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हम नफ़रत फैलाने वालों के शिकार क्यों बन रहे हैं?

हर जगह एक भीड़ खड़ी है, जिसे व्हाट्स अप के ज़रिए वीडियो और ऑडियो का इशारा मिलते ही वो दंगाई में बदल जाती है.

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हम नफ़रत फैलाने वालों के शिकार क्यों बन रहे हैं?
अब भी वक्त है, आप घरों से निकलकर समाज के छोटे-छोटे हिस्सों को दंगाई बनाने के इस प्रोजेक्ट के खिलाफ आवाज़ उठाइये. बहुत देर हो चुकी है और यह देरी बढ़ती जा रही है. हर जगह एक भीड़ खड़ी है, जिसे व्हाट्स अप के ज़रिए वीडियो और ऑडियो का इशारा मिलते ही वो दंगाई में बदल जाती है. हिन्दू-मुस्लिम डिबेट के ज़रिए लोगों में बराबरी से ज़हर भरा गया है. अफवाह की एक चिंगारी भीड़ को किसी के मोहल्ले में ले जाती है और लूटपाट से लेकर आगज़नी और हत्या कराने लगती है. 

हिन्दू-मुस्लिम डिबेट के केंद्र में है कि कैसे लगातार बहसों और प्रोपेगैंडा के ज़रिए आपके मन में मुसलमानों के प्रति नफ़रत भर दी जाए. इतनी भर दी जाए कि एक अफवाह भर से आप दंगा करने लग जाएं, ताकि इल्ज़ाम भीड़ पर आए और नेता आपके बीच संत की तरह आता रहे. पूरा तंत्र लगा हुआ है वीडियो शेयर करने वाला. वो आपसे लगातार पूछ रहा होगा, आपने इसका दिखाया, उसका नहीं दिखाया. बंगाल का दिखाया, केरल का नहीं दिखाया. सब जगह का दिखा दें तब भी वो लौटेगा कि ये नहीं दिखाया वो नहीं दिखाया. वो उन्हीं बातों को दिखाने की ज़िद करेगा जिनसे नफरत फैले. वो कभी ज़िद नहीं करेगा कि प्लीज़ इस नफरत को बंद कराओ. वो उस मौलवी की बात को दिखाने की ज़िद नहीं करेगा जो अपने बेटे की मौत के बाद भी हिंसा न करने की बात करता है. ज़रूर नफरत के इस खेल में दोनों समुदायों के लोग हैं, लेकिन क्या किया जाए, सिस्टम से कहा जाए कि सब पर बराबरी से कार्रवाई करो या इसे लेकर नफरत फैलाई जाए कि ये दिखाओ वो दिखाओ. 

सिस्टम कहीं भी किसी के साथ इंसाफ नहीं कर रहा है. आप अपने बच्चों से पूछिए कि क्या उनके मन में ऐसी कोई नफ़रत है, क्या उनके दोस्तों के मन में नफरत है. ख़ुद को चेक कीजिए कि क्या आपके मन में ऐसी नफ़रत है, ये मैं हिन्दुओं की भलाई के लिए कह रहा हूं. अगर आपके मन में नफ़रत है तो किसी आवेश में आपको दंगाई में बदला जा सकता है. बनाना चाहेंगे, आप यह भी चेक कीजिए कि आपके बच्चों का दोस्त कौन है, वो कैसी बातें करता है. नफ़रत से दूर रहिए. 

उत्तराखंड के रूदप्रयाग ज़िले के अगस्त्यमुनि इलाके में एक फेक वीडियो को लेकर हज़ारों लोग सड़क पर निकल आए. आप जानते हैं कि जो जांच की हालत है और प्रशासन की हालत है, कभी साबित नहीं होगा कि इसके पीछे कौन संगठन था मगर जो दिखा वह यही कि एक फेक वीडियो के आधार पर सैंकड़ों लोगों की भीड़ सड़क पर निकल आई और कानून अपने हाथ में लेने लगी. ये जलती तस्वीरें उस कस्बे की हैं जिस कस्बे का ऐसा मिज़ाज कभी रहा ही नहीं. मंदाकिनी नदी के किनारे केदारघाटी का एक छोटा कस्बा अगस्त्यमुनि जहां बीते शुक्रवार को अचानक गुस्साए लोगों की भीड़ सड़कों पर उतर आई और कई दुकानों, घरों को जलाती चली गई. इन गर्म दिमाग़ लोगों ने ना कुछ देखा, ना समझा बस एक अफ़वाह को सच मान कस्बे में मौजूद कई मुसलमानों की दुकानों को आग लगाते चले गए. उन्हें तोड़ते चले गए. उनमें रखे सामान को फेंकते रहे, कुछ लोग उन्हें लूट भी ले गए. शांत रहने वाला ये कस्बा अचानक सुर्ख़ियों में आ गया. 

