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Priyadarshan


'Priyadarshan' - 147 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • तो क्या आप देश का भी नाम बदलेंगे...?

    तो क्या आप देश का भी नाम बदलेंगे...?

    विचारधाराएं अपनी आस्था के अनुसार जगहों के नाम बदलती रही हैं. कुछ व्यावहारिक और कुछ बड़ी मुश्किलों के अलावा इसमें ख़तरा बस इतना है कि सत्ता बदलने के साथ ये नाम नए सिरे से बदल दिए जा सकते हैं. उत्तर प्रदेश में यह तमाशा हमने बार-बार देखा और अब ठीक से याद भी नहीं रहता कि किस पुराने शहर को किस नए नाम से पुकारा जाए.

  • संवैधानिक संस्थाओं की साख बची रहने दें जेटली जी 

    संवैधानिक संस्थाओं की साख बची रहने दें जेटली जी 

    यह 2015 का साल था जब वित्त मंत्री अरुण जेटली राज्यसभा की भूमिका पर सवाल खड़े कर रहे थे. उनका कहना था कि जनता की चुनी हुई लोकसभा के पारित विधेयकों पर राज्यसभा को सवाल उठाने का हक़ नहीं है. तब लोकसभा के स्पीकर रहे सोमनाथ चटर्जी ने भी इसकी आलोचना की थी और कांग्रेस सांसद मधुसूदन मिस्त्री ने जेटली के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश किया था. दिलचस्प यह है कि अरुण जेटली तब यह बात कह रहे थे जब वे ख़ुद लोकसभा चुनाव हारकर राज्यसभा की मार्फ़त संसद में आए और मंत्री बने.

  • राम की मर्यादा भी भूल गई BJP...!

    राम की मर्यादा भी भूल गई BJP...!

    BJP अपने आराध्य देव राम की मर्यादा को याद रखती, तो उसे ख़याल आता कि सार्वजनिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति पर लगा लांछन कितने सख्त दंड की मांग करता है. सीता पर एक मामूली-से आरोप के बाद राम ने उन्हें महल से बाहर कर दिया - यह जितनी सज़ा सीता की थी, उतनी ही राम की भी - क्योंकि अंततः इसका लांछन राम के सिर भी आना था. एक तरह से महज एक लांछन पर राम ने सिर्फ सीता का बहिष्कार नहीं, अपना आत्मनिर्वासन भी चुना था.

  • दिल्ली की एक शाम के कई अलग रंग- कला से शीरोज़ के संघर्ष तक

    दिल्ली की एक शाम के कई अलग रंग- कला से शीरोज़ के संघर्ष तक

    बेशक, दिल्ली के अपने फरेब हैं और उसकी सांस्कृतिक चेतना का अपना खोखलापन, सतहीपन या पाखंड भी- लेकिन इन सबके बावजूद इस शहर में अपनी तरह की हलचल है जो गाहे-बगाहे आपको ऊष्मा और ऊर्जा दे सकती है.

  • क्योंकि संपत्ति नहीं है स्त्री

    क्योंकि संपत्ति नहीं है स्त्री

    व्यभिचार कानून को रद्द करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला बस इतना नहीं है कि स्त्री और पुरुष के विवाहेतर संबंधों को अब जुर्म नहीं माना जाएगा. दुर्भाग्य से हमारे लगातार सतही-सपाट होते समय में ज़्यादातर लोग इस फैसले की इतनी भर व्याख्या करेंगे. लगातार चुटकुलेबाज होते जा रहे हमारे समाज को यह फैसला अपने लिए स्त्री-पुरुष संबंधों के खुलेपन पर कुछ छींटाकशी का अवसर भर लग सकता है, लेकिन यह एक ऐतिहासिक फैसला है.

  • फिर भी कुछ छूट जाता है मंटो...

    फिर भी कुछ छूट जाता है मंटो...

