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Priyadarshan


'Priyadarshan' - 141 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • दो साल बाद सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक...

    दो साल बाद सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक...

    अब यह लगभग स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के लिए दो साल पहले हुई सर्जिकल स्ट्राइक के निशाने पर जितने सीमा पार बैठे आतंकी थे, उससे कहीं ज़्यादा भारतीय लोकतंत्र था. अन्यथा एक बहुत संक्षिप्त सैन्य कार्रवाई को राष्ट्रीय जलसे में बदलने की ऐसी कवायद न होती कि यूजीसी जैसे संस्थान को इसके लिए विश्वविद्यालयों को सर्कुलर जारी करना पड़ता. सर्जिकल स्ट्राइक निस्संदेह भारतीय सेना की वीरता और क्षमता का उदाहरण थी. सीमा पार जाकर पाक शिविरों में बैठे आतंकियों और उनके आकाओं को तबाह करना और बिना कोई नुक़सान उठाए सुरक्षित लौट आना आसान नहीं था. यह असंभव लगता कारनामा भारतीय सेना ने इतने अचूक ढंग से किया कि पाकिस्तान हैरान रह गया.

  • हिंदी के बीहड़ और दुर्धर्ष व्यक्तित्व का अवसान

    हिंदी के बीहड़ और दुर्धर्ष व्यक्तित्व का अवसान

    हिंदी के विलक्षण कवि-लेखक विष्णु खरे नहीं रहे. बुधवार दोपहर बाद दिल्ली के गोविंद वल्लभ पंत अस्‍पताल में उनका निधन हो गया. करीब हफ़्ते भर पहले वे मस्तिष्काघात के शिकार हुए थे और नीम बेहोशी में अस्पताल लाए गए थे.

  • हिन्दुत्व की भागवत कथा और हिन्दुस्तान का सच

    हिन्दुत्व की भागवत कथा और हिन्दुस्तान का सच

    में मुस्लिम नहीं रहेंगे, तो हिन्दुत्व नहीं रहेगा, लेकिन कई वाक्यों की तरह यह एक आदर्श वाक्य भर है - या संघ परिवार के दर्शन और व्यवहार में इसकी कोई वास्तविक-लोकतांत्रिक झलक भी मिलती है...?

  • अब इस समुदाय को कैसे पुकारें...?

    अब इस समुदाय को कैसे पुकारें...?

    सरकार जिन्हें अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखती है, वे कौन लोग हैं...? क्यों उनके लिए ऐसी सूची बनाने की ज़रूरत पड़ी...? क्योंकि समाज ने बरसों नहीं, सदियों तक उन्हें हाशिये पर रखा, अस्पृश्य बनाए रखा, उनसे अपने सबसे ज़रूरी - मगर हाथ गंदे करने वाले - काम करवाए. उनकी छाया तक को अपवित्र माना गया.

  • परसाई होते तो क्या मॉब लिंचिंग से, आवारा भीड़ के खतरों से बच पाते?

    परसाई होते तो क्या मॉब लिंचिंग से, आवारा भीड़ के खतरों से बच पाते?

    हरिशंकर परसाई खुशकिस्मत थे कि 1995 में ही चले गए. अगर आज होते तो या तो मॉब लिंचिंग के शिकार हो गए होते या फिर जेल में सड़ रहे होते या फिर देशद्रोह के आरोप में मुक़दमा झेल रहे होते. आवारा भीड़ के ख़तरों को उन्होंने काफ़ी पहले पहचाना था. यह भी पहचाना था कि इस भीड़ का इस्तेमाल कौन करता है.

  • फिर इसके बाद ये पूछें कि कौन दुश्मन है...

    फिर इसके बाद ये पूछें कि कौन दुश्मन है...

    जोश मलीहाबादी का एक किस्सा मशहूर है. वह पाकिस्तान चले गए थे और लौटकर भारत आ गए. लोगों ने पूछा कि पाकिस्तान कैसा है. जोश साहब ने जवाब दिया, बाक़ी सब तो ठीक है, लेकिन वहां मुसलमान कुछ ज़्यादा हैं.

  • अटल की शक्ति अटल की सीमा...

    अटल की शक्ति अटल की सीमा...

