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Priyadarshan blog


'Priyadarshan blog' - 172 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • क्या धोनी धीमे हो गए हैं?

    क्या धोनी धीमे हो गए हैं?

    न्यूजीलैंड के खिलाफ सेमीफाइनल मुकाबले में महेंद्र सिंह धोनी जिस तरह रन आउट हुए, उसका रिप्ले फिर से देखिए. देखिए कि गुप्तिल ने कहां जाकर गेंद पकड़ी और कैसे उसे थ्रो किया. दरअसल यह गुप्तिल की किस्मत रही कि उनका थ्रो सीधे स्टंप में लगा और धोनी रन आउट हो गए. खुद गुप्तिल ने ही अगले दिन यह बात भी मानी. धोनी की जगह कोई और खिलाड़ी होता तो भी वह इस थ्रो पर रन आउट हो गया होता. धोनी दरअसल एक रन को दो रन में बदल रहे थे. यह काम वे पहले भी करते रहे हैं. जो महान खिलाड़ी उन पर धीमे होने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं, वे शायद अपने पूरे करिअर में उतने तेज़ नहीं रहे जितने धोनी उस दिन थे.

  • कुलभूषण जाधव को हम कैसे बचाएंगे?

    कुलभूषण जाधव को हम कैसे बचाएंगे?

    हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से आए फ़ैसले के बाद भारत में जीत और जश्न का जो माहौल है, उसमें यह बात जैसे छुपी रह जा रही है कि कुलभूषण जाधव की बस फांसी टली है, उन पर संकट नहीं टला है. क्योंकि हेग से आए फ़ैसले ने बेशक भारत के बहुत सारे आरोपों को सही पाया है लेकिन बहुत सारी दूसरी मांगें ठुकरा भी दी हैं. भारत की मांग थी कि कुलभूषण जाधव को भारत भेजा जाए और उन पर कोर्ट मार्शल के तहत सुनाए गए फ़ैसले को अवैध करार दिया जाए.

  • धोनी को रिटायर होने की जो सलाह दी जा रही है, वह कितनी जायज़ है?

    धोनी को रिटायर होने की जो सलाह दी जा रही है, वह कितनी जायज़ है?

    विश्व कप के कुछ मैचों में दूसरों की उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाने की वजह से जो लोग महेंद्र सिंह धोनी को रिटायर होने की सलाह दे रहे हैं, उन्हें कुछ बातें याद दिलाना ज़रूरी है. 2005 के बाद से लगातार सचिन तेंदुलकर को सलाह दी जाती रही कि वे रिटायर हो जाएं. 2007 के विश्व कप के बाद सचिन ने लगभग तय कर लिया था कि अब वे नहीं खेलेंगे. उन तीन मैचों में वे बस 60-70 रन बना पाए थे. लेकिन तब विवियन रिचर्ड्स ने उन्हें कहा कि वे खेलते रहें, किसी की सुनने की जरूरत नहीं है. सचिन ने यह बात मानी- वनडे और टेस्ट क्रिकेट को मिलाकर सौ शतक पूरे किए, 2011 का वर्ल्ड कप टीम के साथ उठाया और अंततः एक अविश्वसनीय क्रिकेट करिअर पूरा कर बल्ला रखा.

  • राज्यसभा की कार्यवाही से हटाएं शेर, वरना ग़ालिब के नहीं उड़ेंगे पुर्जे, प्रधानमंत्री पर उठेंगे सवाल

    राज्यसभा की कार्यवाही से हटाएं शेर, वरना ग़ालिब के नहीं उड़ेंगे पुर्जे, प्रधानमंत्री पर उठेंगे सवाल

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए राज्यसभा में जो भाषण दिया, वह अब राज्यसभा के रिकॉर्ड का हिस्सा हो चुका है. इस रिकॉर्ड में प्रधानमंत्री के सौजन्य से ग़ालिब के नाम एक ऐसा शेर दर्ज है जो ग़ालिब का नहीं है. दरअसल यह क़ायदे से शेर भी नहीं है. शेर का अपना एक अनुशासन होता है जिससे शायरी की दुनिया से सामान्य परिचय रखने वाले लोग भी मोटे तौर पर परिचित होते हैं.