    मंटो एक जलते हुए शोले का नाम है. उसको छूना दुस्साहस का काम है. छूते ही हाथ जल जाते हैं. मगर इस बदनाम लेखन के भीतर कोई ऐसी कशिश है कि उसको छूने की इच्छा होती है, कोई ऐसी तपिश है जो अपनी ओर खींचती है.

  • दो साल बाद सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक...

    दो साल बाद सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक...

    अब यह लगभग स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के लिए दो साल पहले हुई सर्जिकल स्ट्राइक के निशाने पर जितने सीमा पार बैठे आतंकी थे, उससे कहीं ज़्यादा भारतीय लोकतंत्र था. अन्यथा एक बहुत संक्षिप्त सैन्य कार्रवाई को राष्ट्रीय जलसे में बदलने की ऐसी कवायद न होती कि यूजीसी जैसे संस्थान को इसके लिए विश्वविद्यालयों को सर्कुलर जारी करना पड़ता. सर्जिकल स्ट्राइक निस्संदेह भारतीय सेना की वीरता और क्षमता का उदाहरण थी. सीमा पार जाकर पाक शिविरों में बैठे आतंकियों और उनके आकाओं को तबाह करना और बिना कोई नुक़सान उठाए सुरक्षित लौट आना आसान नहीं था. यह असंभव लगता कारनामा भारतीय सेना ने इतने अचूक ढंग से किया कि पाकिस्तान हैरान रह गया.

  • हिंदी के बीहड़ और दुर्धर्ष व्यक्तित्व का अवसान

    हिंदी के बीहड़ और दुर्धर्ष व्यक्तित्व का अवसान

    हिंदी के विलक्षण कवि-लेखक विष्णु खरे नहीं रहे. बुधवार दोपहर बाद दिल्ली के गोविंद वल्लभ पंत अस्‍पताल में उनका निधन हो गया. करीब हफ़्ते भर पहले वे मस्तिष्काघात के शिकार हुए थे और नीम बेहोशी में अस्पताल लाए गए थे.

  • हिन्दुत्व की भागवत कथा और हिन्दुस्तान का सच

    हिन्दुत्व की भागवत कथा और हिन्दुस्तान का सच

    में मुस्लिम नहीं रहेंगे, तो हिन्दुत्व नहीं रहेगा, लेकिन कई वाक्यों की तरह यह एक आदर्श वाक्य भर है - या संघ परिवार के दर्शन और व्यवहार में इसकी कोई वास्तविक-लोकतांत्रिक झलक भी मिलती है...?

  • अब इस समुदाय को कैसे पुकारें...?

    अब इस समुदाय को कैसे पुकारें...?

    सरकार जिन्हें अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखती है, वे कौन लोग हैं...? क्यों उनके लिए ऐसी सूची बनाने की ज़रूरत पड़ी...? क्योंकि समाज ने बरसों नहीं, सदियों तक उन्हें हाशिये पर रखा, अस्पृश्य बनाए रखा, उनसे अपने सबसे ज़रूरी - मगर हाथ गंदे करने वाले - काम करवाए. उनकी छाया तक को अपवित्र माना गया.

  • परसाई होते तो क्या मॉब लिंचिंग से, आवारा भीड़ के खतरों से बच पाते?

    परसाई होते तो क्या मॉब लिंचिंग से, आवारा भीड़ के खतरों से बच पाते?

    हरिशंकर परसाई खुशकिस्मत थे कि 1995 में ही चले गए. अगर आज होते तो या तो मॉब लिंचिंग के शिकार हो गए होते या फिर जेल में सड़ रहे होते या फिर देशद्रोह के आरोप में मुक़दमा झेल रहे होते. आवारा भीड़ के ख़तरों को उन्होंने काफ़ी पहले पहचाना था. यह भी पहचाना था कि इस भीड़ का इस्तेमाल कौन करता है.

  • फिर इसके बाद ये पूछें कि कौन दुश्मन है...

    फिर इसके बाद ये पूछें कि कौन दुश्मन है...

