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Sudhir jain


'Sudhir jain' - 131 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • फिल्‍म 'पद्मावत' से बड़ी मुश्किल में चारों राज्य सरकारें...

    फिल्‍म 'पद्मावत' से बड़ी मुश्किल में चारों राज्य सरकारें...

    पिछले चार महीनों में इस विवाद के बहाने साहित्य, कला, इतिहास, जाति, धर्म, राजनीति, कानून व्यवस्था और यहां तक कि फिल्म उद्योग व्यापार के पहलू तक सोचे-विचारे गए. खासतौर पर आज की राजनीति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच के जटिल संबंधों पर एक शोध प्रबंध लिखने लायक सामग्री तैयार हो गई है. इस प्रकरण सें एक फायदा यह हुआ दिखता है कि हमेशा उठ खड़े होने वाले विवादों का फौरन निपटारा करने के लिए आगे के लिए नजीरें बन कर तैयार हो गई हैं.

  • चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस से उठे अहम सवाल...

    चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस से उठे अहम सवाल...

    छह दिन पहले इस बात ने सनसनी फैला दी थी कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. इस बात से लोकतांत्रिक भूचाल इसलिए आया कि न्यायपालिका को लोकतंत्र का सबसे विश्वसनीय खंभा माना जाता है और उसी पर संशय पैदा हो गया. सुप्रीम कोर्ट के चार मौजूदा जजों की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस, लोकतांत्रिक भारत में अपने तरह की पहली घटना है.

  • FDI के नए ऐलानों का मतलब...?

    FDI के नए ऐलानों का मतलब...?

    हमारी मौजूदा सरकार अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों के लिए एक से बढ़कर एक चुनौतियां पेश कर देती है, और अब उसने यह चुनौती पेश की है कि अर्थशास्त्री और पत्रकार विश्लेषण करें कि FDI (यानी Foreign Direct Investment यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के नए सरकारी ऐलानों का क्या असर पड़ेगा...?

  • IND VS SA: कारवां क्यों लुटा केपटाउन टेस्ट में?

    IND VS SA: कारवां क्यों लुटा केपटाउन टेस्ट में?

    केपटाउन में भारत की हार का विश्लेषण करने में दिक्कत आ रही है. यह पहला टैस्ट मैच था. अभी दो और खेलने हैं. इतना ही नहीं टी20 और वन डे भी खेलने हैं. इसलिए इस हार का विश्लेषण दक्षिण अफ्रीका दौरे में आगे की रणनीति बनाने के लिहाज से भी है.  देखने की बात यह होगी कि विराट कोहली एंड कंपनी केपटाउन के हाल से कितना सबक लेकर आगे बढ़ती है.

  • कैलेंडर का भी है अपना भरा पूरा इतिहास

    कैलेंडर का भी है अपना भरा पूरा इतिहास

    दुनिया में इस समय सैकड़ों कैलेंडर अस्तित्व में हैं, जिनमें हमारे अपने यानी भारतीय पंचांग भी हैं. लेकिन फिलहाल मौका अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से साल बदलने का है. सो मौके के लिहाल से इस पर नजर डालना प्रासंगिक है...

  • 2जी का झूठ घोटाला कितना बड़ा...

    2जी का झूठ घोटाला कितना बड़ा...

    पांच साल तक 2जी घोटाले का प्रचार करके राजनीति होती रही. तो क्या उस झूठ के उजागर होने के बाद टूजी के झूठ घोटाले पर ही हमें वैसा ही असर देखने को मिलेगा? यह सवाल भी खड़ा होगा कि झूठे आरोप लगाने वालों ने इस झूठे आरोप से क्या क्या कमाया.

  • 2019 के लिहाज़ से गुजरात के जनादेश का संदेश

    2019 के लिहाज़ से गुजरात के जनादेश का संदेश

    इस मुख्य फैसले को कोई नहीं नकार सकता कि गुजरात का जनादेश BJP के पक्ष में आया है, लेकिन उसके साथ जुड़े दूसरे कई और जनादेशों को देखना हो, तो जनता की दी कई और व्यवस्थाओं को पढ़ा जाना भी ज़रूरी है. यह कवायद इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि गुजरात का विधानसभा चुनाव वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को नज़र में रखकर लड़ा जा रहा था.

