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क्यों कॉलेजों को नहीं मिलती सुविधाएं?

आप अपने शहर के किसी भी सरकारी कॉलेज में चले जाइये वहां देखिए कि पढ़ाई लिखाई की क्या हालत है. मेरा एक ही सवाल है. बच्चे को डॉक्टर बनाना है या दंगाई बनाना है. फैसला आपको करना है. किसी भी कस्बे में आज ढंग का कोई कॉलेज नहीं चल रहा है.

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क्यों कॉलेजों को नहीं मिलती सुविधाएं?

यूनिवर्सिटी सीरीज़ धीरे-धीरे लौटती रहेगी. 27 अंक पर हमने छोड़ा था, अब 28वें से शुरू कर रहा हूं जो यहां से नए तरीके से चलेगी. एक नेता ने कहा है कि हिन्दुओं को मंदिर के लिए शहादत देनी पड़ेगी. उस नेता ने कब कहा कि हिन्दुओं के पढ़ाई लिखाई अस्पताल के लिए हम प्रतिनिधि शहादत देंगे. ये जिस शहादत की बात कर रहे हैं क्या आपको लगता है कि इसमें अच्छे घरों के लोग जाएंगे. इस सवाल से क्यों शुरू कर रहा हूं. इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आप अपने शहर के किसी भी सरकारी कॉलेज में चले जाइये वहां देखिए कि पढ़ाई लिखाई की क्या हालत है. मेरा एक ही सवाल है. बच्चे को डॉक्टर बनाना है या दंगाई बनाना है. फैसला आपको करना है. किसी भी कस्बे में आज ढंग का कोई कॉलेज नहीं चल रहा है. तिस पर नेताओं को इतना आत्मविश्वास है कि पढ़ाई लिखाई पर कौन वोट देता है. नौजवान तो पढ़ने लायक रहे नहीं इसलिए उन्हें मंदिर के शहादत के लिए तैयार किया जाए. राज्यसभा में कनिमोई ने सरकार से एक सवाल पूछा और ये ख़बर हर अख़बार में छपी है. 14 मार्च को राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने तमिलनाडु से सांसद एम कनिमोई के सवाल का जवाब दिया.

- 2014 से 2016 के बीच 26,500 छात्रों ने आत्म हत्या की है.
- भारत में हर घंटे एक छात्र के आत्महत्या करने की ख़बर आती है
- गृह राज्य मंत्री ने कहा है कि हर साल यह संख्या बढ़ती जा रही है
- 2014 में भारत भर में 8,068 छात्रों ने आत्म हत्या की
- 2015 में भारत भर में 8,934 छात्रों ने आत्म हत्या की
- 2016 में भारत भर में 9,474 छात्रों ने आत्म हत्या की


तो उन सांसद जी को पता नहीं है कि आपके बच्चे शहादत दे ही रहे हैं. जिस मुल्क में तीन साल में 26,500 नौजवान आत्महत्या कर लें, उस मुल्क में सांसद ये कहें कि मंदिर के लिए हिन्दुओं को शहादत देनी होगी, आपको तय करना है कि आपको क्या करना है. वैसे थोड़ा पता कीजिएगा दंगों में किनके बच्चे मरते हैं. नेताओं के नहीं मरते हैं, ग़रीबों और साधारण परिवारों के बच्चे मरते हैं. चाहे वो हिन्दू हों चाहे वो मुसलमान हों. नेता तो दंगों के बाद फर्जी भाषण देकर सांसद बनता है, विधायक बनता है. तो आप तय कीजिए कि आपको किस लिए शहादत देनी है. यूनिवर्सिटी सीरीज़ की वापसी इसलिए भी होती रहेगी कि 27 एपिसोड दिखाने के बाद किसी पर फर्क नहीं पड़ा क्योंकि नेताओं को यकीन है कि आप किसी भी सरकार से यह मतलब समझते हैं जो काम न करें मगर जिसके नेता दिन रात हिन्दू मुस्लिम टापिक के आस पास बयान देते रहें. तो आप एक काम कीजिए, अपने शहर के किसी भी कॉलेज में जाइये देखिए कि वहां बिल्डिंग के अलावा क्या है. क्या वहां पर्याप्त संख्या में पढ़ाने लायक शिक्षक हैं. 30 से 40 प्रतिशत शिक्षक हर जगह नहीं मिलेंगे, कहीं-कहीं तो पचास से साठ फीसदी शिक्षक नहीं हैं. जब भी हम शिक्षा का निजीकरण या फीस के बढ़ने या टीचर के न होने की बात सुनते हैं, हमें लगता है कि इससे हमारा क्या. यह जानते हुए भी कि इसका नुकसान पैसे वालों के बच्चे नहीं, आप मध्यम श्रेणी और ग़रीब परिवारों के बच्चों को उठाना होगा.

