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Rakesh kumar malviya


'Rakesh kumar malviya' - 96 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा के मायने...

    दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा के मायने...

    दिग्विजय सिंह जो कहते हैं, करते भी हैं. राजनीति से 10 साल संन्यास लेने को कहा था, हारे, तो करके दिखाया भी. नर्मदा परिक्रमा को ही लीजिए. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की यात्रा पूरी होते-होते पूर्व मुख्यमंत्री ने भी घोषणा कर दी, और उसे पूरा किया भी. शि‍वराज की भव्‍य यात्रा का जवाब अपनी ज़मीनी यात्रा से दिया. मध्य प्रदेश में पांव-पांव वाले भैया शिवराज सिंह चौहान कहलाते रहे हैं, क्योंकि इसी पैदलपन की वजह से उन्होंने मध्य प्रदेश के लोगों के दिलों में जगह बनाई, उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद मध्य प्रदेश में BJP की सरकार को एक स्थायी नेतृत्व दिया, बहरहाल अपनी तीसरी पारी तक आते-आते मजबूरी कहें या पूरी सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी उनकी यात्रा को भव्‍य सरकारी परि‍क्रमा माना गया और इसके ठीक बाद सोशल इंजीनियरिंग के महारथी दिग्विजय सिंह ने शिवराज के ही पैंतरों से अपनी ज़मीन तैयार कर ली है.

  • हैप्पीनेस वाले एमपी में बुजुर्ग खुश, युवा उदास

    हैप्पीनेस वाले एमपी में बुजुर्ग खुश, युवा उदास

    2001 से 2015 के बीच देश में हर दिन छह लोगों ने बेरोजगारी के कारण अपनी जान दी. यदि इसमें गरीबी के कारण को और शामि‍ल कर लें तो 13 लोगों ने हर दि‍न खुद अपनी मौत को गले लगाया. भयावह संख्याओं की इस पृष्ठभूमि को जेहन में रखते हुए देखिए कि अब बजाए नई नौकरियां पैदा करने के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाई जा रही है.

  • जी हां, यह हिंदुस्तान का ही एक मकान है...

    जी हां, यह हिंदुस्तान का ही एक मकान है...

    तस्वीर देखकर आप तय कर लीजिए कि इसे घर कहा जाएगा या नहीं कहा जाएगा. हम सोचते हैं कि केवल शहरों में ही बेघरबार लोग सड़कों पर सोते हैं, जिन्हें सड़कों या गलियारों में सोने से रोकने के लिए कीलें ठुकवा दी जाती हैं.

  • टीबी को घेर लि‍या है 'नि‍जीकरण की बीमारी' ने

    टीबी को घेर लि‍या है 'नि‍जीकरण की बीमारी' ने

    यह भी तय कि‍या जाना चाहि‍ए कि यदि 2025 तक देश से टीबी खत्‍म हो रहा है तो क्‍या उसे इस तेज गति से अपना दायरा फैला रहीं और लोगों को गरीबी में धकेल रहीं नि‍जी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं ले जाएंगी, या इसका रास्‍ता स्‍वास्‍थ्‍य बीमा के जरि‍ए खोजा जाएगा, जि‍सका एक वि‍श्‍लेषण यह भी कहता है कि यह सार्वजनि‍क स्‍वास्‍थ्य सेवाओं के लि‍ए घातक ही साबि‍त होगा.

  • क्या सुरक्षित मातृत्व को गंभीरता से नहीं लेतीं सरकारें

    क्या सुरक्षित मातृत्व को गंभीरता से नहीं लेतीं सरकारें

    अब से तकरीबन 12 साल बाद जब देश में मातृत्व स्वास्थ्य की समीक्षा की जाएगी तो यह देखा जाएगा कि इस संबंध में देश ने अपना आंकड़ा कितना दुरुस्त किया. उसके लिए यह भी जरूरी होगा कि इस विषय पर लगातार और गंभीर काम किए जाएं. आखिर देश में विकास के मानक केवल जीडीपी से ही नहीं तौले जाने चाहिए. देशवासियों का गुणवत्तापूर्ण जीवन सेहत और स्वास्थ्य इसमें बहुत महत्वपूर्ण हैं और यह तभी संभव है जब विकास की दिशा सही तय हो.

