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Sanjay kishor blog


'Sanjay kishor blog' - 47 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • नून रोटी खाएंगे, मोदिए को ले आएंगे...

    नून रोटी खाएंगे, मोदिए को ले आएंगे...

    भाजपा और सहयोगी दलों के सांसदों को भी इस बार ये बात समझ लेनी चाहिए कि उन्होंने नरेंद्र दामोदर दास मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया, मोदी ने उन्हें संसद तक पहुंचाया है. अमेठी के आसमान में सुराख स्मृति ईरानी ने नहीं किया है.

  • सोलह साल: कुछ हसीन और कुछ ज़ालिम 

    सोलह साल: कुछ हसीन और कुछ ज़ालिम 

    आज सोलह साल हो गए. जीवन में मज़दूर दिवस एक ख़ास तारीख़ बन गई है. डेढ़ दशक जमा एक साल के इस सफ़र में कई दफे नई तारीख़ से रुबरू हुआ. नए और लुभावने मौक़ों से तार्रुफ़ हुआ, लेकिन जिसे ज़िंदगी के बेहतरीन साल समर्पित कर दिए, उससे बेवफ़ाई करने का जी नहीं चाहा. कुछ लगाव रहा और कुछ मजबूरियां भी और साथ लंबा होता चला गया.

  • दिक्कत क्या है विराट कोहली की आक्रामकता में...

    दिक्कत क्या है विराट कोहली की आक्रामकता में...

    सौरव गांगुली ने आंख में आंख डालकर बात करना सिखाया तो टीम इंडिया ने जीतना भी सीखा. महेंद्र सिंह धोनी की ‘कूलनेस’ में भी आक्रामकता थी.अब विराट कोहली सीने टकरा रहे हैं. कोहली का सीना उस 56 इंच की तरह खोखला नहीं हैं जहां से सिर्फ बातें और वादे निकलते हैं. इस सीने के अंदर आग है जो सिर्फ जीत से बुझना चाहती है. कामयाबी के लिए ये आत्मविश्‍वास भी जरूरी है-'तुम एक स्टैंडिंग कप्तान हो और मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़!' कोहली ने ये कहा हो या न कहा हो, बंदे में क़ुव्वत है तभी दंभ भी दिखा रहा है.

  • FIFA WORLD CUP: जब पिछली बार मिस्र की टीम यहां थी तब सालाह पैदा भी नहीं हुए थे

    FIFA WORLD CUP: जब पिछली बार मिस्र की टीम यहां थी तब सालाह पैदा भी नहीं हुए थे

    जब बॉल सालाह के बूट से टकराकर गोलपोस्ट के भीतर जाती है, तो लिवरपूल फुटबॉल क्लब स्टेडियम का नज़ारा कुछ ऐसा हो उठता है - पहले जश्न और शोर, फिर कुछ क्षण की खामोशी, फिर हाथ आसमान की तरफ उठता है खुदा को शुक्रिया कहने के लिए, और फिर जब वह धरती को चूमता है, तो उन लम्हों की पवित्रता के लिए ज़रूरी शांति का उसके प्रशंसक सम्मान करते हैं.

  • हमारा नेता कैसा हो – नॉर्थईस्ट का जवाब, ‘टशनी’ हो...

    हमारा नेता कैसा हो – नॉर्थईस्ट का जवाब, ‘टशनी’ हो...

    'मॉर्निंग वॉक' के समय 'वॉक' कम, 'टॉक' ज़्यादा होने लगा है. पहले यह बीमारी 'काउ बेल्ट' तक सीमित थी, जहां हर चर्चा राजनीति से शुरू होकर राजनीति पर खत्म होती है. इसलिए भी, क्योंकि छोटे शहरों में भागमभाग कम है और समय ज़्यादा. फुर्सत ही फुर्सत. लिहाज़ा, चाय की चुस्की के साथ राजनीति पर बहसबाज़ी सबसे पसंदीदा शगल है.

