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Sudhir jain blog News in Hindi


'Sudhir jain blog' - 32 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • ठीकरा फुड़वाने के लिए रिजर्व बैंक अपना सिर तैयार रखे...

    ठीकरा फुड़वाने के लिए रिजर्व बैंक अपना सिर तैयार रखे...

    देश की माली हालत को लेकर रहस्य पैदा हो गया है. रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच कुछ चल पड़ने की खबरें हैं. क्या चल रहा है? ये अभी नहीं पता. उजागर न किए जाने का कारण यह है कि आम तौर पर रिजर्व बैंक और सरकार के बीच कुछ भी चलने की बातें तब तक नहीं की जातीं जब तक सरकार कोई फैसला न ले ले. लेकिन हैरत की बात ये है कि सरकार ने आश्चर्यजनक रूप से रिजर्व बैंक के बारे में एक बयान जारी किया है. कुछ गड़गड़ होने का शक पैदा होने के लिए इतना काफी से ज्यादा है. 

  • गिरते रुपये का कहीं कोई अंदरूनी कारण तो नहीं...?

    गिरते रुपये का कहीं कोई अंदरूनी कारण तो नहीं...?

    सरकार गिरते रुपये (Indian rupee) के संकट को बिल्कुल भी तवज्जो नहीं देना चाहती. उसका तर्क है कि दुनिया की दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की मुद्रा भी नीचे गिर रही हैं. इसका एक आशय यह भी निकलता है कि हम अब तक उभरी हुई अर्थव्यवस्था नहीं बन पाए, बल्कि दशकों से उभरती हुई अर्थव्यवस्था ही बने हुए हैं.

  • शिक्षा के मकसद पर प्रधानमंत्री का भाषण

    शिक्षा के मकसद पर प्रधानमंत्री का भाषण

    शनिवार को विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में शिक्षा के पारंपरिक लक्ष्य को दोहराया गया. एक ऐसे लक्ष्य को दोहराया गया, जिसे हासिल करने का तरीका सदियों से तलाशा जा रहा है. लक्ष्य यह कि शिक्षा ऐसी हो जो हमें मनुष्य बना सके, जिससे जीवन का निर्माण हो, मानवता का प्रसार हो और चरित्र का गठन हो. प्रधानमंत्री ने ये लक्ष्य विवेकानंद के हवाले से कहे. इस दोहराव में बस वह बात फिर रह गई कि ये लक्ष्य हासिल करने का तरीका क्या हो? प्रधानमंत्री के इस भाषण से उस तरीके के बारे में कोई विशिष्ट सुझाव तो नहीं दिखा, फिर भी उन्होंने निरंतर नवोन्मेष की जरूरत बताई. हालांकि अपनी तरफ से उन्होंने नवोन्मेष को देश दुनिया में संतुलित विकास से जोड़ा. खैर, कुछ भी हो, शिक्षा और ज्ञान की मौजूदा शक्लोसूरत की आलोचना के बहाने से ही सही, कम से कम शिक्षा और ज्ञान के बारे में कुछ सुनने को तो मिला.

  • सोने की दोगुनी खरीद का माजरा क्या है...?

    सोने की दोगुनी खरीद का माजरा क्या है...?

    इस हफ्ते सूचना मिली कि देश में सोना खूब खरीदा जा रहा है, और बिक्री इतनी बढ़ गई है कि पिछले महीने दोगुने से भी ज़्यादा सोना विदेश से भारत में आया. यह सामान्य घटना नहीं है, लेकिन मीडिया में इस ख़बर का विश्लेषण ज्य़ादा नहीं दिखा. क्या इस घटना का आगा-पीछा नहीं देखा जाना चाहिए...?

  • दो बार चुनाव होने से किसे नफा, किसे नुकसान...

    दो बार चुनाव होने से किसे नफा, किसे नुकसान...

    देश में विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ करवाने की बात फिर उठवाई जा रही है. फिलहाल सारी नहीं, तो कुछ विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव साथ-साथ करवाने की सुगबुगाहट तो है ही. इस काम में कई किंतु-परंतु लगे हैं. इस समय कानूनन एक साथ चुनाव संभव नहीं है, कुछ ही घंटे पहले चुनाव आयोग यह बता चुका है.

  • अब किसान के उत्पाद की कीमत घटाने की कवायद...?

    अब किसान के उत्पाद की कीमत घटाने की कवायद...?

    रिज़र्व बैंक ने कर्ज़ को महंगा करने का फैसला किया. खास बात यह कि यह काम दो महीने में दूसरी बार किया गया. इसका मुख्य कारण यह समझाया गया है कि महंगाई बढ़ रही है. लिहाज़ा महंगाई को काबू में रखने के लिए बाज़ार में पैसे की मात्रा कम करने की ज़रूरत है.

