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क्या हैं गठबंधन के पॉवरप्ले में सोनिया गांधी की वापसी के मायने...

अंतिम चरण के मतदान से ऐन पहले दिखाए गए इस सफेद झंडे से साफ संकेत मिलते हैं कि पार्टी के उस शीर्ष नेतृत्व में पुनर्विचार किया गया है, जिसमें राहुल गांधी, उनकी मां सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ही अधिकतर हिस्से पर विराजमान हैं.

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क्या हैं गठबंधन के पॉवरप्ले में सोनिया गांधी की वापसी के मायने...

कांग्रेस पहले ही ऐलान कर चुकी है कि 'अगर उसे पीएम का पद नहीं मिलता है तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं.'

नई दिल्ली:

सो, कांग्रेस को ही झुकना पड़ा. राहुल गांधी के लिए प्रधानमंत्री पद हासिल करने की महत्वाकांक्षा को परे रखकर पार्टी ने दिन की शुरुआत अपने साथियों को यह संदेश देते हुए की, "कांग्रेस को कोई आपत्ति नहीं होगी, यदि उसे प्रधानमंत्री पद हासिल नहीं होता है..." यह घोषणा सुबह-सुबह की गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्टी के दिग्गज नेता गुलाम नबी आज़ाद ने की.

अंतिम चरण के मतदान से ऐन पहले दिखाए गए इस सफेद झंडे से साफ संकेत मिलते हैं कि पार्टी के उस शीर्ष नेतृत्व में पुनर्विचार किया गया है, जिसमें राहुल गांधी, उनकी मां सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ही अधिकतर हिस्से पर विराजमान हैं.

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ममता बनर्जी और मायावती दोनों ही कांग्रेस के साथ नजदीकी से बचती रही हैं. (File photo)

विपक्ष की राजनीति के इस दौर में नए साझीदार तलाशने के लिए उठाया गया यह पहला कदम है, और काफी अहम है, क्योंकि हाल ही में दक्षिण भारत की राजनीति के मज़बूत चेहरे और तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) प्रमुख के. चंद्रशेखर राव (KCR) ने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) प्रमुख एम.के. स्टालिन से मुलाकात की, ताकि यह चर्चा की जा सके कि एक हफ्ते में ही घोषित होने जा रहे चुनाव परिणाम के बाद कौन किसके साथ गठबंधन करेगा. बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मुखिया मायावती जैसे अन्य विपक्षी नेताओं ने तो देश के प्रशासन के शीर्ष पद पर विराजने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को ज़ाहिर करने में कतई संकोच भी नहीं किया है. मायावती ने तो उस संसदीय निर्वाचन क्षेत्र तक के बारे में बात कर ली, जिससे वह प्रधानमंत्री बनने की स्थिति आने पर चुनाव लड़ने का इरादा रखती हैं. ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) बार-बार कहते रहे हैं कि उन्हें स्टालिन का राहुल गांधी को प्रधानमंत्री कबूल करने का प्रस्ताव कभी स्वीकार नहीं हुआ. और अब, जब KCR संभवतः स्टालिन को कांग्रेस के साथ हुए गठबंधन से अलग खींचकर तीसरे मोर्चे में ले जाने की कोशिश करते दिखे, तो शायद कांग्रेस को समझ आ गया है कि उनका पुनरुद्धार, जिसके लिए दोनों भाई-बहन उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, इंतज़ार कर सकता है, क्योंकि अगर कांग्रेस ने 'मोदी के तूफान' को रोकने में अपनी भूमिका निभाने में कोताही बरती, तो पुनरुद्धार ही दांव पर लग जाएगा.


देर से (बेशक BJP-विरोधी वोटों को बांटकर बहुत ज़्यादा नुकसान पहले ही किया जा चुका है) यह एहसास होने के बाद कांग्रेस अब तैयार दिख रही है कि वह एक ईमानदार बिचौलिये की भूमिका निभाए, ताकि 23 मई के बाद बिखरे हुए विपक्ष का एकजुट होकर सरकार गठन की दिशा में काम कर पाना सुनिश्चित किया जा सके, बशर्ते BJP और उसके सहयोगी दल स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाएं.

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सोनिया गांधी विपक्ष की लीग में नए साथी खोजने की कोशिश कर रही हैं

इस पूरे चुनाव के दौरान लगभग नदारद रहीं सोनिया गांधी भी आखिरकार सामने आईं, ताकि विपक्षी नेताओं के अहम की तुष्टि कर सकें. पिछले 15 दिनों में उन्होंने फोन पर लगभग हर विपक्षी नेता से पहुंच बनाने की कोशिश की है. उन्होंने एम.के. स्टालिन तथा अन्य कई नेताओं को खत भी लिखे हैं, और उन्हें मुलाकात के लिए न्योता दिया है.

