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रवीश कुमार का प्राइम टाइम: लाइब्रेरी को कितनी अहमियत देते हैं हम?

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भारत में लाइब्रेरी की स्थिति बहुत ख़राब है. इंडिया स्पेंड ने इसी 30 जून को भारत की लाइब्रेरी पर एक विस्तृत रिपोर्ट छापी थी. इसके अनुसार 2011 की जनगणना में पहली बार पब्लिक लाइब्रेरी की भी गिनती हुई है. तब पता चला कि भारत के गांवों में 70 हज़ार से अधिक लाइब्रेरी है और शहरों में 4580. एक अरब की आबादी के लिए छोटी बड़ी लाइब्रेरी की कुल संख्या 80,000 भी नहीं है. अमरीका में पब्लिक लाइब्रेरी सिस्टम आबादी के 95 फीसदी हिस्से की सेवा करता है. हर साल एक अमरीकी नागरिक पर 36 डॉलर खर्च करता है, करीब 2500 रुपये. यहां पर एक नागरिक पर 7 पैसा लाइब्रेरी के नाम पर खर्च किया जाता है. लाइब्रेरी न होने का दर्द दिल्ली को भी झेलना पड़ रहा है. दूसरे राज्यों से आए छात्रों को पढ़ने के लिए लाइब्रेरी जाना पड़ता है. गली मोहल्ले में इतनी लाइब्रेरी खुल गई है कि हिसाब नहीं. रीडिंग रूम के कारण उनका बजट बढ़ गया है लेकिन राजनीतिक चेतना की इतनी कमी है कि अगर उनसे दुगना पैसा भी ले लिया जाए तो मां बाप यही कहेंगे कि हां चुपचाप पढ़ो. लाइब्रेरी के लिए संघर्ष मत करो. तुम पढ़ने गए हो. खैर उनकी चिन्ता मत कीजिए लेकिन कस्बों से लेकर गांवों में ज्ञान का एक अंतर तो बना है. लोगों को मालूम होना चाहिए कि अच्छी लाइब्रेरी का होना और वहां जाना सबकी ज़िंदगी बदल सकती है.



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