  • 'कश्मीर कांड' के कारण की तलाश...

    'कश्मीर कांड' के कारण की तलाश...

    जम्मू एवं कश्मीर में ऐसा होने की भनक किसी को नहीं लगी. मीडिया को अचानक बताया गया कि BJP वहां महबूबा मुफ्ती सरकार से अलग होने जा रही है, और दो घंटे के भीतर ही नाकामियों का ठीकरा महबूबा पर फोड़ते हुए BJP ने सरकार गिराने का ऐलान कर दिया. मसला एक विशेष राज्य में सरकार गिराए जाने का है.

  • गांव बंद का एक पहलू यह भी

    गांव बंद का एक पहलू यह भी

    गांव बंद नए तरह का आंदोलन है. लिहाजा इसका आगा-पीछा देखना कठिन काम है. अभी दो दिन हुए हैं. हर दिन इसके असर की समीक्षा होगी. धीरे-धीरे पता चलेगा कि आंदोलनकारी किसानों की रणनीति किस तरह बदलती है. यह सवाल बिल्कुल अंधेरे में है कि आंदोलन के नौवें या दसवें दिन क्या हालात होंगे? फिलहाल सूचनाएं हैं कि देश में जगह-जगह इस आंदोलन ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. अब यह देखा जाना बाकी है कि देश में इस समय सबसे ज्यादा मुफलिस यह तबका अपने उत्पाद को कितने और दिन तक अपने घर या गांव में रखे रख सकता है. यानी ये किसान कब तक शहर जाकर अपना उत्पाद बेचने को मजबूर नहीं होते. बहुत संभव है कि शहर उसे मजबूर कर दे. अगर कर भी दिया तो इस आंदोलन के कुछ हासिल उसे जरूर होंगे. हो सकता है कि इस आंदोलन के दौरान उसे बाजार के कुछ रहस्य हाथ लग जाएं.

  • कर्नाटक ने फूंक ही दिया 2019 का बिगुल...

    कर्नाटक ने फूंक ही दिया 2019 का बिगुल...

    मीडिया और राजनीतिक पंडितों ने पहले ही भांप लिया था कि कर्नाटक चुनाव का असर 2019 के लोकसभा चुनाव तक जाएगा. आखिर वही हुआ. बीएस येदियुरप्पा की हरचंद कोशिश नाकाम होने के बाद अब एचडी कुमारस्वामी शपथ लेने जा रहे हैं. ऐसे बानक बन गए हैं कि इस समारोह में गैर-भाजपाई दलों के नेताओं की आकाशगंगा दिखेगी, और यही अद्भुत नज़ारा 2019 के बिगुल फूंकने जैसा मौका बन सकता है. कर्नाटक चुनाव को इतना महत्व देने का तर्क यह है कि अगर यह मौका न आता, तो देश में राजनीतिक विपक्ष के एक चौपाल पर बैठने की शुरुआत पता नहीं कैसे और कब बन पाती.

  • कर्नाटक में कौन सी अनहोनी हो गई?

    कर्नाटक में कौन सी अनहोनी हो गई?

    उसने अपने पास विकल्प खुले रखे थे, यानी आज जब नतीजे आ गए हैं तब हमें कर्नाटक में कुछ अनहोनी हो जाने की मुद्राएं नहीं बनानी चाहिए. हद से हद हम ये बात कर सकते हैं कि कर्नाटक में जो खंडित जनादेश आया है और उसके हिसाब से जो हो रहा है उसमें कुछ नाजायज़ तो होने नहीं जा रहा है.

  • देशभर में दलितों का उठ पड़ना

    देशभर में दलितों का उठ पड़ना

    दलितों ने भारत बंद की अपील की थी. सरकार को लग रहा होगा कि एक प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन खत्म हो जाएगा. लेकिन ये तो पूरे देश में सनसनीखेज ढंग से उठ पड़ा.

  • श्रीदेवी मृत्यु प्रकरण :  48 घंटे के सस्पेंस का मौका क्यों बना ?

    श्रीदेवी मृत्यु प्रकरण :  48 घंटे के सस्पेंस का मौका क्यों बना ?

    श्रीदेवी मृत्यु प्रकरण में आखिर मामला खत्म होने की खबर आ गई. लेकिन देश दुनिया में इस दौरान रहस्य और सनसनी फैलती रही. क्या इस स्थिति से बचा जा सकता था? इस मामले ने क्या हमें इतना जागरूक कर दिया है कि आगे ऐसे किसी मामले में हम फिजूल की सनसनी और विवादों में नहीं उलझा करेंगे.

