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Ravish kumar News in Hindi


'Ravish kumar' - more than 1000 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • दिल्ली के दंगों में जाति, मजहब से ऊपर भी कई इंसान दिखे

    दिल्ली के दंगों में जाति, मजहब से ऊपर भी कई इंसान दिखे

    दिल्ली दंगों के बीच जब दंगाइयों को मज़हब और राजनीति के हिसाब से बांटकर देखा जा रहा है तभी ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने सनक के इस भयंकर दौर में भी बंटने और बांटने की राजनीति से इनकार कर दिया. दिल्ली दंगे को कवर करने गए कई पत्रकारों ने लिखा है कि हिन्दू और मुसलमान के बीच ऐसा भयंकर दंगा कभी नहीं देखा. उन्हें लगा है कि भरोसे की हर दीवार ढहा दी गई है. लेकिन उन्हीं खंडहरों से ऐसी कहानियां भी निकलकर आ रही हैं जो यकीन पैदा करती हैं कि दिल्ली अपनी इस ग़लती पर अफ़सोस करेगी और भरोसे की नई दीवार भी बनेगी.

  • दिल्ली की हिंसा पर काबू पाने में इतना समय क्यों लगा?  

    दिल्ली की हिंसा पर काबू पाने में इतना समय क्यों लगा?  

    बड़े नेता बोलने लगे हैं हेडलाइन अब बड़ी होने लगेगी और आम लोगों की तकलीफें छोटी होने लग जाएंगी. उनके बयानों से जगह भर जाएगी और जिनकी दुकानें जली हैं, घर वाले मारे गए हैं और जो अस्पताल के बिस्तर पर ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे हैं उनके लिए जगह कम बचेगी.

  • दिल्‍ली में इस हिंसा को क्‍यों बढ़ने दिया गया?

    दिल्‍ली में इस हिंसा को क्‍यों बढ़ने दिया गया?

    मंगलवार को दिल्ली शांत नहीं हो सकी है. जैसे ही लगता है कि हालात सामान्य हो रहे हैं, कहीं और से हिंसा और घायलों की खबरें आने लगती हैं. इस हिंसा को नहीं रोक पाने के लिए कौन ज़िम्मेदार है. यह सवाल गृहमंत्री अमित शाह से शुरू होता है, फिर पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक पर जाता है फिर उप राज्यपाल और फिर मौके पर तैनात पुलिस पर पहुंचते ही दोनों पक्षों में बंट जाता है, जो अपना संतुलन खो चुके हैं और पथराव से लेकर गोलीबारी पर उतर आए हैं.

  • ट्रंप का भारत दौरा और दिल्ली में ये हिंसा!

    ट्रंप का भारत दौरा और दिल्ली में ये हिंसा!

    ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक हाईप्रोफाल राष्ट्रीय मेहमान भारत आया हो और भारत की राजधानी दिल्ली में दंगे हो रहे हों. ये और बात है कि इस हिंसा की प्रशासनिक ज़िम्मेदारी अब के मीडिया समाज में किसी की नहीं होती है, फिर भी ये बात दुखद तो है ही कि हम किस तरह की राजधानी दुनिया के सामने पेश करना चाहते हैं.

  • राजद्रोह जैसा आरोप लगाना कुछ ज्यादा नहीं है?

    राजद्रोह जैसा आरोप लगाना कुछ ज्यादा नहीं है?

    एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूं. यह कहानी आपको याद दिलाएगी कि हम कहां से कहां आ गए हैं. यह हालत हो गई है कि उस मुल्क का नाम सुनते ही इस मुल्क के होश उड़ने लगे हैं. जो अधिकारी अपना काम शायद ही कभी ठीक से कर पाते हों वो तुरंत केस दर्ज कर हीरो बन जाते हैं. राजद्रोह ही लगता है इस वक्त का सबसे प्रचलित अपराध है. पब्लिक लड़की के घर भी चली जाती है और पत्थर मारने लगती है. हम बंगलूरू की अमूल्या को लेकर ही बात करना चाहते हैं.

  • क्या समिति और NGO से चलने लगा है विदेश मंत्रालय

    क्या समिति और NGO से चलने लगा है विदेश मंत्रालय

    एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार की ज़ुबान फिसल गई और उन्होंने नागरिक अभिनंदन समिति का नाम ले लिया.

  • क्या है फेक न्यूज का नया सरगना डीप फेक वीडियो?

    क्या है फेक न्यूज का नया सरगना डीप फेक वीडियो?

    झूठ के पैर नहीं होते लेकिन टेक्नालॉजी ने झूठ को ताकतवर बना दिया है. अभी ही हम जैसे लोग परेशान हैं कि जो बात कहीं नहीं होती वो भी तस्वीर के साथ लिखकर वायरल हो रहा होता है. आल्ट न्यूज़ जैसी साइट वायरल तस्वीर और वायरल वीडियो के पीछे का झूठ तो पकड़ लेते हैं लेकिन वो उन सभी के पास नहीं पहुंच पाता है जिनके व्हाट्स ऐप के इनबाक्स में झूठ पहुंचा होता है.