  • काश, नारा होता - मोदी है, तो 'नामुमकिन है...'

    काश, नारा होता - मोदी है, तो 'नामुमकिन है...'

    इस तरह देखें, तो तबरेज़ की हत्या एक राजनीतिक विचारधारा के तहत की गई हत्या है. यह राजनीतिक विचारधारा भीड़ को एक तरह की वैधता और मान्यता देती है. इस राजनीतिक विचारधारा को एक शक्तिशाली भारत का ख़याल बहुत लुभाता है. 'मोदी है, तो मुमकिन है' जैसा नारा ताक़त के इसी ख़याल से पैदा होता है

  • क्या विश्वविद्यालयों से देश को ख़तरा है?

    क्या विश्वविद्यालयों से देश को ख़तरा है?

    उत्तर प्रदेश की योगी सरकार छात्रों को देशभक्त बनाने के लिए एक अध्यादेश लेकर आई है. उत्तर प्रदेश निजी विश्वविद्यालय अध्यादेश नाम के इस कानून के मुताबिक विश्वविद्यालयों में अगर राष्ट्र विरोधी गतिविधियां हुईं तो उन पर कार्रवाई हो सकती है, उनकी मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है.

  • असदुद्दीन ओवैसी को देख इन्हें याद आती है भारत माता...!

    असदुद्दीन ओवैसी को देख इन्हें याद आती है भारत माता...!

    लोकसभा में असदुद्दीन ओवैसी जब शपथ लेने के लिए आए, तो BJP सांसदों ने 'वन्दे मातरम्' और 'भारत माता की जय'के नारे लगाने शुरू कर दिए. असदुद्दीन ओवैसी हमेशा की तरह ज़्यादा समझदार निकले और उन्होंने हाथ से इशारा किया कि और ऊंची आवाज़ में यह नारे लगाए जाएं.

  • गिरीश कर्नाड प्रतिरोध का व्याकरण थे, जो हम भूलते जा रहे हैं...

    गिरीश कर्नाड प्रतिरोध का व्याकरण थे, जो हम भूलते जा रहे हैं...

    गिरीश कर्नाड की कुछ अंतिम मार्मिक छवियां उन प्रतिरोध सभाओं से बनती हैं, जहां वह कभी 'मैं भी अर्बन नक्सल' और कभी 'नॉट इन माई नेम' की तख़्ती लगाकर पहुंचे दिखाई पड़ते थे. 80 साल की उम्र में अपनी लगातार बड़ी होती शारीरिक व्याधियों के बीच वह अगर इन सभाओं में लंबी दूरी तय कर पहुंचते थे, तो इसलिए नहीं कि उनमें किसी तात्कालिक राजनीतिक प्रतिरोध का शौक या जुनून था, बल्कि इसलिए कि वह जिस बहुलता, विविधता और स्वतंत्रता को भारतीय चेतना का मूल्य मानते रहे, उस पर बढ़ रहे खतरे का उन्हें गंभीरता से एहसास था.

  • राहुल गांधी को क्यों इस्तीफ़ा देना चाहिए...?

    राहुल गांधी को क्यों इस्तीफ़ा देना चाहिए...?

    यह सच है कि 2014 और 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुए हैं. नरेंद्र मोदी और BJP की ऐतिहासिक जीत के आईने में यह हार कुछ और बड़ी और दुखी करने वाली लगती है. लेकिन अतीत में देखें तो ऐसे इकतरफ़ा परिणाम और अनुमान कांग्रेस और BJP दोनों के हक़ में आते रहे हैं और दोनों को हंसाते-रुलाते रहे हैं. 1984 में जब राजीव गांधी को 400 से ज्यादा सीटें मिली थीं और अटल-आडवाणी को महज 2, तब भी कुछ लोगों को लगा था कि अब तो BJP का सफ़ाया हो गया. लेकिन 1989 आते-आते BJP वीपी सिंह की सत्ता का एक पाया बनी हुई थी.