  • मध्‍यप्रदेश में सत्ता का 'सेमीफाइनल' और कांग्रेस की जीत के मायने

    मध्‍यप्रदेश में सत्ता का 'सेमीफाइनल' और कांग्रेस की जीत के मायने

    लगातार तीन विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की विजयी पताका फहरा रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए इसे सबसे ज्यादा अहम बताया जा रहा था तो सत्ता से दूर बैठी कांग्रेस इसके जरि‍ए अपने लिए भरपूर 'ऑक्सीजन' की तलाश कर रही थी. इससे पहले कांग्रेस ने चित्रकूट का उपचुनाव भी जीता था. यह जीत कांग्रेस के साथ ही सिंधिया के गढ़ में ज्‍योति‍रादि‍त्‍य को मजबूती दे गई. इन परि‍णामों के आधार पर अब मध्यप्रदेश में चुनावी चौसर की रणनीति‍ तय होने वाली है.

  • एक साल में कहां गायब हो गए 63 हजार बच्चे?

    एक साल में कहां गायब हो गए 63 हजार बच्चे?

    नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट में मिसिंग चिल्ड्रन के बारे में जो आंकड़े आते हैं उनमें सबसे ज्‍यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि एक साल में इस सेक्शन के तहत गायब होने वाले बच्चों की संख्या में 63407 बच्चे और जुड़ गए हैं.

  • महि‍लाओं के इस ‘जौहर’ पर कुछ कहेंगे-करेंगे आप

    महि‍लाओं के इस ‘जौहर’ पर कुछ कहेंगे-करेंगे आप

    देश की अब तक की सबसे विवादित साबित हो रही फिल्म पद्मावत सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद अब तक संकट में है. फिल्म बनने से लेकर अब तक इस पर तमाम तरह के विवाद रहे हैं.

  • 'ट्रेन में ठंड से कंपकपी छूट रही थी... एक अनजाने हाथ ने आकर चादर डाल दी...'

    'ट्रेन में ठंड से कंपकपी छूट रही थी... एक अनजाने हाथ ने आकर चादर डाल दी...'

    एक रात जब आप रेल के सफर में हों और चादर छूट जाए तो. स्लीपर कोच में सर्द हवाओं और अंदर से उठती हल्की सी कंपकंपी से बचने का सिवाए एक ही रास्ता कि आप अपने शरीर को सिकोड़ लें, घुटनों को उपर तक लें आएं या बैग में पड़े कुछ कपड़ों का जुगाड़ करने का सोचें. इस स्थिति में ऐसा भी हो सकता है कि अनजाना सा हाथ आपके शरीर पर बिना कोई जान-पहचान के आपके सिकुड़े हुए शरीर पर चादर फैला दे और उसके बाद आप सुकून से आपकी रात गुजर जाए.

  • क्या रेप रोक पाने में कारगर होगा एमपी का फांसी फार्मूला?

    क्या रेप रोक पाने में कारगर होगा एमपी का फांसी फार्मूला?

    पिछले कई सालों से मध्यप्रदेश में बच्‍चों और महिलाओं पर अपराध के मामलों में अव्‍वल है. अब मप्र ही पहला ऐसा राज्य बनने जा रहा है जहां बलात्कारियों को मृत्युदंड की सजा दी जाएगी. मध्यप्रदेश में अगले साल चुनाव हैं, स्‍वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी सक्रियता तेज कर दी है.

  • गुजरात चुनाव : CD छोड़िए, इन मुद्दों का तो पोस्टर भी नहीं बनता

    गुजरात चुनाव : CD छोड़िए, इन मुद्दों का तो पोस्टर भी नहीं बनता

    जब गुजरात सरीखे राज्य में चुनावी बयार शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे मुल्क में इसलिए बिखरेगी, क्योंकि यह तो सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की साख का मामला है. विपक्ष इसलिए पूरा ज़ोर लगाएगा, क्योंकि गुजरात जीत लिया तो उनका आधा रास्ता तय हो जाएगा. इसलिए दोनों ही स्तरों पर यह प्रतिष्ठा का विषय तो है ही.

  • क्या हम शिक्षकों को पढ़ाने देंगे?

    क्या हम शिक्षकों को पढ़ाने देंगे?