सोशल मीडिया पर भी बिना सोच समझे पोस्ट पर पोस्ट डाली जाने लगीं, जिनमें अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाता रहा. इससे पहले कि पुलिस प्रशासन को कुछ समझ में आता स्थानीय अल्पसंख्यकों को भारी नुकसान हो चुका था. बिजनौर, सहारनपुर से कारोबार करने आए मुसलमानों की कई दुकानें भी इस गुस्से का शिकार हो चुकी थीं. यह साबित करता है कि अब लोगों को दंगाई बनाने के लिए किसी राजनीतिक दल के नेता को बयान देने की ज़रूरत नहीं है, आपके भीतर इतनी नफ़रत भर दी गई है कि आप सोशल मीडिया पर एक पोस्ट देखते ही आग बबूला हो उठते हैं और दंगाई बन जाते हैं. 

प्रशासन को भी देर हुई बताने में कि तस्वीर झूठी है जब तक प्रशासन बताता कि वीडियो से कुछ प्रमाणित नहीं हो रहा है, तब तक दुकानें जल गईं थीं. हिंसा भड़काने के लिए सोशल मीडिया पर जो आपत्तिजनक फोटो पोस्ट किया गया उसमें एक युवक और युवती के आधे शरीर दिख रहे हैं, चेहरे तक नहीं दिख रहे और इसे ऐसे दिखाया गया जैसे युवक मुसलमान है और लड़की हिन्दू. कहा जाने लगा कि युवक ने लड़की का बलात्कार किया है. इतनी सी बात पर उस कस्बे में नफ़रत की आग फैल गई. धारा 144 लागू कर दी गई, शनिवार को अगस्त्यमुनि समेत आसपास के प्रमुख कस्बों में पुलिस का फ्लैग मार्च किया गया. जब तक डीएम ने तस्वीर साफ की और कहा कि इस कस्बे में बलात्कार की किसी की ने रिपोर्ट भी नहीं कराई है और वीडियो की तस्वीरों से कुछ भी प्रमाणित नहीं होता है.

नौकरी सीरीज़ के दौरान बार-बार कहा कि आपके बच्चों को दंगाई बनाया जा रहा है. इस पूरी घटना पर हमने रूद्रप्रयाग के डीएम से बात की. उन्होंने जो बताया और भीड़ जिस बात को लेकर दंगाई हो गई दोनों में बहुत अंतर था. डीएम ने नहीं बताया कि कौन सा छात्र संगठन इसके पीछे है, मगर उन्होंने कहा कि गुरुवार शाम छात्र संगठन के कुछ लोग और व्यापार मंडल के व्यापारी तीन मज़दूरों को अगस्त्य मुनि में थाने में लेकर आए और कहा कि इन्होंने एक लड़की की आपत्तिजनक तस्वीर बनाई है और उसे सोशल मीडिया पर डालने की धमकी दी है. पुलिस इस मामले की जांच कर ही रही थी कि अगले दिन 6 अप्रैल को कई युवा और व्यापार मंडल के लोग सड़कों पर उतर आए और हंगामा शुरू कर दिया.

शुक्रवार शाम को वो लड़की पुलिस के पास आई और उसने कहा कि जब वो खेलकर घर लौट रही थी तो तीन मज़दूरों ने उसे रोका और कहा कि उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें उनके पास हैं और वो उसे सोशल मीडिया पर डाल देंगे. ये कहकर वो उसे धमकाने लगे. इस मामले में पुलिस ने तीनों मज़दूरों को गिरफ़्तार कर लिया है. इसके अलावा इन तस्वीरों को ग़लत तरीके से पेशकर सोशल मीडिया पर डालने के आरोप में दो लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. पांच लोगों को आगज़नी और तोड़फोड़ के आरोप में अब तक गिरफ़्तार किया गया है. अभी वहां शांत है मगर जिनकी दुकानें जली हैं ज़ाहिर है वो मायूस ही होंगे, सोच रहे होंगे कि वे किस बात के लिए गुस्से का शिकार हुए.