    कुछ लोगों के व्यक्तित्व में अपनी तरह की एक ऊष्मा होती है. अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा ही था. एक बड़प्पन उनकी शख्सियत में था. वे जवाहरलल नेहरू की तारीफ़ कर सकते थे, इंदिरा गांधी को बांग्लादेश युद्ध के बाद दुर्गा बता सकते थे और विपक्ष के बहुत सारे नेताओं से ऐसे दोस्ताना संबंध रख सकते थे जो दलगत राजनीति से ऊपर हों.

  • खौफ से आज़ादी और आज़ादी से खौफ

    खौफ से आज़ादी और आज़ादी से खौफ

    जेएनयू से पीएचडी कर रहे छात्र उमर ख़ालिद को तीन साल पहले तक कोई नहीं जानता था. वह एक छात्र भर थे- शायद कुछ अतिरिक्त उत्साही और जेएनयू के भीतर भी धार्मिक नहीं, राजनीतिक तौर पर बेहद अल्पसंख्यक- क्योंकि जेएनयू में भी उनके संगठन की कोई स्वीकार्यता नहीं थी.

  • वे चालीस लाख लोग...

    वे चालीस लाख लोग...

    असम के नागरिकता रजिस्टर से उठने वाला असली अंदेशा यही है- यह सिर्फ 40 लाख लोगों की नागरिकता तय करने का मामला नहीं है, करोड़ों दूसरे लोगों को यह दिखाने का मामला भी है कि वे भारत में अपनी नागरिकता को असंदिग्ध न मानें.

  • उद्योगपतियों की तारीफ करते प्रधानमंत्री और देश के विकास का सच... 

    उद्योगपतियों की तारीफ करते प्रधानमंत्री और देश के विकास का सच... 

    प्रधानमंत्री की यह बात बिल्कुल सही है कि उद्योगपति देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, उन्हें चोर-लुटेरे समझना या कहना ठीक नहीं और उनके साथ रिश्ते रखने में कोई बुराई नहीं. हो सकता है, उनका यह आरोप भी सच हो कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में उद्योगपतियों से दूरी बरतते हैं, वे चुपचाप उनके घरों में जाकर दंडवत होते हैं. नेताओं के पाखंड के बारे में आम राय अब इतनी स्पष्ट है कि दलों के आर-पार जाकर उनके इस कथन पर भरोसा किया जा सकता है.

  • मजबूत सरकार बनाम मजबूर सरकार- नकली बहस की कोशिश

    मजबूत सरकार बनाम मजबूर सरकार- नकली बहस की कोशिश

    बीजेपी बार-बार यह कह रही है कि विपक्ष मजबूत सरकार नहीं दे सकता. गठबंधन की मजबूरी में बनी सरकारें मज़बूत नहीं हो सकतीं. आज भी यह बात बीजेपी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कही. एक हद तक यह बात सच है. बीजेपी के अकेले बहुमत और एनडीए के समर्थन के साथ नरेंद्र मोदी बेहद मज़बूत प्रधानमंत्री हैं. यह मज़बूती उनकी अपनी छवि का भी नतीजा है.

  • 'हसीनाबाद' : सपने और सच के बीच का फ़ासला

    'हसीनाबाद' : सपने और सच के बीच का फ़ासला

    यह अंदाज़ा था कि गीताश्री जब उपन्यास लिखेंगी तो कोई स्त्री-गाथा उसके केंद्र में होगी. 'हसीनाबाद' को पढ़ते हुए इस स्तर पर उनसे निराशा नहीं होती. उनके उपन्यास के केंद्र में गोलमी नाम की एक युवा नृत्यांगना है जो 'सपने देखती नहीं बुनती है'.

  • शशि थरूर का बयान और राजनीति की इकहरी भाषा

    शशि थरूर का बयान और राजनीति की इकहरी भाषा

    शशि थरूर के वक्तव्य पर आ रही प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि हमारी राजनीतिक भाषा की समझ कितनी इकहरी, सतही और भोंथरी हो गई है. शशि थरूर ने कहा कि 2019 में बीजेपी की जीत से भारत 'हिंदू पाकिस्तान' हो जाएगा. इस वक्तव्य से असहमत होने की गुंजाइश बहुत सारी है, लेकिन पहले इस बयान का मतलब भी ठीक से समझने की ज़रूरत है.

