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Sudhir jain


'Sudhir jain' - 162 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • राफेल खरीद कांड, अपराधशास्त्र के नज़रिये से...

    राफेल खरीद कांड, अपराधशास्त्र के नज़रिये से...

    अदालत ने विमान के दाम के बारे में किसी तरह की सुनवाई से फिलहाल इंकार कर दिया. अदालत ने कहा कि जब तक विमान के दाम के बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं होती, तब तक इस मामले में कोई बात नहीं होगी. हालांकि अदालत ने यह ज़रूर कहा कि यह फैसला करना पड़ेगा कि सरकार से इसे सार्वजनिक करने के लिए कहा जा सकता है या नहीं. बहरहाल, बुधवार को राफेल खरीद में कथित घोटाले में खरीद प्रकिया पर अदालत ने आरोपियों और शिकायतकर्ताओं को तफसील से सुना.

  • सरकार का पिंड नहीं छूटा नोटबंदी कांड से

    सरकार का पिंड नहीं छूटा नोटबंदी कांड से

    कल यानी गुरुवार को नोटबंदी की दूसरी बरसी थी. विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के हादसे को याद दिलाया. उन्होंने बताया कि देश की अर्थव्यवस्था को चैपट करने में नोटबंदी की क्या और कितनी भूमिका रही.

  • ठीकरा फुड़वाने के लिए रिजर्व बैंक अपना सिर तैयार रखे...

    ठीकरा फुड़वाने के लिए रिजर्व बैंक अपना सिर तैयार रखे...

    देश की माली हालत को लेकर रहस्य पैदा हो गया है. रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच कुछ चल पड़ने की खबरें हैं. क्या चल रहा है? ये अभी नहीं पता. उजागर न किए जाने का कारण यह है कि आम तौर पर रिजर्व बैंक और सरकार के बीच कुछ भी चलने की बातें तब तक नहीं की जातीं जब तक सरकार कोई फैसला न ले ले. लेकिन हैरत की बात ये है कि सरकार ने आश्चर्यजनक रूप से रिजर्व बैंक के बारे में एक बयान जारी किया है. कुछ गड़गड़ होने का शक पैदा होने के लिए इतना काफी से ज्यादा है. 

  • यह क्या... और बढ़ गया भ्रष्टाचार...?

    यह क्या... और बढ़ गया भ्रष्टाचार...?

    सनसनीखेज़ ख़बर है कि इस साल देश में भ्रष्टाचार और बढ़ गया. पिछले साल तक 100 में 45 भारतीय नागरिकों को घूस देकर अपना काम करवाना पड़ता था. इस साल 56 फीसदी नागरिकों को घूस देनी पड़ी. यह बात विश्वप्रसिद्ध संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (TI) और लोकल सर्किल्स के सर्वेक्षण से निकलकर आई है. TI पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार की नापतोल का काम करती है. कुछ महीनों बाद TI भ्रष्टाचार के मामले में वैश्विक सूचकांक जारी करेगी, जिससे पता चलेगा कि भ्रष्टाचार के मामले में दूसरे देशों की तुलना में हमारी और कितनी दुर्गति हो रही है. बहरहाल इस सर्वेक्षण से यह ज़ाहिर है कि भ्रष्टाचार के आने वाले वैश्विक सूचकांक में अपने देश की हालत और खराब निकलकर आने का अंदेशा बढ़ गया है.

  • गिरते रुपये का कहीं कोई अंदरूनी कारण तो नहीं...?

    गिरते रुपये का कहीं कोई अंदरूनी कारण तो नहीं...?

    सरकार गिरते रुपये (Indian rupee) के संकट को बिल्कुल भी तवज्जो नहीं देना चाहती. उसका तर्क है कि दुनिया की दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की मुद्रा भी नीचे गिर रही हैं. इसका एक आशय यह भी निकलता है कि हम अब तक उभरी हुई अर्थव्यवस्था नहीं बन पाए, बल्कि दशकों से उभरती हुई अर्थव्यवस्था ही बने हुए हैं.

  • शिक्षा के मकसद पर प्रधानमंत्री का भाषण

    शिक्षा के मकसद पर प्रधानमंत्री का भाषण

    शनिवार को विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में शिक्षा के पारंपरिक लक्ष्य को दोहराया गया. एक ऐसे लक्ष्य को दोहराया गया, जिसे हासिल करने का तरीका सदियों से तलाशा जा रहा है. लक्ष्य यह कि शिक्षा ऐसी हो जो हमें मनुष्य बना सके, जिससे जीवन का निर्माण हो, मानवता का प्रसार हो और चरित्र का गठन हो. प्रधानमंत्री ने ये लक्ष्य विवेकानंद के हवाले से कहे. इस दोहराव में बस वह बात फिर रह गई कि ये लक्ष्य हासिल करने का तरीका क्या हो? प्रधानमंत्री के इस भाषण से उस तरीके के बारे में कोई विशिष्ट सुझाव तो नहीं दिखा, फिर भी उन्होंने निरंतर नवोन्मेष की जरूरत बताई. हालांकि अपनी तरफ से उन्होंने नवोन्मेष को देश दुनिया में संतुलित विकास से जोड़ा. खैर, कुछ भी हो, शिक्षा और ज्ञान की मौजूदा शक्लोसूरत की आलोचना के बहाने से ही सही, कम से कम शिक्षा और ज्ञान के बारे में कुछ सुनने को तो मिला.

