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University series


'University series' - 9 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • हमारे संस्कृत से जुड़े संस्थान किस हाल में हैं?

    हमारे संस्कृत से जुड़े संस्थान किस हाल में हैं?

    26 मई 2014 को जब प्रधानमंत्री मोदी ने हिन्दी में शपथ ली थी तब उनके साथ सुषमा स्वराज, उमा भारती और हर्षवर्धन ने संस्कृत में शपथ ली थी. सांसद के रूप में महेश गिरी, परवेज़ साहिब सिंह वर्मा, शांता कुमार, योगी आदित्यनाथ, महेश शर्मा, राजेंद्र अग्रवाल ने संस्कृत में शपथ ली. 2017 में स्मृति ईरानी राज्य सभा का सासंद बनी थीं तो शपथ संस्कृत में ली थीं. मेसेज गया कि संस्कृत के लिए अब कुछ होने वाला है.

  • शिक्षा व्यवस्था को लेकर कितने गंभीर हैं हम?  

    शिक्षा व्यवस्था को लेकर कितने गंभीर हैं हम?  

    कई बार हमें लगता है कि किसी विश्वविद्यालय की समस्या इसलिए है क्योंकि वहां स्वायत्तता नहीं है इसलिए उसे स्वायत्तता दे दी जाए. जब भी उच्च शिक्षा की समस्याओं पर बात होती है, ऑटोनमी यानी स्वायत्तता को एंटी बायेटिक टैबलेट के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन आप किसी भी विश्वविद्यालय को देखिए, चाहे वो प्राइवेट हो या पब्लिक यानी सरकारी क्या वहां सरकार या राजनीतिक प्रभाव से स्वायत्त होने की स्वतंत्रता है. सरकार ही क्यों हस्तक्षेप करती है, वो हस्तक्षेप करना बंद कर दे. कभी आपने सुना है कि वाइस चांसलर की नियुक्ति की प्रक्रिया बेहतर की जाएगी, उनका चयन राजनीतिक तौर पर नहीं होगा.

  • नौकरी के लिए इतना संघर्ष क्यों?

    नौकरी के लिए इतना संघर्ष क्यों?

    कई बार जवानों और किसानों की हालत देखकर लगता है कि हम सब ज़िद पर अड़े हैं कि इनकी तरफ देखना ही नहीं है. समस्या इतनी बड़ी है कि समाधान के नाम पर पुड़िया पेश कर दी जाती है जो मीडिया में हेडलाइन बनकर गायब हो जाती है. अनाज और आदमी दोनों छितराए हुए हैं. न तो दाम मिल रहा है न काम मिल रहा है. सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए ये मुद्दे एक दूसरे की निंदा करने भर के लिए हैं मगर कोई भी ठोस प्रस्ताव जनता के बीच नहीं रखता है कि वाकई क्या करने वाला है, जो कर रहा है वो क्यों चूक जा रहा है. कई बार लगता है कि हमारे राजनेता, हमारे अर्थशास्त्री, सिस्टम में बैठे लोगों ने ज़िद कर ली है कि इन बुनियादी सवालों पर बात नहीं करना है, मीडिया को हर रात कोई न कोई थीम मिल जाता है, सब कुछ इसी थीम की तलाश के लिए हो रहा है. इसके बाद भी भारत के भीतर से तस्वीरें उथला कर सतह पर आ जा रही हैं.

  • छात्रों की जिंदगी से खिलवाड़ क्यों ?

    छात्रों की जिंदगी से खिलवाड़ क्यों ?

    ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना आपने देखा है? भारत में महानगरों से लेकर ज़िलों में ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना खुला हुआ है, जिसे हम अंग्रेज़ी में यूनिवर्सिटी और हिन्दी में विश्वविद्यालय कहते हैं. इस कारखाने की ख़ूबसूरती यही है कि जिसकी ज़िंदगी बर्बाद होती है उसे फर्क नहीं पड़ता. जो बर्बाद कर रहा है उसे भी कोई फर्क नहीं पड़ता. उत्तर प्रदेश के डॉक्टर राम मनोहर लोहिया यूनिवर्सिटी में इस साल बीए और एमए के 80 फीसदी छात्र फेल हो गए हैं. जिस यूनिवर्सिटी में चार लाख से अधिक छात्र फेल हो जाएं वो दुनिया की सबसे बड़ी ख़बर होनी चाहिए. क्या आपने सुना है कि ऑक्सफोर्ड, हावर्ड, मिशिगन यूनिवर्सिटी के 80 प्रतिशत छात्र फेल हो गए? और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है.