  • आख़िर कांग्रेस ख़त्म क्यों नहीं होती?

    आख़िर कांग्रेस ख़त्म क्यों नहीं होती?

    योगेंद्र यादव के ट्वीट को लेकर हंगामा हो रहा है, लेकिन उसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है. उन्होंने लिखा है, 'कांग्रेस को ख़त्म हो जाना चाहिए. अगर वो भारत के विचार की रक्षा के लिए बीजेपी को इन चुनावों में रोक पाने में नाकाम रही तो इस पार्टी के लिए भारतीय इतिहास में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं है. आज किसी विकल्प के निर्माण में ये सबसे बड़ी बाधा की प्रतिनिधि है.'

  • प्रधानमंत्री क्यों देते पत्रकारों के सवालों के जवाब

    प्रधानमंत्री क्यों देते पत्रकारों के सवालों के जवाब

    'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक रहते हुए कभी दिलीप पडगांवकर ने कहा था कि देश का सबसे ताकतवर आदमी इस देश का प्रधानमंत्री है और दूसरा सबसे ताकतवर आदमी 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक है.तब भी इस वक्तव्य की बहुत आलोचना हुई थी.किसी अच्छे पत्रकार को ताकत के मोह में नहीं पड़ना चाहिए.यह मोह सबसे पहले उसकी पत्रकारिता का क्षरण करता है.लेकिन पत्रकारिता जब अपना काम कर रही होती है तब वह जिस नैतिक आभा से भरी होती है, उसकी ताकत के आगे भी सब सिर झुकाते हैं.

  • गांधी की संतानों से डरती हैं गोडसे की औलादें

    गांधी की संतानों से डरती हैं गोडसे की औलादें

    प्रज्ञा ठाकुर को भले पार्टी के दबाव में माफ़ी मांगनी पड़ी, लेकिन उनकी यह बात सौ फ़ीसदी सही है कि एक ख़ास विचारधारा के तहत गोडसे देशभक्त था- उसकी नज़र में देश की जो परिभाषा थी, उससे वह पूजा करता था. उसकी गांधी जी से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. उसको आरएसएस या हिंदू महासभा ने जो कुछ सिखाया, उस पर उसने पूरी तरह अमल किया. संकट यह है कि आज जो आरएसएस या उससे जुड़े संगठन हैं, उनको अपनी वैचारिकता का भरोसा ही नहीं, इसलिए वे गोडसे की तरह गांधी को सामने से गोली नहीं मारते, पीछे-पीछे उनका वध करते हैं.

  • जन्मदिन पर विशेष : राष्ट्रगान लिखने वाला कविगुरु राष्ट्रवाद के विरुद्ध था

    जन्मदिन पर विशेष : राष्ट्रगान लिखने वाला कविगुरु राष्ट्रवाद के विरुद्ध था

    जब हर तरफ़ राष्ट्रवाद का शोर है, राष्ट्रगान गाने पर ज़ोर है, तब रवींद्रनाथ टैगोर को याद करने का एक ख़ास मतलब है. टैगोर संभवतः दुनिया के अकेले कवि हैं जिनकी रचनाओं को दो-दो देशों ने अपने राष्ट्रगान की तरह अपनाया. भारत के अलावा बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी उनकी ही रचना है. यही नहीं, श्रीलंका का राष्ट्रगान भी जिस आनंद समरकून ने लिखा, वे टैगोर के शिष्य थे- उन्होंने विश्व भारती से पढ़ाई की थी. कई लोगों का मानना है कि जिस गीत को श्रीलंका का राष्ट्रगान बनाया गया है, उसका संगीत टैगोर ने ही तैयार किया था.

