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दिल्ली, तूने सबको 'अपना घर' दिया, लेकिन हमने तुझे 'अनाथ' कर दिया

दो साल की थी, जब पापा मुझे लेकर दिल्ली आए थे. कुछ न याद रहने की उम्र से इस शहर ने मुझे ऐसे गले लगा लिया कि अक्सर पापा से कह बैठती थी - 'आप झूठ बोलते हैं, मेरी तो पैदाइश ही दिल्ली की है.'

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दिल्ली, तूने सबको 'अपना घर' दिया, लेकिन हमने तुझे 'अनाथ' कर दिया

दिल्ली, तूने सबको 'अपना घर' दिया, लेकिन हमने तुझे 'अनाथ' कर दिया (प्रतीकात्मक फोटो)

बचपन से दिल्ली में रहती हूं. पर लोग जब पूछते हैं कि कहां से बिलॉन्ग करती हो, तो जवाब होता है हरियाणा. दादा-परदादा, खेल-खलिहाल और सबसे अहम दो महीने की छुट्ट‍ियां सब वहीं पर हैं, वैसे के वैसे, जैसे पापा कभी छोड़ आए थे. उनते ही सादे और अपने...

दो साल की थी, जब पापा मुझे लेकर दिल्ली आए थे. कुछ न याद रहने की उम्र से इस शहर ने मुझे ऐसे गले लगा लिया कि अक्सर पापा से कह बैठती थी - 'आप झूठ बोलते हैं, मेरी तो पैदाइश ही दिल्ली की है.' मुझमें दिल्ली बस गई, मैं दिल्ली की हो गई, क्योंकि दिल्ली मेरी हो गई... इसमें मेरी भी कोई गलती नहीं. ये शहर ही ऐसा है. जो इसका हो ले वो किसी ओर का कैसे हो सकता है. पोर-पोर में दिल्ली को लेकर चलते हैं दिल्ली वाले...

दिल्ली ने सबको रोजगार दिया, श‍िक्षा दी और दिया गांव-कस्बों से निकलकर यहां अपनी चाह को पूरा करने आए आम आदमी को जीने का जज्बा और ताकत. यहां रहने वालों के दिल में बसती है दिल्ली, और इसकी सड़कें मानों शरीर की नसों की तरह चौबीसों घंटे उनके सपनों को पूरा करने के लिए तेजी से दौड़ती रहती हैं.

हर बेघर का कच्चा-पक्का घर बनाया है दिल्ली ने. कई मनीऑर्डर भेज कर दूर बसे लोगों के भी पेट भरे हैं दिल्ली ने. कभी-कभी सोचती हूं काश! मुझे कहीं बैठी, लेटी या चलती हुई मिल जाए दिल्ली, तो उसे सीने से लगा लूंगी और पूछूंगी कि कैसे उसने सगे-सौतेले का फर्क किए बिना उसके आंचल में आने वाले हर इंसान को इतना प्यार दिया. कैसे उसने देश के हर कोने, हर धर्म और हर स्तर के लोगों को एक-समान रूप से अपनाया...

पर सोच रही हूं अगर दिल्ली कभी मेरे सामने आ भी गई, तो कैसे नजरें मिला पाऊंगी मैं उससे... शर्म से गल न जाएंगी आंखे! क्या खुद को दिल्ली वाला और दिल वाला कहने वाले हम सच मुझ दिल्ली और दिल वाले बन पाए? या बस शब्दों के ही ताने-बाने बुन कर मन को बहला लिया हमने... क्या दिल्ली में बाहर से आने वाला और यहीं का रहने वाला व्यक्त‍ि कभी अपने स्वार्थ से उठकर यह देख पाया कि उसे इतना कुछ देने वाली दिल्ली को उसने क्या दिया...