  • क्या ऐसे ट्रंप की नजरों से छुप जाएगी गरीबी?

    क्या ऐसे ट्रंप की नजरों से छुप जाएगी गरीबी?

    अभी तो माहौल जम रहा था कि अमेरिका से राष्ट्रपति ट्रंप का जहाज़ उड़ेगा और न्यूज़ चैनलों पर ईवेंट कवरेज का मजमा जमेगा..सूत्रों के हवाले से खूब हलवे बनाए जाएंगे, कुछ बातों का पता होगा, कुछ का पता ही नहीं होगा लेकिन तभी आज ट्रंप साहब ने होली जैसे बन रहे मूड को बिगाड़ दिया. उन्हें सोचना चाहिए था कि हम कुछ न पता चले उसके लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं. जबकि हमें पता है कि ट्रंप साहब के पास ड्रोन कैमरा है. इसके बाद भी हमने दीवार बनाई ताकि गरीबों का घर न दिखे. अब ट्रंप साहब कार से उतरकर ड्रोन तो उड़ाएंगे नहीं. इस दीवार से अलग एक और दीवार है. मोटेरा स्टेडियम की तरफ. उस बस्ती की दीवार को रंगा जा रहा है, ईस्टमैन कलर वाले लुक में.

  • क्या कोरोना वायरस से लड़ने के लिए दुनिया और भारत सक्षम हैं?

    क्या कोरोना वायरस से लड़ने के लिए दुनिया और भारत सक्षम हैं?

    न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि उनका विश्लेषण बताता है कि कोरोना वायरस के कारण चीन में करीब 15 करोड़ की आबादी सरकारी पाबंदी में है कि वे अपने घरों से कितने दिनों में और कितनी देर के लिए घर से बाहर निकल सकते हैं. घर से बाहर निकलने पर उनके शरीर का तापमान चेक होता है, डॉक्टर चेक कर एक प्रमाण देता है, फिर परिचय पत्र दिखाना होता है तब कोई सोसायटी से बाहर अपने पड़ोस में जा पाता है. एक समय में घर से एक ही आदमी बाहर जा सकता है. वो भी रोज़ नहीं.

  • हमारे देश में क़ानून का डर कितना बचा है?

    हमारे देश में क़ानून का डर कितना बचा है?

    जस्टिस अरुण मिश्रा ने टेलिकॉम मामले की सुनवाई के समय कह दिया कि इस देश में कोई कानून नहीं बचा है. बेहतर है इस देश में रहा ही नहीं जाए, बल्कि यह देश ही छोड़ दिया जाए. मैं विक्षुब्ध हूं. लग रहा है कि इस कोर्ट के लिए काम ही न करूं. कोर्ट की नाराज़गी इस बात को लेकर थी कि टेलिकॉम मंत्रालय के डेस्क अफसर ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी. ज़ाहिर सी बात है. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर कोई अफसर रोक लगा सकता है.

  • सरकार जब पीछे पड़ जाए तो क्या होता है?

    सरकार जब पीछे पड़ जाए तो क्या होता है?

    एक सरकार किसी के पीछे पड़ जाए तो वह क्या-क्या कर सकती है यह जानना हो तो इस वक्त एक कहानी काफी है. डॉ. कफ़ील ख़ान की कहानी. सोमवार को अलीगढ़ के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ज़मानत देते हैं लेकिन उन्हें 72 घंटे तक रिहा नहीं किया जाता है. 72 घंटे बाद यूपी की पुलिस को ख्याल आता है और वह डॉ. कफील ख़ान पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा देती है जिसके तहत 1 साल तक जेल में रखा जा सकता है.

  • ट्रंप से असलियत छुपाने की कोशिश क्यों?

    ट्रंप से असलियत छुपाने की कोशिश क्यों?

    अहमदाबाद की एक झुग्गी न दिखे इसके लिए दीवार न बनाई जाए. नई बन रही आधी किलोमीटर लंबी यह दीवार अहमदाबाद एयरपोर्ट से गांधीनगर की ओर बनाई जा रही है. इस दीवार के पीछे सरानियावास नाम की एक झुग्गी बस्ती है. यहां के लोग अचानक से दीवार बनते देख हैरान भी हैं और चिन्तित भी. उनके आने जाने का रास्ता एक तरफ से बंद हो जाएगा. यह दीवार इसलिए बनाई जा रही है कि जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आएं तो उन्हें यह झुग्गी न दिखे. 

  • जामिया के छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई पर सवाल

    जामिया के छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई पर सवाल

    अगर मामूली चोटें ही आईं तो फिर वे 5 छात्र कौन से हैं, जिनके अल शिफा अस्पताल में अभी भी भर्ती होने का दावा किया जा रहा है. कई छात्रों ने सांस लेने में तकलीफ की गंभीर शिकायत की है. ये सारी जानकारी जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी की प्रेस कांफ्रेंस में दी गई.