  • एक बीमार समाज और निर्भया का इंसाफ़

    एक बीमार समाज और निर्भया का इंसाफ़

    निर्भया के मुजरिमों के साथ कोई हमदर्दी नहीं रखी जा सकती है. उनका अपराध इतना नृशंस था कि 6 साल बाद भी उसकी याद एक सिहरन पैदा करती है. न्याय की सहज बुद्धि कहती है कि इनके साथ किसी क़िस्म की नरमी की बात सोचना गलत है. हमारे संविधान में अगर किसी जघन्य अपराध के लिए फांसी की व्यवस्था है तो वह जघन्य अपराध ऐसा ही हो सकता है. इसलिए कोई नादान ही बोलेगा कि निर्भया के मुजरिमों को फांसी नहीं होनी चाहिए.

  • 'संजू' क्यों राजू हिरानी की सबसे कमज़ोर फ़िल्म है...

    'संजू' क्यों राजू हिरानी की सबसे कमज़ोर फ़िल्म है...

    'संजू' फिल्म का खलनायक कौन है...? राजू हिरानी के मुताबिक वह प्रेस, जो सूत्रों के मुताबिक या प्रश्नवाचक चिह्न लगाकर अफ़वाहों को ख़बरों की तरह पेश करता है. मीडिया से इस शिकायत को फिल्म में इतनी अहमियत दी गई है कि फिल्म का अंत बाकायदा एक गाने से होता है, जिसमें मीडिया का मज़ाक बनाया गया है. यह सच है कि मीडिया कई बार गैरज़िम्मेदार ढंग से पेश आता रहा है. वह कई बार अपनी ताक़त के नकली गुमान में रहता है. कई बार दूसरे ताकतवर लोग भी उसका यह भरम बनाए रखने में मददगार होते हैं. कई बार यह लगता है कि इन ताकतवर लोगों को ईमानदार नहीं, एक बेईमान मीडिया ही चाहिए, समझदार नहीं, सनसनी वाला मीडिया ही चाहिए.

  • इमरजेंसी: क्या भूलें, क्या याद करें, किन-किन ने मांगी माफ़ी?

    इमरजेंसी: क्या भूलें, क्या याद करें, किन-किन ने मांगी माफ़ी?

    फिल्म 'आंधी' 1975 में बनी थी इमरजेंसी से पहले. फिल्म में सुचित्रा सेन ने एक ऐसी नेता की भूमिका अदा की थी जो अपने पति से अलग रह रही है. बरसों बाद वे मिलते हैं और उनके बीच पुरानी स्मृतियों का रेला बहता रहता है. सुचित्रा सेन का मेकअप काफी कुछ इंदिरा गांधी जैसा था. इमरजेंसी के दौरान यह फिल्म रोक दी गई. लेकिन 1977 में इमरजेंसी खत्म होने के बाद फिल्म फिर से रिलीज हुई और बेहद कामयाब रही. राहुल देव बर्मन ने फिल्म का जो संगीत दिया था, वह आज भी हिंदी फिल्मों के बेहतरीन संगीत की विरासत है. गुलजार के लेखन और निर्देशन की जानी-पहचानी भावुकता को छूती संवेदनशीलता यहां भी मौजूद है.

  • इमरजेंसी : इंदिरा गांधी, हिटलर और जेटली - असली वारिस कौन?

    इमरजेंसी : इंदिरा गांधी, हिटलर और जेटली - असली वारिस कौन?

    यह सच है कि इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है. इस दौर में नागरिक अधिकार छीन लिए गए. नेताओं, लेखकों, पत्रकारों को जेल में डाला गया. उन्हें यंत्रणाएं दी गईं. लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई. 20 सूत्री कार्यक्रम थोपा गया. अनुशासन पर्व के नाम पर तानाशाही का चाबुक चलाया गया. यह भी सच है कि इंदिरा गांधी को इतिहास उनके इस कृत्य के लिए कभी माफ़ नहीं करेगा. भारतीय जनता ने तो उन्होंने 1977 में ही दंडित कर दिया था.

  • कश्मीर दर्द से ऐंठती देह का नाम है

    कश्मीर दर्द से ऐंठती देह का नाम है

    जम्मू-कश्मीर में अब फिर से राज्यपाल का शासन है. महबूबा सरकार से अलग हुई बीजेपी समझाने में जुटी है कि वहां राज्यपाल का शासन क्यों ज़रूरी है. वह अपने जाने-पहचाने शब्दाडंबर पर लौट आई है.

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