भारत में 22 करोड़ तो US मे 4 करोड़ बेरोज़गार, मीडिया में भारी छंटनी

मीडिया में भी बड़ी संख्या में नौकरियां जा रही हैं. जो अखबार साधन संपन्न हैं, जिनसे पास अकूत संपत्ति हैं वे सबसे पहले नौकरियां कम करने लगें. सैंकड़ों की संख्या में पत्रकार निकाल दिए गए हैं.

भारत में 22 करोड़ तो US मे 4 करोड़ बेरोज़गार, मीडिया में भारी छंटनी

प्रतीकात्मक तस्वीर.

अमरीका का श्रम विभाग है. वह बताता है कि इस हफ्ते कितने लोगों को नौकरी मिली है. कितने लोग बेरोज़गार हुए हैं. 10 हफ्तों में अमरीका में 4 करोड़ लोग बेरोज़गार हो चुके हैं. इस हफ्ते के अंत में 21 लाख लोग बेरोज़गारों की संख्या में जुड़े हैं.

भारत में भी श्रम विभाग है. खुद से यह नहीं बताता है कि कितने लोग बेरोज़गार हुए हैं. भारत का युवा को फर्क भी नहीं पड़ता है कि बेरोज़गारी का डेटा क्यों नहीं आता है.

सेंटर फार मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी(CMIE) के ताज़ा सर्वे के अनुसार अप्रैल के महीने में 12 करोड़ 20 लाख लोग बेरोज़गार हुए हैं. उनकी नौकरी गई है. उनका काम छिन गया है. 24 मई तक 10 करोड़ 20 लाख लोग बेरोज़गार हुए हैं. तालाबंदी में ढील मिलने से 2 करोड़ लोगों को काम वापस मिला है.

जिस मुल्क में 22 करोड़ से अधिक लोग बेरोज़गार हुए हों वहां मीडिया क्या करता है, यह सवाल भी नहीं रहा. इन घरों में कितनी मायूसी होगी. घर परिवार पर कितना बुरा मानसिक दबाव पड़ रहा होगा. समस्या यह है कि लंबे समय तक दूसरे क्षेत्रों में भी काम मिलने की संभावना कम है. ऐसा नहीं है कि यहां नौकरी गई तो वहां मिल जाएगी.

मीडिया में भी बड़ी संख्या में नौकरियां जा रही हैं. जो अखबार साधन संपन्न हैं, जिनसे पास अकूत संपत्ति हैं वे सबसे पहले नौकरियां कम करने लगें. सैंकड़ों की संख्या में पत्रकार निकाल दिए गए हैं. न जाने कितनों की सैलरी कम कर दी गई. इतनी कि वे सैलरी के हिसाब से पांच से दस साल पीछे चले गए हैं. प्रिंट के अपने काबिल साथियों की नौकरी जाने की खबरें उदास कर रही हैं. कंपनियां निकालती हैं तो नहीं देखती हैं कि कौन सरकार की सेवा करता था कौन पत्रकारिता करता था. सबकी नौकरी जाती है. इनमें से बहुत से लोग अब वापस काम पर नहीं रखे जा सकेंगे. पता नहीं उनकी ज़िंदगी कहां लेकर जाएगी. युवा पत्रकारों को लेकर भी चिन्ता हो रही है. पत्रकारिता की महंगी पढ़ाई के बाद नौकरी नहीं मिलेगी. इंटर्नशिप के नाम पर मुफ्त में खटाए जाएंगे.

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यह वक्त मज़ाक का नहीं है. मौज नेताओं की रहेगी. वे मुद्दों का चारा फेकेंगे और जनता गुस्से में कभी इधर तो कभी उधर होती रहेगी. क्रोध और बेचैनी में कभी स्वस्थ्य जनमत का निर्माण नहीं होता है. इस वक्त भी देख लीजिए स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कहां बहस हो रही है. सरकारों पर कहां दबाव बन रहा है. प्राइवेट अस्पताल तो किसी काम नहीं आ रहे. जब उम्मीद सरकारी अस्पतालों से है, वहीं के डाक्टर इससे लड़ रहे हैं तो क्यों न उनकी सैलरी बढ़ाई जाए, उनके काम करने की स्थिति बेहतर हो. बहुत सारे नर्सिंग स्टाफ पढ़ाई के बाद नौकरी का इंतज़ार कर रहे हैं. फार्मेसी के छात्र बेरोज़गार घूम रहे हैं. इन सबके लिए रोज़गार का सृजन करना होगा.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।