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फ्यूजन फूड की प्रयोगशाला बन गया है किचन

खान-पान ऐसी फील्ड है जिसमें सबसे ज्यादा प्रयोग किए जा रहे हैं, और सबसे ज्यादा हैपनिंग है

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फ्यूजन फूड की प्रयोगशाला बन गया है किचन

अदरक का हलवा

खास बातें

  1. खानपान में कोई सीमा नहीं रही
  2. किचन में दुनिया भर की सामग्री हुई दाखिल
  3. भारतीय फूड हो रहा है ग्लोबल
नई दिल्ली: आजादी के बाद से ही फूड का सफर आमूल-चूल ढंग से बदल चुका है. इस सफर की शुरुआत ब्रिटिश व्यंजनों के साथ हुई थी जो 1947 से पहले तक भारत में काफी लोकप्रिय थे. लेकिन आजादी के बाद इन्हें राजनैतिक माहौल की वजह से मजबूरन थाली से बाहर होना पड़ा था. आजादी के पहले एक दशक यानी 1947-57 के खान-पान का कोई इतिहास नहीं मिलता है, इसकी वजह यह है कि देश उस समय कई तरह के बदलावों और समस्याओं में उलझा हुआ था. लेकिन इसी अवधि में देश ने अपनी जड़ों की ओर लौटना शुरू किया. घर का खाना और मुगलाई व्यंजन थाली में पहुंचने लगे. हालांकि खानपान पर अंग्रेजों का असर फिर दिखने लगा मसलन, बंगाल में प्रॉन कटलेट्स, दक्षिण भारत में स्टू और लखनऊ में गलौटी और काकोरी कबाब. बदलते दौर के साथ बटर चिकन ने भी लोकप्रियता की पायदान पर दौड़ लगानी जारी रखी. इसकी एक वजह मोती महल और दिल्ली दरबाज जैसे रेस्तरांओं का आना भी था. 
 इस सफर का एक और आयाम था कि अधिकतर भारतीयों ने विदेश (कनाडा और यूके) का रुख किया. इस तरह भारतीय पकवान विदेश की ओर बढ़ गए. आज कई व्यंजन कई इलाकों की खास पहचान बन चुके हैं जैसे सालन और बिरयानी हैदराबादी, पॉट करीज और लजीज हांडी ग्रेवी दिल्ली वालों की. इसी तरह भारतीय शेफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर झंडे गाड़ रहे हैं. आइए हम इन सात दशकों के खान-पान के सफर को सात बिंदुओं में बताते हैः   
  
अंग्रेज गए, पर जायका नहीं: अंग्रेज तो भारत छोड़कर चले गए लेकिन उनके पकवान यहीं रह गए. उनके इस असर ने भारतीय पकवानों को नए तेवर के साथ उभरने का मौका दिया. मसलन, जैसे कश्मीरी रोगन जोश. कश्मीरी मुस्लिम (गाढ़ा और सूपी, प्यार और लहसुन का इस्तेमाल) और पंडित (प्याज और लहुसन के बिना गाढ़ी सब्जी) इसे अलग ढंग से बनाते हैं.
 
rice
 दूधिया बिरयानी

पढ़े-लिखे शेफ: भारत में व्यंजनों का कभी कोई इतिहास नहीं लिखा गया. भारत में शिक्षा के उदय के साथ ही फूड और हॉस्पिटेलिटी में भी इसका असर दिखा, और शेफ काफी शिक्षित होने लगे. इन्होंने खान-पान के इतिहास को दर्ज करना शुरू किया और भारतीय व्यंजनों को नई ऊंचाइयों पर लेकर गए. इन शेफ में मंजीत गिल, जिग्स कालरा और सतीश अरोड़ा के नाम प्रमुखता से आते हैं.

गया खानासामाओं का दौर: पिछले 70 साल के इतिहास में मैं इस इंडस्ट्री का 23 साल से हिस्सा हूं. जिस तरह से शेफ और किचन बदले हैं, उसे मुझे करीब से देखने को मौका मिला है. पहले या तो खानसामा होता था था या फिर बंगाली शेफ लेकिन अब पेशावरी या बुखारी जैसे ब्रांड आ चुके हैं और उनमें एक अलग ही किस्म का खाना परोसा जाता है.  यह स्पेशलिटी ही फूड इंडस्ट्री को आगे लेकर जा रही है.

ट्रैवल और फूड: भारत में जापान, फ्रांस और इंडोनेशिया का खान-पान तेजी से जगह बना रहा है. डेढ़ दशक पहले तक फ्रांसीसी या जापानी रेस्तरां ढूंढना असंभव सा हुआ करता था. लेकिन आज ये बहुतायत में हैं. इसकी एक वजह सैलानियों का भारत आना और यहां अपने देश के व्यंजन लाना है. इसकी मिसाल गोवा और बनारस में देखी जा सकती है. 

खाने के साथ प्रयोग: आज लोग खाने के साथ प्रयोग कर रहे हैं. उन्होंने खुद को किसी सीमा में बांधा नहीं है. इंटरनेशनल शेफ भी भारतीय सामग्री को अपने व्यंजनों में इस्तेमाल करने से हिचक नहीं रहे हैं. मसलन, सालमन में हल्दी और टमाटर सॉस का इस्तेमाल हो रहा है. नए प्रयोग की कोई कमी नहीं है.

सेलिब्रिटी शेफ: आज शेफ सिर्फ खाना बनाने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि वे सेलिब्रिटी बन गए हैं. टीवी पर उनके शो आ रहे हैं. रियलिटी शो में वे जज बन रहे हैं, और शेफ का काम आज काफी आकर्षक हो गया है. फ्यूजन फूड, फूड ट्रेंड्स और आधुनिकता के इस दौर में इस प्रोफेशन ने एक नया मुकाम हासिल कर लिया है. 

टेलीवजन और कुकरी शो: टीवी पर आने वाले कुकरी शो ने खानपान की दुनिया को बदलकर रख दिया है. आज रिजोटो से लेकर चॉकलेट सफल तक लोगों के सामने हैं, और वे इस पर हाथ आजमा रहे हैं. खाना को 7-8 स्टेप में बनाना सिखाना वाकई कमाल है. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लोग खाना बना रहे हैं और सिखा रहे हैं. कुछ दशक पहले इसे सोच पाना भी असंभव था. 

अजय चोपड़ा एक सेलिब्रिटी शेफ हैं और लिविंग फूड्स पर नॉर्दन फ्लेवर्स के होस्ट हैं.

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