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Ravish kumar


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  • माँ-बहन की गालियों पर मां-बहन ही चुप हैं, क्यों चुप हैं?

    माँ-बहन की गालियों पर मां-बहन ही चुप हैं, क्यों चुप हैं?

    मैंने देखा तो नहीं कि उस खेमे की महिला नेताओं और समर्थकों ने कभी इन गालियों का प्रतिकार किया हो. विरोध किया हो. यहाँ तक कि जब महिला पत्रकारों को गालियाँ दी जाती हैं उसका भी विरोध नहीं करती हैं. इस तरह माँ बहन की गालियाँ देने वालों को उस दल की माँ बहन का भी समर्थन प्राप्त हैं. पहली बार माँ और बहने माँ बहनों के नाम पर दी जाने वाली गालियों का समर्थन कर रही हैं. उस दल की सभी माँ बहनों को मैं अपनी माँ और बहन मानता हूँ. तमाम गालियाँ आप सभी के लिए पेश करता हूँ जो मुझे दी जा रही हैं.

  • निजी चैनल के बैनर को लेकर रवीश ने की टिप्पणी, कहा- रवीश का टाइम कभी खत्म नहीं होने वाला 

    निजी चैनल के बैनर को लेकर रवीश ने की टिप्पणी, कहा- रवीश का टाइम कभी खत्म नहीं होने वाला 

    पत्रकारिता में तब भी आम आदमी कोई रवीश जैसा ही कोई ढूंढ़ेंगे. गौरतलब है कि शनिवार को NDTV इंडिया को बेस्ट न्यूज चैनल ऑफ द ईयर के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है. ENBA अवॉर्ड्स 2018 में इसकी घोषणा की गई. इस मौके पर NDTV इंडिया के रिपोर्टर सौरभ शुक्ला को यंग प्रोफेशनल ऑफ द ईयर (एडिटोरियल हिंदी) चुना गया. NDTV इंडिया की तरफ से यह पुरस्कार लेने के लिए रवीश कुमार के साथ-साथ NDTV इंडिया की पूरी टीम मौजूद थी.

  • कश्मीरी छात्रों की मदद के लिए आगे आया सीआरपीएफ, मेरे फोन पर ट्रोल अटैक

    कश्मीरी छात्रों की मदद के लिए आगे आया सीआरपीएफ, मेरे फोन पर ट्रोल अटैक

    आईटी सेल का काम शुरू हो गया है. मेरा, प्रशांत भूषण, जावेद अख़्तर और नसीरूद्दीन शाह के नंबर शेयर किए गए हैं. 16 फरवरी की रात से लगातार फोन आ रहे हैं. लगातार घंटी बजबजा रही है. वायरल किया जा रहा है कि मैं जश्न मना रहा हूं. मैं गद्दार हूं. पाकिस्तान का समर्थक हूं.

  • NDTV इंडिया बना बेस्ट न्यूज चैनल ऑफ द ईयर, रवीश ने कहा- हम न भीड़ बनते हैं और न भीड़ बनाते हैं

    NDTV इंडिया बना बेस्ट न्यूज चैनल ऑफ द ईयर, रवीश ने कहा- हम न भीड़ बनते हैं और न भीड़ बनाते हैं

    NDTV इंडिया को बेस्ट न्यूज चैनल ऑफ द ईयर के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है. ENBA अवॉर्ड्स 2018 में इसकी घोषणा की गई. इस मौके पर NDTV इंडिया के रिपोर्टर सौरभ शुक्ला को यंग प्रोफेशनल ऑफ द ईयर (एडिटोरियल हिंदी) चुना गया.

  • आक्रोश जायज़ है पागलपन नहीं

    आक्रोश जायज़ है पागलपन नहीं

    केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल ने शहीदों की सूची जारी की है. एक तरफ शहीदों के नाम हैं. बगल में गांव, कस्बे और ज़िले का पता है. सबसे किनारे उन पत्नियों के नाम हैं जिनके फोन नंबर हैं. इन्हीं नंबरों पर पतियों के होने का फोन आता रहा होगा, इन्हीं नंबरों पर अंतिम बार सूचना आई होगी.

  • अर्ध सैनिक बलों को पूर्ण सैनिक का सम्मान मिले इसके लिए भी लड़ें हम

    अर्ध सैनिक बलों को पूर्ण सैनिक का सम्मान मिले इसके लिए भी लड़ें हम

    सीआरपीएफ हमेशा युद्धरत रहती है. माओवाद से तो कभी आतंकवाद से. साधारण घरों से आए इसके जाबांज़ जवानों ने कभी पीछे कदम नहीं खींचा. ये बेहद शानदार बल है. इनका काम पूरा सैनिक का है. फिर भी हम अर्ध सैनिक बल कहते हैं. सरकारी श्रेणियों की अपनी व्यवस्था होती है. पर हम कभी सोचते नहीं कि अर्ध सैनिक क्या होता है. सैनिक होता है या सैनिक नहीं होता है. अर्ध सैनिक?