  • राहुल गांधी का विश्लेषण करके रखने का वक्त आ गया है

    राहुल गांधी का विश्लेषण करके रखने का वक्त आ गया है

    राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का यह दूसरा दिन है. वैसे उनके पास तेरह साल का राजनीतिक अनुभव है. बहुत कुछ उनके बारे में हम जान समझ चुके हैं लेकिन सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजनीतिक दल के अघ्यक्ष बनने के बाद उनकी जिम्मेदारी और उनके सामने आने वाली चुनौतियां और जोखिम नए नए होंगे.

  • ग़ज़ब ढा रहे हैं ओपिनियन पोल के व्यापारी...

    ग़ज़ब ढा रहे हैं ओपिनियन पोल के व्यापारी...

    चुनावी आंकड़ों के इस सांख्यिकीय विश्लेषण को सैफोलॉजी कहते हैं, और यह काम करने वाले खुद को विज्ञानी कहते हैं. वे खुद को सांख्यिकी और राजनीति विज्ञान का विशेषज्ञ कहलाना चाहते हैं. उनकी मुद्रा किसी भौतिक विज्ञानी या रसायनशास्त्री से कम नहीं होती. लेकिन दिक्कत यह है कि उनके आकलन विज्ञान के आकलन की तरह शुद्ध नहीं होते.

  • राहुल गांधी की कांग्रेस अध्‍यक्ष पद पर होने वाली ताजपोशी के मायने!

    राहुल गांधी की कांग्रेस अध्‍यक्ष पद पर होने वाली ताजपोशी के मायने!

    राहुल गांधी के कांग्रेस अध्‍यक्ष बनने का दिन आ गया. लंबे इंतज़ार के बाद आया. इसके पहले जब-जब उनके अध्यक्ष बनने की राह बनी, कोई न कोई अड़चन आती रही. कभी विपक्ष की तरफ से उनकी छवि पर हमले और कभी राहुल और प्रियंका के बीच बेहतरी की बातें उठवाई जाती रहीं. बहरहाल हमेशा ही उनके कांग्रेस प्रमुख बनने का काम टलता रहा. जिस तरह हर देरी के नफे नुकसान होते हैं उस तरह इस देरी के भी नफे नुकसान की बातें जरूर होनी चाहिए.

  • क्या नया है इस बार गुजरात में...

    क्या नया है इस बार गुजरात में...

    गुजरात चुनाव में इस बार नई बात यह है कि हरचंद कोशिश के बाद भी हिंदू मुसलमान का माहौल नहीं बन पाया. दूसरी खास बात ये कि वहां के पूर्व मुख्यमंत्री इस समय देश के प्रधानमंत्री हैं. लेकिन वहां सत्तारूढ़ भाजपा इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसे है.

  • मूड बदलने में कितना काम आएगी मूडी

    मूड बदलने में कितना काम आएगी मूडी

    दुनिया के तमाम देशों में आर्थिक वृद्धि की संभावना की अटकल लगाना बहुत ही मुश्किल काम है. यही काम रेटिंग एजेंसी मूडी करती है. यह दुनिया की तीन बड़ी एजेंसियों में से एक है और अपने शोध सर्वेक्षण के ज़रिए निवेशकों का मूड बनाने बिगाड़ने का काम करती है. यह एजेंसी 14 साल से भारत की रेटिंग बहुत ही खराब बताती आ रही थी. इस बार उसने सुधरी हालत का अनुमान दिखाया है.

  • जीएसटी की भी थ्योरियां बदलने लगीं...

    जीएसटी की भी थ्योरियां बदलने लगीं...

    जीएसटी की भी नोटबंदी जैसी गत बन रही है. नोटबंदी में जिस तरह से रोज़रोज़ रद्दोबदल करने पड़े थे उसी तरह से जीएसटी में भी शुरू हो गए. नोटबंदी में जैसी बार बार बदनामी हुई थी वैसी अब जीएसटी में होने लगी.