दिल्ली की बसों में आप सुबह शाम घर दफ्तर के बीच यात्रा में यह तो हिसाब करते ही होंगे कि पेट काट कर पैसे बचा लेते हैं ताकि मेरा बच्चा आपसे कुछ अच्छा कर जाए और आपके जीवन में थोड़ी समृद्धि आ जाए. दही भल्ला बेचते हुए यह तो सोचते ही होंगे कि बस बीए पास कर जाए और बेटा या बेटी अफसरी का इम्तहान देने लगे. बेल का शर्बत तो कभी अंडा बेचते हुए यह ख़्याल तो आता ही होगा कि जिस स्थिति से आप गुज़र रहे हैं उससे बचने का एक ही तरीका है कि आपका बच्चा कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ले. ऑटो चलाने से लेकर ओला और उबर की कार चलाते चलाते आप दस से बारह घंटे का दर्द सह लेते हैं ताकि दो पैसे बच जाएं तो बच्चा कॉलेज से पढ़कर आपसे अच्छी ज़िंदगी की तरफ प्रस्थान करे. आप जैसे लोगों तक शिक्षा के निजीकरण की बहस नहीं पहुंचती है, सच पूछिए तो हम पत्रकारों में से भी बहुतों तक नहीं पहुंचती जबकि उनके बच्चे भी उसी सरकारी कॉलेज में जाने वाले हैं जिसकी फीस कम है. आप सभी ग़रीब और साधारण परिवार के मेहनतकश और ईमानदार लोग हैं. ज्यादातर आपकी पृष्ठभूमि के लोग आपसे बेहतर ज़िंदगी के अवसर तक नहीं पहुंच पाते हैं. अब सरकारी कॉलेज में फीस कम थी मगर चुपके से टीचर गायब कर दिए गए. कॉलेज तो गया मगर घूम फिर कर लौट आया. अब फीस बढ़ने लगी है. इससे होगा यह कॉलेज की पढ़ाई गरीब और निम्न मध्यमवर्ग परिवारों के बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल नहीं कर पाएंगे. आपने दो साल पहले सुना होगा कि महाराष्ट्र के सोलापुर से साइकिल मिस्त्री का बेटा आईएएस अफसर बन गया. 2007 में बनारस के एक रिक्शा वाले का बेटा गोविंद जयसवाल आईएएस बन गया. वैसे तो ज़्यादातर ग़रीब के बच्चे ग़रीब ही रह जाते हैं मगर एकाध इसलिए सफल हो पाते हैं कि कॉलेज की शिक्षा सस्ती है. अब जब यह महंगी होती चली जाएगी और आप इस बहस को छोड़कर हिन्दू मुस्लिम में ही फंसाए जाते रहेंगे तो आपके बच्चे के आईएएस बनने का एक परसेंट चांस भी खत्म हो जाएगा. बल्कि हो चुका है.