इनके अलावा, ओडिशा के 'गुट-निरपेक्ष' माने जाने वाले मुख्यमंत्री नवीन पटनायक तथा तेलंगाना में सूपड़ा साफ कर देने की भविष्यवाणी की वजह से मज़बूत दिख रहे KCR को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने फोन किया है, और उन्हें दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाकात के लिए आमंत्रित किया है.

एक ओर कमलनाथ अपने स्कूली दिनों के साथी नवीन पटनायक (दोनों दून स्कूल में पढ़ा करते थे) से बात कर रहे हैं, दूसरी ओर DMK के सूत्रों ने मुझे बताया है कि KCR से सोमवार को हुई मुलाकात में स्टालिन ने साफ-साफ चेता दिया है कि वह कांग्रेस को धोखा नहीं देंगे, और उन्होंने तो KCR को सुझाव दे डाला है कि वह फेडरल मोर्चे के ख्वाब को भूल जाएं, और ऐसे गुट में शामिल हो जाएं, जिसकी धुरी कांग्रेस हो... यह ऐसा सुझाव था, जिसे अब तक KCR असंभव बताते रहे हैं.

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डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने कहा था कि 'थर्ड फ्रंड के कोई आसार नजर' नहीं आ रहे. यह तेलंगाना सीएम केसीआर के लिए झटका था. 

वैसे, सूत्रों ने बताया है कि व्यक्तिगत रूप से KCR पहले से ही गुलाम नबी आज़ाद और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल के साथ संपर्क में हैं. कांग्रेस के एक और सहयोगी और मास्टर राजनेता शरद पवार ने अब तक के चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस को कोसती आ रहीं मायावती और उत्तर प्रदेश में उनके सहयोगी और समाजवादी पार्टी (SP) के मुखिया अखिलेश यादव से बात की है.

चौतरफा नज़र आ रहा नर्मी का दौर कतई अप्रत्याशित नहीं है - चुनाव नतीजे अब कुछ ही दिन दूर हैं, और क्षेत्रीय नेता त्रिशंकु लोकसभा दिखाई देने की स्थिति में सभी विकल्प खुले रखना चाहते हैं - हां, वे किसे चुनेंगे, उसका आधार होगा कि उनके राज्य के लिए बेहतर 'पैकेज' कौन देने वाला है.

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सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा अध्यक्ष मायावती

अब तक, वे सभी कहते रहे हैं कि वह मोदी-शाह को जाते हुए देखना चाहते हैं. बंगाल के एक वरिष्ठ नेता, जो BJP से कड़ी लड़ाई लड़ते रहे हैं, ने साफ-साफ कहा, "मैं BJP के साथ काम कर सकता हूं, मोदी और शाह के साथ नहीं... हमने इस पर भी चर्चा की है, और अगर उनकी 30 सीटें भी कम रह जाती हैं, तो विपक्ष उन्हें समर्थन नहीं देगा... वह ज़हरीली राजनीति करते हैं, और हमें देश के बारे में भी सोचना होता है..."

हालांकि हर राजनेता हमेशा राष्ट्रहित में काम करने का दावा करता है, लेकिन मोदी और शाह के प्रति यह नाराज़गी भी वास्तविक है. NDA में भी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे जैसे अधिकतर नेता इन दोनों को ज़िद्दी मानते हैं, जिनके साथ काम करना मुश्किल है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह (File photo)

यहां पर सबसे बड़ी गलती अपनी आदतों की वजह से खुद कांग्रेस है, जिसका ट्रैक रिकॉर्ड मौके गंवाने और देर से जागने का रहा है. लेकिन समूचे विपक्ष में सोनिया गांधी का सम्मान किया जाता है, क्योंकि उन्होंने UPA के दो कार्यकाल सुनिश्चित किए थे. ममता बनर्जी जैसे अधिकतर वरिष्ठ विपक्षी नेताओं का उनके साथ व्यक्तिगत जुड़ाव है. यहां तक कि BJP के सहयोगी, जैसे रामविलास पासवान, भी उनसे खुशी-खुशी बातचीत कर लेंगे. सोनिया गांधी अब गठबंधन के पॉवरप्ले में शामिल हो गई हैं, जो अब इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू हो गया है.

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स्वाति चतुर्वेदी लेखिका तथा पत्रकार हैं, जो 'इंडियन एक्सप्रेस', 'द स्टेट्समैन' तथा 'द हिन्दुस्तान टाइम्स' के साथ काम कर चुकी हैं...

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