  • मेरे हिस्से की श्रीदेवी

    मेरे हिस्से की श्रीदेवी

    अस्सी के दशक के शुरुआती साल थे. बाज़ार में VHS नया-नया आया था. आज जैसे हर गली और नुक्कड़ पर सेल-फ़ोन की दुकानें हैं. ठीक उसी तरह वीडियो पार्लर कुकुरमुत्तों की भांति मानों रातो-रात उग आए थे. धक्के खाकर बदमिजाज ब्लैकिए से महंगे टिकट खरीदने की बजाए, 10 रुपये में पूरा परिवार घर के सुकून में पूरी फ़िल्म देख रहा था. जो वीसीआर-वीडियो कैसेट्स रिकॉर्डर खरीद नहीं पाए वे भाड़े पर ले आते और 3 से 4 फ़िल्म एक ही रात में देख जाते.

  • 'वरियर' और 'वॉरियर' की कशमकश

    'वरियर' और 'वॉरियर' की कशमकश

    नाम में 'किशोर' जोड़ लेने से कुदरत की अदालत से उम्र पर 'स्टे ऑर्डर' थोड़े ही मिल जाता है... ज़िन्दगी का अर्द्धशतक कुछ ही साल के फासले पर इंतज़ार कर रहा है... 'मिड-लाइफ क्राइसिस' जैसी कोई बात नहीं है, शायद इसलिए, क्योंकि बचपना बचा हुआ है.

  • 'दुनिया रखूं जूतों के नीचे' वाले विराट कोहली... 'व्हॉट अ गाई!'

    'दुनिया रखूं जूतों के नीचे' वाले विराट कोहली... 'व्हॉट अ गाई!'

    'व्हॉट अ गाई!' शतक दर शतक के बाद हीरोइन हैरान थी. जवाब में ऐतिहासिक जीत के बाद हीरो ने दुनिया के सामने एक बार फिर अपने इश्क़ का इज़हार कर दिया... “यह दौरा काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. मैदान के बाहर के लोगों को इसका श्रेय मिलना चाहिए. मेरी पत्नी मुझे लगातार प्रेरित करती रहती है उसे भी काफी श्रेय दिया जाना चाहिए.”

  • एक 'कनखी' पर फिदा समूचा देश...

    एक 'कनखी' पर फिदा समूचा देश...

    एक मुस्कान पर देश न्योछावर हुए जा रहा है. पलक की एक झपकन करोड़ों दिलों से आहें भरवा रही है. केरल के त्रिशूर के विमला कॉलेज की 18 साल की बीकॉम की छात्रा और आने वाली एक मलयालम फ़िल्म की नायिका प्रिया प्रकाश वारियर ने सिर्फ़ 24 घंटों में सोशल मीडिया के जरिए दिलों को जीत लिया. जनमानस पर छा गयीं. नेशनल क्रश बन गयीं.

  • खेल के मैदान पर कोच होता है शिक्षक

    खेल के मैदान पर कोच होता है शिक्षक

    खेल के मैदान पर कोच शिक्षक होता है. कोच का ईमानदार प्रयास और खिलाड़ी की मेहनत से ही कामयाबी की कहानी लिखी जाती है. एक अकेले शख्स पुलेला गोपीचंद की प्रतिबद्धता ने भारतीय बैडमिंटन को बदल दिया है. भारतीय बैडमिंटन में सुनहरे युग की शुरुआत हो चुकी है. वर्ल्ड और ओलिंपिक सिल्वर मेडलिस्ट पीवी सिंधु और ओलिंपिक कांस्य पदक विजेता साइना नेहवाल इन्‍हीं गोपीचंद की शागिर्द हैं.

  • हिटलर के सम्मान को ठुकराने वाले 'दद्दा' को देश ने क्या दिया?

    हिटलर के सम्मान को ठुकराने वाले 'दद्दा' को देश ने क्या दिया?

    हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को देश वो सम्मान आज भी नहीं दे पाया है जो दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह एडॉल्फ़ हिटलर तक के प्रस्ताव को ठुकरा आया था.

  • ब्रो कोहली, वर्ल्ड कप में आपके 'लड़कों' को इस 'आदमी' की ज़रुरत पड़ेगी!

