टीवी मीडिया के गटर से निकला जमूरा पत्रकारिता का जिन्न

जमूरा पत्रकारिता का जिन्न बाहर निकल चुका है और वो धीरे-धीरे काली आंधी की तरह गंभीर और तथ्यों की पत्रकारिता को लील रहा है

टीवी मीडिया के गटर से निकला जमूरा पत्रकारिता का जिन्न

पुलिस बेरीकेटिंग के नजदीक हम लोग लाइव की तैयारी कर रहे थे..सुबह के आठ बजने वाले थे...नर्म धूप धीरे-धीरे तीखी हो रही थी लेकिन हवा में अब भी  हल्की ठंड मौजूद थी. गांव जाने वाले रास्ते को पुलिस बेरीकेट से बंद कर दिया गया था और एक इंस्पेक्टर जीप के बोनट पर ड्यूटी बदलने का चार्ट बना रहा था. रात भर की ड्यूटी से हलकान पुलिस और PAC वालों के चेहरे तो मास्क में छिपे थे लेकिन कोई बेरीकेट तो कोई दीवार के सहारे टिका शरीर को थोड़ा आराम देने की कोशिश कर रहा था. असहाय सी दिखने वाली सबकी आंखें बस बिना उम्मीद मीडिया के कैमरे और रिपोर्टर पर टिकी थी. गोरिल्ला युद्ध की तरह अचानक लस्त पस्त पड़ी पुलिस फोर्स को देखकर एक महिला एंकर बेरीकेट खींचकर अंदर दाखिल हुई और
लाइव में चीखते हुए.. ये देखिए किस तरह हमें रोकने की कोशिश हो रही है लेकिन हम इंसाफ दिलाकर रहेंगे...दर्जनों पुलिस कर्मी एंकर की तरफ दौड़े...एंकर हांफ रही थी...लेकिन धक्कामुक्की करते हुए नाटकीय विजुअल लाइव जा रहे थे....करीब बीस मिनट चली इस आपाधापी की लाइव कवरेज हो चुकी थी...खौलते टीवी पर जैसे ही कामर्शियल ब्रेक का पानी पड़ा, वैसे माहौल सामान्य होने लगा. 

तीखी धूप के चलते हम सब अब छांव में खड़े हो गए...तभी एक साथी रिपोर्टर गांव के दूसरे रास्ते की रेकी करने लगे..कुछ देर बाद वापस लौटे तो मैंने पूछा कि वहां क्या करे रहे थे? बोला भैया PAC को समझा रहा था कि कुछ देर बाद लाइव के दौरान जबरन जाने की कोशिश करूंगा लेकिन आप पांच-दस मिनट के लिए ह्यूमन चेन बनाकर रोक लीजिएगा...बस डंडे मत मारिएगा...पुरुष रिपोर्टरों के साथ ये स्वाभाविक खतरे होते हैं कि जबरदस्ती करने पर बात धक्कामुक्की और बहस पर नहीं बल्कि मारपीट पर खत्म होती है. 

कुछ देर बाद लाइव होते ही रिपोर्टर भागा...दूसरे रास्ते से गांव जाने की कोशिश हुई, पुलिस ने रोका..जिस कांस्टेबल की ड्यूटी ही बिना सवालों के तैनात रहने के लिए होती है उससे सवाल पूछा जा रहा था कि किसके कहने से मीडिया को रोक रहे हो? ऑन स्क्रीन लाइव के दौरान कांस्टेबल से लेकर अधिकारी तक से उलझने का...गर्मा गर्मी करने का... अपरोक्ष आर्डर दिल्ली के कुछ संपादकों द्वारा जारी हो चुका था..सुशांत राजपूत केस में TRP के दंगल में जमूरा  पत्रकारिता के हाथों बुरी तरह पिटे मीडिया को नकल की कुंजी मिल चुकी थी.....रिपोर्टर के जरिए रचा गया नाटक,  हलक सुखाने वाली आवाज और खुद को चाचा चौधरी-साबू साबित करके बाकी को गोबर सिंह जैसा खलनायक बनाने की आजादी.  

खैर घंटे भर बाद अचानक पुलिस ने पीड़िता के गांव जाने की इजाजत दी और बेरीकेट खुलते ही एक्सक्लूसिव बातचीत की होड़ में रिपोर्टर भागने लगे..पीड़िता के घर में दर्जनों मीडिया के कैमरे पहुंचकर बच्चे से लेकर बड़ों तक से सवाल पूछने लगे...घर की जमीन पर चौपाल लग चुकी थी. चैनल के एंकर्स ज्यादा देर तक पीड़िता की बुजुर्ग मां से इंटरव्यू करने के लिए घेराबंदी कर रहे थे. दो बार बुजुर्ग मां बेहोश हो चुकी थी..एंकर्स के पंखा झलते शाट्स लगातार लाइव थे...दूसरे लोग कुढ़ रहे थे कि मां की आंसू सूख गई तो ड्रामैटिक विजुअल कैसे बनेंगे? 

एक वीभत्स और दर्दनाक घटना की मीडिया कवरेज एक हास्यास्पद नाटक की तरफ लगातार बढ़ रही थी. शाम होते-होते घटना के टीवी गिद्ध का शिकार छीनने यूट्यूबर नाम के सियार भी आ धमके थे..कोई सवर्ण जाति का यूट्यूबर था तो वो करणी सेना का इंटरव्यू ले रहा था और दो चार चैनलों के खिलाफ नारे लगवाकर यूट्यूब में अपने सब्सक्राइबर बढ़ाने की मुहिम चला रहा था तो कुछ दलितों के नेताओं को खड़ा करके सभी सवर्णों को खलनायक बता रहा था. कवरेज का ये अमल देखकर तमाम सारे लोग बदहजमी की चपेट में आ चुके थे. भूत प्रेत, स्वर्ग की सीढ़ी और रिपोर्टरों से छोटे मोटे नाटक करवाकर सालों से मीडिया का खमीर तैयार करवाने वाले कथित संपादकों का ये फार्मूला अब लगभग सड़ चुका है. इस सड़ांध की गटर से जमूरा पत्रकारिता का जिन्न बाहर निकल चुका है और वो धीरे-धीरे काली आंधी की तरह गंभीर और तथ्यों की पत्रकारिता को लील रहा है.


(रवीश रंजन शुक्ला एनडीटीवी इंडिया में रिपोर्टर हैं)

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