  • सोने की दोगुनी खरीद का माजरा क्या है...?

    सोने की दोगुनी खरीद का माजरा क्या है...?

    इस हफ्ते सूचना मिली कि देश में सोना खूब खरीदा जा रहा है, और बिक्री इतनी बढ़ गई है कि पिछले महीने दोगुने से भी ज़्यादा सोना विदेश से भारत में आया. यह सामान्य घटना नहीं है, लेकिन मीडिया में इस ख़बर का विश्लेषण ज्य़ादा नहीं दिखा. क्या इस घटना का आगा-पीछा नहीं देखा जाना चाहिए...?

  • असहमति को 'सेफ्टी वॉल्व' कहे जाने के मायने...

    असहमति को 'सेफ्टी वॉल्व' कहे जाने के मायने...

    पुलिस ने जिन विद्वानों को दबिश डालकर पकड़ लिया था, उन्हें वापस उनके घर छोड़कर आना पड़ा. लेखकों, कवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर यह रोक सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हो पाई. गौरतलब है कि भारतीय न्याय व्यवस्था की एक-एक बात संजोकर रखी जाती है. अदालतों के आदेशों को इतिहास की अलमारी में संगवाकर रखा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने इन विद्वानों की गिरफ्तारी पर रोक लगाकर उसे नज़रबंदी में तब्दील करने का जो अंतरिम आदेश दिया, वह भी इतिहास में सुरक्षित रखा जाएगा. यह आदेश जिनके खिलाफ है, वे कह सकते हैं कि यह आदेश अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन इस मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने एक दार्शनिक वाक्य भी बोला है - असहमति लोकतंत्र का 'सेफ्टी वॉल्व' है... यह सार्थक वाक्य इतिहास में ज़रूर जाएगा. इतना ही नहीं, अदालत ने अपराधशास्त्रियों और न्यायशास्त्रियों को सोच-विचार का एक विषय भी दे दिया है.

  • दो बार चुनाव होने से किसे नफा, किसे नुकसान...

    दो बार चुनाव होने से किसे नफा, किसे नुकसान...

    देश में विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ करवाने की बात फिर उठवाई जा रही है. फिलहाल सारी नहीं, तो कुछ विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव साथ-साथ करवाने की सुगबुगाहट तो है ही. इस काम में कई किंतु-परंतु लगे हैं. इस समय कानूनन एक साथ चुनाव संभव नहीं है, कुछ ही घंटे पहले चुनाव आयोग यह बता चुका है.

  • अब किसान के उत्पाद की कीमत घटाने की कवायद...?

    अब किसान के उत्पाद की कीमत घटाने की कवायद...?

    रिज़र्व बैंक ने कर्ज़ को महंगा करने का फैसला किया. खास बात यह कि यह काम दो महीने में दूसरी बार किया गया. इसका मुख्य कारण यह समझाया गया है कि महंगाई बढ़ रही है. लिहाज़ा महंगाई को काबू में रखने के लिए बाज़ार में पैसे की मात्रा कम करने की ज़रूरत है.

  • ढूंढने निकले मॉब लिंचिंग का कानूनी उपाय...

    ढूंढने निकले मॉब लिंचिंग का कानूनी उपाय...

    हालांकि इस बात में शक नहीं कि लिंचिंग ने देश और दुनिया में अपनी केंद्र सरकार और संबधित राज्य सरकारों की छवि मटियामेट कर दी है. लिहाज़ा, मौजूदा सरकार यह ज़रूर चाहेगी कि लिंचिंग की वारदात हाल-फिलहाल रुक जाएं, और फिर सरकार आखिर सरकार होती है, वह जो चाहेगी, वैसा होगा कैसे नहीं.

  • कड़े कानून को मुलायम बनाने के मायने...

    कड़े कानून को मुलायम बनाने के मायने...

    बिहार में शराब कानून को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, हालांकि बहुत संभलकर. यह कहते हुए कि कानून जरा ज़्यादा कड़ा बन गया था और अब इसे हल्का करेंगे. एक नुक्ता यह भी निकाला गया है कि इस कानून के दुरुपयोग की गुंजाइश कम की जाएगी.

  • सरकार दिखा रही है अदृश्य रोज़गार के अप्रत्यक्ष आंकड़े...