इसलिए जब होस्टल की फीस महंगी हो, कॉलेज की फीस बहुत महंगी हो जाए और हर फार्म की कीमत जीएसटी लगातर 500 से 1000 हो जाए तो समझिए कि आपके बच्चे के लिए आगे बढ़ने के मौके कम हो गए. अमरीका और ब्रिटेन की अच्छी और महंगी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले बच्चे पैसे वाले परिवारों के ही होते हैं. ग़रीब और मेहनत मज़दूरी कर अपने बच्चों को पढ़ाने का सपना तक नहीं देख पाते. क्या आप चाहते हैं कि बिना किसी बहस के, बिना आपकी जानकारी के भारत में यह हालात हो जाए. हो तो गया है वैसे लेकिन आप कब तक इस बहस से भागेंगे. इसलिए जब दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र जब निजीकरण और फीस को लेकर सड़क पर उतरें तो आप ग़ौर से सुनिए. क्या बातें हो रही हैं.

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के शिक्षक संघ ने आज से सत्याग्रह शुरू किया है. इनका कहना है कि एम फिल और पीएचडी के लिए सीट कम कर दी गई है जिसके कारण ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों का उच्चतम शिक्षा तक पहुंचने का रास्ता बंद हो गया है. जेएनयू में एक सिस्टम था, पिछड़े इलाकों से आने वाले साधारण छात्रों को अलग से अंक मिलता था ताकि वे महानगरों के छात्रों के साथ बराबरी कर सकें और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में सिर्फ अमीर और दिल्ली मुंबई के छात्र न पढ़ें बल्कि बलिया, देवरिया, दुमका, गुमला, समस्तीपुर, बक्सर, नीमच, सीकर, सोलन, पिथौरागढ़ के छात्र भी यहां आ सकें. शिक्षक संघ का आरोप है कि अब जो फैसले लिए जाते हैं उसमें शिक्षकों को शामिल नहीं किया जाता है. अचानक 14 मार्च को सात सेंटर के अध्यक्षों को उनके पद से हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने अटेंडेंस को अनिवार्य किए जाने के फैसले का विरोध किया था. क्या शिक्षक अपना मत रखेंगे तो उसके लिए उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए. एम फिल और पीएचडी में क्लास नहीं होती है, छात्र को अपने इलाके में घूम कर शोध करना होता है तो उसका अटेंडेंस क्यों होना चाहिए. इस अटेंडेंस से आखिर हासिल क्या होने वाला है. यह इतना बड़ा फार्मूला है तो देश के तमाम कॉलेजों में टीचर का अटेंडेंस कम क्यों है. टीचर क्यों नहीं हैं.

पीएचडी का छात्र 20 साल का नहीं होता है. उसे रिसर्च के सिलसिले में कभी लाइब्रेरी जाना होता है तो कभी किसी और से मिलने जाना होता है. यूनिवर्सिटी ने फैसला किया किया अटेंडेंस अनिवार्य होगा. लेकिन अगर कोई इस फैसले पर एतराज़ जताए तो क्या उसे रात के दस बजे हटा देने का ऑर्डर थमा देना चाहिए. इतिहास विभाग की प्रोफेसर सुचेता महाजन को विरोध करने के कारण पद से हटा दिया गया.

अगर यही सही पक्ष है तो हमें एक काम करना चाहिए. संविधान में संशोधन कर भारत में सवाल पूछने को गैर कानूनी घोषित कर देना चाहिए और नहीं पूछने पर दस हज़ार का महीने का स्कॉलरशिप मिलना चाहिए. चुप रहने की कुछ तो कीमत मिले. हम इस लेवल पर आ चुके हैं. पूछने पर संपादक की नौकरी चली जाती है, पूछने पर प्रोफेसर को रात दस बजे हटा दिया जाता है.