  • चुनावी सनसनी से अब तक बचा कैसे है गुजरात...?

    चुनावी सनसनी से अब तक बचा कैसे है गुजरात...?

    गुजरात चुनावी सनसनी फैलाने में शुरू से मशहूर रहा है. एक समय था जब गुजरात को सांप्रदायिक विचारों के क्रियान्वयन की प्रयोगशाला कहा जाता था. गुजरात ही है जहां धर्म आधारित मुद्दों को ढूंढने और ढूंढकर पनपाने के लिए एक से एक विलक्षण प्रयोग हमें देखने को मिले. लेकिन यह भी एक समयसिद्ध तथ्य है कि चुनावी राजनीति में एकरसता नहीं चल पाती.

  • भारत में अब कारोबार कितना आसान मानेंगे विदेशी निवेशक...

    भारत में अब कारोबार कितना आसान मानेंगे विदेशी निवेशक...

    अगर यह मानकर चलें कि विदेशी निवेशक किसी देश की रैंकिंग देखकर निवेश करते हैं तो 190 देशों के बीच भारत का रैंक टॉप टेन या टॉप फिफ्टी नहीं बल्कि सौवां है. सो इसी आधार पर किसी कारोबारी को किसी देश में निवेश का फैसला लेना हो तो वे रैंकिग में हमसे बेहतर दूसरे 99 देशों को पहले क्यों नहीं सोचेंगे. हां, अगर यह माना जाए कि विदेशी निवेश के लिए बहुत सारी बातों के अलावा ये सुगमता वाला पहलू भी एक है फिर जरूर विश्‍व बैंक की यह रैंकिग हमारे काम आ सकती है.

  • पिंड नहीं छूट रहा नोटबंदी कांड से

    पिंड नहीं छूट रहा नोटबंदी कांड से

    सालभर होने को आया लेकिन अब तक पुराने नोटों की गिनती का काम चालू बताना पड़ रहा है. पुराने नोटों के असली नकली होने के सत्यापन का काम भी अधूरा है. जब आंकड़े ही न हों तो नोटबंदी की सफलता विफलता की बात कैसे हो? सरकार अपने फैसले के सही होने का प्रचार कर रही है. और विपक्ष इस फैसले के भयावह असर होने के तर्क दे रही है. नोटबंदी के एक साल गुज़रने के दिन यानी आठ नवंबर को विपक्ष काला दिवस मनाएगी और सरकार जश्न. जनता इस विवाद की चश्मदीद बनेगी. वैसे शुरू से ही भुक्तभोगी जनता इस प्रकरण में मुख्य पक्ष है. सो उसे नोटबंदी के फायदे और नुकसान का हिसाब लगाने में ज्यादा दिक्कत आएगी नहीं. मसला इतना लंबा चौड़ा है कि जनता लाखों करोड़ की संख्या का अनुमान तक नहीं लगा सकती. इसीलिए इस हफ्ते कालादिवस और जश्न के दौरान होने वाले तर्क वितर्क के दौरान उसे जागरूक होने का मौका एकबार फिर मिलेगा.

  • नेताओं और अफसरों को कठघरे से बचाने की कोशिश

    नेताओं और अफसरों को कठघरे से बचाने की कोशिश

    सरकारी अफसरों और नेताओं को आसानी से कटघरे में न लाया जा सके इसकी तैयारी राजस्थान सरकार की तरफ से शुरू हो रही है.

  • बेरोज़गारी के आंकड़े का अज्ञान

    बेरोज़गारी के आंकड़े का अज्ञान

    बुधवार को बैठक हुई. उम्मीद थी कि इस बैठक के बाद किसी गेम चेंजर कार्यक्रम चालू करने की सलाह निकलकर आएगी. लेकिन बैठक के बाद इसके अध्यक्ष विवेक देबराय ने जो बताया उसे सुनकर मीडिया चौंक गया.

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