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हर बात की सज़ा छात्रों को ही क्यों?

जिनके इलाके में चोरी नहीं हुई, प्रश्न पत्र लीक नहीं हुए, उन छात्रों को अभी तक समझ नहीं आ रहा है कि उन्हें किस बात की सज़ा मिली है. जब इम्हतान कराने की क्षमता नहीं है तो फिर दसवीं की परीक्षा कराने की जल्दी ही क्या थी.

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हर बात की सज़ा छात्रों को ही क्यों?
दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा, गुनाहगारों की सख़्त सज़ा मिलेगी. जब हमारा सिस्टम अपने मंत्री के ज़रिए यह बोलता है तो समझ जाइये कि क्या होने वाला है. हमारे लापरवाह सिस्टम के पास सबसे बड़ा बयान यही है कि दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा. सीबीएसई की परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हुए और रद्द हुए मगर छात्र तो कई प्रश्न पत्रों के लीक होने की बात कह रहे हैं. जिनके इलाके में चोरी नहीं हुई, प्रश्न पत्र लीक नहीं हुए, उन छात्रों को अभी तक समझ नहीं आ रहा है कि उन्हें किस बात की सज़ा मिली है. जब इम्हतान कराने की क्षमता नहीं है तो फिर दसवीं की परीक्षा कराने की जल्दी ही क्या थी. एक परीक्षा की बात हो तो विश्वास कर लिया जाए कि दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा मगर यहां तो हर दूसरी परीक्षा के दोषी सत्ता में बैठे लोगों को बख़्शीश देकर आपको गुनाहगार बना जाते हैं, गुनाहगार इस मायने में कि आपकी यही ग़लती थी कि आप इन बातों पर विश्वास कर बैठे. व्यापम के दोषी आज तक घूम रहे हैं. जांच ही हो रही है, सुनवाई ही हो रही है इसलिए जब यह कोई कह दे कि गुनाहगारों को सख़्त सज़ा मिलेगी तो आप 20 लाख माता पिता ख़ुद को गुनाहगार समझ लें और मान लें कि आपको सज़ा मिल चुकी है.

बहुत से माता पिता और छात्र हमें ईमेल कर रहे हैं कि उन्हें किस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. जंतर मंतर पर कुछ माता-पिता और छात्रों ने प्रश्न पत्रों के लीक होने के विरोध में नारेबाज़ी की. इनकी मांग है कि पूरी परीक्षा दोबारा से हो क्योंकि कई जगहों से अलग-अलग प्रश्न पत्रों के लीक होने की बात सामने आ रही है. इन मांगों को लेकर हमें सावधानी बरतनी होगी. दिल्ली पुलिस ने इसकी जांच के लिए एसआईटी का गठन किया है. 15 जगहों पर छापे मारे हैं और कई लोगों से पूछताछ की है. पुलिस ने सीबीएसई से पूछा है कि परीक्षा सेंटर तक प्रश्न पत्रों के पहुंचने की प्रक्रिया क्या है. कुछ छात्रों तो यह भी दावा कर रहे हैं कि बायोलजी का पेपर भी लीक हुआ है. अकाउंटेंसी का पेपर लीक होने की बात भी छात्र कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ अंडमान और दुबई से लोग लिख रहे हैं कि जब उनके यहां पेपर लीक नहीं हुआ तो फिर दोबारा परीक्षा क्यों दें. एक छात्र ने कहा कि उसका सीबीएसई से भरोसा उठ गया है. जिस कोचिंग वाले के यहां दिल्ली पुलिस ने छापे मारे हैं, उसके समर्थन में छात्र ही उतर आए कि हमारे सर ऐसा नहीं कर सकते.

हमारी परीक्षा प्रणाली का यह हाल है कि मुंबई यूनिवर्सिटी में भी कापी जांचने का ठेका किसी प्राइवेट एजेंसी को दिया गया, कापी ऐसे जांची गई कि छात्र कई हफ्तों तक आंदोलन ही करते रहे. कई बार जब हम प्राइम टाइम करते हैं तब ख़बर को पढ़ते हुए अहसास होता है कि यह ख़बर दरअसल कुछ और है. 28 मार्च के प्राइम टाइम में हमने उत्तराखंड के प्राइवेट मेडिकल कालेज की फीस की ख़बर दिखाई थी. जिस तरह मानव संसाधन मंत्री प्रश्न पत्र लीक होने पर रात भर सो नहीं पाए, उस तरह तो नहीं मगर जितनी देर जागा उतनी देर सोचता रहा कि कहीं ये आर्थिक गुलामी तो नहीं है. ये आर्थिक गुलामी नहीं है तो और क्या है. आप एक मेडिकल कालेज में एडमिशन लेते हैं फिर पता चलता है कि उसकी फीस 7 लाख से 23 लाख हो जाती है. आप अब बीच में पढ़ाई छोड़ नहीं सकते और लोन लिया तो वो आपकी क्षमता से बाहर होगा, लिहाज़ा अब कालेज में पढ़ने के दौरान गुलाम तो बनेंगे ही उसके बाद भी वही हालत होगी. एजुकेशन लोन लेते हैं मगर 7 लाख की फीस 23 लाख कर देने का तुक समझ नहीं आया. क्या इन छात्रों से सब कुछ बिकवा कर हड़प लेने का यह इंतज़ाम है, अगर ऐसा है तो इसे ही आर्थिक ग़ुलामी कहते हैं क्योंकि अब अगर इससे मुक्ति चाहेंगे तो उन्हें कालेज छोड़ने के लिए 60 लाख देने होंगे. बहुत दर्शकों ने कहा कि प्राइवेट मेडिकल कालेज है, पैसे वालों के बच्चे पढ़ते हैं. जिनके यहां ब्लैक मनी होती है. यह धारणा है. प्राइवेट मेडिकल कालेज में कुछ सीटें पैसे वाले खरीद लेते हैं मगर यह कहना कि सारे बच्चे ऐसे ही हैं, ग़लत होगा.

इसलिए हमने कई मां बाप और छात्रों से पूछताछ की कि आप किस आर्थिक श्रेणी के हैं. पता चला कि ये सब नीट की प्रवेश परीक्षा में अच्छे नंबर लाने वाले साधारण घरों के छात्र हैं. इन्होंने दूसरे प्राइवेट कालेज में इसलिए एडमिशन नहीं लिया क्योंकि वहां 7 लाख की फीस थी और उत्तराखंड के प्राइवेट मेडिकल कालेजों की फीस 5 लाख थी. बहुत से छात्र बेहद साधारण परिवार के हैं. उनके लिए अब लोन लेना मुश्किल हो रहा है. जिस तरह से फीस बढ़ाई गई है वो अमानवीय है. किसी भी साधारण परिवार के लिए दो महीने के भीतर 30 लाख से लेकर 40 लाख तक की फीस का इंतज़ाम करना आसान नहीं होगा. इन्हें पता होता कि एक साल की फीस 23 लाख हो जाएगी तो यहां आते ही नहीं. आखिर कोई सरकार किसी प्राइवेट मेडिकल कालेज को 400 परसेंट फीस बढ़ाने की अनुमति कैसे दे सकती है. इसके विरोध में मेडिकल कालेज के 650 छात्र धरने पर बैठे हैं. इनमें से आधे उत्तराखंड के ही हैं. उनका भी बैकग्राउंड बहुत साधारण है.

आम दर्शकों ने पहली प्रतिक्रिया इसी तरह से दी कि प्राइवेट मेडिकल कालेज के हैं तो अमीर घरानों के हैं इसलिए दो महीने में 30 से 40 लाख रुपये दे सकते हैं. मगर अब आप समझ सकते हैं कि इनके साथ अन्याय हो रहा है. ये आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं. 20 लाख की फीस नहीं दे सकते हैं. आप जानते हैं कि उत्तराखंड में सरकार ने प्राइवेट मेडिकल कालेज को फीस बढ़ाने की छूट दे दी है जिसके कारण एमबीबीएस के प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष की फीस इस तरह बढ़ी है कि सुनकर आप चक्कर खा जाएंगे.

- पहले साल की फीस 6 लाख 70 हज़ार से बढ़ाकर 23 लाख कर दी गई है
- दूसरे साल की फीस 7 लाख 25 हज़ार से बढ़ाकर 20 लाख कर दी गई है
- तीसरे साल की फीस 7 लाख 36 हज़ार से बढ़कर 26 लाख कर दी गई है

यही नहीं जो छात्र दूसरे वर्ष में पहुंच चुके हैं उनसे पहले साल की बकाया राशि ली जाएगी यानी उन्हें 40 लाख रुपये देने पड़ेंगे. कोई भी इतनी फीस नहीं दे सकता. यह इस वक्त की बहुत बड़ी खबर है. अगर सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो ये मां बाप अपने बच्चों को डाक्टर बनाने के लिए बर्बाद हो जाएंगे. इनमें से ज़्यादातर साधारण परिवारों के हैं.

कहा जा रहा है कि छात्रों से हलफनामा लिया गया था कालेज जो फीस तय करेगा देनी होगी. एडमिशन के वक्त हर कोई साइन कर देता है लेकिन कोई यह नहीं सोच सकता कि 6 लाख से सीधे बढ़ाकर फीस 22 लाख कर दी जाएगी. आप समझ सकते हैं कि मां बाप और छात्रों पर इस वक्त क्या बीत रही होगी. एक मां को समझ नहीं आ रहा है कि 31 मई तक 41 लाख की फीस कहां से लाकर देंगे क्योंकि उसके दोनों बच्चे वहां पढ़ते हैं. कई लोगों को लगेगा कि यह मज़ाक है, सबके पास पैसे होते हैं बस ज़रा एक बार आप खुद को इनकी जगह रखकर सोच लीजिए, क्या आप सात लाख की जगह 23 लाख की फीस देना चाहेंगे.

कुछ मां बाप ने कहा है कि अगर वे अपना घर बार बेच भी दें तब भी इतना पैसा नहीं दे सकते हैं. क्या इस संकट पर मानव संसाधन मंत्री से लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को पहल नहीं करनी चाहिए. कुछ ने तो प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखा है.

हमारे सहयोगी दिनेश मानसेरा ने बताया कि गुरु राम राय मेडिकल कालेज एक बहुत ही प्रतिष्ठित ट्रस्ट से संचालित होता है. गुरु राम राय सिखों के सातवें वे गुरु हर राय जी के पुत्र थे. उन्होंने 1676 में अपना डेरा पन्थ कायम किया था. डेरा ए दून के नाम से इसका नाम देहरादून पड़ा. यहां हर साल धार्मिक मेला लगता है. गुरु राम राय ट्रस्ट के एजुकेशन मिशन के करीब 150 से ज़्यादा गुरु राम राय के नाम से हिन्दी और इंग्लिश मीडियम स्कूल चलते हैं. नर्सिंग कालेज हैं, कृषि कालेज हैं, संस्कृत कालेज हैं, डिग्री कालेज हैं, एक हजार बेड का अस्पताल है. 150 सीट वाला मेडिकल कालेज है. अरबों की संपत्ति है. पैसे की कोई कमी नहीं है. फिर भी मेडिकल कालेज की फीस 6 लाख 70 हज़ार से बढ़ाकर 23 लाख कर दी गई है. दिनेश का कहना है कि उन्होंने भी खुद कई बच्चों की पृष्ठभूमि चेक की है, कोई भी इतनी फीस नहीं दे सकता. अव्वल तो 6 लाख की फीस ही भारी थी मगर 23 लाख तो परमाणु विस्फोट के समान है.

मुझसे इनकी स्थिति देखी नहीं जा रही है, आखिर सरकार ने कैसे 400 फीसदी फीस बढ़ाने की अनुमति दी है. दिनेश मानसेरा का कहना है कि गुरु राम राय मेडिकल कालेज या ट्रस्ट की तरफ से कोई बोलने को तैयार नहीं है. सामने आए भी तो हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्लाय के वाइस चांसलर जो खुद फीस बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट गए थे. हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार की गठित कमेटी फीस का फैसला करेगी लेकिन कमेटी के बजाए सरकार के कैबिनेट ने फैसला कर लिया. मामला एक कालेज का नहीं बल्कि तीन प्राइवेट कालेज का है.

उत्तराखंड की यह फीस वृद्धि भयावह है. मध्य प्रदेश में मेडिकल प्रवेश परीक्षा में धांधली के खिलाफ लड़ने वाले आनंद राय ने बताया कि उनके राज्य में भी 20 लाख फीस नहीं है. पिछले साल नीट की पोस्ट ग्रेजुएट परीक्षा में जो प्रश्न पत्र लीक हुआ था, उस मामले में भी आनंद राय ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता हैं.

यही नहीं पोस्ट ग्रेजुएट की फीस 10 लाख से तीस लाख प्रति वर्ष कर दी गई है. छात्रों के मेसेज सुनाने लगूं तो आप सुन नहीं पाएंगे. उनकी नींद उड़ गई है. ये सभी मिडिल क्लास बैकग्राउंड से आते हैं. किसी तरह एक बार लोन ले लिया कि डाक्टर तो बन जाएंगे मगर उन्हें नहीं पता था कि 6 लाख की जगह 23 लाख और 10 लाख की जगह 30 लाख फीस हो गई. हमारा विपक्ष सो रहा है, सरकारें लापरवाह हो गईं हैं वर्ना इतनी ज़्यादाती तो कोई नशे में भी नहीं करता. क्या आपको नहीं लगता कि इन छात्रों के साथ नाइंसाफी हो रही है.

जान देने की कोई ज़रूरत नहीं, मगर कोई लापरवाह मंत्री भी इस शो को देख रहा है तो उसे एक बार के लिए सोचना चाहिए. इन छात्रों के साथ ये नाइंसाफी नहीं होनी चाहिए. ये सरासर आर्थिक गुलामी है.

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18 फरवरी 2018 को मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग ने 200 पदों के लिए परीक्षा ली थी जिसमें 5 लाख से अधिक छात्र शामिल हुए थे. इस परीक्षा में 15 ऐसे सवाल थे जो या तो गलत थे या उनके दो दो जवाब बनते थे. छात्रों ने हंगामा किया तो 5 प्रश्नों को डिलिट कर दिया गया है मगर छात्र कहते हैं कि इससे उनके साथ नाइंसाफी होने का ख़तरा है. फिर से पूरी परीक्षा होनी चाहिए. हाई कोर्ट से स्टे तो है मगर वो काफी नहीं है. ये छात्र इंदौर के भंवरकुआं इलाके में धरने पर चार दिनों से बैठे हैं, 29 मार्च को वहां से मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग तक मार्च भी निकाला. मध्य प्रदेश में एक और नियम है. अगर आपको लगता है कि परीक्षा में पूछा गया प्रश्न गलत है तो हर छात्र को चुनौती देनी होगी. चुनौती देने वाले छात्र को हर सवाल के लिए 100 रुपये देने होंगे यानी इस बार 1500 रुपये हर छात्र को देने पड़ेंगे तब जाकर वे उन 15 प्रश्नों को चुनौती दे सकेंगे. बेरोज़गारों से कमाने का यह मॉडल कमाल का है. बताता है कि समाज और सिस्टम में तर्क की जगह हमेशा हमेशा के लिए समाप्त हो गई है.

बिहार में एक नौकरी का किस्सा बताता हूं. 4 अगस्त 2016 को 234 जूनियर इंजीनियर की वेकैंसी निकली. एक साल के कांट्रेक्ट के लिए यह नौकरी थी. दो साल बीत गए हैं अभी तक पूरी बहाली नहीं हुई है. ये बिहार की हालत है जिसे दंगों में फूंक देने के लिए नेता और उनके पीछे युवा पागल हो गए हैं. छात्रों की इतनी हालत खराब है कि वे किससे कहें. अभी भी 43 सीट खाली है और बहाली नही हुई है.


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