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रवीश कुमार का प्राइम टाइम: क्या वित्तीय आंकड़ों का ढांचा ढह रहा है?

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आज अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर ने बजट में कमाई और खर्चे के बीच 1 लाख 70 हज़ार करोड़ के अंतर पर सवाल उठाया है. पूछा है कि इतना पैसा बजट के हिसाब से कैसे गायब हो सकता है. क्या सरकार जानबूझ कर कुछ छिपा रही है. प्रोफेसर का कहना है कि 2018-19 के रिवाइज़्ड एस्टिमेट में टैक्स रेवन्यू 14.8 लाख करोड़ था. यह अंतरिम बजट में था जो फरवरी के महीने में चुनाव से पहले पेश किया गया था. जून महीने में सीजीए, कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स ने बताया था कि टैक्स रेवन्यू 13.16 लाख करोड़ ही है. जून में आया यह आंकड़ा लेटेस्ट माना जाता है. इन दोनों में 1.67 लाख करोड़ का है. 14.8 लाख करोड़ के टैक्स रेवेन्यू के हिसाब से भारत का वित्तीय घाटा कम लगेगा. 13.16 लाख करोड़ का डाटा लेंगे तो वित्तीय घाटा बढ़ जाता है क्योंकि राजस्व कम होगा, कमाई कम होगी और खर्चा ज़्यादा होगा तो वित्तीय घाटा बढ़ेगा. अगर सरकार ने खर्चे में कमी की होगी तो वैसी स्थिति में वित्तीय घाटा कम हो सकता था लेकिन वित्त मंत्री हर बार कह रही हैं कि ख़र्चे में कोई कमी नहीं की गई है. 2018-19 में सरकार ने बताया था कि कितना कमाएगी. बजट 2019-20 में इन्हीं आंकड़ों का इस्तमाल हुआ लेकिन इकनोमिक सर्वे में जो सही आंकड़ा था उसका इस्तमाल नहीं हुआ. जो ताज़े आंकड़े हैं उसका इस्तमाल नहीं हुआय. अर्थशास्त्री जयति घोष कहती हैं कि अगर आर्थिक सर्वे के आंकड़ें सर्वे हैं तो इसका एक ही समाधान है कि फिर से बजट पेश किया जाए. इसे लेकर सदन में सवाल जवाब भी हुआ जहां वित्त मंत्री ने जवाब दिया.



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