दिल्ली विश्वविदयालय के शिक्षक भी 19 से 23 मार्च तक के लिए हड़ताल पर हैं. 19 मार्च को नॉर्थ कैंपस के आर्ट्स फैकल्टी में जमा हुए और वहां से मार्च किया, धरना दिया. मुद्दा यह है कि सरकार ने एक नीति बनाई है कि कॉलेज अपना तीस फीसदी फंड खुद जुटाएंगे. सरकार ने HEFA नाम की नई संस्था बनाई है जिसका पूरा नाम है हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी. कॉलेज या यूनिवर्सिटी को अब इससे कर्ज़ लेना होगा. दिल्ली विश्वविद्यालय ही नहीं, आईआईटी ने भी कहा है कि अगर सरकार पैसे की जगह लोन देगी तो इसका असर छात्रों पर पड़ेगा. फीस महंगी हो जाएगी. महेश्‍वर पेरी ने बताया कि इसके कारण आज आईआईएम के दो साल की फीस 15 लाख तक पहुंच गई है, जबकि कुछ साल पहले मात्र दो लाख थी. क्या आप अपने बच्चों की पढ़ाई की फीस इस हद तक महंगी होने देना चाहेंगे. अगर संस्थान सरकार से ही लोन लेकर सरकार को चुकाते रहेंगे तो छात्रों के प्रोजेक्ट पर ख़र्च नहीं कर पाएंगे. दिल्ली विश्वविद्लाय शिक्षक संघ भी इस हेफा को लेकर एतराज़ जता रहा है. उनका कहना है कि उच्च शिक्षा महंगी हो जाएगी. पहले विश्वविद्‌यालय, आईआईटी या आईआईएम सरकार को प्रस्ताव भेजते थे और सरकार पैसा भेज देती थी कि पढ़ाई लिखाई में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. अब उन्हें लोन लेना पड़ रहा है. अगर शिक्षा महंगी होगी तो आम भारतीयों के बच्चे क्या 15 लाख या दो लाख की फीस देकर पढ़ पाएंगे. इसी को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहा है.

पेंशन का भी मसला बहुत गंभीर है. बहुत से शिक्षकों को पेंशन नहीं मिला है. जबकि रिटायर हुए काफी वक्त गुज़र गया है. नई पेंशन नीति का विरोध हो रहा है. डूटा के विरोध का एक और मसला है. यह थोड़ा जटिल है मगर भाव यह है कि इसके ज़रिए दलित और आदिवासी छात्रों को आने का रास्ता संकरा किया जा रहा है. शिक्षकों का कहाना है कि आरक्षण नीति में बदलाव किया जा रहा है. इसके लिए रोस्टर को बदला जा रहा है. इनका कहना है कि इसके कारण दलित और आदिवासी छात्रों का लेक्चरर और प्रोफेसर के पद पर पहुंचना पहले से भी मुश्किल हो जाएगा. विश्वविद्यालय के कार्यकारी परिषद के सदस्य राजेश झा का कहना है कि आरक्षित वर्ग में 25 प्रतिशत सीटें कम हो जाएंगी. इससे जो लोग एडहाक पर वर्षों से पढ़ा रहे हैं, नौकरी मिलने की उनकी संभावना भी समाप्त हो जाएगी.

आप जानते हैं कि डीयू में कई हज़ार अस्थायी शिक्षक पढ़ा रहे हैं. कायदे से इन सभी को परमानेंट कर देना चाहिए मगर कम को करना पड़े इसका रास्ता निकाला जा रहा है. क्या ऐसा है, ऐसा नहीं है तो इसी का जवाब दे दीजिए कि जब डीयू में शिक्षकों के पद ख़ाली हैं तो बाकी शहरों के कॉलेज में आपके बच्चों को पढ़ा कौन रहा है, टीचर या दीवार, या नौजवान होर्डिंग पर नेता जी का स्लोगन ही पढ़ रहे हैं. स्लोगन में स्वर्ग नहीं होता है. सिम्पल सवाल है, पद खाली हैं, क्लास में बच्चे हैं तो शिक्षक परमानेंट क्यों नहीं हैं. इस सवाल का जवाब नहीं है तभी इस तरह के बयान आते हैं कि मंदिर के लिए शहादत देने का टाइम आ गया है. अगर कॉलेजों पर 30 फीसदी फंड जुटाने का दबाव डाला जाएगा तो फीस काफी बढ़ने जा रही है.

अखबारों में दावा किया जाता रहता है कि जीएसटी के कारण टैक्स कलेक्शन बढ़ गया है. सरकार की कमाई बढ़ गई है फिर उस कमाई को पढ़ाई लिखाई पर क्यों नहीं ख़र्च किया जा रहा है. फिर बजट क्यों कम हो रहा है. क्या दावा सही नहीं है. आप इन शिक्षकों को लेफ्ट राइट के खांचे में मत देखिए. इनके जो सवाल हैं उसका असर आप पर ज़्यादा पड़ेगा. रही बात लेफ्ट राइट की तो राइट वाले भी रो रहे हैं. जिन्होंने नारे लगाए, मुखौटे पहने उनमें से भी बहुतों का परमानेंट नहीं हो रहा है. अब वे कह नहीं सकते मगर इनबॉक्स में मेसेज भेजते हैं कि हमारा इश्यू उठा दीजिए, क्या पता नौकरी मिल जाए.

आशय यह है कि साधारण परिवार के बच्चों के बर्बाद होने का इंतज़ाम पूरा हो चुका है. ईमानदार दारोगा, तहसीलदार, बेलदार, इंजीनियर, स्कूल के शिक्षक, बैंक के क्लर्क, 20-30 हज़ार कमाने वाले लोग अपने बच्चों को अच्छी और सस्ती शिक्षा नहीं दे पाएंगे. बिहार के कई विश्वविद्यालयों में बीए का सेशन दो से तीन साल लेट चल रहा है. अगर आप अपने बच्चों को बर्बाद होते देखना चाहते हैं कि तो उनका दाखिला बिहार के बीएन मंडल यूनिवर्सिटी, मगध यूनिवर्सिटी, बी आर अंबेडकर बिहार यूनिवर्सिटी, जयप्रकाश नारायण यूनिवर्सिटी में करा दीजिए. वहां तीन साल का बीए पांच से सात साल में कराए जाने का फार्मूला पेटेंट हुआ है.

नौजवान कॉलेज से निकलेगा ही नहीं तो बेरोज़गार होकर बाहर घूमेगा ही नहीं. बिहार के नौजवानों ने इसे स्वीकार भी कर लिया है. बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड में एक कॉलेज का नाम बता दीजिए जो ढंग से चल रहा हो, जहां योग्य और सारे शिक्षक हों. कायदे से बीस कॉलेज का नाम पूछना चाहिए था मगर एक का नाम नहीं बता पाएंगे ये. इसलिए अगर आपके बच्चे बर्बाद हो चुके हैं तो उन्हें मंदिर की शहादत के लिए भेज दीजिए, सांसद जी उनका इंतज़ार कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री का पटना यूनिवर्सिटी में दिया बयान मुझे याद है. पिछले साल पटना यूनिवर्सिटी के 100 साल होने पर उन्होंने कहा था कि दस प्राइवेट और दस सरकारी यूनिवर्सिटी को दुनिया की चोटी की 100 यूनिवर्सिटी में पहुंचाने के लिए पांच साल में 10,000 करोड़ दिए जाएंगे. 2016-17 के बजट में इस आइडिया का आगमन हुआ था. उस बजट में इसके लिए कोई पैसा नहीं दिखा. 2017-18 के बजट के एक्सपेंडिचर पेज पर इसके लिए 50 करोड़ का ज़िक्र मिला. देकर आए थे 50 करोड़ और देने की बात कर रहे थे 10,000 करोड़. 2018-19 के बजट में विश्व स्तरीय संस्थान बनाने के सामने 250 करोड़ लिखा है. उसके पहले के बजट में आपने सुना कि मात्र 50 करोड़ लिखा है. दो साल में कोई 300 करोड़ का ज़िक्र बजट में मिलता है. जबकि बात हुई है कि पांच साल में 10,000 करोड़ दिए जाएंगे.

यह सब तभी पता चलेगा जब आप अखबार पढ़ने और टीवी देखने का तरीका बदलेंगे. ज़रूरतें बढ़ गईं हैं मगर बजट कम होता जा रहा है. कुछ प्रतिशत बढ़ाकर बताया जाता है कि बढ़ा है मगर वास्तविक रूप से बहुत कमी आ रही है. आप कह सकते हैं कि जब व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और न्यूज़ चैनलों से ही विज्ञान और इतिहास पढ़ना है तो फिर कॉलेज पर पैसे ख़र्च क्यों किए जाएं. वैसे जब डूटा के शिक्षक प्रदर्शन कर रहे थे तब दिल्ली विश्वविद्यालय के मुक्त शिक्षा विद्यालय के छात्र भी पुतला लेकर फूंकने आ गए थे. इनकी मांग है कि अभी तक इनके पास कोर्स मटीरियल नहीं पहुंचा है. स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग में भी पांच लाख छात्र हैं. इन छात्रों को नवंबर के बाद दूसरे और तीसरे वर्ष का स्टडी मटीरियल मिला है जबकि सत्र तो जुलाई से ही शुरू हो जाता है. मई में इनकी परीक्षा होनी है. बिना किताब पढ़े ये परीक्षा कैसे देंगे तो पुतला फूंक रहे हैं. हिन्दी के नाम पर न जाने कितने मंत्री चैनलों पर आकर बवाल कर दें मगर इन छात्रों का कहना है कि हिन्दी माध्यम के छात्रों को भी कुछ विषय की अध्ययन सामग्री अंग्रेज़ी में दी जा रही है. जिसका स्टडी मटेरियल नहीं मिल रहा है उस विषय को शिक्षक भी नहीं पढ़ा रहे हैं. और स्टडी मटेरियल में लिखा गया है कि आप जांच लें कि दी गई सामग्री आपके सिलेबस में है या नहीं.

ये दिल्ली विश्वविद्यालय का हाल है, तो कस्बों और राज्यों की राजधानियों में क्या हाल होगा. आखिर हम बर्दाश्त कैसे कर रहे हैं कि बीएड की पढ़ाई का सत्र एक साल और दो साल देरी से कैसे चल सकता है. आगरा के डॉ. भीम राव अंबेडकर विश्वविद्यालय के एक छात्र का पत्र आया है. आप भी पढ़ लें...

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रवीश सर, हम लोग यूपी के डॉ. भीम राव अंबेडकर विश्वविद्याय आगरा में सत्र 2015-17 बीएड द्विवर्षीय पाठ्यक्रम के छात्र हैं, वैसे तो हम लोगों का परीक्षा और परिणाम जून-जुलाई 2017 तक आ जाना चाहिए था लेकिन विश्वविद्यालय की लापरवाही के कारण हम लोगों का द्वितीय वर्ष या अंतिम वर्ष की परीक्षा दिसंबर 2017 के अंतिम सप्ताह में संपन्न हुई थी. इसकी प्रयोगात्मक परीक्षा फरवरी 2018 में हुई लेकिन अभी तक परिणाम नहीं आया है. यूपी लोक सेवा आयोग में एलटी ग्रेड की वैकेंसी आई है, जिसमें हमें भी शामिल होना है परंतु परिणाम न आने के कारण हज़ार छात्रों का भविष्य अधर में है. विश्वविद्यालय के कुलपति और परीक्षा नियंत्रक को भी मेल किया गया है लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला है. बीएड सत्र 2015-17 के दूसरे विश्वविद्यालय के छात्रों का परिणाम जुलाई या अगस्त 2017 में ही आ गया है. सर आप नौकरी के प्राइम टाइम शो पर एक बार बोल दीजिए. शायद विश्विविद्लायय के कुलपति और परीक्षा नियंत्रक को कुछ समझ आ सके.

अगर इनके कमरे में लेदर की कुर्सी है और उस पर सफेद तौलिया है तो इन्हें कभी समझ नहीं आएगा कि हज़ारों छात्रों की ज़िंदगी से खेलने का दर्द क्या होता है. अगर इन छात्रों में से एक का भी भविष्य बर्बाद हुआ, नौकरी के अवसर से कोई चूक गया तो कौन ज़िम्मेदार होगा.


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