का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी संख्या करोड़ों में है. जिन्हें सियासत और सिस्टम सिर्फ उल्लू बनाती है. जिनके लिए पॉलिटिक्स में आए दिन भावुक मुद्दों को गढ़ा जाता है, ताकि ऐसे नौजवानों को बहकाया जा सके. क्योंकि सबको पता है कि जिस दिन सुमित जैसे नौजवानों को इन भावुक मुद्दों का खेल समझ आ गया उस दिन सियासी नेताओं का खेल खत्म हो जाएगा. मगर चिंता मत कीजिए. इस लड़ाई में हमेशा सियासी नेता ही जीतेंगे. उन्हें आप बदल सकते हैं, हरा नहीं सकते हैं. इसलिए सुमित जैसे नौजवानों को हार जाना पड़ता है.

  • मैनहोल में होने वाली मौतों का ज़िम्मेदार कौन?

    मैनहोल में होने वाली मौतों का ज़िम्मेदार कौन?

    सरफ़राज़, पंकज, राजा, उमेश और विशाल को आप नहीं जानते होंग. 9 सितंबर 2018 को पश्चिम दिल्ली के कैपिटल ग्रीन डीएलएफ अपार्टमेंट में इन पांचों की सीवर की सफाई करते हुए मौत हो गई. क्या आपको दिल्ली के घिटोरनी इलाके के स्वर्ण सिंह, दीपू, अनिल और बलविंदर याद हैं.

  • बैंकों का एनपीए बढ़ने के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

    बैंकों का एनपीए बढ़ने के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

    बैंकों ने जितना लोन दिया, उस लोन का जितना हिस्सा बहुत देर तक नहीं लौटता है तो वह नॉन परफार्मिंग असेट हो जाता है. जिसे एनपीए कहते हैं. एनपीए को लेकर यूपीए बनाम एनडीए हो रहा है. लेकिन जिसने इन दोनों सरकारों में लोन लिया या नहीं चुकाया, उसका तो नाम ही कहीं नहीं आ रहा है. 2015 में जब आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने भारतीय रिज़र्व बैंक से पूछा था कि लोन नहीं देने वालों के नाम बता दीजिए तो रिजर्व बैंक ने इंकार कर दिया था. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने नाम बताने के लिए कहा था. क्या यह अजीब नहीं है कि जिन लोगों ने लोन नहीं चुकाया उनका नाम राजनीतिक दल के नेता नहीं लेते हैं. न प्रधानमंत्री लेते हैं न राहुल गांधी लेते हैं न अमित शाह नाम लेते हैं. क्या यह मैच फिक्सिंग नहीं है. असली खिलाड़ी बहस से गायब है और दोनों तरफ के कोच भिड़े हुए हैं.

  • हिदायतुल्लाह नेशनल यूनिवर्सिटी के छात्र आंदोलन पर, शिक्षकों पर गंभीर आरोप

    हिदायतुल्लाह नेशनल यूनिवर्सिटी के छात्र आंदोलन पर, शिक्षकों पर गंभीर आरोप

    हिदायतुल्ला नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 1000 के छात्र इन दिनों आंदोलन कर रहे हैं. 27 अगस्त से वे एक निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं. उन सीनियरों के बदले भी जो सहते रहे और चुपचाप यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर चले गए. उनके बदले भी ये छात्र लड़ रहे हैं, ताकि उन्हें और आने वाली पीढ़ियों को अब और न झेलना पड़े.

  • भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार गिरफ़्तार

    भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार गिरफ़्तार

    जब सरकारें आपको कम्युनिस्ट बताकर गिरफ्तार करने आने लगे तो समझ लेने का वो आखिरी वक्त होता है कि अब आपकी कोई हैसियत नहीं है. जब टीवी चैनल अर्बन नक्सल और कम्युनिस्ट बताकर देश का दुश्मन टाइम बहस करने लगें तो समझ लेने का आखिरी वक्त होता है कि अब नौकरी से लेकर पढ़ाई पर बात नहीं होगी. अब आपकी बात ही नहीं होगी और जो भी होगी उस प्रोपेगैंडा के हिसाब से होगी, जिसे मैं अक्सर थीम एंड थ्योरी कहता हूं. जिसे लेकर एक तरफ विरोधी या सवाल करने वालों को कुचला जा सके और दूसरी तरफ सवाल न उठे इसका इंतज़ाम किया जा सके. थीम एंड थ्योरी के तहत तीन मूर्ति में किस किस की मूर्ति लगेगी बहुत कमज़ोर टॉपिक था. इसलिए आज एक नया टॉपिक न्यूज़ मीडिया के मार्केट में लांच हो गया है, जिसके सहारे धीरे-धीरे मीम बनकर आपके व्हाट्सऐप में आने लगेगा. आप लाठियां खाते रहें कि सरकारी नौकरी में बहाली कब होगी मगर आपके सारे रास्ते बंद हो चुके हैं.

