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रवीश कुमार का प्राइम टाइम: 'कहीं पानी-पानी, कहीं सूखा-सूखा' ऐसा क्यों ?

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1985 में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बुतरस बुतरस घाली ने कहा था कि मध्य पूर्व में अगला युद्ध पेट्रोल नहीं, पानी के सवाल पर होगा. 2001 में संयुक्त राष्ट्र के ही महासचिव कोफ़ी अन्नान ने कहा कि पानी को लेकर चल रही तीखी प्रतियोगिता भविष्य के युद्धों की जड़ बन सकती है और 2007 में एक अन्य महासचिव बान की मून ने कहा कि जल संकट आने वाले कल के बहुत सारे युद्धों और संघर्षों को ईधन दे सकता है. हालांकि बाद में संयुक्त राष्ट्र ने राय बदली भी- 2018 को पानी पर चल रहे एक सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के उपमहासचिव ने माना कि पानी का संकट है, ये संकट बड़ा होता जाएगा, लेकिन याद दिलाया कि पानी देशों को जोड़ता रहा है, तोड़ता नहीं रहा है. उन्होंने भारत-पाकिस्तान और पश्चिमी एशिया के देशों में पानी के समझौतों की चर्चा की. लेकिन एक बात साफ़ है- पानी का संकट बड़ा हो रहा है. भारत के बड़े शहर जैसे पानी के टाइम बम पर बैठे हुए हैं. कहा जा रहा है कि 21 शहरों में साल भर के भीतर पानी ख़त्म हो जाएगा. लेकिन एक तरफ़ धरती सूखी पड़ी है तो दूसरी तरफ़ शहर पानी में डूब रहे हैं. इसी महीने हमने देखा, पानी ने मुंबई में कितना कोहराम मचाया मौसम बदल रहा है- जहां पानी बरसता है, इतना बरसता है कि सबकुछ तहस-नहस हो जाए. नहीं बरसता है तो धरती सूखी रह जाती है, लोग प्यासे रह जाते हैं, पानी को ट्रेनों से एक जगह से दूसरी जगह ले जाना पड़ता है. देखिए ये रिपोर्ट- कहीं पानी-पानी, कहीं सूखा-सूखा.



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