    सरकार दिखा रही है अदृश्य रोज़गार के अप्रत्यक्ष आंकड़े...

    अपनी केंद्र सरकार बेरोज़गारी के मोर्चे पर बुरी तरह फंसी है. अब तक तो यह कहकर काम चल जाया करता था कि रोज़गार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब सरकार के कार्यकाल का लगभग सारा समय ही गुज़र गया है, सो, अचानक ये दावे किए जाने लगे हैं कि सरकार ने कितने करोड़ लोगों को रोज़गार दे दिया.

  • उत्तराखंड के 'जनता दरबार' में कुदृश्य कांड

    उत्तराखंड के 'जनता दरबार' में कुदृश्य कांड

    सरकार और जनता के बीच संवाद का एक कुदृश्य इस समय पूरे देश में सनसनी फैला रहा है. कोशिश पूरी हुई कि यह नज़ारा किसी तरह जनता के बीच पहुंच न पाए, लेकिन ज़माना सोशल मीडिया का है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के उस 'जनता दरबार' में सरकार से एक नागरिक की फरियाद करने के दौरान हुई 'तू-तू मैं-मैं' का नज़ारा कैमरों में कैद हो चुका था. वह 'जनता मिलन' उर्फ 'जनता दरबार' था.

  • 'कश्मीर कांड' के कारण की तलाश...

    'कश्मीर कांड' के कारण की तलाश...

    जम्मू एवं कश्मीर में ऐसा होने की भनक किसी को नहीं लगी. मीडिया को अचानक बताया गया कि BJP वहां महबूबा मुफ्ती सरकार से अलग होने जा रही है, और दो घंटे के भीतर ही नाकामियों का ठीकरा महबूबा पर फोड़ते हुए BJP ने सरकार गिराने का ऐलान कर दिया. मसला एक विशेष राज्य में सरकार गिराए जाने का है.

  • गांव बंद का एक पहलू यह भी

    गांव बंद का एक पहलू यह भी

    गांव बंद नए तरह का आंदोलन है. लिहाजा इसका आगा-पीछा देखना कठिन काम है. अभी दो दिन हुए हैं. हर दिन इसके असर की समीक्षा होगी. धीरे-धीरे पता चलेगा कि आंदोलनकारी किसानों की रणनीति किस तरह बदलती है. यह सवाल बिल्कुल अंधेरे में है कि आंदोलन के नौवें या दसवें दिन क्या हालात होंगे? फिलहाल सूचनाएं हैं कि देश में जगह-जगह इस आंदोलन ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. अब यह देखा जाना बाकी है कि देश में इस समय सबसे ज्यादा मुफलिस यह तबका अपने उत्पाद को कितने और दिन तक अपने घर या गांव में रखे रख सकता है. यानी ये किसान कब तक शहर जाकर अपना उत्पाद बेचने को मजबूर नहीं होते. बहुत संभव है कि शहर उसे मजबूर कर दे. अगर कर भी दिया तो इस आंदोलन के कुछ हासिल उसे जरूर होंगे. हो सकता है कि इस आंदोलन के दौरान उसे बाजार के कुछ रहस्य हाथ लग जाएं.

  • कर्नाटक ने फूंक ही दिया 2019 का बिगुल...

    कर्नाटक ने फूंक ही दिया 2019 का बिगुल...

    मीडिया और राजनीतिक पंडितों ने पहले ही भांप लिया था कि कर्नाटक चुनाव का असर 2019 के लोकसभा चुनाव तक जाएगा. आखिर वही हुआ. बीएस येदियुरप्पा की हरचंद कोशिश नाकाम होने के बाद अब एचडी कुमारस्वामी शपथ लेने जा रहे हैं. ऐसे बानक बन गए हैं कि इस समारोह में गैर-भाजपाई दलों के नेताओं की आकाशगंगा दिखेगी, और यही अद्भुत नज़ारा 2019 के बिगुल फूंकने जैसा मौका बन सकता है. कर्नाटक चुनाव को इतना महत्व देने का तर्क यह है कि अगर यह मौका न आता, तो देश में राजनीतिक विपक्ष के एक चौपाल पर बैठने की शुरुआत पता नहीं कैसे और कब बन पाती.

  • कर्नाटक में कौन सी अनहोनी हो गई?

    कर्नाटक में कौन सी अनहोनी हो गई?

    उसने अपने पास विकल्प खुले रखे थे, यानी आज जब नतीजे आ गए हैं तब हमें कर्नाटक में कुछ अनहोनी हो जाने की मुद्राएं नहीं बनानी चाहिए. हद से हद हम ये बात कर सकते हैं कि कर्नाटक में जो खंडित जनादेश आया है और उसके हिसाब से जो हो रहा है उसमें कुछ नाजायज़ तो होने नहीं जा रहा है.

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