  • क्या अबूझ पहेली बनकर आने वाला है आम बजट

    क्या अबूझ पहेली बनकर आने वाला है आम बजट

    इस बार का बजट इस सरकार के कार्यकाल का अंतिम पूर्ण बजट होगा. यानी मौजूदा सरकार के कार्यकाल के कामकाज की समीक्षा का आखिरी मौका होगा. जाहिर है कि सरकार चार साल की अपनी उपलब्धियों को दिखाने के लिए आंकड़ेबाजी के सारे हुनर लगा देगी.

  • FDI के नए ऐलानों का मतलब...?

    FDI के नए ऐलानों का मतलब...?

    हमारी मौजूदा सरकार अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों के लिए एक से बढ़कर एक चुनौतियां पेश कर देती है, और अब उसने यह चुनौती पेश की है कि अर्थशास्त्री और पत्रकार विश्लेषण करें कि FDI (यानी Foreign Direct Investment यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के नए सरकारी ऐलानों का क्या असर पड़ेगा...?

  • मूड बदलने में कितना काम आएगी मूडी

    मूड बदलने में कितना काम आएगी मूडी

    दुनिया के तमाम देशों में आर्थिक वृद्धि की संभावना की अटकल लगाना बहुत ही मुश्किल काम है. यही काम रेटिंग एजेंसी मूडी करती है. यह दुनिया की तीन बड़ी एजेंसियों में से एक है और अपने शोध सर्वेक्षण के ज़रिए निवेशकों का मूड बनाने बिगाड़ने का काम करती है. यह एजेंसी 14 साल से भारत की रेटिंग बहुत ही खराब बताती आ रही थी. इस बार उसने सुधरी हालत का अनुमान दिखाया है.

  • आखिर निपट गया नोटबंदी का हवन, अब नफा-नुकसान जांचने की बारी

    आखिर निपट गया नोटबंदी का हवन, अब नफा-नुकसान जांचने की बारी

    आज यानी वित्तीय वर्ष के आखिरी दिन नोटबंदी का सनसनीखेज अनुष्ठान पूरा हो गया. इस आर्थिक राजनीतिक हवन से क्या हासिल हुआ इसका पता अब चलेगा. हालांकि इसे हवन कहे जाने से कुछ लोगों को ऐजराज हो सकता है लेकिन पिछले चार महीनों में इस अनुष्ठान की विधि में रोज़-रोज़ जिस तरह बदलनी पड़ी उससे यह तो तय हो गया कि अपने देश ने एक नवोन्वेषी काम किया. नए तरीके से काम करने में एक जोखिम होता ही है सो अब यह हिसाब लगना शुरू होगा कि नोटबंदी से जो फायदा हुआ है उसकी तुलना में नुकसान कितना हुआ. यह भी देखा जाएगा कि जिस मकसद से यह काम किया गया था वह कितना पूरा हुआ. सिर्फ ऐलानिया मकसद के आधार पर ही समीक्षा करना ठीक होगा. उनके अलावा जो फायदे गिनाए जा रहे होंगे वह नोटबंदी के फैसले का जबरन बचाव करने के अलावा और कुछ नहीं होंगे.

  • नोटबंदी को कितना ढंक पाया जीडीपी का आंकड़ा

    नोटबंदी को कितना ढंक पाया जीडीपी का आंकड़ा

    सरकार ने एलान करवा दिया है कि देश की अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का ज्यादा असर नहीं पड़ा. विश्वसनीयता के प्रबंधन के लिए यह एलान बाकायदा केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के जरिए किया गया है. यह संगठन ही देश में सकल घरेलू उत्पाद की नापतौल करता है. चलन के मुताबिक हर तीन महीने में, यानी साल में चार बार यह आंकड़े जारी करवाए जाते हैं. इस आंकड़े ने इतनी हलचल मचा रखी है कि अब इस पर बहस की तैयारी है.

  • आरबीआई के पूर्व गवर्नर के गंभीर इशारों को समझें...

    आरबीआई के पूर्व गवर्नर के गंभीर इशारों को समझें...

    इस साल के बजट के असर के बारे में कुछ सनसनीखेज बातें निकलकर आना शुरू हो गई हैं. खास तौर पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन ने बहुत ही बड़ी बात की तरफ इशारा किया है. साफ-साफ कहने के बजाए उन्होंने अपनी बात छुपाकर कही है. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ही छुपाव किया होगा. लेकिन अगर सिर्फ इशारा ही किया है तो वाकई यह भी जिम्मेदारी का निर्वाह ही है. अब यह देश के विद्वानों और जागरूक नागरिकों का काम है कि उनके इशारे की व्याख्या करें.

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