  • दौरा, दौरा, दौरा, दौड़ते ही रह गए प्रधानमंत्री, कार्यकाल का एक तिहाई इसी में कटा

    दौरा, दौरा, दौरा, दौड़ते ही रह गए प्रधानमंत्री, कार्यकाल का एक तिहाई इसी में कटा

    प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल का कितना हिस्सा यात्राओं में बिताया इसे लेकर स्क्रोल और दि प्रिंट ने दो रिपोर्ट की है. स्क्रोल की रिपोर्ट आप ज़रूर देखें. इसलिए भी कि किस तरह डेटा जर्नलिज़्म किया जा सकता है.

  • सीएजी की रिपोर्ट से सरकार को क्या क्लीन चिट?

    सीएजी की रिपोर्ट से सरकार को क्या क्लीन चिट?

    आज गजब हो गया. राफेल पर सीएजी की रिपोर्ट तो आई, मगर सार्वजनिक होकर भी गोपनीय नज़र आई. अभी तक दि वायर और हिन्दी में गोपनीय रिपोर्ट सार्वजनिक हो रही थी मगर आज सार्वजनिक होकर भी रिपोर्ट के कई अंश गोपनीय नज़र आए. सीएजी ने यूरो और रुपये के आगे संख्या की जगह अंग्रेज़ी वर्णमाला के वर्म लिखे हैं. इस तरह रिपोर्ट पढ़ते हुए आपको ये तो दिखेगा कि मिलियन और बिलियन यूरो लिखा है मगर मिलियन के आगे जो कोड इस्तेमाल किए हैं उसे पढ़ने के लिए जग्गा जासूस को हायर करना पड़ेगा. आप पेज 120 और 121 पर जाकर देखिए. राफेल विमान कितने में खरीदा गया, कितने का प्रस्ताव था इनकी जगह जो संकेत चिन्ह लिखे गए हैं, उन्हें पढ़ने के लिए आईआईटी में एडमिशन लेकर फेल होना ज़रूरी है.

  • कार्टून कैरेक्टर की भाषा बोल रफाल विवाद पर लीपापोती कर गई CAG

    कार्टून कैरेक्टर की भाषा बोल रफाल विवाद पर लीपापोती कर गई CAG

    सोचिए 6 फरवरी तक रक्षा मंत्रालय बता रहा है कि डील को लेकर कीमतों के बारे में नहीं बताना है. 13 फरवरी को रिपोर्ट संसद में रखी जाती है. आप चाहें तो अनुमान लगा सकते हैं कि यह सब मैनेज किए जाने की निशानी है या सीएजी आखिरी वक्त तक काम करती है. वैसे मंत्री लोग ही अलग अलग चरणों में दाम बता चुके थे.

  • बेरोज़गारी के आंकड़े क्यों छुपा रही है सरकार?

    बेरोज़गारी के आंकड़े क्यों छुपा रही है सरकार?

    बेरोज़गारी से ही कहना होगा कि अगर वह कहीं है तो सरकार को दिख जाए. क्योंकि सरकार के पास नौकरियों के जो आंकड़े हैं उससे लगता है कि बेरोज़गार नौकरी लेकर मुझसे व्हाट्सऐप मैसेज से मज़ाक करते रहते हैं कि हमारी ख़बर दिखा दीजिए.

  • रफ़ाल विमान सौदे में नियम ताक़ पर रखे गए?

    रफ़ाल विमान सौदे में नियम ताक़ पर रखे गए?

    रफाल मामले की कहानी 360 डिग्री घूम कर फिर से वहीं पहुंच गई है. क्या ऐसा सुना था आपने कि पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में रक्षा मामले की मंत्रिमंडल समिति जिन शर्तों के साथ डील को पास करे, उसके कुछ दिनों बाद रक्षा मंत्रालय की समिति उन शर्तों को हटा दे.

  • किसके लिए रफाल डील में डीलर और कमीशनखोर पर मेहरबानी की गई?

    किसके लिए रफाल डील में डीलर और कमीशनखोर पर मेहरबानी की गई?

    सरकार बार-बार कहती है कि रफाल डील में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है. वही सरकार एक बार यह भी बता दे कि रफाल डील की शर्तों में भ्रष्टाचार होने पर कार्रवाई के प्रावधान को क्यों हटाया गया? वह भी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक में इसे हटाया गया.