  • क्या भारत में भी दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं होना चाहिए...?

    क्या भारत में भी दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं होना चाहिए...?

    अक्षय कुमार भारतीय नागरिक नहीं हैं. यह बात मुंबई में वोटिंग के दौरान सामने आई. कई सितारों ने वोट दिए. उनकी पत्नी ट्विंकल ने भी वोट डाला. लेकिन इस सूची में अक्षय कुमार नहीं थे, क्योंकि उन्होंने कनाडा की नागरिकता ले रखी है. लेकिन क्या नागरिकता न होने से अक्षय कुछ कम भारतीय हो जाते हैं...? इत्तफाक से पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने लगातार ऐसी फिल्में कीं, जिनका वास्ता देशभक्ति से है. बल्कि कुछ अतिरिक्त राजभक्ति दिखाते हुए उन्होंने बिल्कुल सरकारी कार्यक्रमों को बढ़ावा देने वाली 'टॉयलेट - एक प्रेम कथा' और 'पैडमैन' जैसी फिल्में भी कीं. और तो और, ऐन चुनावों के बीच उन्होंने प्रधानमंत्री का इंटरव्यू किया और देसी चुटकुले भी साझा किए.

  • बेगूसराय में कैसे जीतेगा कन्हैया कुमार...?

    बेगूसराय में कैसे जीतेगा कन्हैया कुमार...?

    बेगूसराय भी कहीं बनारस साबित न हो, यह डर बिल्कुल निराधार नहीं है. भारत में चुनाव बेशक किसी जश्न से कम नहीं, लेकिन उनको लड़ा किसी जंग की तरह ही जाता है.

  • पुस्तक दिवस कौन मनाता है?

    पुस्तक दिवस कौन मनाता है?

    जैसे-जैसे हम किताबों से दूर होते जा रहे हैं, किताबों को लेकर हम ज्यादा प्रेम जताने लगे हैं. जो लोग कहते हैं कि उन्हें किताबें पढ़ना अच्छा लगता है, उनमें वाकई दस फ़ीसदी लोग ही वाकई नियमित तौर पर किताबें पढ़ते हैं. बाकी किताबों के बारे में पढ़ लेते हैं.

  • दलितों-आदिवासियों का एक बड़ा पक्षधर चला गया

    दलितों-आदिवासियों का एक बड़ा पक्षधर चला गया

    मार्च खत्म होते-होते मौत ने जैसे अपने बही खाते का आखिरी हिसाब वसूल लिया- हिंदी की जानी-मानी लेखक, संपादक और संचयनकर्ता रमणिका गुप्ता को अपने साथ ले गई. पीछे छूट गए हमारी तरह के पेशेवर श्रद्धांजलि लेखक- यह बताने के लिए कि इस साल अर्चना वर्मा, कृष्णा सोबती और नामवर सिंह के बाद हिंदी के साहित्याकाश को हुई चौथी क्षति है और यह जोड़ने के लिए कि 89 को छूती उम्र में रमणिका गुप्ता का निधन शोक का नहीं, एक जीवन की संपूर्णता को महसूस करने का विषय है.

  • आख़िरकार चले गए नामवर सिंह..

    आख़िरकार चले गए नामवर सिंह..

    हिंदी की आलोचना परंपरा में जो चीज़ नामवर सिंह को विशिष्ट और अद्वितीय बनाती है, वह उनकी सर्वसुलभ सार्वजनिकता है. वे किन्हीं अध्ययन कक्षों में बंद और पुस्तकों में मगन अध्येता और विद्वान नहीं थे, वे सार्वजनिक विमर्श के हर औजार का जैसे इस्तेमाल करते थे. उन्होंने किताबें लिखीं, अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख लिखे और साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया.