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रेलगाड़ियां समय पर क्यों नहीं पहुंच सकतीं?

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रेलगाड़ियां समय पर क्यों नहीं पहुंच सकतीं?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

ट्रेन तो हमेशा ही देर चलती रही है, तो क्या इसी कारण यह सवाल पूछना बंद कर दिया जाए कि ट्रेन लेट क्यों चल रही है. इस वक्त तो कुहासा भी नहीं है न ही तीज त्योहारों के कारण स्पेशल ट्रेन की संख्या बढ़ी है, फिर भी कई ट्रेनें बीस से तीस घंटे की देरी से क्यों चल रही हैं. क्या इन रेलगाड़ियों में सफर करने वाले यात्रियों के समय की कोई कीमत नहीं. मीडिया के लिहाज़ से सोचिए. किसी दिन बीस हवाई जहाज़ चार से दस घंटे देर से उड़े उस दिन चैनलों पर तूफान मच जाता है. हाहाकार मच जाता, मगर ऐसा क्यों है और कब तक ऐसा रहेगा कि रेल गाड़ी देर से चले और हम सवाल न करें. लाखों लोग रोज़ इस देरी के कारण झुंझलाते हुए उतरते हैं और फिर सामान्य हो जाते हैं. उनके काम से लेकर पैसे का जो नुकसान होता है उसकी भरपाई कोई नहीं करता. हमने स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस की बात की. एक चूक हो गई. पहले बताया था कि यह ट्रेन बिहार के जय नगर से आनंद विहार तक चलती है मगर आनंद विहार नहीं यह नई दिल्ली से चलती है और जयनगर तक जाती है. स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर चल रही इस ट्रेन की तो कम से कम ऐसी पहचान होनी चाहिए थी कि सामान्य तौर से यह समय से चले.

12561 नंबर की स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस को दो मई की दोपहर दो बजे जयनगर से दिल्ली के लिए रवाना होना था. मगर यह ट्रेन जयनगर से खुलती है तीन मई की सुबह 2 बजकर 20 मिनट पर यानी 12 घंटे लेट. तीन मई को इसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर साढ़े बारह बजे पहुंचना था, मगर कार्यक्रम शुरू होने तक यह नहीं पहुंची थी. 2 मई को दिल्ली से जयनगर की ओर जाने वाली ट्रेन नंबर 12562 के रवाना होने का समय था शाम 8 बजकर 40 मिनट. वेबसाइट से पता चल रहा है कि यह ट्रेन दो मई को नहीं, तीन मई की रात 9 बजकर 30 मिनट पर खुलेगी यानी 24 घंटे लेट है. 2 मई की ट्रेन तीन मई को खुल रही है और तीन मई की ट्रेन चार मई को खुलेगी.

हमारे सहयोगी प्रमोद गुप्ता 3 मई की शाम साढ़े पांच बजे दरभंगा स्टेशन गए. वहां पता चला कि दिल्ली से दरभंगा आने वाली 12561 नंबर की स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस 24 घंटे लेट है. इसी ट्रेन को वापस जयनगर से दिल्ली के लिए जाना है. उस वक्त बताया गया कि अब यह ट्रेन दोपहर तीन बजे के बजाय सुबह के तीन बजे जाएगी यानी 12 घंटे की देरी से खुलेगी.

हमारे सहयोगी प्रमोद गुप्ता एक वीडियो भेजा है. दिल्ली से चलकर दरभंगा आने वाली स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस स्टेशन में प्रवेश कर रही है. इस ट्रेन को 2 मई की शाम साढ़े पांच बजे दरंभगा आना था मगर यह 3 मई को पहुंच रही है वह भी पौने सात बजे. यानी 24 घंटे से भी अधिक समय की देरी से दरभंगा आई है. अब इसी को जयनगर जाना है और वहां से तैयार होकर वापस दिल्ली के लिए रवाना होना है. आप यात्रियों के तनाव की कल्पना कीजिए तो इस रिपोर्ट का महत्व पता चलेगा. प्रमोद गुप्ता ने बताया कि यह ट्रेन 11 सितंबर 2015 को पहली बार चली थी. तब से लेकर आज तक यह समय से नहीं चलने के कारण ही जानी जाती है. कई बार समस्तीपुर मंडल इस ट्रेन को कैंसल कर समय से चलाने का प्रयास भी करता है तो भी यह ट्रेन वापस 5 घंटे से लेकर 22 घंटे की देरी से चलने लगती है. दरभंगा स्टेशन पर यात्री पूछ पूछ कर परेशान रहते हैं कि स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस कब आएगी, कब जाएगी. गांवों से आकर लोग प्लेटफार्म पर दस-दस बारह-बारह घंटे बैठे रहते हैं. क्या इनके वक्त की कोई कीमत नहीं है. रेलवे तो इन्हें एक ग्लास पानी भी नहीं पिलाता होगा.

इधर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर यात्री कई घंटे से इंतज़ार करते रहे, जयनगर से आने वाली और जयनगर को जाने वाली दोनों ट्रेन का. एक यात्री को 2 मई के स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस से जयनगर के लिए जाना था और एक यात्री को 3 मई के स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस से जाना था. दोनों कंफ्यूज बैठे थे कि 2 मई वाली ट्रेन आज जाएगी या 3 मई वाली ट्रेन आ जाएगी. 3 मई को नई दिल्ली स्टेशन पर जयनगर से आने वाली स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस शाम 6 बजकर 35 मिनट पर आई है. इस ट्रेन को दो मई के दिन दोपहर साढ़े बजे आना था. आई है 30 घंटे की देरी से.

सोचिए इस ट्रेन में अगर कोई स्वतंत्रता सेनानी सफर कर रहे हों, और उनके साथ बैठे यात्री बार-बार इस ट्रेन का नाम लेकर कोस रहे हों कि 20 घंटे 24 घंटे लेट रहती है. कोई इस ट्रेन का माई बाप ही नहीं है तो उन स्वतंत्रता सेनानी को कितना बुरा लगता होगा. सोचते होंगे कि अच्छा होता हम लोगों के नाम से ट्रेन ही नहीं चलती. यह स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान है कि उनके नाम से बनी ट्रेन कभी समय से नहीं चलती है. क्या रेल मंत्री पीयूष गोयल इस ट्रेन को समय से चला कर दिखा सकते हैं... हमने यह तय किया है कि जब तक स्वतंत्र भारत में स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस समय से नहीं चलेगी प्राइम टाइम में हर दिन इसका ज़िक्र करूंगा. इस ट्रेन में चलने वाले यात्रियों के अनुभव भयावह हैं. एक यात्री ने हमें मेसेज किया कि वे इस ट्रेन से अक्सर दिल्ली से मधुबनी जाते हैं मगर साल के 12 महीने यह ट्रेन 12 से 18 घंटे की देरी से तो चलती ही है.

क्षितिज मोहन ने 6 अक्टूबर 2016 को इस ट्रेन से यात्रा की थी, उस दिन के रनिंग स्टेटस का स्क्रीन शॉट भी भेजा है. उनका कहना है कि तब यह ट्रेन 31 घंटे की देरी से चल रही थी. उनका कहना है कि वे इस स्क्रीन शॉट को पूरी ज़िंदगी सहेज कर रखेंगे. ऐसे भी जागरूक यात्री होते हैं. एक और यात्री मृत्युजंय झा ने अपने परिवार के लोगों के लिए 1 जून का टिकट कटाया था, रोज़ इस ट्रेन का स्टेटस चेक कर रहे थे, मगर इसके लेट चलने की आदत से परेशान हो गए और टिकट ही कैंसिल करा दिया. इन्हें इस बात का यकीन था कि ट्रेन लेट होगी ही होगी. हम चाहते हैं कि सोमवार से यह ट्रेन समय पर चलने लगे और मृत्युंजय जी का परिवार दोबारा टिकट कटा कर इसी ट्रेन से दरभंगा जाए.

मृत्युंजय की बात सही है कि इस ट्रेन से काम करने वाले मेहनतकश लोग चलते हैं. उनके लिए एक दिन की देरी का मतलब है एक और छुट्टी और एक छुट्टी कटी तो महीने का वेतन कम हो जाएगा. अगर प्रधानमंत्री खुद को कामदार कहते हैं तो कामगारों को लेकर चलने वाली ट्रेन कभी लेट नहीं होनी चाहिए. जब रेल मंत्री पीयूष गोयल स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस को समय से चलवा देंगे तब हम दूसरी ट्रेन को समय से चलवाने का चैलेंज देंगे जो 20-20 घंटे की देरी से चल रही हैं. हमारे सहयोगी सलीम ने गोरखपुर मंडल के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी संजय यादव से बातचीत की कि कितनी गाड़ियां देरी से चल रही हैं. उन्होंने बताया कि अप्रैल के महीने में लगभग 5045 ट्रेनें चलाई गईं जिसमें से 2,182 गाड़ियां लेट हुईं. एक मिनट से लेकर ज्यादा लेट मानी गईं. इन्होंने कारण बताया कि अपनी क्षमता से ज़्यादा रेल गाड़ियां चला रहे हैं. रखरखाव के काम हो रहे हैं इस वजह से भी देरी है. लेकिन क्या यह देरी सिर्फ आज की है. पिछले कई महीने से कई रेलगाड़ियां देरी से चल रही हैं. यात्रियों की मानें तो स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस कभी समय से ही नहीं चली जो इसी रूट से गुज़रती है.

सलीम ने गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर इंतज़ार कर रहे कुछ यात्रियों से बात की. किसी को राजस्थान के हनुमानगढ़ जाना है, किसी को अंकलेश्वर जाना है तो किसी को सूरत. कोई 12 घंटे से स्टेशन पर इंतज़ार कर रहा है तो सात से आठ घंटे से. अवध आसाम एक्सप्रेस 18 घंटे की देरी से चल रही है. स्टेशन साफ सुथरा है मगर ट्रेन के चलने का समय वही है जो कभी था जो शायद हमेशा से ही रहा होगा.

देरी का कारण पूछिए तो ज़रूर बताया जाता है कि इस बार दुर्घटना की दरों में बहुत ही कमी आई है लेकिन यह तो रेलवे की क्षमता में सुधार बताता है. इसका मतलब यह कैसे हो जाएगा कि ट्रेन की रफ्तार 30 घंटे देरी से कर दें और फिर दावा करें कि दुर्घटना की दरों में कमी आई है.

फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा ने तीस साल बाद रेल यात्रा करने का फैसला किया. उन्होंने ट्वीट किया कि 30 साल बाद भी कुछ नहीं बदला है. उन्होंने तय किया कि लखनऊ से वाराणसी ट्रेन से चलते हैं. 29 अप्रैल को नीलाचंल एक्सप्रेस का टिकट लिया. इस ट्रेन को लखनऊ से दोपहर ढाई बजे रवाना होना था मगर चली रात के 12 बजे. दस घंटे की देरी से वे वाराणसी पहुंचते हैं. ट्वीट करते हैं कि टीवी पर बड़ी बड़ी बातें सब झूठ हैं. हिन्दुस्तान का सच हिन्दुस्तान से ही छुपा हुआ है.

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गाड़ी नं. 12487 सीमांचल एक्सप्रेस बिहार के अररिया ज़िले के जोगबनी से चलती है और आनंद विहार तक आती है. 1 मई को यह ट्रेन 22 घंटे 15 मिनट की देरी से खुली है. रेलवे इन्क्वायरी की वेबसाइट बताती है कि यह ट्रेन 1 दिन 3 घंटा 8 मिनट की देरी से आनंद विहार पहुंचेगी यानी 27 घंटे की देरी से. इन रेलगाड़ियों में चलने वाले यात्रियों के समय की कीमत होती तो देर से चलने की इस बीमारी को दूर कर दिया जाता. चार पांच घंटे तो यात्री बर्दाश्त कर लेते हैं मगर 20 घंटे और 27 घंटे की देरी को वो कैसे समझाएंगे. इसी तरह पटना कोटा एक्सप्रेस 24 घंटे की देरी से चलती है. इस देरी के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाए? अगर रेल मंत्री डाइनेमिक हैं तो रेल गाड़ियां क्यों नहीं डाइनेमिक हैं? ये सारी ट्रेनें क्यों 20 घंटे 24 घंटे की देरी से चलती हैं? नौकरी सीरीज़ की तरह कहीं ये रेलवे सीरीज़ न चल पड़े. कई ट्रेने हैं जो छह से दस घंटे की देरी से भी चल रही हैं. कम से कम रेलवे को 24 घंटे की देरी होने पर यात्रियों को मुआवज़ा देना चाहिए.

हमने यूपी के 12,460 बीटीसी शिक्षकों के संघर्ष को कई बार दिखाया. उन्होंने अपने संघर्ष से बड़ी कामयाबी हासिल की है. अदालत से कई बार अपना केस जीतने के बाद भी उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं मिल रहा था. जब आंदोलन तेज़ किया तो योगी सरकार को कहना पड़ा कि नियुक्ति पत्र देंगे और नियुक्ति पत्र देने की प्रक्रिया शुरू हो गई. बहुतों को मिल गई है और बहुतों को मिल रही है. इन सबने प्राइम टाइम के प्रति आभार व्यक्त किया है. हम उम्मीद करते हैं कि ये बहुत अच्छे शिक्षक बनेंगे. यह सही है कि हमने कई बार दिखाया मगर असली संघर्ष इन्हीं लोगों का था. यही लोग आपस में चंदा करके महीनों अदालती लड़ाई लड़ते रहे, सड़कों पर लाठियां खाते रहे. आप भी इन्हें बधाई दीजिए ताकि इनका उत्साह बना रहे. अब दूसरी लड़ाई है कि क्या पेंशन की व्यवस्था लोगों को वापस मिल सकेगी, निर्भर करता है लड़ने वाले कितना लड़ते हैं. इसके लिए सरकारी कर्मचारियों को नैतिक बल और आत्म बल का विकास करना होगा.


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