  • रफाल का एक और सच हुआ बाहर

    रफाल का एक और सच हुआ बाहर

    इस नोटिंग में रक्षा सचिव इस बात पर एतराज़ ज़ाहिर करते हैं कि अगर प्रधानमंत्री कार्यालय को भरोसा नहीं है तो वह डील के लिए अपनी कोई नई व्यवस्था बना ले. जाहिर है जो कमेटी कई साल से काम कर रही है, अचानक उसे बताए बगैर या भंग किए बगैर प्रधानमंत्री कार्यालय सक्रिय हो जाए तो किसी को भी बुरा लगेगा.

  • प्रधानमंत्री मोदी ने भी 356 लगाकर विरोधी दल की सरकारें गिराई हैं

    प्रधानमंत्री मोदी ने भी 356 लगाकर विरोधी दल की सरकारें गिराई हैं

    प्रधानमंत्री मोदी इस आधार पर भाषण की शुरूआत करते हैं कि जनता को सिर्फ वही याद रहेगा जो वह उनसे सुनेगी. उनका यकीन इस बात पर लगता है और शायद सही भी हो कि पब्लिक तो तथ्यों की जांच करेगी नहीं, बस उनके भाषण के प्रवाह में बहती जाएगी. इसलिए वे अपने भाषण से ऐसी समां बांधते हैं जैसे अब इसके आर-पार कोई दूसरा सत्य नहीं है. लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाब में उनका लंबा भाषण टीवी के ज़रिए प्रभाव डाल रहा था मगर इस बात से बेख़बर कि जनता जब तथ्यों की जांच करेगी तब क्या होगा.

  • चिट फंड घोटाला पीड़ितों को राहत के लिए कोई क़ानून क्यों नहीं बना?

    चिट फंड घोटाला पीड़ितों को राहत के लिए कोई क़ानून क्यों नहीं बना?

    गुजरात की आबादी 6 करोड़ से कुछ अधिक है. कल्पना कीजिए पूरे राज्य के लोगों को एक कंपनी ठग ले और राज्य की तमाम संस्थाएं कुछ न कर सकें. पीएसीएल कंपनी ने 5 करोड़ 85 लाख लोगों के लाखों करोड़ लूट लिए. तीन साल हो गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मगर वही आदेश पूरी तरह लागू नहीं हो सका और लोगों के पैसे नहीं मिल सके.

  • सबकी लापरवाही ने मिलकर ली थी अमृतसर में 58 लोगों की जान

    सबकी लापरवाही ने मिलकर ली थी अमृतसर में 58 लोगों की जान

    रिपोर्ट की ईमानदारी बताती है कि किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले वह उन प्रक्रियाओं को खोजती है जिससे छेडछाड़ करने के नतीजे में 58 लोग कटकर मर जाते हैं. क्या पता इन लापरवाहियों के कारण आज भी इसी तरह की ट्रेन दुर्घटनाएं हो रही हों. अगर आप इस रिपोर्ट में किसी एक को नाप देने की हेडलाइन खोज रहे हैं तो निराशा होगी लेकिन यह रिपोर्ट किसी एक को भी नहीं छोड़ती है.

  • चिट फंड कंपनियों के पीड़ितों की चिंता किसे?

    चिट फंड कंपनियों के पीड़ितों की चिंता किसे?

    ये बेहद आम लोग होते हैं जो न ट्विटर पर आकर अपने मुद्दे को ट्रेंड करा सकते हैं और न ही टीवी चैनलों के सामने रो सकते हैं. हमने 4 फरवरी के प्राइम टाइम में पर्ल एग्रोटेक कोरपोरेशन लिमिटेड के पीड़ितों की कहानी बताई थी.

  • बीमा का मतलब अस्पताल और इलाज नहीं होता है, कुछ और होता है

    बीमा का मतलब अस्पताल और इलाज नहीं होता है, कुछ और होता है

    हर साल बजट आता है. हर साल शिक्षा और स्वास्थ्य में कमी होती है. लोकप्रिय मुद्दों के थमते ही शिक्षा और स्वास्थ्य पर लेख आता है. इस उम्मीद में कि सार्वजनिक चेतना में स्वास्थ्य से जुड़े सवाल बेहतर तरीके से प्रवेश करेंगे. ऐसा कभी नहीं होता. लोग उसे अनदेखा कर देते हैं. इंडियन एक्सप्रेस में लोक स्वास्थ्य पर काम करने वाली प्रोफेसर इमराना क़ादिर और सौरिन्द्र घोष के लेख को अच्छे से पेश किया गया है ताकि पाठकों की नज़र आए. इस लेख के कुछ बिन्दु इस प्रकार हैं-

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