    जोश मलीहाबादी का एक किस्सा मशहूर है. वह पाकिस्तान चले गए थे और लौटकर भारत आ गए. लोगों ने पूछा कि पाकिस्तान कैसा है. जोश साहब ने जवाब दिया, बाक़ी सब तो ठीक है, लेकिन वहां मुसलमान कुछ ज़्यादा हैं.

  • अटल की शक्ति अटल की सीमा...

    अटल की शक्ति अटल की सीमा...

    कुछ लोगों के व्यक्तित्व में अपनी तरह की एक ऊष्मा होती है. अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा ही था. एक बड़प्पन उनकी शख्सियत में था. वे जवाहरलल नेहरू की तारीफ़ कर सकते थे, इंदिरा गांधी को बांग्लादेश युद्ध के बाद दुर्गा बता सकते थे और विपक्ष के बहुत सारे नेताओं से ऐसे दोस्ताना संबंध रख सकते थे जो दलगत राजनीति से ऊपर हों.

  • खौफ से आज़ादी और आज़ादी से खौफ

    खौफ से आज़ादी और आज़ादी से खौफ

    जेएनयू से पीएचडी कर रहे छात्र उमर ख़ालिद को तीन साल पहले तक कोई नहीं जानता था. वह एक छात्र भर थे- शायद कुछ अतिरिक्त उत्साही और जेएनयू के भीतर भी धार्मिक नहीं, राजनीतिक तौर पर बेहद अल्पसंख्यक- क्योंकि जेएनयू में भी उनके संगठन की कोई स्वीकार्यता नहीं थी.

  • वे चालीस लाख लोग...

    वे चालीस लाख लोग...

    असम के नागरिकता रजिस्टर से उठने वाला असली अंदेशा यही है- यह सिर्फ 40 लाख लोगों की नागरिकता तय करने का मामला नहीं है, करोड़ों दूसरे लोगों को यह दिखाने का मामला भी है कि वे भारत में अपनी नागरिकता को असंदिग्ध न मानें.

  • उद्योगपतियों की तारीफ करते प्रधानमंत्री और देश के विकास का सच... 

    उद्योगपतियों की तारीफ करते प्रधानमंत्री और देश के विकास का सच... 

    प्रधानमंत्री की यह बात बिल्कुल सही है कि उद्योगपति देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, उन्हें चोर-लुटेरे समझना या कहना ठीक नहीं और उनके साथ रिश्ते रखने में कोई बुराई नहीं. हो सकता है, उनका यह आरोप भी सच हो कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में उद्योगपतियों से दूरी बरतते हैं, वे चुपचाप उनके घरों में जाकर दंडवत होते हैं. नेताओं के पाखंड के बारे में आम राय अब इतनी स्पष्ट है कि दलों के आर-पार जाकर उनके इस कथन पर भरोसा किया जा सकता है.

  • मजबूत सरकार बनाम मजबूर सरकार- नकली बहस की कोशिश

    मजबूत सरकार बनाम मजबूर सरकार- नकली बहस की कोशिश

    बीजेपी बार-बार यह कह रही है कि विपक्ष मजबूत सरकार नहीं दे सकता. गठबंधन की मजबूरी में बनी सरकारें मज़बूत नहीं हो सकतीं. आज भी यह बात बीजेपी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कही. एक हद तक यह बात सच है. बीजेपी के अकेले बहुमत और एनडीए के समर्थन के साथ नरेंद्र मोदी बेहद मज़बूत प्रधानमंत्री हैं. यह मज़बूती उनकी अपनी छवि का भी नतीजा है.

  • 'हसीनाबाद' : सपने और सच के बीच का फ़ासला

    'हसीनाबाद' : सपने और सच के बीच का फ़ासला

    यह अंदाज़ा था कि गीताश्री जब उपन्यास लिखेंगी तो कोई स्त्री-गाथा उसके केंद्र में होगी. 'हसीनाबाद' को पढ़ते हुए इस स्तर पर उनसे निराशा नहीं होती. उनके उपन्यास के केंद्र में गोलमी नाम की एक युवा नृत्यांगना है जो 'सपने देखती नहीं बुनती है'.

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