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प्राइम टाइम : क्या इस बार किसानों से वादा निभाएगी सरकार?

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देश में भले चाहे जितनी परेशानी हो, हमारे नेताओं को कोई परेशानी नहीं है. वे आराम से अच्छे कपड़े पहन रहे हैं, उनके सूटकेस नए-नए से लगते हैं. चश्मा भी महंगा ही होता है, इस दल से टिकट नहीं मिलता है तो उस दल से ले आते हैं. आप लोकतंत्र पर बहस करते रहिए, आपके सारे संघर्षों का फायदा वो लोग उठा ले जाते हैं जो किसी संघर्ष में नहीं होते हैं, किसी सड़क पर नहीं दिखते हैं और आराम से टिकट लेकर पार्टी तक ख़रीद लेते हैं. जब भी आप नेताओं की तरफ देखेंगे तो खुद पर ही शक होने लगेगा कि ख्वामख़ाह हमीं परेशान हैं. अकबर इलाहबादी का शेर है, 'क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ, रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ.' जनता के लिए लोकतंत्र ख़तरे में है क्योंकि उसकी आवाज सुनी नहीं जाती, लीडर के लिए कोई ख़तरा नहीं है. इसीलिए आप किसी लीडर को सड़क पर संघर्ष करते नहीं देखेंगे, वह मंच पर आता है और चला जाता है.



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