  • क्यों कॉलेजों को नहीं मिलती सुविधाएं?

    क्यों कॉलेजों को नहीं मिलती सुविधाएं?

    यूनिवर्सिटी सीरीज़ धीरे-धीरे लौटती रहेगी. 27 अंक पर हमने छोड़ा था, अब 28वें से शुरू कर रहा हूं जो यहां से नए तरीके से चलेगी. एक नेता ने कहा है कि हिन्दुओं को मंदिर के लिए शहादत देनी पड़ेगी. उस नेता ने कब कहा कि हिन्दुओं के पढ़ाई लिखाई अस्पताल के लिए हम प्रतिनिधि शहादत देंगे. ये जिस शहादत की बात कर रहे हैं क्या आपको लगता है कि इसमें अच्छे घरों के लोग जाएंगे.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : ऐसे बनेगा इक्कीसवीं सदी का भारत?

    प्राइम टाइम इंट्रो : ऐसे बनेगा इक्कीसवीं सदी का भारत?

    आज रजत जयंती दिवस हैं. यूनिवर्सटी सीरीज़ का 25वां अंक हम धूम धाम की जगह बूम बाम से मनाने जा रहे हैं. ऐसी कहानियां जिसे आप देखकर खुद को दिलासा देंगे कि आप बच गए. सिस्टम जब विस्फोट करता है तो उसके छर्रे जाने कितनी पीढ़ियों की पीठ में धंस जाते हैं, जिसका हिसाब कोई नहीं कर सकता.

  • यूनिवर्सिटी सीरीज़ 23वां एपिसोड : अतिथि विद्वानों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं

    यूनिवर्सिटी सीरीज़ 23वां एपिसोड : अतिथि विद्वानों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं

    मध्य प्रदेश में जो ठेके पर रखे जाते हैं उन्हें अतिथि विद्वान कहते हैं. लाइब्रेरी में जो रखे जाते हैं उन्हें अतिथि ग्रंथपाल कहते है. कायदे से तो अतिथि की ख़ातिरदारी करने का दंभ भरते हैं मगर राज्य के अतिथि विद्वानों की सिस्टम ने ऐसी ख़ातिरदारी की है वे दस दस साल की नौकरी के बाद भी किसी की ख़ातिरदारी के लायक नहीं रहे.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : अच्छे-अच्छे संस्थानों का हाल ख़राब, ऐसी शिक्षा व्यवस्था छात्रों से खिलवाड़

    प्राइम टाइम इंट्रो : अच्छे-अच्छे संस्थानों का हाल ख़राब, ऐसी शिक्षा व्यवस्था छात्रों से खिलवाड़

    हमारी यूनिवर्सिटी सीरीज़ का 22वें अंक में प्रवेश कर चुकी है. हमारी सीरीज़ का असर ये हुआ कि व्यवस्था के कान पर जूं तो नहीं रेंगी मगर घास कट गई है. यह भी बड़ी कामयाबी है कि भले टीचर न रखे जाएं, लाइब्रेरी ठीक न हो, शौचालय न हो मगर इन सबके बीच घास कट जाए तो माना जाना चाहिए कि अभी कुछ बचा हुआ है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : अस्थायी शिक्षकों के भरोसे देश की शिक्षा व्‍यवस्‍था

    प्राइम टाइम इंट्रो : अस्थायी शिक्षकों के भरोसे देश की शिक्षा व्‍यवस्‍था

    यह यूनिवर्सिटी सीरीज़ का 20वां अंक है. मुझे पता है कि अब आपके लिए झेलना मुश्किल हो गया लेकिन यह सीरीज़ उन लाखों नौजवानों के लिए है जो इस सिस्टम को झेल रहे हैं, जब यही नौजवान कालेजों से निकलेंगे तो समाज और देश को झेलना मुश्किल हो जाएगा.