अब आप इन दुकानों को देखिए. केदारनाथ हाइवे पर इन दुकानों को मज़हब के हिसाब से चुना गया. यहां पर फोटोग्राफर, सैलून, रेडिमेड कपड़ों की दुकान थी, कॉस्मेटिक की दुकान थी, हार्डवेयर की दुकान थी, सब्जी बेचने वाले ग़रीब की भी दुकान थी. यहां हिन्दुओं की भी दुकानें हैं. मगर एक समुदाय की दुकानों को चुनकर किसी का सामान लूटा गया, किसी में आग लगा दी गई. ऐसा करने वाली भीड़ ने यह भी नहीं सोचा कि पचीस-तीस साल से यहां दुकानें चल रही हैं. जिस बात पर गुस्सा हैं वो बात भी सही नहीं है. किसी का ढाई लाख का नुकसान हुआ तो किसी को दस लाख का. दुकान के ताले तोड़ कर सामान निकालकर लूटा गया. कुछ दुकानदार दुकान बंद कर भागे, ताकि जान बचा सकें. इनमें से कोई कैमरे पर बात करने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि इन्हें डर है. सुशील बहुगुणा, दिनेश मानसेरा और गजेंद्र जी ने सारे इनपुट दिए हैं. 

आग लगाने वाली भीड़ के जा चुकने के बाद जो आग बुझा रहे वे पड़ोस के हिन्दू दुकानदार थे. इन सबको अगस्त्यमुनि के ताने बाने के जल जाने पर गहरा दुख है. यह स्टोरी इसलिए दिखा रहा हूं ताकि पता चले कि नफ़रत हमें कहां लेकर जा रही है.तो हमने भारत को यहां तक पहुंचा दिया. भीड़ की हिंसा के पीछे अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति भरी गई नफरत के अलाव कुछ नहीं था. अगर बलात्कार को लेकर ही गुस्सा था तो भी भीड़ को कोई हक नहीं है कि वो कानून हाथ में ले. 2015 में भारत भर में बलात्कार के 34, 651 मामले दर्द हुए थे. 2016 में बलात्कार के मामले में 12.4 प्रतिशत की वृद्धि हो गई. इस साल 38,947 मामले बलात्कार के मामले दर्ज हुए.

सोचिए अगर हर बलात्कार के पीछे भीड़ आ जाए तो कोई शहर जलने से नहीं बचेगा. गुस्सा बलात्कार को लेकर था या बलात्कार के बहाने किसी समुदाय को निशाना बनाने की रणनीति. यह सब सवाल है, जिनका जवाब देने में आप जानते हैं कि अब कहां सिस्टम में हिम्मत बची है. अब एक ऐसी कहानी बताता हूं जहां बलात्कार की शिकार अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए एक बाप ने ही खुद को आग लगा ली. उत्तराखंड में जिन लोगों ने दुकानें जलाईं हैं, उन्हें इस बाप के लिए भी आगे आना चाहिए, किसी की दुकान जलाने के लिए नहीं, इंसाफ की लड़ाई में मदद के लिए. दंगाई धर्म की आड़ में धर्म को बदनाम कर रहे हैं. इतनी बात आप कब समझेंगे. सिस्टम ठीक होता तो किसी के लिए कानून हाथ में लेना आसान नहीं होता. न भीड़ के लिए न कथित रूप से विधायक और उनके भाई के लिए. यह भीड़ एक दिन आपके घरों की तरफ भी आएगी या आपके घरों से किसी को अपनी तरफ ले जाएगी, किसी का घर जलाने, किसी की हत्या करने. अब आप फंस गए हैं.

