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रवीश कुमार का प्राइम टाइम : ख़ूब लड़ा ऑस्ट्रेलिया का मीडिया, खूब झुका भारत का मीडिया

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आप जो अख़बार ख़रीदते हैं, या जो चैनल देखते हैं, क्या वह आज़ाद है? उसके आज़ाद होने का क्या मतलब है? सिर्फ छपना और बोलना आज़ादी नहीं होती. प्रेस की आज़ादी का मतलब है कि संपादक और रिपोर्टर ने किसी सूचना को हासिल करने के लिए मेहनत की हो, उन्हें छापने से पहले सब चेक किया हो और फिर बेखौफ होकर छापा और टीवी पर दिखाया हो. इस आज़ादी को ख़तरा सिर्फ डर से नहीं होता है. जब सरकारें सूचना के तमाम सोर्स पर पहरा बढ़ा देती हैं तब आपके पास सूचनाएं कम पहुंचने लगती हैं. सूचनाओं का कम पहुंचना सिर्फ प्रेस की आज़ादी पर हमला नहीं है, वो आपकी आज़ादी पर हमला है. क्या आप अपनी आज़ादी गंवाने के लिए तैयार हैं? अगर हां तो आपने यह फ़ैसला कब कर लिया और किस आधार पर किया? मुझे मालूम है कि आप गोदी मीडिया की करतूत से परेशान हैं. आपको पता है कि भारत का प्रेस इस वक्त किनके चरणों में लेटा हुआ है. लेकिन आपने एक और चीज़ नोटिस की होगी. भारत का प्रेस सरेंडर करने लगा है. वह लड़ना भूल गया है. चुनिंदा मामलों में निंदा प्रस्ताव पास करने के अलावा पत्रकारिता के मानकों की फिर से स्थापना की कोशिश और पत्रकारिता की आज़ादी हासिल करने का जज़्बा दिखाई नहीं देता. डरे हुओं के लिए एक अच्छी ख़बर आई है. ऑस्ट्रेलिया से. वैसे वहां जो हुआ, उसके जैसा कुछ-कुछ भारत में भी हो चुका है लेकिन इस तरह से नहीं जैसा 21 अक्टूबर की सुबह ऑस्ट्रेलिया के लोगों ने देखा जब अख़बार खोला.



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