  • सरकारी नौकरियों की भर्ती में सालों क्यों लगते हैं?

    सरकारी नौकरियों की भर्ती में सालों क्यों लगते हैं?

    हर दिन सोचता हूं कि अब नौकरी सीरीज़ बंद कर दें. क्योंकि देश भर में चयन आयोग किसी गिरोह की तरह काम कर रहे हैं. उन्होंने नौजवानों को इस कदर लूटा है कि आफ चाह कर भी सबकी कहानी नहीं दिखा सकते हैं. नौजवानों से फॉर्म भरने कई करोड़ लिए जाते हैं, मगर परीक्षा का पता ही नहीं चलता है. देश में कोई भी खबर होती है, ये नौजवान दिन रात अपनी नौकरी को लेकर ही मैसेज करते रहते हैं. मेरी नौकरी, मेरी परीक्षा का कब दिखाएंगे. परीक्षा देकर नौजवान एक साल से लेकर तीन साल तक इंतज़ार कर रहे हैं तो कई बार फॉर्म भरने के बाद चार तक परीक्षा का पता ही नहीं चलता है. यह सीरीज़ इसलिए बंद करना ज़रूरी है क्योंकि समस्या विकराल हो चुकी है. जब भी बंद करने की सोचता हूं किसी नौजवान की कहानी सुनकर कांप जाता हूं. तब लगता है कि आज एक और बार के लिए दिखा देते हैं और फिर सीरीज़ बंद नहीं कर पाता. 

  • गिरते रुपया का आम आदमी पर क्या होगा असर?

    गिरते रुपया का आम आदमी पर क्या होगा असर?

    डॉलर के मुक़ाबले रुपये की राजनीति घूम फिर कर 2013-14 आ जाती है जब यूपीए के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नकारा साबित करने के लिए रुपये की कीमत का ज़िक्र होता था. आप मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी के उस समय के ट्वीट को देखें या भाषण सुने तो रुपये के गिरते दाम को भारत के गिरते स्वाभिमान से जोड़ा करते थे. विपक्ष के नेताओं से लेकर रविशंकर और रामदेव भी कहा करते थे कि मोदी जी प्रधानमंत्री बनेंगे तो डॉलर के मुकाबले रुपया मज़बूत हो जाएगा. जब भी रुपया कमज़ोर होता है ट्‌विटर पर रविशंकर का ट्वीट चलने लगता है कि मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते ही एक डॉलर की कीमत 40 रुपये हो जाएगी यानी रुपया मज़बूत हो जाएगा. वे किस आधार पर कह रहे थे, वही बता सकते हैं अगर वे इस पर कुछ कहें. आज भारत का रुपया डॉलर के मुकाबले इतना कमज़ोर हो गया जितना कभी नहीं हुआ था. पहली बार एक डॉलर की कीमत 70 रुपये हो गई है.

  • कब मिलेगी ख़ौफ़ से आज़ादी?

    कब मिलेगी ख़ौफ़ से आज़ादी?

    15 अगस्त के आस-पास दिल्ली अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क हो ही जाती है, इसके बाद भी संसद के बिल्कुल करीब कंस्टीट्यूशन क्लब के बाहर उमर ख़ालिद पर गोली चलाने की कोशिश होती है. सुरक्षा के लिहाज़ से इस हाई अलर्ट ज़ोन में कोई पिस्टल लेकर आने की हिम्मत कैसे कर गया और फरार भी हो गया. उमर ख़ालिद कंस्टीट्यूशन क्लब के बाहर चाय की दुकान से पेप्सी पीकर लौट रहे थे कि पीछे से हमला होता है. उन्हें मुक्का मार कर गिरा दिया, लेकिन उमर ने उसका हाथ पकड़ लिया जिसके हाथ में पिस्तौल थी. ढाई बजे से वहां 'ख़ौफ़ से आज़ादी' नाम का कार्यक्रम होने वाला था, उसी के लिए उमर ख़ालिद समय से पहले पहुंच कर चाय पी रहे थे. तभी वहां कोई शख्स आया जो सफेद शर्ट में था और उमर ख़ालिद को धक्का देने लगा.