    बहुत पहले से शिक्षकों के जनगणना में डयूटी लगाए जाने सहित कई तरह के गैर शैक्षणिक कार्यों के कार्टून अखबारों में बनते-छपते रहे हैं. इसमें नया यह है कि इस बात को भी अब नापा-तौला जाएगा कि एक समाज में शिक्षक की हैसियत क्या है और उसकी छवि को समाज में किस तरह से गढ़ा जा रहा है. इसमें सबसे बड़ी विडंबना यही है कि नीतिगत रूप से उसकी भूमिका शिक्षक से ज्यादा प्रबंधन की मानी जाने लगी है, ठीक अखबारों के संपादकों जैसी.

  • टोल की सड़कों पर इतराना कैसा …?

    टोल की सड़कों पर इतराना कैसा …?

    भारतीय जनता पार्टी में मोदी-अमित युग आने के बाद देश के टॉप टेन भाजपाई लीडर्स में शुमार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सड़क पर दिए बयान की आम जनता में भद पि‍ट रही है, क्‍योंकि वह रोज सड़कों पर नि‍कलती है और उनकी सच्‍चाई जानती है. क्या मध्यप्रदेश में वाकई सड़कों की हालत बेहतर है और क्या सचमुच इतनी बेहतर है कि अमेरिका से भी अच्छी हैं, इस बात पर तमाम तरह का मजाक हो सकता है और हुआ भी.

  • क्या ट्रैक्टर के लिए कार जैसा लोन मिल सकता है ?

    क्या ट्रैक्टर के लिए कार जैसा लोन मिल सकता है ?

    सवाल यह है कि जब मध्‍यमवर्गीय नौकरीपेशा वर्ग पर बैंक इतनी आसानी से भरोसा कर सकती है, जि‍स पर भी मंदी की मार से नौकरी जाने का खतरा लगातार मंडराता ही रहता है, तब वह कि‍सानों पर ऐसा भरोसा क्‍यों नहीं कर पाती ? क्‍या बैंकों का नजरि‍या भी यह नहीं बताता कि भारत के अंदर कि‍सानों की हालत इतनी ज्‍यादा खराब है, जि‍स पर बैंक भरोसा ही नहीं करते और उनको उस ‘फोर पीज’ से भी नीचे की कैटेग‍री में डाल दि‍या गया है, जि‍न्‍हें बैंक लोन देने से कतराते हैं. आपको शायद याद हो, क्‍योंकि यह ज्‍यादा पुरानी बात नहीं जब खेती को जीवन जीने के संसाधनों में ‘सबसे उत्तम’ माना-कहा जाता था.

  • कैसे पूरा होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गरीबी हटाओ का नारा?

    कैसे पूरा होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गरीबी हटाओ का नारा?

    इधर देश के प्रधानमंत्री ने गरीबी हटाओ का नारा दिया और उसके दो दिन बाद ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने बताया कि भारत इसमें तीन अंक नीचे खिसक गया है.

  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद अहम, लेकिन क्या रुकेंगे बच्चों के खिलाफ अपराध...?

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद अहम, लेकिन क्या रुकेंगे बच्चों के खिलाफ अपराध...?

    देखा जाए तो इस फैसले के लागू किए जाने के पहले ही देश के एक और कानून 'बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम' का उल्लंघन हो चुका होता है. इसका उल्‍लंघन करने पर भी कड़े प्रावधान किए गए हैं, लेकिन हर साल सरकार खुद ही यह बताती है कि उसने देश में लाखों बाल विवाह होने से रोके हैं.

  • नवरात्रि में नारी शक्ति की यह कैसी पूजा ?

    नवरात्रि में नारी शक्ति की यह कैसी पूजा ?

    नवरात्रि  में हमारा समाज कन्याओं की पूजा करता आया है. उन्हें भोजन पर आमंत्रित किया जाता है. चरण धोकर स्वागत किया जाता है.

  • माफ कीजि‍ए, मैं यह पुरस्‍कार नहीं ले सकता!

    माफ कीजि‍ए, मैं यह पुरस्‍कार नहीं ले सकता!

    खेती-किसानी करने वाला एक सामान्‍य व्यक्ति मुख्यमंत्री के हाथों मिलने जा रहा सम्मान लौटा दे तो चर्चा होना स्वाभाविक ही है. असहिष्णुता के मुद्दे पर नामचीन साहित्यकारों ने पुरस्‍कार वापस कर दि‍ए थे, इसकी खूब प्रतिक्रिया भी हुई थी. हाल-फि‍लहाल एक किसान द्वारा पुरस्‍कार लेने से मना कर देना का यह पहला मामला है. यह कि‍सान हैं बाबूलाल दाहिया.

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