    ब्रो कोहली, वर्ल्ड कप में आपके 'लड़कों' को इस 'आदमी' की ज़रुरत पड़ेगी!

    कल मैच देखने बैठ गया. बहुत दिनों बाद हुआ कि टेलीविजन स्क्रीन के सामने से उठ नहीं पाया. आमतौर पर स्पोर्ट्स रिपोर्टर से लोग रश्क करते हैं-क्या नौकरी है!

  • पापा, यहां 'ढंग' का कोई है भी?

    पापा, यहां 'ढंग' का कोई है भी?

    सच है कि हम अपने बच्चों को भीड़ का हिस्सा नहीं बनाना चाहते. हर मां-बाप की ख़्वाहिश होती है कि उनके बच्चे भीड़ नहीं, भीड़ में चेहरा बनें. लेकिन किसी भी हालत में कल इन्हें भीड़ का सामना तो करना ही पड़ेगा, जहां हर क़िस्म की शख्सियतें मिलेंगी. एक न एक दिन बच्चों पर से हमें अपना सुरक्षा चक्र हटाना होगा. ये आवरण एकाएक हटेगा तो ज़्यादा तकलीफ़देह हो सकता है. इसलिए समय-समय पर 'एक्सपोज़र' जरुरी है.

  • आख़िर नाम भी तो संजय है...

    आख़िर नाम भी तो संजय है...

    "मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता'. खीज के साथ झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी. कंप्यूटर पर अक्षर धुंधले नज़र आ रहे थे. आंखें फैलाई. मिचमिचाई. मल कर भी देखी. वाशरूम जाकर पानी से धो भी ली. (दिल्ली में 23 साल से रहते-रहते "बाथरूम" कब "वाशरूम" बन गया पता ही नहीं चला.)

  • माया के लिए अब अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे

    माया के लिए अब अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे

    साल 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 640,867 गांव हैं. देश की 68.84 फीसदी आबादी गांवों में रहती है. 26% लोग गरीबी रेखा के अंतरराष्ट्रीय मानक से नीचे रहते हैं. इनसे आप स्मार्टफोन चलाने और कैशलेस बनने की बात कर रहे हैं. अरे मित्रो, इनके पास दो जून का खाना जुटाना भी मुश्किल होता है.

  • राष्ट्रगान की गरिमा को मत गिराइए

    राष्ट्रगान की गरिमा को मत गिराइए

    जरा सोचिए कि दादा कोंडके की मूवी के पहले राष्ट्रगान बजाया जाता तो क्या इससे राष्ट्रगान की गरिमा नहीं गिरती! आप सनी लियोनी की फिल्म के दर्शकों को राष्ट्रगान बजाकर खड़ा करवाएंगे!

  • स्कर्ट की लंबाई के भी मायने... नजरिया और निगाह बदलें

    स्कर्ट की लंबाई के भी मायने... नजरिया और निगाह बदलें

    इस बात से सहमत हूं कि स्कर्ट की लंबाई किसी का चरित्र मापने का पैमाना नहीं हो सकता. "पैमाना" भले ही न हो लेकिन स्कर्ट की लंबाई हमारे देश में "मायने" रखता है.... बहुत ज्यादा. "बच्चन", "नंदा", "गांधी", "अंबानी", या "बिरला" सरनेम के लिए स्कर्ट की लंबाई शायद मायने नहीं रखती हो क्योंकि यह समाज का प्रभावशाली वर्ग है.

  • जब खबरिया चैनल अश्लील सीडी से खेलने लगे...

    जब खबरिया चैनल अश्लील सीडी से खेलने लगे...

    टीवी चैनलों पर दिखने वाला अर्धनग्न शख्स संदीप कुमार था दिल्ली का महिला और शिशु कल्याण मंत्री जो अब पूर्व हो चुका है. उसकी सेक्स सीडी खबरिया चैनल वालों के लिए टीआरपी की चाबी बन गई थी. हर चैनल लगे सीडी की अश्लील तस्वीर से "खेलने", उसे अपनी-अपनी वेब साइटों पर "वायरल" करने. सभी के पास "एक्सक्लूसिव" फुटेज थे.