आज राहुल सांकृत्यायन की 125वीं जयंती है. राहुल हिंदी के बड़े साहित्यकार और बड़े घुमक्कड़ थे. लगभग तीस भाषाओं के जानकार थे, साहित्य, दर्शन, राजनीति इत्यादि विविध विषयों पर उन्होंने 100 से अधिक किताबें लिखीं. तिबब्त से दुर्लभ पांडुलिपियों को वे भारत ले कर आए थे. जयंती के मौके पर आज उनके गांव कुछ पत्रकार गए हैं. शंभुनाथ शुक्ल और प्रकाश के रे ने वहां से तस्वीरें भेजी हैं. इस विद्वान यायावर ने भी धर्म की हिंसा पर जो कहा था, आज भी आप होता हुआ देख रहे हैं

उन्हीं के एक लेख का हिस्सा है जो 'द वायर' में छपा है. तस्वीरें उनके पैतृक गांव कनैला की हैं. राहुल ने कहा है कि धर्मों की जड़ में कुल्हाड़ी लग गया है और इसलिए अब मज़हबों के मेल-मिलाप की भी बातें कभी-कभी सुनने में आती हैं, लेकिन क्या यह संभव है? मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना है? अगर मज़हब बैर नहीं सिखलाता तो चोटी दाढ़ी की लड़ाई में यह हज़ार बरस से आज तक हमारा मुल्क बर्बाद क्यों है? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिए, आज भी हिन्दुस्तान के शहरों और गांवों में एक मज़हब वालों को दूसरे मज़हब बालों के ख़ून का प्यासा कौन बना रहा है? कौन गाय खाने वालों से गोबर खाने वालों को लड़ा रहा है. कनैला गांव में उनकी 125 वीं जयंती पर छोटा सा कार्यक्रम हुआ. उनकी बेटी जया सांकृत्यायन भी हैं. आप इन तस्वीरों में देख सकते हैं कि दो चार लोग अभी भी किसी को याद कर रहे हैं, जिसने आपको पहले ही याद दिला दिया था कि बातों को याद रखो इससे पहले कि धर्म के नाम पर आपका सब कुछ जला दिया जाए. 

8 अप्रैल की दोपहर यूपी के मुख्यमंत्री के आवास के सामने एक लड़की ने खुद को आग लगा ली. वह जलकर मर जाना चाहती थी क्योंकि उसका कहना है कि उसके साथ गैंगरेप हुआ. मामले के वापस लेने के लिए पिता को प्रताड़ित किया गया और पिता की मौत हो गई. इस लड़की ने गैंगरेप का आरोप बीजेपी के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर लगाया था. एक आरोप यह भी है कि मुकदमा वापस न लेने पर विधायक के भाई ने 3 अप्रैल को उसके पिता को बेरहमी से पीटा. पुलिस ने विधायक पर केस दर्ज नही किया बल्कि पुलिस ने पीड़िता और परिवार पर ही केस कर दिया और पिता को ज़ख्मी हालत में जेल भेज दिया. 
इस रोष के कारण पीड़िता और उसके परिवार के लोग उन्नाव से लखनऊ आए और खुद को जलाकर मारने की कोशिश की. इस मामले में 6 पुलिस अधिकारी सस्पेंड किए गए हैं. आरोपी विधायक का कहना है कि उनकी छवि ख़राब करने की साज़िश हो रही है. हो सकता है साज़िश हो मगर पिता की मौत क्या उनके भाई के मारने से मौत हुई है. एक बार आप सिस्टम के पास जाइये, वो हिन्दू हो या मुस्लिम दोनों को बराबर से तोड़ देता है. उसके भीतर की नाइंसाफियों से कोई बग़ैर हताश हुए नहीं लौटा है. आप उन युवाओं से बात कीजिए जो एसएससी की सीजीएल 2016 की परीक्षा पास कर ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं. इनमें हिन्दू भी होंगे और मुस्लिम भी. अगस्त 2017 में ही पास कर गए थे मगर तरह-तरह की प्रक्रियाओं के नाम से आठ महीने हो गए मगर ज़्वाइनिंग नहीं हो रही है. इनकी संख्या सौ से अधिक है और ये सभी सीबीआई के सब इंस्पेक्टर के लिए चुने गए थे. यही नहीं 2012 में भी कुछ लोग चुने गए थे जो कोर्ट में केस लड़ रहे हैं ज्वाइनिंग के लिए.

