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रवीश कुमार का प्राइम टाइम : पोंग बांध विस्थापितों की इंसाफ़ की लड़ाई

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योजनाओं का एलान होता है तो विकास विकास होता है. वो लोग जो योजनाओं से दूर होते हैं, हेडलाइन देखकर खुश हो जाते हैं. जिनकी ज़मीन पर योजना साकार होनी होती है, उनके होश उड़ जाते हैं. वो लंबे समय के लिए मुकदमों और आंदोलनों की शरण में धकेल दिए जाते हैं. सभी सरकारों के पास दिखाने के लिए पुनर्वास की तमाम नीतियां हैं लेकिन उनके लागू होने तक इतना लंबा वक्त गुज़र जाता है कि न तो प्रेस की दिलचस्पी होती है और अगर आप चाहें भी तो रिपोर्ट की काफी इतने सवाल जवाब में उलझ जाती है कि न सवाल समझ आता है और न ही जवाब. जो आम आदमी होता है वह समय समय पर बैनर लिए प्रदर्शन कर रहा होता है. आरटीआई से सूचनाएं ले रहा होता है. प्रधानमंत्री से लेकर चीफ जस्टिस तक को पत्र लिखता रहता है. पूरा मामला ऐसा बना दिया जाता है कि जो विस्थापित होता है वही झूठा नज़र आने लगता है. आप इन चेहरों को नहीं पहचान पाएंगे. दरअसल हम नहीं जानते थे. इन सबके हाथ में जो तख्ती है, जिस इंसाफ की ये बात कर रहे हैं, उसकी कहानी आपको हजम नहीं होगी. इस बच्चे के दादा जी एक योजना के लिए विस्थापित हुए थे अब ये पोताजी इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं. 1960 में दादा जी के समय पोंग बांध के लिए ज़मीन ली गई थी और अब उनका पोता 2019 में पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहा है. ये सभी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के हैं. आप यकीन नहीं करेंगे कि ये लोग 50 साल से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट से जीत जाने के बाद भी इन्हें पुनर्वास की ज़मीन नहीं मिली है.



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