  • क्या नियमों को तोड़कर राफेल डील में बदलाव?

    क्या नियमों को तोड़कर राफेल डील में बदलाव?

    क्या राफेल लड़ाकू विमान की खरीद में घोटाला हुआ है, इस बारे में आज यशवंत सिन्हा, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी ने प्रेस कांफ्रेंस की. इनकी मांग है कि सरकार सभी सवालों के जवाब दे, विपक्ष इन सवालों को ठीक से उठाए और मीडिया उन तथ्यों को उजागर करने का प्रयास करे, जिन्हें सरकार छिपाना चाहती है. प्रशांत भूषण ने प्रेस रिलीज में लिखा है कि सरकार दोस्ताना मीडिया के ज़रिए भ्रम फैला रही है. आइये पहले जल्दी से इसकी कहानी कैसे शुरू होती है उस पर नज़र डालते हैं. राफेल लड़ाकू विमान फ्रांस की कंपनी डास्सों एविएशन बनाती है. 2007 से भारत इसे ख़रीदने का सपना देख रहा है. उस साल भारतीय वायुसेना ने सरकार को अपनी ज़रूरत बताई थी और यूपीए सरकार ने रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोज़ल तैयार किया था कि वह 167 मीडियम मल्टी रोल कंबैट एयरक्राफ्ट खरीदेगा. इसमें साफ साफ कहा गया था कि जो भी टेंडर जारी होगा उसमें यह बात शामिल होगी कि शुरुआती ख़रीद की लागत क्या होगी, विमान कंपनी भारत को टेक्नॉलजी देगी और भारत में उत्पादन के लाइसेंस देगी.

  • तमिलनाडु की राजनीति के एक युग का अंत

    तमिलनाडु की राजनीति के एक युग का अंत

    तमिलनाडु की राजनीति का आज दूसरा युग समाप्त हो गया. डीएमके नेता एम करुणानिधि का देहांत हो गया. 94 साल के करुणानिधि 28 जुलाई से अस्पताल में भर्ती थे. तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि का लंबा दौर चला है. 5 दिसंबर 2016 को जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति अनिश्चतता से गुज़र रही थी. 5 बार मुख्यमंत्री रहे एम करुणानिधि के निधन ने राज्य की राजनीति का मैदान खुला छोड़ दिया है. जयललिता और करुणानिधि की राजनीति सिर्फ प्रतिस्पर्धा की राजनीति नहीं थी, दोनों ने विचारधारा के स्तर पर कई रेखाएं खीचीं हैं. आज स्क्रीन पर आप भले ही करुणानिधि के उदास और टूटे हुए समर्थकों को देख रहे हैं मगर इस शख्स ने तमिलनाडु का ग़ज़ब का इतिहास लिखा है. आप जानते है कि डीएमके की स्थापना अन्ना दुरई ने की थी. इस पार्टी में नौजवान नेता के रूप में एम करुणानिधि आए थे. इससे पहले वे पत्रकारिता में थे.

  • मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में नीतीश सरकार सोती क्यों रही?

    मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में नीतीश सरकार सोती क्यों रही?

    दिल्ली को अब पता चला है, वैसे पूरा नहीं पता चला है, सुप्रीम कोर्ट को भी पता चल गया है और अदालत ने मामले का संज्ञान ले लिया है. बिहार के एक बालिका गृह के भीतर 44 में से 34 बच्चियों के साथ बलात्कार की पुष्टि की ख़बर को सिस्टम कैसे पचा सकता है और समाज कैसे डकार लेकर चुप रह सकता है इसे समझने के लिए नेता, नौकरशाही, न्यायपालिका और जाति के आधार पर गोलबंद ताकतवर लोगों के झुंड के भीतर झांक कर देखना होगा. बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग के कहने पर ही मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस ने राज्य के कई सुधार गृहों का जायज़ा लिया और 27 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट सौंप दी. 110 पेज की रिपोर्ट एक दो घंटे में पढ़ी जा सकती है मगर समाज कल्याण विभाग एक महीने तक हरकत में नहीं आया.

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