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भारतीय राजनीति में मोदी-शाह युग: Modi 'सपनों के सौदागर', Shah बने 'चाणक्‍य'

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भारतीय राजनीति में मोदी-शाह युग: Modi 'सपनों के सौदागर', Shah बने 'चाणक्‍य'

इन विधानसभा नतीजों से पूरी तरह से पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह का राजनीति में वर्चस्‍व स्‍थापित हो गया है(फाइल फोटो)

यूपी में बीजेपी की भारी बढ़त ने एक बार फिर सियासत में पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्‍यक्ष अमित शाह के वर्चस्‍व पर मुहर लगा दी है. यूपी में बीजेपी की विस्‍फोटक बढ़त ने अमित शाह को जहां राजनीति का 'चाणक्‍य' साबित कर दिया है वहीं नरेंद्र मोदी 'सपनों का सौदागर' बनकर उभरे हैं. इन चुनावों ने पीएम मोदी के नोटबंदी और सर्जिकल स्‍ट्राइक जैसे सख्‍त फैसलों पर मुहर लगा दी है. इसके साथ ही यह साबित हो गया है कि भारतीय राजनीति का हालिया दौर मोदी और शाह का है और वक्‍त गुजरने के साथ इस दौर को मोदी-शाह युग के नाम से ही जाना जाएगा.

इस जोड़ी की आक्रामक शैली का ही यह नतीजा रहा है कि यूपी और उत्‍तराखंड जैसे राज्‍य केसरिया रंग में सराबोर हो गए हैं. अमित शाह इसलिए चाणक्‍य बनकर उभरे हैं क्‍योंकि उन्‍होंने यूपी में अपने दबदबे को बरकरार रखा है. 2014 के लोकसभा चुनावों में यूपी में बीजेपी को 71 सीटें मिली थीं और इस बार भी अमित शाह ने अपने खास अंदाज में ही खासकर यूपी में चुनाव लड़ा. छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन किया. पिछड़े वर्ग और दलित वोटबैंक को अपनी तरफ लाने के लिए दूसरे दलों से पार्टी में आने वाले प्रत्‍याशियों पर भरोसा जताया. इससे टिकट बंटवारे में पार्टी के भीतर असंतोष जरूर पनपा लेकिन बीजेपी ने उसको समय रहते ही थाम लिया. अमित शाह को करीब से जानने वाले उनके बूथ मैनेजमेंट, चुनाव में जातीय गणित के आकलन और संभावनाओं को वोट में बदल देने की क्षमता के कायल हैं. उनकी रणनीतियां इसीलिए परंपरागत लिहाज से एकदम अलग होती है लेकिन उसके अप्रत्‍याशित नतीजे भी मिलते हैं.   

उल्‍लेखनीय है कि पिछले दिनों सत्‍तारूढ़ सपा परिवार के कलह में हुई घमासान के बाद जिस तरह ब्रांड अखिलेश उभर कर के सामने आए उससे अक्‍टूबर-नवंबर के महीने में जो भी ओपिनियन पोल आए उसमें अखिलेश सबसे पसंदीदा नेता बनकर उभरे. उसके बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन को उनका 'मास्‍टर स्‍ट्रोक' करार दिया गया. उधर बीजेपी ने कोई अपना मुख्‍यमंत्री घोषित नहीं किया था. टिकट बंटवारे को लेकर भी सबसे ज्‍यादा पार्टी में असंतोष दिखा और चुनाव शुरू होने से ऐन पहले यह माना जाने लगा कि अखिलेश सबसे पर भारी पड़ सकते हैं.

लेकिन यूपी चुनाव शुरू होने के साथ पीएम मोदी के प्रचार में उतरने के साथ ही पूरा माहौल बदलना शुरू हो गया. चुनाव प्रचार का जिम्‍मा उन्‍होंने खुद उठाया. रिकॉर्डतोड़ रैलियां करनी शुरू कर दीं और अपने तरकश से नित नए तीर निकालकर विरोधियों पर हमले करने लगे. विपक्षी पीएम मोदी की गति, ऊर्जा को देखकर हैरान रह गए. दरअसल सपा और बसपा को लगता था कि संभवतया बिहार से सबक लेते हुए बीजेपी शायद यूपी में उनको उस तरह से प्रचार के लिए नहीं उतारे लेकिन विरोधियों को हैरान करते हुए पीएम मोदी ने चुनावी कमान को पूरी से अपने हाथों में ले लिया और नेतृत्‍व करने लगे. देखते ही देखते तीसरे चरण के चुनाव से माहौल बदलने लगा और अंतिम चरण से पहले तो पूर्वांचल की धुरी बनारस में तीन दिन तक रोड शो और रैलियां कर उन्‍होंने विरोधियों को हांफने पर मजबूर कर दिया.

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पीएम मोदी ने जिस तरह से उन्‍होंने पार्टी अध्‍यक्ष अमित शाह के साथ इस बार का यूपी चुनाव लड़ा है, उससे मीडिया में भी यह कहा जाने लगा कि ऐसा लग रहा है कि यह भारतीय राजनीति का अंतिम चुनाव है. ऐसा चुनाव प्रदेश की राजनीति में पहले कभी नहीं लड़ा गया.

दरअसल पीएम मोदी के बारे में राजनीतिक विश्‍लेषकों का मानना है कि वह पूरी तरह से जन भावना को समझते हैं और उसके अनुरूप ही फैसले लेते हैं. इसके चलते जनता के जेहन में इस दौर में वह पूरी तरह से हावी हो चुके हैं. शायद यही कारण है कि नोटबंदी जैसे सख्‍त फैसले लेने के बाद भी लोगों का अपार समर्थन उनको हासिल हो जाता है और सीमापार सर्जिकल स्‍ट्राइक जैसे फैसले लेकर जनता का दिल जीत लेते हैं.


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