  • दिल्ली नतीजे : माई नेम इज केजरीवाल एंड आई एम नॉट अ टेररिस्‍ट

    दिल्ली नतीजे : माई नेम इज केजरीवाल एंड आई एम नॉट अ टेररिस्‍ट

    एक मुख्यमंत्री को आतंकवादी बताना एक ऐसा प्रयोग था जो संयोग से फेल कर गया. दिल्ली की जनता ने केजरीवाल से कहा कि हम आपको जानते हैं और आप आतंकवादी नहीं हैं. आम आदमी पार्टी ने 60 से अधिक सीटें जीतकर बता दिया कि बीजेपी के सैकड़ों सांसदों, दर्जनों मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की सभा काम नहीं आई.

  • गार्गी कॉलेज में छात्राओं से बदसलूकी पर चुप्‍पी क्‍यों?

    गार्गी कॉलेज में छात्राओं से बदसलूकी पर चुप्‍पी क्‍यों?

    जब शहर में एक बार भीड़ बनती है तो वो एक चुनाव से गायब नहीं होती. वो उन घरों में रहती है जहां उन्हें पनाह मिलती है. अगर जेएनयू मामले में दिल्ली पुलिस ने अपना काम निष्पक्षता से किया होता तो इतनी जल्दी एक और भीड़ गार्गी कॉलेज के कैंपस में धावा नहीं बोलती. लड़कियों के कॉलेज में सैकड़ों की संख्या में मर्दों की भीड़ घुस आती है

  • तथ्यों और संदर्भों से जूझता प्रधानमंत्री का भाषण

    तथ्यों और संदर्भों से जूझता प्रधानमंत्री का भाषण

    दो सीरयस बाते हैं. प्रधानमंत्री के भाषण में फेकिंग न्यूज वेबासाइट की बात कैसे आ गई और दूसरा क्या प्रधानमंत्री नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में नेहरू-लियाकत पैक्ट का जिक्र सही तरीके से कर रहे हैं?

  • क्या शाहीन बाग से मुगल राज आ जाएगा?

    क्या शाहीन बाग से मुगल राज आ जाएगा?

    शाहीन बाग का धरना शांतिपूर्ण ही रहा, कोई हिंसा नहीं हुई फिर भी इस धरने को लेकर सरकार के मंत्री से लेकर बीजेपी के सांसदों ने क्या-क्या नहीं कहा. इस धरने को लेकर खतरे की ऐसी-ऐसी कल्पना पेश की गई जैसे लगा कि भारत में कोई शासन व्यवस्था ही नहीं है. किसी मोहल्ले की भीड़ आकर दिल्ली पर मुगल राज कायम कर देगी. मुगलों का राज मोहल्ले से नहीं निकला था. इतिहास का इस तरह से देखा जाना आबादी के उस हिस्से को बीमार करने लगेगा जिन्हें यह समझाया जा रहा है कि एक मोहल्ले में धरने पर बैठे लोग हिन्दुस्तान जैसे विशाल मुल्क पर मुगल राज कायम कर देंगे. इस शाहीन बाग को बदनाम करने के लिए क्या-क्या नहीं हुआ.

  • क्या कभी स्कूली शिक्षा पर भी लड़ा जाएगा चुनाव?

    क्या कभी स्कूली शिक्षा पर भी लड़ा जाएगा चुनाव?

    90 के दशक के आखिरी हिस्से से अचानक भारत की राजनीति को बिजली सड़क पानी के मुद्दे से पहचाना जाने लगा. इससे बिजली और सड़क का कुछ भला तो हुआ लेकिन पानी पीछे छूट गया. शिक्षा और स्वास्थ्य का तो नंबर ही नहीं आया. दिल्ली विधानसभा का चुनाव शायद पहला चुनाव है जिसमें शिक्षा का सवाल केंद्र में आते आते रह गया. बेशक दिल्ली का चुनाव स्कूल से शुरू होता है लेकिन शाहीन बाग को पाकिस्तान, गद्दार और आतंकवाद से जोड़ने की सियासी आंधी के कारण पिछड़ता जा रहा है. हिन्दी प्रदेशों के लिए जिनमें से दिल्ली शिक्षा का आखिरी पड़ाव है, यह मुद्दा नई राजनीति को जन्म दे सकता है या दे सकता था. बिहार यूपी और अन्य हिन्दी प्रदेशों से शिक्षा के कारण भी लाखों लोगों का पलायन हुआ है. लोगों ने खराब स्कूलों और कॉलेज की कीमत इतनी चुकाई है कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए शहर बदलने लगे और ट्यूशन और कोचिंग का खर्चा उनकी ज़िंदगी की जमा पूंजी निगल गया. स्कूल अगर राजनीति के केंद्र में आता है तो यह मसला दिल्ली सहित हिन्दी प्रदेशों की राजनीति बदल देगा.

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