ये सीबीआई के दफ्तर फोन करते हैं, कुछ का कुछ जवाब मिलता है मगर ज्वाइनिंग की चिट्ठी नहीं मिलती है. 7 महीने बगैर किसी वेतन के घर बैठे हैं. उनकी आवाज़ में कातरता आ गई है. एसएससी की परीक्षा से पास हुए छात्र जो फिल्म डिविज़न विभाग के लिए चुने गए थे वे भी अपनी ज्वाइनिंग को लेकर परेशान हैं. हमने अपनी सीरीज़ में इनकी बात कई बार उठाई है. सरकार ही समय पर अपना वादा पूरा नहीं करती है. सब कुछ इतना फास्ट होने लगा है तो इनकी नौकरी में इतनी देरी क्यों हो रही है. आप इनसे पूछिए कि टीवी पर क्या देखना चाहते हो यही कहेंगे कि नौकरी सीरीज़. हमें नौकरी चाहिए. ग्रामीण बैंक से रिटायर हुए एक अधिकारी ने भी पत्र लिखा है. कितनी कातरता भरी है. आपकी भी वही हालत हो जाएगी जब पता चलेगा कि आपको अब 1800 रुपये के मासिक पेंशन पर रहना होगा. आखिरी सैलरी 1 लाख और रिटायरमेंट के अगले महीने 1800. ये सब मुझसे उम्र में बड़े हैं, मगर पत्र लिखते हुए इतने कातर हो चुके हैं, इनके भीतर इतनी निराशा भर गई है कि मुझे लगता नहीं कि मैं भारत के नागरिक से बात कर रहा हूं. हिन्दू मुस्लिम डिबेट आपकी नागरिक शक्ति को कुचल देता है. या तो भीड़ बनकर मर जाइये या भीड़ बनकर किसी को मार दीजिए. यही बहुतों की नियति है. कितना दुखद है. 

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सरकार का कोई मंत्री बता सकते हैं जो इन्हें इंसाफ दिला सकता है, आप ही बता दीजिए वैसे ये सबके यहां जाकर ट्वीट कर चुके हैं. आपका भारत बहुत बदल गया है. आपने बदलने कैसे दिया. 3 अप्रैल से रोहतक पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस, पीजीआई के एमबीबीएस और बीडीएस के इंटर्न धरने पर बैठे हैं. ये तरह तरह से आंदोलन कर रहे हैं ताकि प्रशासन इनकी बात सुन ले. इनका कहना है कि इन्हें हर महीने 12000 का भत्ता मिलता है, जबकि बाकी केंद्रीय संस्थानों में 17,900 मिलता है. उन्हें भी 17,900 रुपये मासिक भत्ता दिया जाए. सात दिनों से 24 घंटे ये धरना दे रहे हैं. पीजीआई रोहतक के समर्थन में हरियाणा के कई सरकारी मेडिकल कॉलेज के 2500 से अधिक मेडिकल इंटर्न और छात्र हड़ताल पर चले गए हैं. हरियाणा के सभी मेडिकल कॉलेज रोहतक के पंडित बीडी शर्मा यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ एंड साइंस के तहत आते हैं. इनका कहना है कि एम्स के ओपीडी में 12,000 मरीज़ आते हैं और पीजीआई की ओपीडी में 10,000 मरीज़ आते हैं. संख्या में बहुत अंतर नहीं है लेकिन एम्स के इंटर्न को 17,900 रुपये मासिक मिलता है और रोहतक पीजीआई में 12000 ही मिलता है.

हरियाणा में मज़दूरों की दिहाड़ी 480 रुपये है और मेडिकल इंटर्न को रोज़ के 400 मिलते हैं. इन मुद्दों के लिए इनसे प्रभावित लोगों के अलावा कोई राजनीतिक संगठन जिद नहीं करता, धमकी नहीं देता कि ये दिखाओ तब मानेगे, हमेशा उन्हीं बातों को लेकर क्यों कहता है जिनसे नफरत फैलती है कि ये दिखया वो नहीं दिखाया है. इतनी ही फिक्र है तो कल से ग्रामीण बैंक के रिटायर लोगों की पेंशन 1800 से बढ़ाकर इतना तो कर दो जितना जीने के लिए चाहिए. सीबीआई के सब इंस्पेक्टर की ज्वाइनिंग के लिए इंतज़ाकर कर रहे नौजवानों को ज्वाइनिंग लेटर दे दो.


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