हमने दिल्ली को क्या दिया...? प्रदूषण, जगह-जगह थूकी गई पान की पीक, दिवारों पर ब्लैडर की तृष्णा, लगातार बढ़ते कूड़े के पहाड़, गिरता जल स्तर, मनमाने तरीके से भेद-भेद कर बनी ऊंची इमारतें, सड़ी गर्मी, खाली कूड़ेदान और सड़कों पर पड़ा कचरा... क्या सचमुच दिल्ली इसी के लायक थी... शायद हां, यही तो सीख और सिखा रहा है आज हमारा समाज- 'जो हमें न दे उससे छीन लो और जो दे उसे हीन कर दो...' खैर.

बीते कुछ सालों से दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से यहां रहने वाला हर परिवार, हर शख्स यह बात सोच चुका होगा कि क्यों न दिल्ली को छोड़कर कहीं और शिफ्ट किया जाए. पर किसी ने यह न सोचा होगा कि क्यों न अपनी दिल्ली को फि‍र से साफ-सुथरा और रहने लायक बनाया जाए... क्यों न सड़कों पर इधर-उधर कचरा न फेंका जाए, क्यों न थैलियों का इस्तेमाल बंद किया जाए, क्यों न सार्वजनिक परि‍वहन में जाया जाए, क्यों न पानी का बचाव किया जाए, क्यों न घर को ठंडा रखने के लिए एसी से हटकर कुछ और उपाय तलाशे जाएं... आख‍िर ऐसा सोचने की जरूरत ही क्या है. दिल्ली वालों के पास और भी बहुत काम है, बहुत व्यस्त दिनचर्या होती है इनकी. जरा भी टाइम नहीं 'दिल्ली-वालों' के पास दिल्ली के लिए... बस खबरें आती रहती हैं एनजीटी ने इसे फटकार लगाई, कोर्ट ने उसे फटकार लगाई, जवाब मांगा, हिसाब मांगा... नतीजे नहीं, हालात वही... या कहें कि बदतर हो रहे हैं.

खबर है कि सुप्रीम कोर्ट सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर सुनवाई कर रहा है. और सरकार मामले में बार बार वक्त मांगे जा रही है. इस बार कोर्ट ने दिल्ली सरकार को वक्त देने से इनकार कर दिया. आपको क्या लगता है इस खबर से दिल्ली को राहत मिली होगी. नहीं जनाब, दिल्ली जान गई है कि उसने बाश‍िंदे नहीं, मतलब के यार पाले हैं, जो उसके लिए समय ही नहीं निकाल सकते. इतना समय भी नहीं कि हाथ में पड़ा कचरा कूड़ेदान में ड़ाल दें सड़क पर नहीं...

अब दिल्ली ने भी जवाब देना शुरू कर दिया है. पानी में अमोनिया का स्तर बढ़ रहा है, सर्दियां छोटी और गर्मियां बर्दाश्त न होने वाली होती जा रही हैं. एक वक्त था जब दिल्ली की सड़कें सांस लेती थीं तो हरियाली सुगंध आती थी, लेकिन अंदर तक मर चुकी दिल्ली अब सांस में भी काला स्याह धुंआ ही छोड़ती है.

रात के अंधेरे में जब आप, मैं, हम सब कमरों में आराम से सो रहे हैं, दिल्ली चुपचाप पड़ी लंबी-लंबी सांसें ले रही है, तड़प कर पीने के लिए पानी मांग रही है, गर्म हवाओं के थपेड़ों और कचरे की सड़ांध ने उसे बेसुध कर दिया है, वह उम्मीद में है कि उसके सोए हुए बाश‍िंदे जल्द ही उठेंगे और उसकी सुध लेंगे... मैं इस अंधेरी रात में, चुपके से अपनी प्यारी और लाचार दिल्ली के कान में एक खौलता हुआ कड़वा सच कहना चाहती हूं कि 'दिल्ली, माफ करना, तूने सबको 'अपना घर' दिया, लेकिन हमने तुझे 'अनाथ' कर दिया...'

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अनिता शर्मा एनडीटीवी खबर में चीफ सब एडिटर हैं

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :
इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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